मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

संसार छुडाए वही सच्चा धर्म


श्री जैन दर्शन अर्थात् कर्म का संबंध छोडने का मार्ग दिखाने वाला दर्शन। इस संसार चक्र से छुडाने वाला दर्शन वह जैन दर्शन। संसार के संबंधों को दृढ करे, वह सच्चा धर्म नहीं है। सच्चा धर्म तो वही है कि जिसने संसार के संबंध को नाम-शेष करने का मार्ग दिखाया हो। श्री जैन दर्शन की विवेकपूर्वक विचारणा करो। संसार के संबंध को तोडने की जिनकी इच्छा उत्पन्न नहीं होती हो, वह जैन नहीं। संसार के संबंध को छोडने का उपदेश नहीं दे, वह सच्चा उपदेशक नहीं और संसार के संबंध दृढ बनें, ऐसा उपदेश दे, वह जैन साधु नहीं, अपितु सिर्फ वेशधारी है। ये भगवान के शासन के नाम पर पेट भरने वाले और तिरने के नाम पर स्वयं डूबने वाले और दूसरों को डुबाने वाले हैं। श्री जैन दर्शन का साधु जो उपदेश देता है, वह संसार के संबंध को तोडने का उपदेश देता है। कारण कि इसके बिना कल्याण नहीं है। ऐसा अनंतज्ञानियों ने जोर देकर कहा है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

पुण्य-पाप ही साथ जाने वाले हैं


यह सत्य है कि जो जन्मे हैं उनका मरण निश्चित है। इच्छा या अनिच्छा से, मरे बिना चलता नहीं है। किन्तु, यह विचार करो कि मरता कौन है? आत्मा मरती नहीं है। आत्मा तो है और रहने वाली है। यहां से मरण के बाद सारा खेल समाप्त हो जाता होता तो ज्ञानियों ने धर्म का उपदेश न दिया होता। किन्तु, यहां से मरने के बाद खेल समाप्त नहीं होता है। यहां से मर कर जो आत्माएं मोक्ष में नहीं जाती है, उन समस्त आत्माओं के लिए यह नियम है कि यह शरीर छूटा और कृतकर्मानुसार निश्चित समय में नूतन शरीर का संबंध बन जाता है। मनुष्य मरता है, उसके साथ उसके पुण्य-पाप नहीं मरते हैं।

आप जानते हैं कि यह शरीर यहां रहेगा, किन्तु कार्मन और तेजस शरीर साथ में जाता है। मनुष्य यहां से मरता है, इसलिए पुण्य-पाप के योग से दूसरे स्थान पर निश्चित समय पर वह आत्मा नवीन शरीर धारण करता है। इससे यह स्पष्ट है कि पुण्य-पाप यह सभी आत्मा के साथ ही जाते हैं। इसीलिए बांधे हुए कर्म शान्ति पूर्वक भोगने के सिवाय या तप आदि से उन्हें खपाए बिना सुख के अर्थी को छुटकारा नहीं है। कर्म का संबंध छूटे नहीं, वहां तक मरण के पीछे जन्म निश्चित है। कर्म से छूटना और कर्म छूटने के योग से दुःख और जन्म से मुक्त होना ही सच्चे सुख का मार्ग है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

संसार को बढाने की हायतौबा क्यों?


लोगों को मरते हुए या उनके शव के दाह संस्कार को तो आपने आपकी जिन्दगी में कई बार अवश्य देखा होगा। कभी आपको लगा कि एक दिन मेरे शरीर की भी यही हालत होनी है? किसी के अंतिम संस्कार के लिए, किसी को जलाने के लिए श्मशान गए हो, तब कभी आपको ऐसा लगा कि इस प्रकार से किसी दिन मेरे शरीर को भी स्नेहीगण, संबंधीगण, पडौसी आदि ले जाएंगे और मेरा खून ही मेरे शरीर को आग लगा देगा? धन-सम्पत्ति कुछ भी साथ नहीं लेजा सकोगे।

आपको यह निश्चित हो कि मेरा यह शरीर अमर रहने वाला है तो बोलो! किन्तु भयंकर से भयंकर पापात्माएं भी अंतिम कोटि के नास्तिक होने पर भी यह बात तो अंत में जानते हैं कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि जिस दिन इस शरीर को कोई संग्रह करने वाला नहीं है। या तो जला देंगे या तो दफनाकर छोड देंगे। मानो कि अशुभ के योग से जो कोई ऐसे स्थान में मरे हों तो जंगल मं पशु-पक्षी, चील-कौए उसका भक्षण करेंगे। समुद्र इत्यादि में फेंक देंगे, किन्तु शरीर के लिए ऐसा कुछ न कुछ होने वाला ही है, यह निश्चित बात है। तो फिर संसार में संसार को और बढाने की लालसा या हायतौबा क्यों, किसके लिए? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

मौत निश्चित है


जिनका जन्म हुआ, उनका मरना निश्चित है। मरण के बाद जन्म नियम से होता ही हो, ऐसा नहीं है। जो-जो मरते हैं, वे-वे जन्म लेते हैं, ऐसा एकान्त नियम नहीं है। किन्तु जो-जो जन्मते हैं, वे मरण प्राप्त किए बिना नहीं ही रहते, यह तो निश्चित ही है। अनंतकाल में अनंत आत्माओं ने मरण के बाद वापस जन्म नहीं लिया, ऐसा हुआ है। किन्तु अनंतकाल में एक भी आत्मा ऐसा नहीं जन्मा कि जो वापस मरा नहीं हो। मृत्यु के साथ जन्म यह एकान्त नियम नहीं है, किन्तु जन्म के साथ मुत्यु यह एकान्त सत्य है। यहां से मरकर श्री सिद्धगति को प्राप्त आत्माएं यानी मोक्ष में जाने वाली आत्माएं पुनः जन्म नहीं लेतीं। जो जन्म लेगा, उसकी मृत्यु निश्चित है।

आप मरोगे या नहीं? आज जिस शरीर का आप संस्कार करते हैं, बारम्बार साफ किया करते हैं, जिसके ऊपर अत्यंत मोह रखते हैं, वह एक दिन अग्नि में भस्मीभूत हो जाएगा, ऐसा आपको लगता है? शरीर यहां रहेगा और आपको अपने कर्मों के साथ किसी अन्यत्र स्थान पर जाना पडेगा, ऐसा लगता है? आपका सर्वाधिक प्रिय स्नेही आपके शरीर को मोटी-मोटी लकड़ियों पर सज्जित करेगा, आपके शरीर पर बडे-बडे लकडे रखेगा और उसके बाद उसमें आग लगा देगा, इतना ही नहीं आपका शरीर जल्दी से जल्दी भस्मीभूत हो इसके लिए वह आग में घी और डालेगा, राल फेंकेगा ताकि जल्दी से जल्दी आग पकडे और दाह-संस्कार फटाफट हो, ऐसा आपको लगता है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अहंकार और चापलूसी डुबोने वाले हैं


वर्तमान मौजशोख के साधन व भौतिकता की चकाचौंध में ही जो स्वर्ग व मोक्ष की कल्पना करता हो, उसे तो धर्मशास्त्र भी सिर्फ बोझारूप लगेंगे। भावी जीवन को सुधारने और आत्महित की चिंता के प्रति जो बेपरवाह हैं, उन्हें अपने स्वयं के दोष सुनने की इच्छा भी नहीं होती है, फलस्वरूप शिष्ट पुरुषों का समागम और तत्त्वचिंतन आदि गुणों का आगमन बन्द हो जाता है और जीवन में अहंकार आ जाता है। ऐसे लोगों को फिर चापलूसी ही अच्छी लगती है, जो स्वयं भी डूबता है और दूसरे को भी डुबो देता है। चापलूसी तीन घोर घृणित दुर्गुणों का मिश्रण है- असत्य, दासत्व और विश्वासघात। आज अधिकांश लोगों को चापलूसी ही पसंद है, उनमें अपनी कमियां या क्षतियां सुनने की ताकत नहीं रही है, इस कारण कोई खरी-खरी कहे तो बुरा लगता है; परन्तु जब आत्मज्ञान होगा, तब अपनी भूल बताने वाले उपकारी लगेंगे। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

संसार में रस लेने वाले हिये के अंधे


जिन्हें संसार ही चाहिए और मोक्ष नहीं ही चाहिए, वे सब हिये (हृदय) से अंधे हैं। भगवान राजपाट छोडकर साधु बने। साधु बनने का अर्थ है- सुखों को लात मारकर दुःखों को निमंत्रण देना। जिन सुखों को भगवान ने छोड दिया, उनके पीछे आप पड रहे हैं और इसमें आपको कुछ भी अनुचित नहीं लगता है तो आप भगवान के भक्त नहीं रह जाते हैं। ‘मुझे यह शरीर छोडकर अन्यत्र जाना है’, इस बात को आज लगभग सभी भूल गए हैं। ‘यहां से जाने के बाद मेरा क्या होगा?’ यह चिन्ता आज लगभग नष्ट हो गई है। मैं मरने वाला हूं, यह खयाल हर पल रहे तो जीवन में बहुत-सी समझदारी आ जाए। भावी जीवन को मोक्ष मार्ग का आधार बनाने के प्रयत्न शुरू हो जाएं। सिर्फ वर्तमान की क्रियाएं, पेट भरना, बाल-बच्चे पैदा करना और मौजमजा करना, ये क्रियाएं तो कौन नहीं करता है? तुच्छ प्राणी भी अपने रहने के लिए घर बना देते हैं, वर्तमान की इच्छापूर्ति करते हैं और विपत्ति में भागदौड भी करते हैं। मात्र वर्तमान का विचार तो क्षुद्र जंतुओं में भी होता है। भावी जीवन का विचार छोडकर जो सिर्फ वर्तमान के ही विचारों में डूबा रहता है, वह अपने कर्त्तव्य पालन से च्युत हुए बिना नहीं रहता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

मर्यादा का दिवाला निकल रहा है


मर्यादा रहेगी वहां तक धर्म रहेगा। महापुरुष भी किसी की निश्रा में रहते थे, उनकी आज्ञानुसार चलते थे। आज चारों ओर मर्यादा का दिवाला निकलता जा रहा है। कोई किसी की सुनने या मानने को तैयार नहीं। पुत्र माता-पिता की बात नहीं मानते और विद्यार्थी शिक्षक का उपहास करते हैं। आज युवकों की क्या दशा है, यह तो अखबार पढनेवाले आप लोगों को मालूम ही है, ये युवक अपने बाप के भी बाप बन गए हैं। और प्रोफेसर के भी प्रोफेसर बन गए हैं। कॉलेजों के संस्थापक कॉलेजों को कैसे चलावें, इस चिंता में हैं और नए कॉलेज न खोलने के निर्णय पर आए हैं। दुनिया में पढे-लिखे गिने जानेवाले अपनी होंशियारी का उपयोग भी दुनिया को परेशान करने में और स्वयं का स्वार्थ साधने में कर रहे हैं।

आत्मा का ज्ञान हुए बिना, जितना अधिक पढा जाए उतना अधिक गंवारपन आता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज के कॉलेज हैं। आत्म-ज्ञान से रहित व्यक्तियों को ज्ञान देने का यह परिणाम है। आत्म-ज्ञान से, धर्म से जीवन में मर्यादा आती है और मर्यादा होने से घरों का संचालन भी ठीक तरह से होता है। मर्यादा से रहित घरों में हमेशा झगडे हुआ करते हैं। मिथ्याज्ञान पाकर आपके लडके आपके न रहें यह आप सहन कर सकते हैं, परन्तु सम्यग्ज्ञान से आपके लडके आपके न रहकर साधु बन जाएं तो यह आप सहन नहीं कर सकते। कैसी गजब की बात है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

वृद्धाश्रम समाज के लिए शर्म की बात


आज आप लोगों के घरों में बुजुर्गों की स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘जो कमावे वह खावे और दूसरा मांगे तो मार खावे’। ऐसी स्थिति हो जाने के कारण ही इस देश में वृद्धाश्रम या विधवाश्रम की बातें चलने लगी हैं। ऐसे आश्रम स्थापित हों, यह कोई गौरव की बात नहीं है; अपितु उन बुजुर्गों और विधवाओं के परिवारों के लिए तथा समाज और संस्कृति के लिए शर्म की बात है।

आपसे मेरा पहला प्रश्न यह है कि आपका राग आपके माता-पिता पर अधिक है या पत्नी-बच्चों पर अधिक है? भगवान पर राग होने का दावा करने वाले को मेरा यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। योग की भूमिका में माता-पिता की पूजा लिखी है, पत्नी-बच्चों की नहीं। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि आज के लोगों को कम से कम कीमत की कोई चीज लगती हो तो वह उसके मां-बाप हैं। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

जंगली जमाना


देश बरबाद हो रहा है। मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवों को तो मानो जीने का अधिकार ही नहीं, ऐसी हवा फैलगई है। वर्तमान युग, हिंसक युग है। जिस युग को आप अच्छा मानते हैं, वह घोर घातकी युग है। लाखों जीव काटे जाते हैं; वह भी कानून का ठप्पा लगाकर। आप इस हिंसा को रोक भी नहीं सकते। यदि रोकने का प्रयत्न करो तो ‘देशप्रेमी’ न गिनाओ। आज मनुष्य, मनुष्य से घबराकर चलता है। जानवर से तो थोडी दूरी पर रहे तो निर्भय, परन्तु मनुष्य तो पीछे पडजाता है। अतः उससे डरकर रहना पडता है। ऐसा यह युग है। कैसा विचित्र है यह युग!! इतनी अधिक अधोगति हो रही है, तथापि ‘प्रगति हो रही है’ ऐसा बोलने वालों को लज्जा तक नहीं आती। यह अचरज की बात नहीं है? ऐसा जंगली जमाना तो कभी नहीं रहा होगा।

आजकल एकता की बातों के नाम पर ही एकता के टुकडे हो रहे हैं। धर्म के नाम पर जाति के नाम पर राजनीति हो रही है। भूतकाल में जो एकता थी, वह आज देखने को नहीं मिलती। अमेरिका का अनाज यहां आता है, परन्तु यहां के एक प्रांत का अनाज दूसरे प्रांत के काम नहीं आता। विदेशी भी अनाज देकर कोई उपकार नहीं करते! वे अपना कचरा यहां सरका देते हैं और यहां की अच्छी चीज वहां जाती है। कैसी विरोधाभासी और विनाशक नीतियां है और कहते हैं कि प्रगति हो रही है। यह कितने शर्म की बात है! आज देश का उद्धार नहीं, अधःपतन हो रहा है। शक्ति बढने के साथ आपके घरों में मौज-शौक के साधन तो बढते ही जाते हैं, परन्तु धर्म के साधन बढते हुए कहीं नजर नहीं आते हैं। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सुख-दुःख में शरणभूत धर्म ही है


सुख-दुःख में शरणभूत धर्म ही है

सुख और दुःख में एकमात्र धर्म ही शरणभूत है। इसलिए धर्म ही सर्वस्व है, धर्म ही भाई है, धर्म ही पिता है, धर्म ही माता है। भाई, पिता और माता आदि की गरज पूरी करने वाला धर्म ही है। अरे, संसार के भाई, माता, पिता आदि जो हमारी चिन्ता करते हैं, वह धर्म का ही प्रताप है। धर्म न रहे तो पिता, माता, भाई आदि में से कोई भी खबर लेने वाला नहीं रहेगा। धर्म पुण्य के रूप में उदित होगा तो ही सम्बंधी, सम्बंधी रहेंगे और मित्र मित्र रहेंगे। लडका अंतिम समय तक आपको पिता कहेगा, चिन्ता करेगा, यह धर्म का ही प्रताप है। ऐसे धर्म को दुनिया की सामग्री के लिए या सगे-सम्बंधियों के लिए छोडना क्या उचित है? दुनिया की कोई सामग्री या कोई सगा-सम्बंधी जिस समय काम में नहीं आता, उस समय धर्म काम में आता है। यह साता भी दे सकता है और असाता के समय हृदय को यह समाधि में भी रख सकता है। अतः अवलंबन तो केवल मात्र धर्म का ही चाहिए। धर्म की रुचि प्रकट हो और विवेक बढे तो समझ में आता है कि अपना धर्म ही हमें सब संग से छुडाकर असंगत्व का अनुपम सुख दिलाता है! -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

तृष्णा का आतंक


मन की तृष्णा ने आज कितना भयानक आतंक फैलाया है? पिता-पुत्र, पति-पत्नी, बडा भाई, छोटा भाई, सास-बहू इन सब लोगों के बीच का व्यवहार देखो। जरा सोचो तो सही एक दूसरे के लिए कितनी ईर्ष्या, द्वेष-भावना दिल में भरी हुई है? मन की तृष्णा बढी है। पर-वस्तुओं को प्राप्त करने की व भोगने की लालसा बढी है और त्याग-भावना नष्टप्रायः हो गई है। इसके परिणामस्वरूप आज के संसार में भयानक भगदड और भागदौड मच रही है। लोग भौतिकता की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं। जब तक मन की भयानक भूख नहीं मिटेगी और त्याग की भावना पैदा नहीं होगी, तब तक ऐसी भगदड और भागदौड मची रहेगी, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। इस तरह विचार किया जाए तो अवश्य समझ में आएगा कि मन की भौतिक भूख ही सारे विनाश का कारण है। संसार के प्रति अरुचि न हो तो, धर्म किस काम का? अधिक प्राप्त करने के लिए धर्म किया जाता हो तो वह धर्म, धर्म रहता ही नहीं, धंधा हो जाता है, बिना पैसे के धंधे जैसा। आज आपको साधुओं की आवश्यकता क्यों है? बहराने के लिए? इनके पगल्ये हों तो घर में लक्ष्मी के पगल्ये हो जाएं इसलिए? या धर्म करने हेतु शास्त्र की विधि का ज्ञान आवश्यक है इसलिए? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

कायरता से समाज सड़ता है


‘चलने दो, अपने को क्या करना है’, ऐसे मंद विचारों और लापरवाही, कायरता से समाज सड जाता है और फिर सडे हुए समाज में हृदय को हर्ष या तृप्ति नहीं मिलती, आत्मकल्याण का मार्ग निष्कंटक नहीं रह जाता, समाज शोषित हुआ चला जाता है। खेत के पाक को पूर्ण रीति से फलने देने के लिए पास ही उत्पन्न हुए कचरे का नाश करना ही चाहिए। फसल अच्छी हो इसके लिए खरपतवार को तो नष्ट करना ही पडता है। आप लोग धर्म-विरूद्ध प्रवृत्तियों को रोक नहीं सकते, इसी कारण तो हमें विरोध का झण्डा उठाना पडता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

धर्म संघ के लिए पांच बातें


धर्म संघ के लिए पांच बातें

जो अर्थ-काम को हेय माने, धर्म-मोक्ष को उपादेय माने, वही संघ में गिना जाए। संघ छोटा हो तो हर्ज नहीं, लेकिन वह भगवान की आज्ञा मानने वाला हो।

धर्म संघ के चारित्र का मूलाधार तादात्म्य तथा प्रेम है। यह मेरा संघ है, मैं इसका अंश हूं, इसकी भलाई में ही मेरी भलाई है; यह भाव जब उत्पन्न होता है, तब संघ-चरित्र का निर्माण होता है। मेरे कार्य से संघ को भले ही लाभ न हो, कम से कम हानि तो न हो; यह भाव उत्पन्न होने पर संघ का चारित्र प्रकट होता है। जब यह विचार जाग्रत होता है और अहो रात्र संघ का चिन्तन होता है, संघ को उठाने का, संघ-समाज को सुखी करने का, संघ के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कर्त्तव्य पूर्ति का विचार होता है, मैं रहूं या न रहूं, उससे क्या; संघ रहना चाहिए, यह सोच बनना चाहिए।

चरित्र या स्नेह का आधार एकात्मता है। जो इस एकात्मता को पहचानेगा, वही स्नेह कर सकेगा, वही असुखी होते हुए भी प्रेम करेगा। अतः केवल चारित्र्य का आग्रह करने से चारित्र्य निर्माण नहीं होगा, उसके लिए ठोस आधार लेना पडेगा। प्राचीन काल से चला आनेवाला हमारा संस्काररूप जीवन, जिसे संस्कृति कहते हैं, वही सामान्य अधिष्ठान है। उसके जागरण से ही एकात्मता संभव है। प्रत्येक व्यक्ति एकात्मता का व्यक्त रूप है, यह समझ कर समाज की सेवा करना ही धर्म है। जैसे जीवाणु शरीर की सेवा करते हैं, कोई भी आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करता; वैसे ही समाज को एकात्मस्वरूप जानकर (केवल मानकर नहीं) जीवन को समष्टिरूप समाज की सेवा में लगा देना ही जीवन का साफल्य है। एकात्मता का भाव ही समाज को सुसंगठित रूप दे सकेगा।

शारीरिक शक्ति आवश्यक है, किन्तु चरित्र उससे भी अधिक महत्व का है। बिना चरित्र के केवल शारीरिक शक्ति मनुष्य को पशु बना देगी। चरित्र की शुद्धता ही वैभव एवं महानता की जीवन-प्राण होती है।

यदि महान जागतिक लक्ष्य में हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें प्रथमतः अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। हमें वादों की मानसिक श्रृंखलाओं और आधुनिक जीवन के व्यवहारों तथा अस्थिर फैशनों से मुक्ति कर लेनी होगी। परानुकरण से बढकर संघ की अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती। हम स्मरण रखें कि अन्धानुकरण का अर्थ प्रगति नहीं, वह तो आत्मिक पराधीनता की ओर ले जाता है।

समाज इसे समझे और वैश्विक आवश्यकताओं पर खरा उतरे। आज चहूं ओर जो घोर निराशा व भय का वातावरण है, उसमें जैन धर्म के सिद्धान्त ही आशा की एक किरण हैं। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अन्याय-अनीति का प्रतिकार होना ही चाहिए


जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, विरोधी लोग देव-गुरु-धर्म की खुलेआम निंदा कर रहे हों, उन पर चोट पहुंचा रहे हों या फिर अन्याय-अनीति से धर्म की हानि हो रही हो, अहिंसा को जड-मूल से उखाडने की बातें चल रही हो; ऐसे संकट की घडी में कोई सत्पुरुषों को सहनशील बनने की सलाह दे तो उस सलाह को वे कभी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। उस समय वे खुलेआम कहते कि “ऐसे प्रसंगों पर ‘सहनशीलता’ धारण करने वाला ‘सहनशील’ नहीं है, अपितु काम को बिगाडने वाला है, कायर है। यह सहनशीलता का गलत अभिप्राय है। अरिहंत परमात्माओं ने, हमारे महापुरुषों ने ऐसी सहनशीलता का सहारा कभी नहीं लिया, बल्कि इसके विपरीत ऐसी सहनशीलता का उपदेश देने वालों को धिक्कारते और समाज को भी सावधान करते कि ऐसे लोगों से बचकर रहना, अन्यथा तुम लुट जाओगे।

जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, देव-गुरु-धर्म पर हमला हो, अन्याय हो; तब उसका प्रतिकार न करना मानवता के लिए घोर कलंक है, श्रावकत्व पर कलंक है, समाज पर कलंक है। सच्चा धर्मवीर ऐसे अन्याय के विरूद्ध अलख जगाता है। वह न तो स्वयं अन्याय करता है और न अपने सामने होने वाले अन्याय को देख सकता है। वह सदैव अन्याय और अनीति के प्रतीकार के लिए कटिबद्ध रहता है। अन्याय का प्रतिकार करने के लिए देव-गुरु-धर्म-समाज-संस्कृति के चरणों में वह अपने प्राणों को हंसते-हंसते बलिदान कर देता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

शासन पर हमला असहनीय


शासन रहने वाला है, यह निश्चित है। पाखण्डी पैदा होंगे, यह भी निश्चित है। तो भी शासन के ऊपर के आक्रमणों को दूर करने का आराधकों को प्रयत्न करना चाहिए, यह भी निश्चित है। शक्ति के होते हुए भी जो पौद्गलिक इरादों से शासन पर होने वाले हमलों की उपेक्षा करे और उसका दर्द भी उनको न हो तो शासन के रहने पर भी वे शासन के विराधक ही बनेंगे। मुझे कोई गाली दे और मैं गुस्सा करूं, तो यह मेरी कमी है। किन्तु, शासन के ऊपर कोई आक्रमण करे और मैं गलत शान्ति का प्रयोग करूं तो आराधक साधु नहीं। जिसके बदौलत हमने सबकुछ पाया, जिन श्री जिनागम के योग से हमने जीवन की सार्थकता समझी, उनको कोई गाली दे, उसके लिए अंट-शंट बोले फिर भी हमें आघात न लगे तो यह बेशर्मी की हद है। संसार के मोह में फंसे हुए तथा प्रमादी बने हुओं को, स्वयं जागृत बनकर जागृत रखने का, आवाज देकर भी जागृत करने का काम हमारा है। यह न करें और मान-पान आदि के लिए खोटी शान्ति का दिखावा करें, शक्ति के होते हुए भी शासन का अपमान होने दें, तो हम अपराधी ही हैं। समता के नाम पर यहां चुप नहीं रहा जा सकता। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

आधि-व्याधि-उपाधि में समाधि


मानव-जीवन के सिवाय अन्य किसी भी जीवन में मोक्ष-साधक, सर्व त्यागमय धर्म की साधना नहीं हो सकती। इस कारण इस जीवन में अनंत ज्ञानियों की आज्ञानुसार सर्व त्याग की साधना हो जाए, यही एक कर्तव्य है, इसमें कोई शंका नहीं है। फिर भी यह मार्ग सभी के लिए सरल नहीं है, अतः उस आदर्श को आँखों के सामने रखकर इस प्रकार जीवन जीना चाहिए कि कदाचित् इस जीवन में उस मार्ग की साधना शक्य न बने तो भी भवांतर में तो अवश्य सहज बन जाए। आधि, व्याधि और उपाधि से भरे इस संसार में भी समाधिमय जीवन जीने की कला श्री वीतराग परमात्मा का शासन सिखाता है। श्री जिनशासन के बारह प्रकार के तप से निर्मल जीवन जीना सीख ले तो विषय-कषाय रूप यह संसार भी आत्मा को संतप्त करने में समर्थ नहीं बन सकता है। संसार में भी संतोष, शान्ति और समाधि से कैसे जीया जाए, यह कला जैन धर्म सिखाता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

मन्दिर-उपाश्रयों का दुरुपयोग हर हाल में रोकें


खराब स्थान का अच्छा उपयोग हो सकता है, किन्तु अच्छे स्थान का खराब उपयोग कदापि नहीं हो सकता। आज उपाश्रय में क्या करने की धमाल मच रही है? उपाश्रय में कहीं अर्थ और काम की मंत्रणा होती है? आज अर्थ और काम की इतनी ज्यादा वांच्छा बढ गई है कि लोग धर्म स्थानों को भी अर्थ-काम की साधना में लगा रहे हैं। उपाश्रय में तो सिर्फ और सिर्फ धर्म-क्रिया ही होनी चाहिए, धर्म की ही बातचीत होनी चाहिए, धर्म का ही विचार होना चाहिए; किन्तु यहां तो राजनीतिक पैंतरेबाजी हो रही है, शादी-ब्याह और पुत्र-पौत्र के जन्म-दिन मनाए जा रहे हैं, यह कितनी हैरानी और दुःख की बात है? बनवाने वाले ने तो धर्म-क्रिया के लिए स्थान बनवाया, किन्तु आज के उसके हकदार उनकी भावनाओं पर ही छीणी-हथौडा मारने के लिए तैयार हैं। ऐसे लोगों को पूरी दृढता से समझाना चाहिए कि यहां तो सामायिक, प्रतिक्रमण, पौषधादि धर्म-क्रिया ही हो सकती है। संसार को बढाने वाली क्रियाएं तो यहां हर्गिज नहीं हो सकती हैं।

दुर्भाग्य से आज घर और बाजार से धर्म की बातें निकल चुकी हैं। अब उपाश्रयों से भी धर्म निकालना चाहते हैं क्या? श्री जिनमन्दिर और उपाश्रयों की पवित्रता का नाश करना चाहते हैं क्या? धर्म के अर्थियों को सावधान होना चाहिए। ऐसे धर्म-शत्रुओं की इच्छाएं पूर्ण न हों, इसके लिए चाहे जैसे भी हो विरोध करना ही चाहिए। पुण्य-क्रियाओं के लिए निर्मित स्थानों का दुरुपयोग करने का पापात्माओं को क्या अधिकार है? आपके पूर्वजों ने आपके अच्छे के लिए मन्दिर-उपाश्रय आदि बनवाए हैं, इनका दुरुपयोग रोकना आपका कर्त्तव्य है। तिरने के स्थान को डूबने का स्थान नहीं बनाया जा सकता। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

धन का नशा खराब होता है


नीति से कमाया हुआ धन भले ही अच्छा माना जाए, परन्तु धन तो वास्तव में खराब ही है। जो धन का बन जाता है, वह बाप का नहीं रहता, मां का नहीं रहता, भाई का नहीं रहता, पुत्र का नहीं रहता, पुत्री का नहीं रहता; वास्तव में फिर वह किसी का नहीं रहता। धन ही उसके लिए सबकुछ होता है। वह धन के नशे में पागल हो जाता है, बेभान हो जाता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

संयम सहज नहीं है


पेट भरने के लिए दीक्षा नहीं ली जाती। जो ऐसा बोलते हैं कि बेचारा दुःखी था, पेट भरने का साधन नहीं था, इसलिए दीक्षा ले ली, वे वास्तव में भयंकर पापात्मा हैं। उन लोगों को अपना पेट भरने के लिए चाहे जैसे निर्दय काम करते हुए भी शर्म नहीं आती है। चाहे जैसी गुलामी करने में भी उनको निर्बलता नहीं दिखाई देती। दूसरे पेट भरने के लिए दीक्षा लेते हैं, ऐसा कहने वाले पापात्माओं को भागवती दीक्षा पर या धर्म के ऊपर तनिक भी प्रेम नहीं होता है।

मांग कर लाना और मिले उससे पेट भरना। मिले तो खाना, न मिले तो पूरी मन की प्रफुल्लता से तप करना और संयम पालना, यह कोई सहज वस्तु नहीं है। इसलिए ऐसे यथेच्छ बोलने वाले, ऐसा बोलते भले ही हों, परन्तु वे समझते हैं कि ‘संयम पालना सहज नहीं है’। नहीं तो बदमाशी करके पेट भरने वाले उन लोगों ने कभी का वेश पहनकर यह कपटपूर्ण प्रयत्न किया ही होता। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा