सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

सम्यग्दर्शन का प्रभाव


अनंत उपकारी भगवान श्री जिनेश्वर देव के शासन में सम्यक्त्व का महत्त्व इतना अधिक आंका गया है कि इसके बिना ज्ञान भी सम्यक ज्ञानरूप नहीं होता। इसके बिना चारित्र भी सम्यक चारित्ररूप नहीं होता और इसके बिना तप भी सम्यक तपरूप नहीं होता। चाहे धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो, चाहे भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचनानुसार अर्थ से प्ररूपित और श्री गणधर भगवंतों द्वारा सूत्ररूप से ग्रंथित आगमशास्त्रों का ज्ञान हो, तो भी अगर उसको धारण करने वाली आत्मा सम्यक्त्व को प्राप्त न हो, तो उस आत्मा का वह शास्त्रज्ञान भी सम्यग्ज्ञान के रूप में उस आत्मा को परिणत नहीं होता।

अतः उस आत्मा का वह शास्त्रज्ञान भी अज्ञान अथवा मिथ्याज्ञान की कोटि में गिना जाता है। इसी प्रकार चारित्र भी भगवान द्वारा प्ररूपित चारित्र के आचारों का आचरण रूप हो तो भी उस चारित्र का पालन करने वाली आत्मा यदि सम्यक्त्व को पाई हुई न हो तो उस आत्मा का वह चारित्राचार का पालन भी सम्यक चारित्र की गिनती में नहीं आता, अपितु कायकष्टादि की श्रेणी में आता है।

इसी प्रकार तप के विषय में भी समझना चाहिए। तप भी भगवान द्वारा प्ररूपित अनशनादि प्रकारों के आसेवनरूप हो तो भी उस अनशनादि तप का आसेवन करने वाली आत्मा यदि सम्यक्त्व को प्राप्त न हो तो वह तप, उस आत्मा के कर्मों को तपाने वाला नहीं बनता। अपितु आत्मा को संतप्त बनाने आदि के द्वारा वह तप उस आत्मा के लिए संसारवृद्धि का कारण बन जाता है। अतः आत्मा के उस तप के आसेवन को भी सम्यक कोटि के तप में नहीं गिना जाता।

जबकि सम्यक्त्व का यह प्रभाव है कि उसकी मौजूदगी में ज्ञान इस तरह आत्मा में परिणत होता है कि वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान गिना जाता है; चारित्र का पालन ऐसे भावपूर्वक होता है कि उससे उस चारित्र का पालन सम्यक चारित्र गिना जाता है और तप भी ऐसे भावपूर्वक होता है कि उससे उस आत्मा से लगे कर्म तपते हैं, कर्म की निर्जरा होती है और इसलिए वह तप सम्यक तप की कोटि में गिना जाता है। इस सम्यक्त्व गुण की इस प्रकार की महिमा को जो जीव सुन लेता है और जो यह भी मानता और समझता है कि ‘शास्त्र ने ऐसा कहा है और शास्त्र कभी मिथ्या नहीं कहता’, तो उस जीव को सम्यक्त्व पाने की इच्छा हुए बिना रहेगी क्या? ‘मुझे मेरी आत्मा में यह गुण प्रकटे, ऐसा करना चाहिए’, ऐसा विचार उसके दिल में पैदा हुए बिना रहेगा क्या? जिस जीव के मन में ऐसा विचार आया, वह जीव सम्यक्त्व गुण की महिमा को बताने वाले शास्त्र का अथवा उस सम्यक्त्व को प्राप्त करने के उपायों की प्ररूपणा करने वाले ज्ञानी भगवंतों द्वारा कथित शास्त्रों का ज्ञान सम्पादन करने का पुरुषार्थ करेगा न? क्योंकि, उसे सम्यक्त्व पाना है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

गुणों को देखकर प्रसन्न हों, पागल नहीं


दूसरे लोगों में गुण होते ही नहीं अथवा दूसरे लोगों के गुण देखकर प्रसन्न नहीं होना चाहिए, ऐसा हम कहना नहीं चाहते हैं। गुणों को देखकर प्रसन्न अवश्य होना चाहिए, लेकिन उसके पीछे पागल तो कभी नहीं होना चाहिए। ग्राहक उसे सामान्य सभ्यता का गुण समझे तब तक ठीक है, लेकिन अगर वह उसमें फंस जाए और ऐसा मान ले कि, ‘यह आदमी तो बहुत अच्छा है, यहां मोलतोल नहीं करना चाहिए’ तो शायद ग्राहक लुटा जाएगा। सभ्यता के नाम पर आज लुटे जाने में देर नहीं लगती है। इसलिए सावधान रहने की बहुत आवश्यकता है। शांति, सभ्यता, क्षमाशीलता आदि गुणों को देखकर प्रसन्न होना चाहिए, किन्तु वास्तव में ये गुण प्रशंसनीय हों तो ही प्रशंसा करें, अन्यथा मौन रहें।

कुमत फैलाने वालों में शांति एक प्राकृतिक गुण होता है। भिखारी को आप चार गालियां देंगे तो भी वह मुंह नहीं बिगाडेगा, वह तो आपको अन्नदाता ही कहेगा। वह गुस्सा नहीं करेगा और आँखों में आँसू नहीं आते होंगे तो भी आँसू लाएगा। वह समझता है कि अगर यहां क्षमा न रखी गई तो मेरी भीख जाएगी। क्या ऐसी क्षमा प्रशंसा की पात्र है? इस क्षमा को देखकर ऐसा विचार अवश्य होना चाहिए कि मोक्ष की साधना करनी है तो हम भी इसी प्रकार क्षमा धारण करें। भिखारी रोटी के टुकडे के लिए जितनी इच्छा और प्रवृत्ति करता है, इतनी इच्छा और प्रवृत्ति हमारे अंतःकरण में मोक्ष के लिए, धर्म के लिए नहीं है। जितना प्रेम, जितनी गरज और आतुरता भिखारी के मन में रोटी के टुकडे के लिए है, उसका एक शतांश भी हमारे हृदय में धर्म के लिए हो तो हमारा इच्छित काम हो जाए। फिर हमारी दशा आज के जैसी नहीं रहे।

भिखारी की क्षमा के लिए मन में इस प्रकार सोचें अवश्य, लेकिन उसकी प्रशंसा न की जाए। वह तो कृपण को दानवीर तथा अधर्मी को धर्मवीर भी कहेगा, जो भी उसे रोटी का टुकडा देगा, उसे वह धर्मात्मा कहेगा। भिखारी को अगर कोई कहे कि ‘वह व्यक्ति तो कसाई है’, तो वह कहेगा कि ‘वह कुछ भी हो, मुझे तो रोटी का टुकडा देता है न? इसलिए मेरे लिए तो वह अन्नदाता है, धर्मात्मा है।’ भिखारी की यह क्षमा और उदारता का गुण अगर धर्मसाधना में आ सके तो अच्छा है, ऐसा मन में सोचना चाहिए, लेकिन शब्दों में खुले आम उसकी प्रशंसा नहीं की जाए। बगुले की शांति मछलियों को पकडने हेतु होती है। ऐसी ही शांति पापोन्मुख न होने के हेतु हम रखना सीखें तो बहुत लाभ हो सकता है। इसी प्रकार अगर व्यापारी की क्षमा, उदारता आदि के विषय में समझें और इन सब गुणों की अपने हृदय में अनुमोदना इस प्रकार करें कि ऐसे गुण धर्मबुद्धि से हम प्राप्त कर सकें तो कितना अच्छा हो? कितु इनकी प्रशंसा प्रकट रूप से नहीं की जा सकती।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

सम्यक्त्व के दोषों का साम्राज्य


वर्तमान समय में शंका आदि पांचों दोषों का साम्राज्य व्याप्त है। बात-बात में शंका होती है, कांक्षा के विषय में तो कुछ पूछने जैसा ही नहीं है, फिर विचिकित्सा तो अवश्य होगी। मिथ्यामति की प्रशंसा ने अपना दृढ स्थान बना ही लिया है और उनके परिचय में वृद्धि होती ही जा रही है। गुणानुराग के नाम पर महापापियों की प्रशंसा आप लोगों के द्वारा हो जाती है। गुणानुराग के नाम पर हिंसक वृत्तिवालों को भी मंच पर बिठाने के लिए आप तैयार हो जाते हैं। संयम का समर्थ धारक हो, आगम का ज्ञाता हो, किन्तु सूत्र के विरूद्ध अगर वह एक अक्षर भी बोले तो उसकी प्रशंसा नहीं की जानी चाहिए। ऐसे समय में उसका संयम या ज्ञान देखना नहीं होता। अभवी जीव में चाहे साढे नव पूर्व का ज्ञान हो, भवी जीव के संयम से भी कहीं उच्च कक्षा का संयम हो, असंख्य आत्मा को मुक्ति दिला सके, ऐसी उसकी देशना हो, फिर भी अगर वह अभव्य है, ऐसा स्पष्ट हो जाए तो उसका बहिष्कार करने की आज्ञा शासन में है। अनुचित गुणानुराग के नाम से पापपोषक आत्माओं की प्रशंसा सम्यक्त्व के लिए महान दोष है। उसमें से बचने का कोई उपाय नहीं है।

शंका तथा कांक्षा करने वाला तो स्वयं मरता है, विचिकित्सा करने वाला स्वयं जो प्राप्त किया है, उसे हार जाता है, लेकिन मिथ्यामती की प्रशंसा करने वाला स्वयं तो डूबता ही है, अपने साथ अनेकों को भी ले डूबता है। ऐसा मनुष्य तो मानो पूरी नौका में छेद करने का काम करता है। हजारों लोगों के साथ नाव में बैठकर उसी नाव में छेद करना, स्वयं डूबना तथा दूसरों को भी डुबाना, इसके समान भयंकर पाप और क्या हो सकता है? अज्ञानवश अगर ऐसा हो तो अलग बात है, लेकिन जो लोग समझपूर्वक ऐसा पाप करते हैं, वे किसी प्रकार दया के पात्र नहीं हैं। वे हेतुपूर्वक यह सब करते हैं। शास्त्रकारों ने ऐसे मनुष्यों को रासभ (गधा) वृत्तिवाले कहा है। हम वृत्ति से उनको रासभ के समान कहते हैं। आकार में तो वे मनुष्य ही हैं, मनुष्यों की सभा में आते हैं, बैठते हैं, नेता के समान काम करते हैं, वक्ता तथा लेखक होने का दावा करते हैं। समकिती इन सब बातों का विवेक रखता। सम्यग्दृष्टि के अंतर में गुणानुराग तो होता ही है, उसके बिना प्रमोद भावना टिक ही नहीं सकती। लेकिन उस भावना को अक्षुण्ण बनाए रखना और साथ ही मिथ्यामती की प्रशंसारूप चौथा दूषण भी नहीं लगने देना, इन दोनों बातों को ध्यान में रखना है। अगर गुणानुराग न रहा तो प्रमोद भावना खंडित होती है और उसके नाम से मिथ्यामती की प्रशंसा होती है, तो सम्यक्त्व दूषित होता है। गुणानुराग को अखंडित रखा जाए और वाणी पर अंकुश रखा जाए तो ही सम्यक्त्व अक्षुण्ण बना रह सकता है। गुण को देखने के बाद अगर आनंद उत्पन्न न हो तो प्रमोद भाव खंडित होता है और बोलने में गलती हो तो सम्यक्त्व खंडित होता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

अच्छी बातें भी योग्य व्यक्ति को ही बताई जाती हैं !


जैसी संगति करेंगे, वैसे परिणाम आएंगे। मिथ्यात्वियों के संसर्ग में रहने पर सम्यक्त्व जानेवाला और मिथ्यात्व आने वाला ही है। इसलिए मिथ्यामतियों का परिचय, प्रशंसा और उनकी संगति दोषरूप है।

कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाति एक गुण तीन।

जैसी संगति बैठिए, वैसो ही फल दीन ।।

कई लोग कहते हैं, ‘ऐसी अच्छी बातें आप सबको क्यों नहीं समझाते हैं?’ लेकिन, उन लोगों को यह मालूम नहीं है कि अच्छी बातें भी योग्य व्यक्ति को ही बतानी चाहिए। हर किसी को नहीं बताई जाती। मूल्यवान खजाना चोर-डाकू को नहीं दिखाया जाता। योग्य, भले मनुष्य को भी अगर उसका ज्ञान न हो और अगर हम दिखाने जाएं तो उभय को नुकसान होने की संभावना रहती है। सही है तो क्यों सबको न समझाएं? ऐसा घमण्ड नहीं रखना चाहिए। बिना सामर्थ्य के अगर समझाने जाएंगे तो आप तो जब समझा सकेंगे तब समझाएंगे, लेकिन वे आपको अवश्य कुछ समझा देंगे। सम्यक्त्व अति मूल्यवान है, इसलिए उसकी रक्षा अति आवश्यक है, यह बात अपने दिमाग में अच्छी तरह से दृढ कर लीजिए।

सम्यक्त्व की भावना बहुत दुर्लभ है। मूक, जड पदार्थ भी अगर आत्मा को द्विधा में डाल सकते हैं तो फिर उन्मार्ग पर चलने वाले, बोलने में समर्थ ऐसे चैतन्यमय प्राणी द्विधा में डाल दें तो क्या आश्चर्य? संपत्ति, मान-सम्मान, ऐशोआराम आदि भी अगर आत्मा में द्विधा उत्पन्न कर सकते हैं, तो फिर वाकपटु मिथ्यामती का परिचय क्या नहीं कर सकता? कई बार आप लोग कहते हैं कि मुक्ति चाहिए! बिना विरति के मुक्ति की प्राप्ति संभव नहीं है, यह भी निश्चित है, ये सब बातें शतप्रतिशत सही हैं... लेकिन ‘संयोग अनुकूल नहीं हैं...ऐसी क्षमता नहीं है...’ ऐसे एक के बाद एक बहाने बताने लगते हैं। सच है या नहीं? मिथ्यामती के परिचय के बिना भी अगर यह स्थिति है तो फिर जहां केवल उन्मार्ग का ही जमावडा है, ऐसे मिथ्यामतियों के परिचय से क्या न हो?

उस स्थिति में दूषण को आने में कितनी देर लग सकती है? तथ्य को समझने के बाद भी सिर्फ संयोगों को ही देखते रहें, संभव कार्य को भी असंभव माना करें तो परिणाम क्या हो? लक्ष्मी की कामना करने वाला संयोग न हो तो भी उसकी आकांक्षा क्या होती है? वह बाजार में जाएगा और इधर-उधर से ताकत जुटाने का प्रयत्न करेगा। ऐसा कोई भी प्रयत्न यहां दिखाई देता है क्या? सम्यग्दृष्टि प्राप्त न कर सकें यह संभव है, लेकिन प्रयास ही न किया जाए, वह कैसे चलेगा? चौबीस घंटे में विरति लेने के लिए कितना प्रयत्न किया जाता है? मिथ्यामति के परिचय के बिना भी यह स्थिति है, तो परिचय से तो क्या दशा हो सकती है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

बुद्धिमान भी मूर्ख की संगत में मूर्ख बन जाते हैं!


सम्यग्दर्शन का पांचवा दोष है, ‘मिथ्यामती का परिचय’। व्यापार के काम से या दुनियादारी के संबंध के कारण मिलना-जुलना पडता है, इसे परिचय नहीं मानेंगे, किन्तु साथ उठने-बैठने का गहरा संबंध हो, उसे परिचय कहते हैं। मिथ्यामती के परिचय के परिणामस्वरूप पूर्व-उल्लेखित चारों दोषों का आत्मा में प्रवेश होता है। कलिकालसर्वज्ञ आचार्य भगवान श्री हेमचंद्रसूरीश्वरजी महाराज बतलाते हैं कि मिथ्यामती के परिचय से दृढ सम्यक्त्व में भी भेद होता है, तो फिर सामान्य सम्यक्त्व के विषय में तो पूछना ही क्या? मिथ्यामतियों के पास रहने से, उनकी क्रिया देखने से, उनके साथ बातचीत के अधिक प्रसंग के फलस्वरूप बात-बात में शंका उत्पन्न होती है। दृढ समकिती भी बदल जाएं तो सामान्य या नए धर्मी का क्या कहना?
शास्त्रकार कहते हैं कि समकिती को इन पांचों ही दोषों से दूर रहना चाहिए। समर्थ आत्मा के लिए अलग विधान है। उसके लिए तो मिथ्यादृष्टियों की सभा में जाने की भी छूट है तथा उनके साथ वाद-विवाद करने की भी छूट है, क्योंकि उसमें तो उन्मार्ग में स्थित मनुष्यों को यहां सन्मार्ग में खींच लाने की क्षमता होती है। कई लोग कहते हैं कि गुटबंदी से क्या लाभ? अगर हमारा मार्ग सही है तो गुटबंदी की क्या आवश्यकता? क्या हमारे दर्शन में कोई लचरपना है? लेकिन उन्हें पता नहीं, दुनिया में कहावत है कि "तंबाखू के खेत को रक्षक-बाड की आवश्यकता नहीं होती।" महंगी फसल के खेत के लिए ही रक्षक-बाड बनाना आवश्यक हो जाता है। रक्षक-बाड न हो तो वहां समझ लीजिए कि खेत की फसल बहुत मूल्यवान नहीं है। दुनिया मूल्यवान वस्तु की रक्षा के लिए प्रयत्न करती है। ज्यादा मूल्यवान न हो, ऐसी वस्तु की, ऐसे माल की रक्षा की चिंता कोई नहीं करता। अनादिकाल से मिथ्यात्व में डूबी हुई, मिथ्यात्व का सेवन करने वाली और उसी में मगन रहने वाली आत्मा महापुण्य के योग से इस सम्यग्दर्शन को प्राप्त करती है, तब उसकी रक्षा के लिए उचित उपाय प्रयत्नपूर्वक करना ही चाहिए कि नहीं?
दुनिया में कहा जाता है कि बुद्धिमान भी मूर्ख की संगत में मूर्ख बनजाते हैं। इसीलिए ही नीतिकार भी कहते हैं- ‘न मूर्खजनसंसर्गः, सुरेन्द्रभवनेष्वपि’।
‘अगर अच्छी संगति न मिले तो वन में रहना अच्छा है; किन्तु अगर नगर में भी मूर्ख की संगति मिलती है, तो वहां नहीं रहना चाहिए, क्योंकि मूर्ख के तो तोष एवं रोष दोनों व्यर्थ हैं, नुकसानकारक हैं।’ दोनों स्थिति में वह कुछ न कुछ गडबड किए बिना नहीं रहता। मूर्ख लोग देवलोक को भी नर्कागार बना सकते हैं, इतनी क्षमता उनमें होती है। बडी मुश्किल से, महापुण्ययोग से, अति दुर्लभ ऐसे सम्यक्त्वरत्न की प्राप्ति जिसे हो, वह मिथ्यामती लोगों की भीड में सम्मिलित हो जाए, यह कैसे चल सकता है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अन्य दर्शन की प्रशंसा भी सम्यक्त्व में दोष है


अन्य दर्शनों की प्रशंसा भी सम्यक्त्व में दोषरूप बतलाई गई है। इतना ही नहीं, बल्कि उन दर्शनों के प्रति राग को ‘दृष्टिराग’ के रूप में वर्णित कर सत्पुरुषों के लिए उसकी दुरुच्छेदता वर्णित की है। क्योंकि, वह राग आत्मा को असदाग्रही बना देनेवाला है। कुत्सित दर्शनों के प्रति राग, सद्वस्तु को समझने में महान अंतरायरूप है। इसी कारण से ऐसे दर्शनों के प्रति जो रागी, वे मिथ्यादृष्टि और उनके गुण की जो प्रशंसा, वह भी सम्यक्त्व का चौथा दोष है। इस दोष से बचने की भावना वाले को कुदर्शनों से अत्यंत ही सजग रहना चाहिए। अयोग्य स्थान में रहा हुआ गुण भी प्रदर्शन में रखने योग्य नहीं रहता। इस गुण को प्रदर्शन में रखने के लिए उसकी आधारभूत वस्तु भी साथ रखनी पडती है और उस आधारभूत वस्तु को साथ रखने से उस वस्तु को लेकर वह गुण भी दोषरूप भासित होता है। इसी कारण से उसकी प्रशंसा भी दोषरूप है। दुनिया में भी यह वस्तु सिद्ध है। दुनिया भी कहती है कि ‘अयोग्य वस्तु की महिमा नहीं गाई जाती।’ और अगर कोई गाता हो तो उससे सचेत रहना चाहिए।

अयोग्य वस्तु की शक्ति की भी प्रशंसा नहीं की जाती। सौ बार धोया हुआ घी भले ही सारा सफेद हो, फिर भी अगर वह खा लिया जाए तो मार डाले, इसलिए किसी को देते हुए कहना ही पडे कि ‘वह नाशक है, इसलिए बाहर लगाने के लिए है, परंतु मुंह में डालने के लिए नहीं है।’ उसी प्रकार ‘आदमी बहुत होशियार’ होते हुए भी अगर चोर हो, तो उसे कोई भी नहीं रखेगा। होशियार भले ही हो, परन्तु हाथ का साफ हो तो ही रखा जा सकता है। हाथ के मैले को तो नहीं ही रखा जा सकता है। श्रेष्ठी लोग बिना मुनीम के बेशक चला लें, परंतु हाथ के मैले को तो नहीं ही रखेंगे। सेठ समझता है कि निपट निठल्ला तो चोरी करने जाए तो भी पकडा जाए, परंतु होशियार तो जमा-उधार ठीक से करे, लेकिन बीच में से खा जाए उसका क्या हो? इससे व्यवहार में कहा जाता है कि ‘चोर का भाई घंटीचोर’, मतलब कि चोर की प्रशंसा करने वाले को भी चोर का ही साथी समझना चाहिए। चोर को पेढी में घुसाकर उसकी चोरी में से भी वैसे लोग माल खाने वाले होते हैं। इसलिए ही कहना पडता है कि अकेले गुण पर मोहित न हो जाएं, परन्तु किसका गुण है? यह अवश्य पूछना और जानना चाहिए।

चाहे जितना होशियार घोडा हो, पर बिना लगाम के उस पर नहीं ही बैठा जा सकता है। हाथी पर बैठना अच्छा है, परंतु बिना अंकुश के बैठना यह भयंकर ही है। उसी प्रकार जैसे गुण अच्छा, परंतु स्थल देखे बिना प्रशंसा नहीं की जा सकती। अन्यथा अनर्थ हो जाए। इसी कारण से ज्ञानी कांक्षा को और मिथ्यामतियों के गुणवर्णन को भी दोष के रूप में बतलाते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

वस्तुमात्र का संपूर्ण वर्णन श्री जैनदर्शन में ही


वस्तुमात्र का संपूर्ण वर्णन श्री जैनदर्शन के सिवाय अन्यत्र लभ्य ही नहीं है। किसी भी गुण को लें या किसी भी तत्त्व को लें, उसका यथास्थिति और संपूर्ण वर्णन सिवाय जैनदर्शन के, अन्य किसी भी दर्शन में नहीं ही मिलेगा, यह निर्विवाद है। जीवतत्त्व का स्वरूप जानना, यह प्रत्येक अहिंसावादी के लिए अति आवश्यक है, परंतु उसका स्वरूप जानने के लिए अन्यों के चाहे जितने ग्रंथ पढें, परंतु यथास्थिति और संपूर्ण वर्णन किसी भी दर्शन में नहीं मिलेगा; क्योंकि कोई तो आत्मा को ‘विभु’ और ‘एक ही’ कहेगा; कोई उसे ‘अनेक’ बतलाकर ‘सर्वव्यापी’ कहेगा; कोई उसे ‘अणुरूप’ कहेगा, कोई ‘नित्य ही’ तो कोई ‘अनित्य ही’ कहेगा; कोई ‘निर्लेप ही’ तो कोई ‘लेपयुक्त ही’ कहेगा। इससे अधिक स्वरूप किसी स्थान पर नहीं मिलेगा। जबकि श्री जैनदर्शन में जीवों की अनेकता, उनकी देहपरिमाणता के साथ ही उसका स्वरूप, स्वभाव, उसके प्रकार आदि उससे सम्बंधित प्रत्येक अवस्था का यथास्थिति और संपूर्ण वर्णन मिलेगा।

जीवतत्त्व के विषय में जैसे यथास्थिति वर्णन श्री जैनदर्शन में ही मिल सकता है, वैसे अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बंध, निर्जरा और मोक्षतत्त्व का यथास्थिति और संपूर्ण वर्णन भी श्री जैनदर्शन में ही मिल सकता है। इससे यह बात सुनिश्चित है कि प्रत्येक वस्तु का यथास्थिति और संपूर्ण वर्णन एक श्री जैनदर्शन में ही है, अन्य दर्शनों में नहीं है। अन्य दर्शनों में तो किसी भी वस्तु का एकदेशी (आंशिक) वर्णन ही आया है और उसे ही संपूर्ण मान लेने में आया है, इसी कारण से उन्हें कुदर्शन माना जाता है और इसलिए ही उन दर्शनों को युक्तियुक्त अथवा सुंदर कहने में सम्यक्त्व को दोष लगता है।

इस विश्व में परम वीतराग एवं सर्वज्ञ ऐसे श्री जिनेश्वरदेवों द्वारा प्रणीत किया हुआ श्री जैनदर्शन ही ऐसा है कि जिसमें वस्तुमात्र का स्वरूप सर्वदेशीय और (सर्वांशिक) यथास्थिति रूप से आलेखित किया गया है। द्रव्यार्थिक नय से आत्मा नित्य है, पर्यायार्थिक नय से आत्मा अनित्य है, आत्मा का स्वरूप अनादि सिद्ध है, आत्मा में क्षण-क्षण परिवर्तन होता है, आत्मा में होने वाला परिवर्तन कैसे-क्यों होता है, आत्मा की किस अवस्था में किसके योग से उसमें परिवर्तन होता है, आत्मा में होते परिवर्तन के प्रकार क्या, आत्मा कब और किसके योग से अपना संपूर्ण स्वरूप प्रकट करती है, संसारवर्ती जीव कितने हैं, वे संसार में किस-किस प्रकार से रहे हुए हैं, सिद्धत्व को प्राप्त आत्माएं कितनी हैं, वे किस प्रकार से रही हुई हैं वगैरह जीवतत्त्व संबंधी बातें जानने योग्य हैं और इन सभी बातों का वास्तविक स्वरूप केवल श्री जैनदर्शन में ही आलेखित है। इसी प्रकार अन्यान्य तत्त्वों की विविधता, विशिष्टता, विलक्षणता एवं विरूपता आदि का वर्णन श्री जैनदर्शन में ही मिलेगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

श्री जैनदर्शन ही एक सर्वांग सत्य है


जैनदर्शन को संप्राप्त व्यक्ति मर्जी में आए उसे ही पूजें ऐसा नहीं है, उसे तो गुणवान मात्र को पूजने चाहिए, मर्जी न हो तो भी गुणवान को पूजने का तो उसका फर्ज है। ‘इसे ही मानूं’, ऐसा तो मिथ्यादृष्टि कहते हैं, परंतु सम्यग्दृष्टि ऐसा कहे ही नहीं। क्योंकि, इस शासन को पाए हुए व्यक्ति को तो योग्य हो उन सभी को मानने पडें। मर्जी में आए उसे माने, ऐसी छूट यहां नहीं है। विशेष में यदि सारे ही दर्शन युक्तियुक्त, वास्तविक एवं सत्य ही हों तो हम श्री जैनदर्शन के ही अनुयायी क्यों कहलाएं? क्यों कर ‘सर्वदर्शन के अनुयायी’ न कहलवाएं? जो वस्तु युक्तियुक्त हो, उसे नहीं मानने की छूट सम्यग्दृष्टि आत्मा ले सके वैसा नहीं है। यदि ऐसी छूट ले तो मिथ्यादृष्टि में और उसमें फर्क भी क्या? यहां कुलपरंपरा का बचाव चले ही नहीं। कुलपरंपरा में भी जो सच्चा हो, वही माना जाए, परंतु जो गलत हो, वह नहीं ही माना जाए। सारे ही दर्शन यदि युक्तियुक्त ही होते तो एकांत गुण के ही पुजारी ऐसे हमारे पूर्वाचार्य अपने को ‘जैनाचार्य’ के रूप में नहीं परिचित करवाते हुए ‘सर्वदर्शनाचार्य’ के रूप में ही परिचित करवाते! परंतु ऐसा था ही नहीं, इसी कारण से कलिकालसर्वज्ञ भगवान श्री हेमचंद्रसूरीश्वरजी महाराजा कहते हैं कि माध्यस्थ के दिखावे से सर्वदर्शन को युक्तियुक्त कहकर उसकी स्तुति करना, यह भी सम्यक्त्व में दूषण है। इससे स्पष्ट ही है कि इस विश्व में सर्वांग सत्य दर्शन कोई है तो वह एक मात्र श्री जैनदर्शन ही है।

श्री जैनदर्शन के सिवाय के अन्य दर्शनों में नितांत अच्छाई नहीं है, ऐसा ही है, परंतु व्यवहार (दुनिया) का नियम है कि नदी-नाले में से कभी रत्न निकले तो वे भी रत्नाकर के ही माने जाएंगे। नदी-नाले में से रत्नादिक निकल जाएं, इसलिए वे नदी-नाले के नहीं कहे जाएंगे अथवा नदी-नाले को रत्नाकर भी नहीं कहा जाएगा। कहना ही पडेगा कि रत्न तो रत्नाकर में से ही निकले, परंतु अन्यत्र से हाथ लग जाए तो भी मानना कि पानी के बहाव के साथ आ गए थे, वे निकले। ऐसा आग्रह नहीं है कि अन्य स्थान से निकले ही नहीं। परंतु वे रत्न निकले सो तो रत्नाकर के ही। वैसे ही अन्य दर्शनों में जो अच्छापन आया है, उसमें भी प्रभाव मूल वस्तु (जैन धर्म) का है, परंतु जहां से अच्छापन आया है, वह उसका नहीं है। अन्य दर्शन में अच्छी वस्तु है, परंतु वह श्री जैनदर्शन की है। अतः वहां रही हुई वस्तु अच्छी है, परंतु वह स्थान अच्छा नहीं है। अन्य दर्शनों में जो सुंदरता का दर्शन होता है, वह उनका अपना प्रभाव नहीं है, अपितु श्री जैनदर्शन का ही प्रभाव है। किसी-किसी गुण को लेकर आगे कर देने मात्र से किसी भी काल में और किसी भी प्रकार से कुदर्शन सुदर्शन नहीं बनता। गुणमात्र की उत्पत्तिभूमि श्री जैनदर्शन है, विश्व में गुणमात्र का प्रवर्त्तन करने वाला एक श्री जैनदर्शन ही है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

गुणरागी सजग और विवेकी बनें!


हमें गुण के साथ एतराज नहीं है, परंतु व्यक्ति के साथ है। क्योंकि जिस गुण से सम्यग्दृष्टि आत्मा हित साधती है, उसी गुण से मिथ्यादृष्टि आत्मा अहित साधती है। इसलिए ऐसे गुणवान की प्रशंसा न हो कि जिसके परिणाम से अन्य आत्माएं अयोग्य मार्ग पर चढ जाएं। यदि उस प्रकार की प्रशंसा करने में आए तो उस प्रकार की प्रशंसा करने वाला, दूसरों को उन्मार्ग पर चढाने के पाप का भी भागीदार होता है। इसी कारण से गुणरागी बनने वाले को विवेकी, परीक्षक एवं विचारशील बनना चाहिए और दिखावेभर के गुण में अनुरक्त नहीं हो जाना चाहिए। दिखावे भर के गुण में अनुरक्त हो जाना, यह विवेक नहीं, अपितु अविवेक है।

सज्जन के गुण जितने अनुपात में हों, उतने ही बाहर आएं और दुर्जन में गुण हो थोडे, परंतु दिखाई दें बहुत, क्योंकि उसका आडम्बर तो अपनी जात को (अपने आपको) पूजवाने का होता है। इस कारण से गुणरागी दिखावे भर से लोभ में पड जाए तो कभी भी सन्मार्ग पर टिक नहीं सकता। हित के अर्थियों को, अपने आपको सन्मार्ग में स्थिर रखने एवं दूसरे उन्मार्ग पर न चढ जाएं, इसलिए, ‘गुण, परंतु किसका है?’ यह अवश्य देखना चाहिए।

श्री जिनेश्वर देव के आगम से जिन-जिन की दृष्टि विपरीत है, वे सारे ही मिथ्यादृष्टि हैं और ऐसी आत्माओं के गुण की प्रशंसा करना, यह सम्यक्त्व का चौथा दोष है। इससे स्पष्ट है कि मिथ्यादृष्टि विद्वान और शक्तिसंपन्न हो सकता है, परंतु उसकी विद्वत्ता ज्ञानकोटि की नहीं होती, अपितु अज्ञानकोटि की होती है और उसकी शक्ति सद्गुणकोटि की नहीं होती, अपितु दुर्गुणकोटि की होती है। घोर मिथ्यादृष्टि, अपने ज्ञान, शक्ति और क्षमा आदि गुणों का उपयोग आत्महित हेतु नहीं कर सकता। ‘द्वैपायन ने तप की शक्ति का उपयोग किस में किया?’ यह तो आप जानते ही हैं। सचमुच सद्गुण पचाने के लिए दृष्टि शुद्ध चाहिए। नहीं तो उस गुण को दुर्गुण बनते देर नहीं लगती, इसी कारण से गुणरागी, स्व-पर का घात हो ऐसी प्रशंसा न करें।

इस कथन से यह बात सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं ही रहती कि ‘सत्य को असत्य मनवाने का कार्य यह शास्त्रकार चाहते ही नहीं।’ शास्त्रकार कहते हैं कि गुण तो अवश्य हो, वहां भी उदारता, सदाचार, तप, भावना भी हो, परंतु उस गुण से वह मुक्ति की साधना के बजाय संसार की साधना करते हैं; इससे वे गुण जैसा फल देना चाहिए, वैसा फल नहीं दे सकते। इसी कारण से उन गुणों को लेकर वे गुण के स्वामी प्रशंसापात्र नहीं रहते। एक मिथ्यामति के गुण की या सारे मिथ्यामति के गुण की और एक दर्शन की या सर्व दर्शन की प्रशंसा से सम्यक्त्व में दोष लगे बिना नहीं रहता। इसीलिए गुणरागी को अत्यंत ही सावधान रहना चाहिए और ‘सजग विवेकी’ बनना चाहिए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

मिथ्यात्वियों के गुणानुराग का डंका बज रहा है!


मिथ्यादृष्टि की प्रशंसा दोषरूप है। गुण को देखकर प्रमोद हो, उसमें हर्ज नहीं। अयोग्य के गुण को बडा रूपक देने से आज सारा उधम मचा है। आज सब तरफ मिथ्यात्वियों के गुणानुराग का डंका बज रहा है। अभी भी सोते रहेंगे, दुनिया की जंजाल से नहीं उठेंगे, ‘चलेगा-चलेगा’ कहकर ढकेलते रहोगे तो परिस्थिति भयंकर होगी। जैसे-जैसे दिन जाते हैं, वैसे परिस्थिति भयंकर बनती है। अभी यह समय है कि भाग्यवान बच सके। भगवान के पास प्रार्थना करें कि ऐसे संयोग मिले कि साध्य साधा जा सके। वस्तुस्थिति ठीक से समझ में आए, हृदय में उतर जाए, फिर भी प्रमाद करें तो आपके जैसा दुर्भागी कोई नहीं। समझे हुए फिर भी व्यवहार, दुनिया अथवा पोजिशन के पीछे खींचे जाकर अगर आप धर्मसेवन न करें, शासनसेवा न करें तो शास्त्र कहते हैं कि कल्याण की कामना है कहां?

बात-बात में ‘मैं और मेरी पोजिशन’ कहने वाले को शास्त्र कहते हैं कि वह धर्म पाया ही नहीं है। आज सम्यग्दृष्टि का मजाक उडाने वाले भी बहुत हैं। कोई उनसे कहे कि ‘जैन कुल में जन्म लेने के बाद हम से इस प्रकार किया जा सकता है?’ तो वे कहेंगे कि ‘बैठ-बैठ, सम्यग्दृष्टि की दुम! दुनिया में रहते हैं तो सब करना पडता है।’ इस स्थिति का कारण यही है कि ‘धर्म को छोडकर अपनेपन की चिता बहुत है।’ और वह धर्म के प्रति वफादार कब तक रह सकते हैं? कहना ही पडेगा कि अपने को मान-पान, अच्छा स्थान मिले तब तक; पता चले कि अब स्थान नहीं है कि तुरंत महाराज को और आगम को खमासमणा देकर चले जाएं।

गुणानुरागी कितना विवेकी होता है? बाहर की क्रिया से वह उलझन में पडे? दान, शील, तप और भाव के स्वरूप को वह ठीक से समझता है, क्योंकि उस प्रत्येक के पीछे अनेक प्रकार के भाव काम करते होते हैं। प्रशंसा कौन-से दान की? व्यापारी ग्राहक को चाय पिलाए, पान खिलाए यह दान है? ना! नहीं। यह तो चाय की गरमी में उलझाकर उसके पास से मनमाने पैसे निकलवाने के लिए पिलाते हैं, इसलिए उचित दान भी नहीं कहा जाता। गुणों का नाप निकालें। जैसे-तैसे जनों के गुणगान से तो दुनिया का अधःपतन होता है। यह दोष धर्म के स्वरूप से अज्ञानी जैन समाज में नस-नस में फैला है। पुण्यवान कोई विरले बचे होंगे। अयोग्य स्थान में रहे हुए गुण की प्रशंसा से स्व-पर का नाश होता है, इसलिए उससे अवश्य बचना चाहिए। मिथ्यामती में भी गुण तो हो सकते हैं, परंतु वे गुण वास्तविक रूप से प्रशंसा के पात्र नहीं हैं। उस गुण से सम्यग्दृष्टि आत्मा को आनंद अवश्य हो। वे गुण अपने जीवन में उतारने की भावना भी सम्यग्दृष्टि आत्मा को जागे, परंतु उस गुण को लेकर जिसमें वह गुण हो उनकी, उन्मार्ग का प्रचार हो इस प्रकार की प्रशंसा तो नहीं ही की जा सकती है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा