गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

अपनी आत्मा से पूछिए!


कई लोग ऐसा कहते हैं कि ‘हमारी दशा चाहे जैसी हो, हमारा व्यवहार चाहे जैसा हो, परंतु श्री जिनेश्वर देवों ने जो कहा है, वही सत्य और निःशंक है, ऐसा तो हम हृदय से मानते हैं।’ यह मान्यता यदि अंतःकरण से है तो यह उच्च कोटि की लघुकर्मिता है। यह निस्संदेह सत्य है कि श्री जिनेश्वर देवों ने जिन-जिन वस्तुओं का जो-जो स्वरूप बताया है, उन वस्तुओं को उस-उस रूप में अंतःकरण से माना जाए तो भी आत्मा की मुक्ति निश्चित हो जाती है। परंतु अंतःकरण के साथ विचार करके निश्चित करना चाहिए कि ‘हम श्री जिनेश्वर देवों ने जो कहा, वही सत्य और निःशंक है, ऐसा कहते हैं या वास्तविकरूप से मानते हैं?’

यह बात यदि मात्र कहने की ही हो और हृदय में बराबर बैठी न हो तो इस बात को हृदय में बराबर बिठा लेना चाहिए। आत्मा से पूछना चाहिए कि ‘बोल, तुझे श्री जिनेश्वर देवों ने जिस वस्तु को जिस रूप में बताई है, वही वास्तविक है, ऐसा लगता है? उन तारकों ने जिसे उपादेय कही, जिसे ज्ञेय कही और जिसे हेय कही, वह उसी अनुसार लगती है? जिसे उन्होंने उपादेय कही वह उपादेय ही लगती है? हेय कही वह हेय ही लगती है? ज्ञेय कही वह ज्ञेय ही लगती है?’ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आत्मा के साथ यह विचार कर लेना जरूरी है।

श्री जिनेश्वर देवों ने संसार को दुःखमय कहा है, दुःखफलक कहा है और दुःखपरम्परक कहा है। आत्मा से पूछिए, ‘संसार तुझे कैसा लगता है?’ श्री जिनेश्वर देव ने जो कहा, वही सत्य और निःशंक है, ऐसा कहने वाले आपको क्या संसार दुःखमय है, दुःखफलक है और दुःखपरम्परक है, ऐसा लगता है? यदि अंतःकरण से ऐसा लगता हो तो यह भी प्रसन्नता की बात है।

परंतु, इसके बदले यदि संसार सुखमय लगे, पौद्गलिक संयोग बहुत अच्छे लगें, इनके मिलने पर इनमें आसक्त बना जाए, इनके जाने पर असाध्य सन्निपात हो जाए, ये बढते रहें, ऐसी रात-दिन चिंता रहा करे, जीवन में ये कभी न छूटें तो अच्छा, कभी आत्मा को ऐसा पश्चाताप न हो कि ‘मैं ‘पर’ में मुग्ध बना रहा हूं तो मेरा क्या होगा?’ दिन रात इन्हें ही प्राप्त करने की, भोगने की, बढाने की और इन्हें सुरक्षित रखने की चिंता बनी रहे, तथा इनके बिना सुख ही नहीं, ऐसा अनुभव होता हो तो यह कैसी दशा है, इसका विचार करिए!

कोई कह दे कि चौबीस घंटे बाद ये भोगादि जाने वाले हैं और यदि ऐसा विश्वास हो जाए तो असाध्य सन्निपात हो जाता है, यह क्या बताता है? पौद्गलिक संयोगों को ‘पर’ मानने वाले की मनोदशा कैसी होनी चाहिए? यह सब ठीक ढंग से विचार करिए। यह विचार स्फूर्णता अनवरत रूप से चलनी चाहिए, क्योंकि इससे आपकी लघुकर्मिता दृढ व निर्मल बने बिना नहीं रहेगी।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सम्यग्दृष्टि धर्म-अर्थ-काम को कैसा माने?


अनंत उपकारी श्री जिनेश्वर देवों ने ऐसा सुंदर मार्ग प्ररूपित किया है कि इस मार्ग की यदि बराबर आराधना की जाए, इस मार्ग पर यदि बराबर चला जाए, इस मार्ग का यदि आचरण किया जाए, तो जगत के जीव जो वास्तविक रूप से चाहते हैं, उसे बहुत सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। जगत के जीवों की वास्तविक इच्छा दुःख से और सुखाभास से मुक्त होने की है तथा वास्तविक सुख को पाने की है। जगत के जीवों को ऐसा सचमुच अच्छा नहीं लगता जो दुःखवाला हो। दुःख को खींचकर लाने वाला सुख भी वास्तविक रूप से जगत के जीवों को रुचिकर नहीं लगता। जगत के जीवों को सुख चाहिए और वह भी ऐसा कि जिसमें दुःख का अंश मात्र न हो, सदाकाल टिकने वाला हो तथा अधूरा भी न हो। जगत के जीवों की यह अभिलाषा सरलता से सफल हो, ऐसा मार्ग श्री जिनेश्वर देवों ने बताया है।

श्री जिनेश्वर देवों के द्वारा बताया हुआ मार्ग ऐसा उत्तम होने पर भी, इस मार्ग का जीवन में शक्ति-अनुसार आचरण न दिखे, इस उपाय को व्यवहार में उतारने का उल्लास न दिखे, इससे विपरीत मार्ग के आसेवन में तत्परता दिखे और ज्ञानियों ने जो दुःख के कारण बताए, वे सुख के कारण लगें, तो क्या समझना चाहिए? दुःख नहीं चाहिए और सुख चाहिए, इस बात में मतभेद है? नहीं। क्योंकि, ऐसा तो सब कहते हैं कि दुःख टले और और सुख मिले, इसके लिए तो हम रात दिन प्रयत्न करते हैं; इससे स्पष्ट है कि दुःख को दूर करने की और सुख को पाने की इच्छा तो सबकी है ही। अब, यह इच्छा होने पर भी, इस इच्छा को बराबर सफल कर सकें, ऐसा श्री जिनेश्वर देवों ने मार्ग बाताया है, उसका सेवन क्यों नहीं होता? यह प्रश्न जब खडा होता है, तब बडी दुविधा होती है। दुःख नहीं चाहिए और सुख चाहिए, इस बात में मतभेद नहीं, फिर भी श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित अनुपम सुख के मार्ग का शक्ति-अनुसार पालन नहीं होता, इसका कारण क्या है?

‘श्री जिनेश्वर देवों के बताए हुए मार्ग पर श्रद्धा नहीं?’ इस प्रश्न के उत्तर
में ‘ना’ ऐसा मानने को भी हृदय इनकार करता है। श्री जिनेश्वर देवों ने जो कहा है, वही सत्य है और शंकारहित है, ऐसा स्पष्ट एवं जोरदेकर कहने में ही हृदय को संतोष होता है। ये तारक असत्य कहते ही नहीं, ऐसा हमें विश्वास है। इन तारकों ने जो कहा है, वह सत्य ही है। अर्थात् श्री जिनेश्वर देवों के कथित मार्ग पर श्रद्धा नहीं है, ऐसा भी हमें स्वीकार नहीं है। इतनी भी जो स्थिति है, वह लघुकर्मिता को सूचित करती है, यह निश्चित है। लघुकर्मी हुए बिना आत्मा की ऐसी स्थिति नहीं होती। इतना होते हुए भी जिन आत्माओं को अधिक लघुकर्मी बनना हो और अंत में कर्मरहित दशा प्राप्त करनी हो, उनको अपनी वास्तविक स्थिति को समझने और सोचने के प्रयत्न के प्रति असावधान नहीं रहना चाहिए।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

संसार दुःखमय, दुःखफलक और दुःखपरम्परक है


यह संसार दुःखमय है, इस संसार में सुख नहीं है, अपितु दुःख है। संसार के स्वरूप का वर्णन करते हुए श्री जिनेश्वर देवों ने संसार को दुःखमय कहा, दुःखफलक कहा और दुःखपरम्परक भी कहा। इससे यह बात सच्ची और शंकारहित सिद्ध हो जाती है कि संसार में सुख नहीं, अपितु दुःख है, संसार का फल भी दुःख है और संसार से दुःख की परम्परा चलती है। क्योंकि, यह बात श्री जिनेश्वर देवों ने कही है। ‘वही सत्य है और शंकारहित है, जो श्री जिनेश्वर देवों ने कहा है,’ ऐसा जोर देकर बोलने वाले को संसार ऐसा ही लगना चाहिए। आपको कभी ऐसा लगा कि यह संसार दुःखमय है? यह संसार दुःखफलक है, ऐसा लगा? यह संसार दुःख परम्परक है, ऐसा लगा?

क्या लगता है? जहां श्री जिनेश्वर देव ‘सुख नहीं’, ऐसा कहते हैं वहां आपको सुख लगता है तो ‘श्री जिनेश्वर देवों ने कहा, वही सत्य और निःशंक है’, यह बात कहां रही? यदि श्री जिनेश्वर देवों ने जो कहा वही सत्य और निःशंक है, ऐसा हृदयपूर्वक माना जाता हो तो बंगले में प्रवेश करते समय, भोजन करते समय, लाख रुपये मिलते समय, कभी हृदय में दुःख होता है क्या? ऐसा भी नहीं होता है कि इन सब में मुझे सुख क्यों लगता है? इन सबके द्वारा पुण्य के उदय वाले को पौद्गलिक सुख मिलता है, परंतु पौद्गलिक सुख वास्तविक सुख नहीं है, यह सुखाभास है। श्री जिनेश्वर देव के सेवक को तो पौद्गलिक सुख भी विचारणा के योग से दुःखरूप लगना चाहिए। यह दुःखरूप लगेगा, तब ही इसमें से रस उडेगा। रस उडने पर इन सब में रहते हुए, इन सबका भोग करते हुए भी इनमें रूखापन रहेगा। ऐसा विचार होगा कि मैं इन्हें भले ही भोगता हूं, परंतु यह मैं अच्छा नहीं करता; इसका परिणाम दुःख है। ऐसा करते हुए वैराग्य आ सकता है और आया हुआ वैराग्य कदाचित सुस्थिर भी बन सकता है।

एक तरफ हम कहते हैं कि "श्री जिनेश्वर देवों ने जो कहा है, वही सत्य है और वही निःशंक है" और दूसरी तरफ श्री जिनेश्वर देवों ने संसार को दुःखमय, दुःखफलक और दुःखपरम्परक कहा है, ऐसा जानते हुए भी यदि संसार हमें वैसा न लगे, उससे विपरीत लगे, संसार में सुख लगे तो यह भी देखना चाहिए कि इसका कारण क्या है? श्री जिनेश्वर देवों ने संसार को जैसा बताया है, वैसा लगते हुए भी उसका त्याग न कर सकें, यह संभव है, परंतु वह छोडने योग्य है, इसमें आत्मा का हित नहीं है, अपितु हानि है, ऐसा तो लगना ही चाहिए। अपनी वर्तमान दशा को देखकर हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इसमें मिथ्यात्व काम करता है या यह अविरति का दोष है? यदि यह दोष अविरति सम्बंधी है, मिथ्यात्व का नहीं है, सम्यक्त्व हो और मान्यता में तनिक भी परिवर्तन न हो, तो खतरे की बात नहीं है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

कीचड़ में कमलवत्


जिन जीवों को ऐसा लग गया है कि मुझे संसार का कोई भी भोग नहीं चाहिए और एकमात्र मोक्ष ही चाहिए और ऐसा होने से जिन जीवों ने भगवान द्वारा प्ररूपित मोक्षमार्ग की आराधना का ही पुरुषार्थ अपनाया है, ऐसे जीव भी उसी भव में मोक्ष को प्राप्त कर लें, ऐसा अधिकतर नहीं होता। एकमात्र मोक्ष ही चाहिए, ऐसा मन में लग जाने के बाद और भगवान द्वारा प्ररूपित मोक्षमार्ग की साधना को अपनाने के बाद भी ऐसे जीवों को मोक्ष-प्राप्ति के पहले बीच में कुछ भव करने पडें, ऐसा संभव है। तब ऐसे मोक्षार्थी जीव मर कर कहां जाएं? अधिकतर देवलोक में जाते हैं।

देवलोक में इन जीवों को संसार के भोग का संग कितना गाढ होता है? वे कितना ही चाहें, परंतु भोग से अलग नहीं हो सकते। ऐसी स्थिति वहां होती है। परंतु, ज्ञानी कहते हैं कि ये जीव भोग में आसक्त दिखते हैं, फिर भी भोग की अवगणना करने वाले होते हैं और एकमात्र मोक्ष की ही आकांक्षा रखने वाले होते हैं। बाहर से ये भोग में आसक्त लगते हैं, परंतु अंदर से ये भोग की अवगणना करने वाले होते हैं। जो आत्मा एकमात्र मोक्ष की ही अर्थी होती हैं और मोक्ष के लिए ही पुरुषार्थ करने की इच्छा वाली होती हैं, ऐसी आत्माओं की यह बात है। ऐसी आत्माओं को भोग के संग में रहना पडता है, इसलिए वे भोग के संग में रहते अवश्य हैं, परंतु उनके मन में भोग की अवगणना का भाव होता ही है।

कीचड़ में पैदा होने वाला कमल पानी से बढता है, वह कीचड़-पानी के संग में रहता है तो भी वह कीचड़ और पानी से निर्लिप्त रहता है। वैसे ही सम्यग्दृष्टि आत्मा भोग भोगते हुऐ भी भोग से निर्लिप्त रहते हैं और एक मात्र मोक्ष की आकांक्षा में ही रमण करते रहते हैं। इसमें यदि थोडी भी भूल हो जाती है और भोग का संग करने लग जाते हैं, तो उत्तमता का भंग होने में देर नहीं लगती।

एकमात्र मोक्ष के ही अर्थी आत्मा देवलोक से भी पुनः मनुष्य लोक में आते हैं न? ऐसे आत्माओं को पुण्य के कारण मनुष्य लोक में भी संसार के भोग की उत्तम सामग्री मिलती है, परंतु देवलोक में जिन्होंने भोग की अवगणना की हो, वे मनुष्य लोक के भोगों से कैसे ललचा सकते हैं? उनका वश चले तो वे भोग का सर्वथा त्याग ही कर दें और भोग में रहना पडे तो भोग की अवगणना के भाव जीवित रखते हुए रहते हैं।

इस प्रकार देव के और मनुष्य के थोडे भव करके वे मोक्ष में चले जाते हैं। श्रावकों को भी संसार के भोग का एकांत निस्पृह भाव इस प्रकार से संभव हो सकता है। नहीं तो श्रावकों के लिए ‘मोक्षायैव तु घटते’ कहा गया है, वह संगत नहीं होता।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

दर्शनमोहनीय का क्षयोपशम


दर्शनमोहनीय का क्षयोपशम भी अच्छा हो और उसके साथ चारित्र मोहनीय का उदय हो और वह भी जोरदार हो तो उसके कारण वह आत्मा संसार के सुख-दुःख में रति-अरति का अनुभव करता हो, ऐसा भी हो सकता है। परंतु, इतने मात्र से उसमें सम्यग्दर्शन नहीं है, ऐसा निर्णय नहीं किया जा सकता। संसार के सुख में रति और दुःख में अरति का अनुभव करते हुए भी, इस विषय में वह सचमुच क्या मानता है, यह भी देखना पडेगा। दर्शनमोहनीय का क्षयोपशम, वास्तव में तो आत्मा को तात्विक दृष्टि से देखने वाला बना देता है। ज्ञानियों द्वारा कहे गए हेय, उसे हेय ही लगते हैं और उपादेय, उपादेय ही लगते हैं। यह कार्य दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम से निष्पन्न होता है। परंतु हेय को छोडने का जोरदार उल्लास और उपादेय को अंगीकार करने का जोरदार उल्लास पैदा होने के लिए चारित्रमोहनीय के क्षयोपशम की आवश्यकता होती है।

दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम के प्रताप से मोक्ष व शुद्ध मोक्षमार्ग की रुचि प्रकट होती है, परंतु उस मार्ग के आचरण रूप सम्यकचारित्र तो चारित्रमोहनीय के क्षयोपशम के बिना प्राप्त नहीं होता। दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम से मोक्ष को प्राप्त और मोक्षमार्ग के स्थापक देवाधिदेव पर बहुत श्रद्धा होती है। जो वीतरागी नहीं, अनंतज्ञानी नहीं, वे देव गिने जाते हों और उनका जगत् में चाहे जितना भारी चमत्कार माना जाता हो, तो भी ऐसे देव को वह कुदेव ही मानता है। गुरु के विषय में भी उसे श्री जिनेश्वर द्वारा कथित मोक्षमार्ग पर चलने के लिए संसार के सब संगों को छोड चुके साधु ही गुरु लगते हैं और अन्य जो कोई दुनिया में धर्मगुरु गिने जाते हों, वे उसे कुगुरु ही लगते हैं। धर्म भी श्री जिनेश्वर द्वारा कथित हो वही सुधर्म अन्यथा कुधर्म, ऐसा उसे लगता है। इस प्रकार कुदेव, कुगुरु और कुधर्म का त्याग और सुदेव, सुगुरु और सुधर्म का स्वीकार दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम से निष्पन्न होते हैं। परंतु चारित्र के लिए तो चारित्रमोहनीय का ही क्षयोपशम चाहिए।

भगवान ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र को मोक्षमार्ग कहा है। सम्यग्दर्शन को पाए हुए का ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहा जाता है। अर्थात् उसे तीन में से दो का योग प्राप्त हुआ माना जाता है। परंतु तीसरे के योग के लिए तो चारित्रमोहनीय का क्षयोपशम होना चाहिए। सम्यग्दर्शन वाला जीव देव की सेवा और गुरु की सेवा आदि करता है, परंतु उसमें चारित्र के परिणाम तो चारित्रमोहनीय के क्षयोपशम होने पर ही आते हैं। सम्यग्दर्शन के योग से चारित्र पाने की भावना आए बिना नहीं रहती, परंतु उस भावनानुसार आचरण तो चारित्रमोहनीय के क्षयोपशम से ही हो सकता है। अर्थात् विरति न हो तो भी सम्यग्दर्शन हो सकता है। परंतु विरति की भावना ही न हो तो सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

घर बेचकर जीमन नहीं किया जाता


सम्यक्त्व पाने के लिए तो "संसार के सुख में ही सुख मानने की और संसार में दुःख आए तो कायर हो जाने की जो खराब आदत पड गई है, उसे हटाना पडेगा।" जो दुःख में रोया करता है और सुख में हंसा करता है और फिर इसमें बुद्धिमानी मानता है, तो वह जीव सम्यक्त्व पा सकता है? बाहर के सुख-दुःख में बहुत राग-द्वेष युक्त बनने वाले तो प्राप्त सम्यक्त्व को भी गंवा बैठते हैं। बाहर के सुख-दुःख में बहुत राग और बहुत द्वेष तो साधुपन को भी लूट लेते हैं, हम लोग मान-पान आदि में फंस जाते हैं तो परिणाम में साधुपन भी चला जाता है और कदाचित सम्यक्त्व भी जा सकता है।

जहां प्राप्त-वस्तु के भी जाने की संभावना हो, वहां सम्यक्त्व के आने की तो संभावना ही नहीं है। एक-दो बार नहीं, बल्कि अनंत बार साधुपन लिया हो और लेकर उसे अच्छी तरह पाला हो, अर्थात् अतिचार न लगे इस प्रकार साधुत्व के आचारों का पालन किया हो, तो भी सम्यक्त्व प्रकट न हुआ हो, ऐसे जीव भी इस संसार में होते हैं, ऐसा शास्त्र कहता है।

साधुत्व के पालन में स्वर्गादि सुख मिलते हैं, ऐसा सुनकर स्वर्गादि सुख के लिए साधुपन ले और अच्छी तरह पाले, यह संभव है। विषय-कषाय के जोर से उत्कट तप करे, और उत्कट चारित्र पाले, यह भी संभव है। साधुपन से सच्चा लाभ उसी को होता है, जिसे संसार का कोई भी सुख, सुखरूप नहीं लगता। ऐसा साधु इसका दुःख इस तरह टालो, उसका दुःख उस तरह टालो, ऐसी पापमय प्रवृत्ति में कैसे पड सकता है?

कुछ लोग कहते हैं कि इससे प्रभावना होती है! घर बेचकर जीमन करने वाला क्या बुद्धिमान कहा जाता है? घर-बार बेचकर जीमन करे और जीमन में ऐसा जिमावे कि जीमन की याद रह जाए! परंतु दूसरे दिन से वह अपना पेट भरने के लिए भीख मांगने निकले, तो क्या यह अच्छा कहा जा सकता है?

जीमने वाले लोग भी, उसे क्या कहेंगे? मूर्ख! इस तरह घर बेचकर जीमन करने के लिए तुझे किसने कहा था? ऐसा ही लोग उसे कहेंगे न? इसी प्रकार साधुत्व को भूलकर प्रभावना करने वाले को ज्ञानीजन क्या कहेंगे? जिस धर्म को वह स्वयं धक्का दे रहा है, वह जीव धर्म की प्रभावना क्या करेगा? वह धर्म की प्रभावना करेगा या अधर्म की? सम्यग्दर्शन पाने के बाद भी अविरति के गाढ उदय वाले के सामने बहुत कठिनाई और बहुत भय रहता है। सम्यग्दर्शन से पतित हो जाने की संभावना भी बहुत होती है। परंतु, जहां तक सम्यग्दर्शन बराबर टिका रहता है, वहां तक तो वह उत्तम में ही गिना जाता है। वह केवल मोक्ष के लिए ही प्रयत्न करता है, ऐसा कहा जा सकता है, भले ही उसका प्रयत्न धीमा हो।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

सम्यग्दृष्टि के मनोभावों का फल


सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त आत्माओं में जितनी सर्वविरति होती है, उनकी अपेक्षा देशविरति आत्मा और अविरति आत्मा बडी संख्या में होती हैं। देशविरति और अविरति आत्मा तो सब गृहस्थ ही होती हैं न? ये सब विषयों का सेवन न करती हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता और ये सब परिग्रह नहीं रखती हों, प्राप्त न करती हों, संग्रह न करती हों, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। तब विषयों का सेवन करने वाला और परिग्रह रखने वाला षट्काय की हिंसादि से बच सकता है? अभी स्थूल हिंसा, स्थूल असत्य और स्थूल अदत्तादान से वह दूर रहता हो, यह संभव है। क्योंकि, कई जीव ऐसे भी होते हैं कि ‘अभी हमारा काम पैसे के बिना नहीं चल सकता, क्योंकि संसार में बैठे हैं, और संसार तो हिंसामय है; अर्थात् हिंसा से भी सर्वथा नहीं बचा जा सकता; परंतु अपने भोग और परिग्रह के लिए हम असत्य नहीं बोलेंगे और चोरी नहीं करेंगे, इस मनोवृत्ति वाले होते हैं।

आप यदि ऐसा कहते हैं कि हम विवश हैं कि भोग बिना हमारा काम नहीं चलता; इसलिए परिग्रह बिना नहीं चलता और भोग और परिग्रह के बिना नहीं चलता, अर्थात् हम षट्काय की हिंसादि से सर्वथा बच नहीं सकते। परंतु चाहे जैसी स्थिति में भी हम असत्य बोलेंगे नहीं और चोरी करेंगे नहीं; तो यह सुनकर हम प्रसन्न होते हैं! परंतु इस संसार में ऐसे भी जीव हैं, जिन्होंने हिंसादि पांच महापापों का त्याग स्थूलरूप से भी किया नहीं है। ऐसे जीवों में भी जो जीव सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त हैं, उनके लिए भी शास्त्र कहता है कि ‘नरक और तिर्यंच गति के द्वार उन जीवों के लिए बंद हैं और दिव्य-सुख, मानुषिक-सुख तथा मुक्ति-सुख उनके स्वाधीन हैं!’ तब विचार करना चाहिए कि ‘ऐसा होता है तो उसका कारण क्या है? हिंसादि चालू है, विरति है नहीं, तो भी ऐसा होता है तो ढूंढना चाहिए कि ऐसे जीव कैसे मनोभाव के स्वामी होते हैं। क्रिया में तो कोई अच्छाई नहीं, क्रिया तो पापक्रिया ही है, फिर पापक्रिया होते हुए भी सम्यग्दृष्टि जीवों को दुर्गति से बचा लेने वाली चीज क्या है? और उन्हें दिव्य आदि सुखों को स्वाधीन बना देनेवाली वस्तु क्या है? ऐसी स्थिति में मनोभाव का विचार किए बिना काम नहीं चलता और यह विचार भी योग्य स्वरूप में करना पडेगा।

इस विषय में जैसे-जैसे विचार करते हैं, हमें दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम या उपशम की महत्ता समझ में आती है। यह क्षयोपशम या उपशम भाव ही सम्यग्दृष्टि जीव द्वारा होने वाली पाप क्रियाओं में से पाप के रस को निचोड डालता है। यह क्षयोपशम भाव ही सम्यग्दृष्टि जीव को पुण्यबंध में सहायक होता है और इस क्षयोपशम भाव द्वारा ही सम्यग्दृष्टि जीव निर्जरा करने वाला बनता है। वह पाप करता है तो विवशता से करता है, उसमें उसे रस नहीं होता, उसी का यह फल है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

सम्यक्त्वी का बर्ताव कैसा होता है?


सम्यग्दर्शन गुण के योग से आत्मा को सर्वप्रथम लाभ तो यह होता है कि वह आत्मा अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकती है। ज्ञानीजन जिसे त्याज्य और खराब कहते हैं, वह सब उसे भी त्याज्य और बुरा ही लगता है। इसी प्रकार ज्ञानीजन जिसे अच्छा और स्वीकारने योग्य कहते हैं, वह उसे भी अच्छा और स्वीकार करने योग्य ही लगता है। ऐसी दृष्टि और ऐसी रुचि जीव में सम्यग्दर्शन गुण के कारण प्रकट होती है। यह इस दृष्टि और इस रुचि का बहुत बडा लाभ है। हम जो कुछ करते हैं, उसमें सचमुच अच्छा क्या है और सचमुच खराब क्या है, उसकी समझ हमें होती है? जो कुछ हमें अच्छा लगता है, उसे करने की इच्छा हमें होती है? अच्छा न भी हो सके तो भी अच्छा करने की तमन्ना तो बहुत होती है? और जो खराब लगता है, उससे दूर रहने का मन भी बहुत होता है? हमें जो कुछ खराब करना पडता है, उसके लिए भी हमें लगता है कि हम खराब कर रहे हैं? ‘मैं यह खराब करता हूं, मैं यह जो करता हूं, वह अच्छा नहीं है, ऐसा अनुभव होता रहता है?

बर्ताव की खराबी छठे गुणस्थानक पर पहुंचने पर नहीं होती है। आगे बढकर कहें तो, जीव जब सातवें गुणस्थानक में चल रहा हो, तब ही उसके बर्ताव में खराबी नहीं है, ऐसा कहा जा सकता है, क्योंकि सातवें गुणस्थानक में प्रमाद नहीं होता। उससे पहले खराबी हो सकती है। छठे गुणस्थानकवाली आत्मा प्रमाद का सेवन करे, ऐसा हो सकता है। परंतु, छठे गुणस्थानक में रही आत्मा उस प्रमाद को अच्छा मानती है? उसे सेवन-योग्य मानती है? नहीं। अब पांचवें गुणस्थानक में रहा हुआ जीव चाहे वह संसार छोडा हुआ हो या संसार में बैठा हो, संसार में वह रहता हो और संसार का सेवन भी करता हो तो भी उसका संसार में रहना और संसार का सेवन करना उसे अच्छा लगता है? नहीं, संसार में रहना और संसार का सेवन करना बुरा है, ऐसा वह जानता है। इसीलिए उसने जितनी विरति स्वीकार की है, उसका उसे आनंद होता है और स्वीकृत विरति के अभ्यास से परिपूर्ण विरति प्राप्त करने की उसकी अभिलाषा होती है।

चौथे गुणस्थानक में जीव विरति के रूप में तनिक भी विरति नहीं कर सकता। चौथे गुणस्थानक में रहे हुए जीव में अविरति ही होती है, ऐसा कहा जाता है। वह जीव अविरति का सेवन करता हो, परंतु ‘मैं अविरति का सेवन करता हूं, यह अच्छा नहीं है’, ऐसा वह जीव मानता है। इस तरह, स्वयं जो कुछ भी प्रमाद करता है, जो कुछ भी अविरति होती है, उसे खराब मानने वाले जीव इस संसार में कितने हैं? ऐसे जीव संसार में थोडे ही होते हैं। जो कुछ अच्छा है, उसे ही अच्छा मानना और जो कुछ खराब है, उसे खराब ही मानना, कोई सरल बात नहीं है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

सम्यक्त्वी के लिए नरक के द्वार बंद हो जाते हैं!


जैसे हम आत्मा हैं, वैसे अनंतानंत आत्मा इस विश्व में अनादिकाल से विद्यमान हैं और अनंतानंत काल तक अनंतानंत आत्मा इस जगत में विद्यमान रहने वाली हैं। अपना अस्तित्व अर्थात् आत्मा मात्र का अस्तित्व कभी भी सर्वथा मिटने वाला नहीं है। परंतु, हमारी आत्मा इस प्रकार भटकती-भटकती जीए, यह हम नहीं चाहते। आत्मा जीवित तो रहने वाली है ही, परंतु आत्मा इस प्रकार भटकती हुई जीवित रहे, यह हमें पसंद नहीं है न? इसीलिए हम संसार से छूटने और मोक्ष को पाने का पुरुषार्थ कर रहे हैं, यह भी सत्य है न? जिन्होंने अब तक यह पुरुषार्थ अंगीकार नहीं किया, वे भी अब इस पुरुषार्थ को स्वीकार करना चाहते हैं न? हमें संसार से छूटना है और मोक्ष पाना है, यह हमारा लक्ष्य है। इसके लिए हमें जो पुरुषार्थ करना होता है, उसमें सम्यक्त्व गुण की पहली आवश्यकता है।

सम्यक्त्व गुण प्रकट हुए बिना, किसी भी आत्मा को, किसी भी काल में मुक्ति नहीं मिल सकती; और सम्यक्त्व गुण जिसमें प्रकट हो जाता है, उसके लिए नरक गति और तिर्यंच गति के द्वार बंद हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अपितु दैवी सुख भी उसके स्वाधीन हो जाते हैं। जिस भव में सम्यक्त्व की प्राप्ति हो, उसी भव में मुक्ति की प्राप्ति भी हो, ऐसे जीव थोडे हैं। मुक्ति-प्राप्ति के पूर्व जिन जीवों को कुछ समय संसार में रहना होता है, ऐसे जीव सम्यक्त्व प्राप्त करने वालों में अधिक संख्या में होते हैं।

ऐसे जीव मुक्ति को पाने से पूर्व कहां रहते हैं? संसार में तो रहते हैं, परंतु कैसे स्थान पर रहते हैं? सम्यक्त्व और जीव का सम्बंध यदि बराबर बना रहता है तो वह जीव कभी भी दुर्गति में नहीं जाता है। सम्यक्त्व की प्राप्ति के पूर्व आयुष्य बांध लिया हो तो अलग बात है। अन्यथा सम्यक्त्व की मौजूदगी में सम्यग्दृष्टि जीव को कभी दुर्गति के आयुष्य का बंध नहीं होता। वह जीव न तो नर्क गति में जाता है और न तिर्यंच गति में जाता है। शेष रही दो गतियों में भी वह जीव सुखवाले स्थान को पाता है। अंततः वह जीव मनुष्य गति को नियमतः पाता है और सर्व कर्मों का क्षय करके मुक्ति को प्राप्त करता है।

सम्यक्त्व की महिमा को बताने वाली इस बात का मर्म आपकी समझ में आता है? आत्मा में सम्यक्त्व गुण का प्रकटीकरण हो जाए तो इतने मात्र से दुर्गति बंद हो जाती है और सुख भी स्वाधीन हो जाता है, इसका क्या कारण है? सम्यक्त्व को पाने मात्र से जीव खराब व्यवहार करने से रुक जाता है, ऐसा नहीं है, परंतु खराब व्यवहार करने पर भी उस आत्मा में अच्छापन प्रकट होता है, जिसके कारण उसके लिए दुर्गति के द्वार बंद हो जाते हैं और दैविक सुख, मानुषिक सुख तथा मुक्ति सुख उसके स्वाधीन हो जाते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

वीतराग परमात्मा का सर्वदेशीय शासन


जब भी कोई जीव सम्यक्त्व प्राप्त करता है, वह जीव सम्यक्त्व प्राप्ति के पूर्व मिथ्यादृष्टि ही होगा न? वह मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्व को प्राप्त कराने वाले परिणामों का स्वामी बने बिना तो सम्यक्त्व प्राप्त नहीं करेगा न? अर्थात् उपदेशादि के श्रवण से या स्वाभाविकरूप से भी जीव सम्यक्त्व की सन्मुख दशा योग्य क्षयोपशम को प्राप्त करता है, तब ही वह जीव क्रमशः सम्यक्त्व को प्राप्त कर सकता है। ऐसे जीव के मिथ्यात्व का उदय चालू है, परंतु वह मंद पड गया होता है। उसको इतना क्षयोपशम हुआ है। अर्थात् उस जीव को जो कुछ गुण लाभ होता है, वह उस क्षयोपशम के बल से होता है।

ऐसे जीव को मिथ्यादृष्टि कहने के बजाय ‘सम्यक्त्व के सन्मुख हुआ जीव’ कहना अधिक संगत है। यदि ऐसा न हो तो जीव सम्यग्दर्शन गुण को प्रकट कैसे कर सकता है? इसीलिए धर्म को धर्म के रूप में करने की शुरूआत प्रथम गुणस्थान से होती है, ऐसा मिथ्यात्वादि की मंदता की अपेक्षा से कहा जा सकता है। सम्यक्त्व की सन्मुख दशा को प्राप्त जीव का भाव सम्यग्दृष्टि जीव के भाव के साथ अंशरूप में समानता करने वाला होता है और इस कारण से ही वह भाव उस जीव को सम्यक्त्व प्राप्त कराने वाला बनता है।

हम सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त हैं या हम में सम्यग्दर्शन गुण को प्रकट करने की इच्छा पैदा हुई है, अतः हम सम्यक्त्व की सन्मुख दशा में हैं? यह हमें स्वयं शास्त्र की बात को समझकर निश्चित करना चाहिए। यह सब सुनते हुए सर्वप्रथम तो हमें यह प्रतीति हो जानी चाहिए कि ‘श्री वीतराग का शासन ऐसा है कि इसके सच्चे अभ्यासी आत्माओं को ऐसी समझपूर्वक प्रतीति होती है कि, ‘जगत के सब शासनों के सन्मुख खडे रहने की और धर्मशासन की परिपूर्ण योग्यता स्वयं में होने की प्रतीति कराने की शक्ति एकमात्र श्री वीतराग परमात्मा के शासन में ही है’।

दुनिया में शासन बहुत हैं और स्वयं को धर्मशासन बताने वाले शासन भी बहुत सारे हैं। उनमें श्री वीतराग परमात्मा के शासन को छोडकर शेष जो शासन हैं, उनमें कई तो वास्तविक रूप से धर्म शासन ही नहीं हैं। और जो धर्मशासन कहे जा सकते हैं, वे भी आंशिक धर्म शासन ही हैं। वास्तव में तो उन शासनों की सब बातें निरपेक्ष होने के कारण वे कुदर्शन हैं, जबकि श्री वीतराग परमात्मा का शासन सर्वदेशीय शासन है। श्री वीतराग परमात्मा के शासन में आत्मा के स्वरूप का वर्णन इस तरह किया गया है कि जो कहीं बाधक नहीं होता। आत्मा अनादिकाल से कैसी है, आत्मा का जड के साथ क्या सम्बंध है, आत्मा किससे व कैसे बद्ध होती है और कैसे मुक्त हो सकती है; इत्यादि का वर्णन श्री वीतराग परमात्मा के शासन में परस्पर अविरुद्ध रीति से किया गया है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा