मंगलवार, 13 मार्च 2012

क्रोध, मान, माया, लोभ सबसे बडे शत्रु


क्रोध विवेक को नष्ट कर देता है। क्रोध जब व्यक्ति को आता है तो वह बेभान हो जाता है, उसे करणीय-अकरणीय का विवेक नहीं रहता, वह प्रीति को समाप्त कर देता है। मान, विनय को नष्ट कर देता है। अभिमान में व्यक्ति को यह ध्यान नहीं रहता कि मेरे सामने कौन खडा है? उनका विनय किस प्रकार किया जाए? वह तो स्वयं को सर्वेसर्वा मानता है। अभिमानी व्यक्ति को जरा-सी प्रतिकूलता मिली नहीं कि वह क्रोध से आगबबूला हो उठता है। माया, मैत्री भाव को नष्ट कर देती है। माया-छल-कपट जब व्यक्ति के भीतर जाग जाता है तो फिर वह मित्र को भी मित्र नहीं मानता। उससे भी छलावा करने लगता है। मायावी व्यक्ति में अहंकार भी होता है और क्रोध भी।

और लोभ जब व्यक्ति के भीतर जाग जाता है, तो वह सर्वनाश कर देता है। सब कुछ नष्ट कर देता है। लोभ तो सारी इज्जत को मिट्टी में मिला देता है। सारी प्रतिष्ठा को धूल में मिला देता है। इतना ही नहीं, लोभ के आ जाने पर सारा जीवन ही नष्ट हो जाता है। लोभ हमारे भीतर जाग जाता है, तो हम ' पर' के साथ मैत्री कर लेते हैं। पर के साथ जब मैत्री होने लगती है, तो वहीं सारी विषम स्थितियां पैदा हो जाती है। लोभी व्यक्ति में माया भी होती है और अहंकार व क्रोध भी।

क्रोध, मान, माया और लोभ ये आत्मा के स्वभाव नहीं, आत्मा के गुण नहीं, ये विभाव हैं, ये सभी बाहरी, पर संयोगों का परिणाम हैं। ये चारों किसी न किसी रूप में अन्योन्याश्रित भी हैं और साथ-साथ भी चलते हैं। क्रोध, मान का कारण भी है। मान, माया का कारण भी है। माया, लोभ का कारण भी है। क्रोध, मान, माया और लोभ आत्मा के सबसे बडे शत्रु हैं, इनसे बचेंगे तो ही यह मानव भव सार्थक होगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 12 मार्च 2012

क्रिया से पहले जानों कि क्या और क्यों कर रहे हो!


पहले ज्ञान प्राप्त करो उसके बाद आचरण करो। अगर तुम्हें ज्ञान ही नहीं है कि अमुक पदार्थ में जीव है, पानी में जीव है, तो उन जीवों के प्रति दया कैसे जागेगी? करुणा कैसे जागेगी? इसलिए जीवन में क्रिया करने से पहले विवेक का होना, ज्ञान का होना जरूरी है। साधना करो, लेकिन साधना करने से पूर्व, उस क्रिया को आचरण में लाने से पूर्व, उसका ज्ञान करो। ज्ञान पहले आवश्यक है, उसे क्रिया के पहले जानो।

हमारे पास क्षमता है सोचने-समझने की। बुद्धि है हमारे पास, लेकिन हम उसका सही उपयोग नहीं कर रहे हैं। आत्मकल्याण में हम अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं कर रहे हैं। संसार वृद्धि में, संसार के कार्यो में हम अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। वास्तव में स्वयं के साथ स्वयं की शत्रुता बढा रहे हैं। हम स्वयं अपनी आत्मा के शत्रु बने हुए हैं। गलत मार्ग पर हमारी आत्मा चलती है तो वह स्वयं की शत्रु बनती है और सही मार्ग पर चलती है तो स्वयं की मित्र बनती है। लेकिन आज हमारी स्वयं की मनःस्थिति ऐसी बनी हुई है कि हम सभी अधिकांश रूप से हमारी आत्मा के शत्रु बने हुए हैं।

जब तक हमारा ध्यान आत्मा के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने वाले इन नाशवान् पदार्थों के प्रति लगा रहेगा, चाहे वह नाशवान पदार्थ शरीर हो या शरीर की कोई अन्य सम्पदा हो। जब तक हम बाह्य तत्त्व से जुडे हुए हैं, अपने से भिन्न तत्त्व से जुडे हुए हैं, तब तक हम अशान्त ही रहगें। ज्ञानियों ने कहा है कि द्वैत भाव में शान्ति नहीं होती है। शान्ति होती है अद्वैत भाव में रहने पर। अद्वैत में हम कब जा सकते हैं, जब केवल आत्मा में जाएं। पर की बात ही हम न करें। पर के प्रति हमारा ध्यान ही न रहे।

अभी हमारी मैत्री जड पदार्थों के साथ है। जड पदार्थ ही हमें संसार में बांधे हुए हैं। जड पदार्थों के प्रति हमारी आसक्ति होती है और आसक्ति के कारण जन्म-मरण होता है। हम बार-बार संसार में जन्म लेते हैं। जन्म-मरण का मूल आधार क्या है? पदार्थों के प्रति हमारा राग-भाव। यह राग-भाव ही हमारे भीतर आसक्ति पैदा करता है। बन्धन का कारण क्या है? बन्धन का कारण भी यह राग-भाव ही है। हमारे भीतर जिस किसी के प्रति आसक्ति रह जाती है, उस रूप में हमारा जन्म पुनः हो जाता है। और यह जन्म-मरण का चक्कर अनवरत चलता रहता है।

यदि आप इस जन्म-मरण के चक्कर से सर्वथा-सर्वदा के लिए मुक्त होना चाहते हैं, तो कोई भी क्रिया करने से पहले इतना जरूर विचार करिए कि मैं क्या कर रहा हूं? किसके लिए और क्यों कर रहा हूं? क्या जीवन का यही उद्देश्य है? यदि आप मुक्त होना चाहते हैं तो इसी चिंतन से आगे की राह निकलेगी।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 11 मार्च 2012

दूरदृष्टा महापुरुष


अब से लगभग आठ दशक पूर्व देश में सर्वत्र आजादी-स्वतंत्रता के नारे गूंज रहे थे। गांधीजी ने ‘हिन्द-स्वराज’ पुस्तक में लिखा था कि ‘संसदीय प्रणाली की लोकशाही तो वैश्या व वंध्या जैसी है, हिन्दुस्तान यदि उस प्रवाह में बह गया तो बर्बाद हो जाएगा।’ लेकिन, गांधीजी स्वयं भी लोकशाही के प्रवाह में बह गए। उस समय व्याख्यान वाचस्पति पूज्यपाद आचार्य भगवन श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने अपनी दूरदृष्टि से इस लोकशाही, चुनाव-पद्धति तथा बहुमतीवाद का प्रचण्ड विरोध किया था। पूज्यश्री ने कहा- ‘इस चुनाव-पद्धति से गुण्डाशाही को प्रोत्साहन मिलेगा, गांव-गांव में कलह-क्लेश खडे हो जाएंगे, जातिवादी मानसिकता से भाईचारा खत्म हो जाएगा, धन का भयंकर दुर्व्यय होगा, सज्जनों के बजाए दुर्जनों का बोलबाला बढेगा।’

उन महापुरुष की भविष्यवाणी आज सत्य सिद्ध होती दिखाई दे रही है।

शनिवार, 10 मार्च 2012

बच्चों में धार्मिक संस्कारों की जरूरत


आज समाज में संस्कारों की कितनी कमी होती जा रही है? आजकल के माता-पिता को फुर्सत नहीं है कि वे आधा घंटा भी अपने बच्चों के पास बैठकर उन्हें धर्म की शिक्षा दें, समझाएं, अच्छे संस्कार दें। आजकल के माता-पिता तो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के नाम पर कान्वेन्ट में डाल देते हैं। आप सोचते हैं कि कान्वेन्ट (अंग्रेजी ढंग का बाल विद्यालय) में पढने जाएगा तो हमारा बच्चा इन्टेलीजेन्ट (चतुर) बनेगा। पढ-लिखकर होशियार बन जाएगा और आगे चलकर बडा आदमी बन जाएगा। वहां जो शिक्षा परोसी जाती है, उसमें आत्मा कहां है? वहां तो जहर ही जहर है। संसार में बिगडने, भटकने के साधन बढते जा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों के साधन घटते जा रहे हैं। ये सब आपने विचार नहीं किया। आप उसे कितना ही सम्हाल कर रखिए, लेकिन जब बचपन से ही बच्चा ऐसे माहौल में पलता है, पढता है, जो सीखता है, उसमें वे संस्कार आएंगे ही। एक बार उसमें हमारी संस्कृति के विपरीत संस्कार भर गए तो वह आपसे लुक-छिप कर अण्डा खाएगा, मांस खाएगा, शराब पिएगा। आप कहाँ देखेंगें, आपको इतनी फुर्सत है?

आजकल के बच्चे बीडी-सिगरेट पीते हैं? बच्चों में ये संस्कार कहां से आए? सिगरेट तो पिताजी पीएंगे। पैकेट (डिब्बा) बाजार से बच्चे को लाने के लिए भेजते हैं। बच्चा देखता है कि पिताजी रोजाना बीडी-सिगरेट पीते हैं। देखता है तो नकल करता है। उसमें ये आदत शुरू हो जाती है। जैनियों की सन्तानें कहां जा रही है? क्या हमारी जैन परम्पराएँ है और आजकल के लडके क्या कर रहे हैं? मांस, अण्डा, शराब जीवन के अंग-सम बन गए हैं। जैन-अजैन में कोई फर्क नहीं रह गया है।

कई जैनियों के जीवन में इतनी विद्रूपता है कि यहाँ आकर तो वे धार्मिक क्रियाएँ करते हैं, धर्म-साधना करते हैं और घर जाकर मांस पकाते हैं। मांस खाते हैं। शराब पीते हैं। ये वृत्तियाँ जीवन में बढती जा रही हैं। आज पक्के जैनत्व के संस्कार कहाँ हैं? आज बच्चों को जैनत्व के संस्कार नहीं दिए जा रहे हैं। अगर बच्चों में संस्कार डाले जाएं तो बच्चा क्या से क्या बन सकता है।

वह माता शत्रु के समान है, जिसने अपने बालक को संस्कारित नहीं किया। वह पिता वेरी के समान है, जिसने अपने बच्चे को संस्कार नहीं दिए। कितने माता-पिता हैं, ऐसे जो कम से कम आधा घण्टा बैठ कर अपनी सन्तानों को धार्मिक-नैतिक संस्कार देते हैं? आज इसकी महति जरूरत है। पूरे जैन समाज से यह बहुत बडी अपेक्षा है कि बच्चों को संस्कार सम्पन्न बनाने के लिए प्रयास किए जाएं। इसके लिए समाज में आज संस्कार-क्रान्ति की आवश्यकता है।    -आ. श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

 आज हम देखते हैं संस्कारों के अभाव में ही भक्ष्याभक्ष्य का विवेक नहीं रहा और परिणामतः बच्चों-युवाओं में कई प्रकार की शारीरिक-मानसिक बीमारियां पैदा होती जा रही है। बच्चे प्रायः कार्टून चेनल्स और वीडियो गेम्स के जरिए हिंसक मनोवृत्ति के शिकार हो रहे हैं। आचार्य श्रीमद् विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा का उक्त कथन लगभग सात दशक पूर्व का है, लेकिन आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

खनन और खान माफिया

मध्यप्रदेश में खान माफिया ने जो कुछ किया, अत्यंत दुःखद है, किन्तु मैं देश और मीडिया को यह बताना चाहता हूं कि देश में किसी भी राज्य की तुलना में राजस्थान में सबसे ज्यादा 65 प्रकार के मिनरल्स हैं और यहां सभी दलों के बडे राजनेता व बडे अधिकारी माइनिंग के कारोबार में किसी न किसी प्रकार से लिप्त हैं। यहां गैरकानूनी माइनिंग भी है और हजारों कामगार मरते भी हैं, लेकिन उनकी कोई आवाज नहीं है। यहां तो हालत यह है कि वन विकास के नाम पर केन्द्र से करोडों रुपये लेकर अफसरों ने वहां दो ही महीनों में वन विकास भी बता दिया और फिर उसी भूमि को राजस्व भूमि बताकर उसमें माईंसें आवंटित करली। अफसरों और नेताओं ने इन माइंसों से करोडों-अरबों रुपये कमा कर पूरी अरावली श्रृंखला को बर्बाद कर दिया है। मेरे पास कई तथ्य हैं और पिछले 20 साल से लगातार इस पर लिख रहा हूं, लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनें। यहां बहुत दर्दनाक और भयावह परिस्थितियां हैं। आने वाली पीढयां रोएंगी, यदि अब भी किसी ने ध्यान नहीं दिया तो!

पढ़िए-

अकाल....अकाल....अकाल

किसे दोष दिया जाए?

अमानवीय एवं विनाशक नीतियां और खनन?

अति संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र में खनन

अनियंत्रित खनन

अवैज्ञानिक खनन

खनन से जल-स्रोतों का विनाश

खनन से कृषि भूमि का विनाश

खनन से चरागाह का विनाश

खनन से वन विनाश

पहाडों का पूरी तरह सफाया

खनन क्षेत्र का चट्टानी रेगिस्तान में बदलाव

परिणाम- अकाल

इन तथ्यों की सच्चाई राजसमन्द के रूप में आप के सामने है

विकास का यह कौनसा मॉडल है?

जीवन क्या है?


जीवन को धन्य बनाने की बात तभी बन सकती है, जबकि जीवन को सही रूप से समझ लिया जाए। अभी हममें से बहुत कम व्यक्ति ऐसे होंगे, जिन्होंने जीवन को सर्वांगीण रूप से सर्वतोभावेन समझ लिया हो। जीवन को जी लेना अलग बात है। जीवन को जीवन के तौर-तरीके से जी लेना, जीवन की सम्यक उपयोगिता को समझ लेना और उसके आधार पर जीवन को जीना अलग बात है।

जब तक हम जीवन को ठीक तरह से समझ नहीं लेते कि यह जीवन पंचभूत तत्वों-पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश से हटकर भी कुछ और है, तो हमें यह बात समझ में आ सकती है कि हमारा जीवन स्थूल से परे सूक्ष्म सत्ता है।

अगर हमें अपने जीवन को ठीक तरह से समझना है, ठीक तरह से जानना है तो, हमें अपनी बाहर की सारी दौड को बंद करनी होगी। बाहरी परिवेश से अलग हटना होगा, जीवन की सारी यात्रा को बदल देना होगा। जीवन की सारी दिशा को परिवर्तित कर देना होगा। अभी तक की हमारी सारी यात्रा बहिर्भाव की यात्रा थी। स्वभाव की यात्रा नहीं बनी। जीवन में इस बहिर्भाव में हमने अपने स्वभाव को इतना भुला दिया है कि हमारे समक्ष यह बहिर्भाव ही स्वभाव बन चुका है। हम अब स्वभाव की चर्चा ही नहीं करते हैं।

आप आज आत्मा की मूल सत्ता को भुलाए बैठे हैं। हम शान्ति को, आनन्द को पाना चाहते हैं, लेकिन उसे बाहर ही बाहर खोज रहे हैं। पर पदार्थो में, पर-घरों में शान्ति खोज रहे हैं। यह जीवन नहीं है।

जीवन एक पवित्र यज्ञ है। लेकिन, उन्हीं के लिए जो सत्य के लिए अपनी आहुति देने को तैयार होते हैं। जीवन एक अमूल्य अवसर है। लेकिन, उन्हीं के लिए जो साहस, संकल्प और श्रम करते हैं। जीवन एक वरदान देती चुनौती है। लेकिन, उन्हीं के लिए जो उसे स्वीकारते हैं और उसका सामना करते हैं। जीवन एक महान संघर्ष है। लेकिन, उन्हीं के लिए जो स्वयं की शक्ति को इकट्ठा कर विजय के लिए जूझते हैं। जीवन एक भव्य जागरण है। लेकिन, उन्हीं के लिए जो स्वयं की निंद्रा और मूर्च्छा से लडते हैं। जीवन एक दिव्य गीत है। लेकिन, उन्हीं के लिए जिन्होंने स्वयं को परमात्मा का वाद्य बना लिया है।

अन्यथा, जीवन एक लम्बी व धीमी मृत्यु के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जीवन वही हो जाता है, जो हम जीवन के साथ करते हैं। जीवन मिलता नहीं, जीता जाता है। जीवन स्वयं के द्वारा स्वयं का सतत सृजन है। नियति नहीं, निर्माण है।

-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 1 मार्च 2012

आनंद भोग में नहीं, त्याग में है


देवत्व के भोगों की तुलना में मानवीय भोग अति तुच्छ हैं। देवताओं के भोगों से परिचित नहीं होने के कारण मनुष्य इन तुच्छ भोगों में लीन हो जाते हैं। ऐसे भोगों को वर्षों तक भोगने पर भी तृप्ति नहीं होती। इससे यह सूचित होता है कि भोग-सुख भोगने से भोगवृत्ति तृप्त होती ही नहीं है। भोगों की तृष्णा हटाए बिना सुख और आनंद प्राप्त नहीं होगा। यदि आनंद चाहिए, तृप्ति चाहिए तो तृष्णा को त्यागना होगा। तृष्णा युक्त मन रखने वाला मनुष्य इस लोक के भोगों को भोग कर तृप्ति प्राप्त करे, आनंद प्राप्त करे, यह संभव नहीं।

वर्तमान मौजशौख के साधन व भौतिकता की चकाचौंध में ही जो स्वर्ग व मोक्ष की कल्पना करता हो, उसे तो धर्मशास्त्र भी सिर्फ बोझारूप लगेंगे। भावी जीवन को सुधारने और आत्महित की चिंता के प्रति जो बेपरवाह हैं, उन्हें अपने स्वयं के दोष सुनने की इच्छा भी नहीं होती है, फलस्वरूप शिष्ट पुरुषों का समागम और तत्त्वचिंतन आदि गुणों का आगमन बन्द हो जाता है और जीवन में अहंकार आ जाता है। ऐसे लोगों को फिर चापलूसी ही अच्छी लगती है, जो स्वयं भी डूबते है और दूसरे को भी डुबो देते है। आज अधिकांश लोगों में अपनी कमियां या क्षतियां सुनने की ताकत नहीं रही है, इस कारण कोई खरी-खरी कहे तो बुरा लगता है; परन्तु जब आत्मज्ञान होगा तब अपनी भूल बताने वाले उपकारी लगेंगे।

सुख एक उत्तेजना है, और दुःख भी। प्रीतिकर उत्तेजना को सुख और अप्रीतिकर को हम दुःख कहते हैं। आनन्द दोनों से भिन्न है। वह उत्तेजना की नहीं, शान्ति की अवस्था है। सुख जो चाहता है, वह निरंतर दुःख में पडता है। क्योंकि, एक उत्तेजना के बाद दूसरी विरोधी उत्तेजना वैसे ही अपरिहार्य है, जैसे कि पहाडों के साथ घाटियां होती हैं और दिनों के साथ रात्रियां। किन्तु, जो सुख और दुःख दोनों को छोडने के लिए तत्पर हो जाता है, वह उस आनन्द को उपलब्ध होता है, जो कि शाश्वत है।

आत्मा से उत्पन्न होनेवाले वास्तविक आनन्द की बजाय, जो वस्तुओं और विषयों से निकलने वाले सुख को ही आनन्द समझ लेते हैं, वे जीवन की अमूल्य सम्पदा को अपने ही हाथों नष्ट कर देते हैं। ध्यान रहे कि जो कुछ भी बाहर से मिलता है, वह छीन भी लिया जाएगा। उसे अपना समझना भूल है। स्वयं का तो वही है, जो कि स्वयं में ही उत्पन्न होता है। वही वास्तविक सम्पदा है। उसे न खोजकर, जो कुछ और खोजते हैं, वे चाहे कुछ भी पा लें, अंततः वे पाएंगे कि उन्होंने कुछ भी नहीं पाया है और उल्टे उसे पाने की दौड में वे स्वयं जीवन को ही गंवा बैठे हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

पर पदार्थ में ममत्व बुद्धि भी व्यभिचार है


आर्यों में भी जो उत्तम कोटि के आर्य हैं, उन्होंने पर स्त्री के सामने विकार भरी दृष्टि डालने को भी व्यभिचार माना है। इस बात को लेकर जैन शासन के महापुरुष तो यहां तक फरमाते हैं कि पर-भाव में ममत्व की बुद्धि भी एक प्रकार का आत्मा का व्यभिचार है।

‘पर’ अर्थात्? शरीर से लेकर यह समस्त जगत हम से ‘पर’ (भिन्न) है। जिसे हम ‘मेरा शरीर’ कहते हैं, वह भी वास्तव में अपना नहीं है। अनादिकाल से जिसका ‘अस्तित्व’ है और जो भिन्न-भिन्न शरीर में रही है, ऐसी आत्मा ही ‘मैं’ हूं। ‘मैं’ अर्थात् शरीर नहीं, अपितु शरीर में रही आत्मा। उस आत्मा के स्वयं के गुणों के सिवाय, मेरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का भान हमें यह जैन शासन प्रारम्भ से ही कराता है।

आत्मा के गुणों को छोडकर मेरा कुछ भी नहीं है और फिर भी इस शरीर आदि में हमें ‘ममत्व’ बुद्धि है। शरीर आदि में ममत्व बुद्धि, यह आत्मा का अनादिकालीन व्यभिचारी स्वभाव है। जब तक शरीर आदि के ऊपर से ममत्व बुद्धि दूर नहीं होगी, तब तक आत्मा का अनादिकालीन व्यभिचारी स्वभाव दूर नहीं हुआ है, यह मानना ही पडेगा।

मनुष्य जन्म को सफल बनाना हो तो उस व्यभिचारी स्वभाव को छोडना ही होगा। जब तक शरीर आदि के विषय में ममत्व बुद्धि दूर नहीं होगी और जब-जब भी ममत्व बुद्धि हो जाए तब-तब खयाल आते ही उससे रुकें नहीं.... आकुल-व्याकुल न हों, तब तक अनंतज्ञानी आदि तारकों ने रत्नत्रयी के भाजन रूप मनुष्य जन्म की जो पहिचान कराई है, उसे हम पढें-सुनें तो भी यह बात हृदय में स्थिर नहीं होगी। जैन कुल में तो यह शिक्षण बचपन से ही मिलना चाहिए। शरीर और अन्य पदार्थों के प्रति ममत्व बुद्धि हो जाए तो उसका खयाल आते ही कंपन का अनुभव हो, ऐसे जैन कितने?

शरीर और अन्य पदार्थों के प्रति ममत्व बुद्धि का सर्वथा अभाव हो, यह स्थिति अभी दूर है। क्योंकि उसके लिए तो अत्यधिक सामर्थ्य चाहिए। परन्तु हृदय से मूल सिद्धान्त की रुचि पैदा हुए बिना शरीर आदि के प्रति रही ममत्व बुद्धि का हृदय में डंक भी कहां से रहेगा? अनादिकालीन अभ्यास आदि के कारण समझदार आत्माओं में भी कभी-कभी शरीर आदि के प्रति ममत्वभाव हो जाए, यह भी कोई असंभव बात नहीं है। परन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ममत्व भाव आ जाए तो वह हृदय में खटकता है या नहीं? उसे मूल में से निकालने का मन होता है या नहीं? मनुष्य जन्म, एक मात्र रत्नत्रयी का ही भाजन है, यह बात हृदय में बराबर जच जाए तो ही शरीर आदि के प्रति रहा ममत्व भाव हृदय में कांटे की भाँति डंक देगा और उस ममत्व भाव से सर्वर्था मुक्त बनने का प्रयत्न होगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा