बुधवार, 9 जनवरी 2013

किया जैन जगत पर उपकार, खोले संयम के द्वार (4)

जिस समय वि.सं. 1969 में मुनिश्री रामविजयजी की दीक्षा हुई थी, उस समय पूरे श्वेताम्बर जैन संघ में केवल 150 साधु थे। प्रभु महावीर के शासन में संभवतया इतनी कम साधु संख्या इससे पूर्व कभी नहीं रही। दीक्षा विरोधियों और तत्कालीन समाज में व्याप्त मिथ्या धारणाओं के खिलाफ आफ 79 वर्षों तक लगातार अनवरत संघर्ष व सद्प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप संवत् 2047 में इनकी संख्या बढकर 6000 को पार कर गई। दीक्षा के मार्ग को सरल बनाने में और लोगों में स्वीकार करने जैसा बनाने में सबसे बडा योगदान उनका ही रहा है। इसे उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं। एक बार उन्होंने खंभात में एक साथ 24 और अमलनेर में एक साथ 26 मुमुक्षुओं को साधु जीवन में पदार्पण कराया था। बीसवीं सदी की जैन शासन की यह सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएं थीं।

मुनिश्री तिलकविजयजी नाम के एक साधु के दीक्षा लेने पर उनकी सांसारिक पत्नी इतनी उत्तेजित हो गई कि उसने भरी सभा में मुनिश्री रामविजयजी के कपडे फाडने का प्रयास किया, साथ ही उसने पुलिस में दर्ज करवाई रिपोर्ट में मुनिश्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने मुझे ओघे से पीटा। यह केस अहमदाबाद की कोर्ट में चला। जिसमें गवाही देने के लिए मुनिश्री को जाना पडता। उनकी कार्यशैली, पैरवी, तर्क और पक्ष प्रस्तुतिकरण इतना प्रभावी होता था कि संयोग से ही किसी केस में उन्हें वकील की जरूरत होती। इस केस में भी आरोपी के कटघरे में प्रवेश से पूर्व उन्होंने ओघा से जमीन का परिमार्जन करने के बाद, उसी ओघा को न्यायाधीश को बताकर उन्होंने कहा कि “हम साधु इसका उपयोग कीडे-मकोडे भी न मर जाएं, इसके लिए जमीन परिमार्जन के लिए करते हैं। आप ही बताइए क्या कोई जैन साधु इसका उपयोग किसी को मारने के लिए कर सकता है?” उनकी इस दलील को न्यायमूर्ति अवाक सुनते ही रह गए। न्यायमूर्ति ने देखा कि यह महिला ही अपने पति को वापस लाने के लिए झगडा करने धर्मसभा में गई, इसी ने मुनिश्री पर हमला किया और उल्टे उन्हें फंसाने के लिए यह सारा आरोप गड रही है। उन्होंने मुनिश्री को ससम्मान आरोपों से मुक्त कर दिया। ऐसी एक नहीं, अनेक घटनाएं उनके जीवन में घटित हुईं।

बालदीक्षा के प्रश्न पर तथाकथित सुधारक जैनों के आचार्यश्री के सामने आ जाने पर वातावरण काफी उग्र था। विरोधियों में जितना जुनून था, उससे दो गुनी खुमारी आचार्यश्री के संसारी भक्तों में थी। आचार्यश्री के विरोधी उन्हें मार्ग से हटाने के लिए तरह-तरह के पत्र भेजते। कुछ में खून करने की धमकी भी दी जाती थी। ऐसी स्थिति में बडे से बडा दृढ साधु भी ठंडा पड जाता। खुद आचार्यश्री के भक्त और शुभेच्छु भी उन्हें दीक्षा का आग्रह छोडने के लिए समझाते, तब वे कहते कि ‘इनके सामने एक बार झुक जाने पर इनकी गलत बात प्रस्थापित हो जाएगी’। आचार्यश्री के विरोधी उन्हें किसी भी समय समाप्त कर सकते हैं, ऐसा भय उत्पन्न होने पर उनके दादागुरु विजयदानसूरि जी काफी सजग रहते। उन्हें भीक्षा में कोई जहरीला पदार्थ न खिला दे, इसके लिए उनके वफादार शिष्य मुनिश्री चारित्रविजय जी हमेशा उनके साथ रहते थे। अपने गुरु को कोई भी आहार देने से पूर्व वे स्वयं चखते और आधा घंटा उसका प्रभाव देखने के बाद अपने गुरु को आहार देते थे।

ऐसे उग्र विरोध के वातावरण में आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी का मुम्बई में प्रवेश होने पर रास्ते में जगह-जगह काले झण्डे लगाए गए थे, मार्ग में कांच बिखेरा गया था और मकानों से उन पर पत्थरों की वर्षा की गई, फिर भी उनके हृदय में विरोधियों के प्रति मैल पैदा नहीं हुआ और विरोध से डरकर उन्होंने कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाए।

मुम्बई में तथाकथित सुधारवादियों के बवाल, उग्र विरोध और हमला करने की संभावनाओं के मद्देनजर डर के मारे समाज के कुछ अग्रणीय कहे जाने वाले लोगों ने आचार्य भगवन् को सुरक्षा की दृष्टि से प्रवचन बंद रखने की सलाह दी तो पूज्य श्री ने निर्भीकता से कहा, ‘हमारी सुरक्षा की आप तनिक भी चिन्ता न करें। हमारी रक्षा करने वाला श्री जिनशासन जयवंत है। कोई हमारी रक्षा करेगा, इस विश्वास पर हमने यह संयम अंगीकार नहीं किया है।’

इस तरह खुद अनेक तरह के संघर्षों का सामना करते हुए 20वीं सदी में जैन धर्म संघ के महानायक रहे, श्रमण संस्कृति के उद्धारक-पोषक धर्मयोद्धा, जैन शासन सिरताज व्याख्यानवाचस्पति पूज्य आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने आबाल-वृद्ध सबके लिए दीक्षा का मार्ग सरल बनाया। जिसके फलस्वरूप ही उनके हाथों एक साथ 21-24-26 आदि दीक्षाएं हुईं और आज भी एकसाथ अनेक दीक्षाएं हो रही है। निश्चित तौर से कह सकते हैं कि यह चमत्कार उन्हीं का है। आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी के 121 शिष्य और 150 प्रशिष्य के साथ ही सैकडों श्रावक-श्राविका होंगे, जिन्होंने उनके उपदेश सुनकर हमेशा के लिए संसार का त्याग कर संयम जीवन स्वीकार्य किया होगा। वे 8 वर्ष के बालक से लेकर 73 वर्ष के वृद्ध को भी दीक्षा देने से पूर्व उन्हें सख्त कसौटी से गुजारते थे तथा विश्वास होने पर ही दीक्षा देते थे। कसौटी के लिए एक वर्ष अपने साथ विहार में रखते थे।

स्व. आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी इसलिए महान थे कि बडे से बडे तूफान के बीच भी वे अपनी सच्ची बात से थोडा भी पीछे नहीं हटते थे और साथ ही यह कहते कि ‘मेरी कोई भी बात भगवान महावीर के उपदेश के विपरीत हो तो मुझे बताएं, मैं सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए तैयार हूं’।

जिन्होंने जन्म से लेकर तरुणावस्था तक और अपने दीक्षा-प्रसंग से लेकर अन्य भव्यात्माओं को दीक्षा देने, उन्हें संयम में दृढ करने, आर्य संस्कृति, श्रमण संस्कृति की रक्षा के लिए अलख जगाने से लेकर संयम की उत्कृष्टता बनाए रखने के लिए अंतिम श्वांस तक कई झंझावातों का सामना किया, किन्तु कभी उफ तक नहीं की; समस्त जैन जगत उन महान् आत्मा के इस उपकार को कभी नहीं भुला सकता। उन्हें शत-शत नमन्!

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

किया जैन जगत पर उपकार, खोले संयम के द्वार (3)


पूज्य श्री राम विजय जी को अपने मुनि जीवन के प्रारम्भिक काल में ही विक्रम संवत 1980-81 (सन् 1924-25) में अपने गुरु मुनि श्री प्रेमविजय जी महाराज के साथ अहमदाबाद में लगातार दो चातुर्मास करने का अवसर मिला। इन चातुर्मासों में मुनि श्री रामविजय जी के प्रवचनों के प्रभाव से अहमदाबाद के अनेक होटल बंद हो गए थे। उसी दौरान नवरात्रि में भद्रकाली मन्दिर में होने वाली हिंसा (बकरों का वध) मुनि श्री के प्रवचनों के प्रभाव से बंद हो गई। इस हिंसा के खिलाफ विशाल जन आंदोलन हुआ। इन चातुर्मासों में मुनिश्री ने दीक्षा धर्म की अलख जगाई थी। चूंकि उनके प्रवचनों के प्रभाव से बडे-बडे युवा उद्योगपति, धनकुबेर भी दीक्षा लेने लगे थे तो ऐसी मान्यता बनने लगी थी कि मुनिश्री रामविजयजी बच्चों और युवाओं के सिर पर ऐसी भभूति डालते हैं, जिससे वे दीक्षा लिए बगैर नहीं रहते। इस मान्यता से ही उनके खिलाफ फौजदारी मुकदमों की शुरुआत हो गई। उन्हें पचासों बार कोर्ट में उपस्थित होना पडा, कभी झूठ-कपट का सहारा नहीं लिया और स्वयं उन्होंने अपनी पैरवी कर विजय का डंका बजाया। कालांतर में विरोध और मुकदमें करने वालों के भावों में भी परिवर्तन आया और वे इनसे दीक्षित हुए, यह हृदय परिवर्तन बहुत बडी बात है। मुनि श्री कान्तिविजयजी की माता और पत्नी आदि इसके उदाहरण हैं।

उनकी दीक्षा में बार-बार पैदा हुई बाधाओं से मुनिश्री रामविजयजी ने मनोमन गांठ बांध ली थी कि दीक्षा के संबंध में लोगों के हृदय परिवर्तन की जरूरत है। साधु होने के कुछ ही वर्ष में उन्होंने काफी शास्त्राभ्यास कर लिया और व्याख्यान देने की शुरुआत की। लोग उनकी प्रवचनशैली के कायल हो गए। मुनिश्री रामविजयजी जहां भी प्रवचन करते, वहां भारी भीड जमा हो जाती। व्याख्यान में भी वे एक ही बात को अलग-अलग तरीके से समझाते कि संसार असार है, छोडने जैसा है और साधु बनने जैसा है। सर्वविरतिमय साधु जीवन के प्ररुपण के कारण समाज में अनेक प्रकार की तरंगें पैदा हुई।

मुनिश्री रामविजयजी के अद्भुत् व्यक्तित्व और प्रभावशाली प्रवचनों से आकर्षित युवकों और श्रीमंतवर्ग में भी दीक्षा लेने और साधु बनने के लिए चाह पैदा हुई तो दूसरी ओर शुरुआत से ही दीक्षा का विरोध करनेवाला वर्ग अपने अहंकार और दुराग्रह के कारण और अधिक उग्र बना। मुनिश्री रामविजयजी उनके लिए दुश्मन नम्बर एक बन गए। किसी भी व्यक्ति के दीक्षा लेने के लिए तैयार होने पर विरोधी दीक्षा रोकने के लिए आकाश-पाताल एक कर देते। दूसरी ओर मुनिश्री रामविजयजी की दृढता चट्टान जैसी थी। किसी भी कीमत पर अपने निर्णय पर अमल करने के लिए वे दृढ रहते। इस तरह अपनी हिम्मत से वे किसी को भी दीक्षा दे देते। इसके बाद भी आफतों का अंत नहीं होता था। दीक्षा के विरोधी साधु बनने वाले के परिवार वालों को उकसाकर उनके नाम से कोर्ट में मुकदमे करवा देते थे। इन सभी मुकदमों में मुख्य आरोपी के रूप में मुनिश्री रामविजयजी का ही नाम रहता।

मात्र दीक्षा देने के तथाकथित अपराध के कारण उन पर अनेक केस मुम्बई, अहमदाबाद, बडोदरा और खंभात की अदालतों में चले थे। गवाही देने के लिए उन्हें लगभग 50 बार आरोपी के कटघरे में खडा रहना पडा होगा। फिर भी उन्होंने अपने कदम वापस नहीं खींचे। (क्रमश:)

सोमवार, 7 जनवरी 2013

किया जैन जगत पर उपकार, खोले संयम के द्वार (2)


अनन्त उपकारी श्री अरिहंत परमात्माओं ने आठ वर्ष की आयु को दीक्षा के लिए योग्य बताई है। लघु वय में ही दीक्षित होकर शासन की अनुपम प्रभावना करने वाले अनेक महापुरुषों की जीवन सौरभ इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर आज भी महक रही है। इतना सब जानते हुए भी तथाकथित इतिहासज्ञों ने जमाने के विषाक्त प्रभाव से शास्त्र-सिद्ध बालदीक्षा के विरोध का तूफान खडा करने का प्रयास किया। उस समय 20वीं सदी में जैन धर्म संघ के महानायक रहे, श्रमण संस्कृति के उद्धारक-पोषक धर्मयोद्धा, जैन शासन सिरताज व्याख्यानवाचस्पति पूज्य आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने मुस्कराते हुए अनेक विपत्तियों-आपत्तियों को सहन किया और उनका माकूल जवाब देकर बालदीक्षा विरोध के घनघोर बादलों को छिन्न-भिन्न करके दीक्षा और बालदीक्षा का मार्ग सुलभ बनाया। यह दीक्षायुगप्रवर्तक पूज्य श्री का समग्र जैन समाज पर महान् उपकार था। आज दीक्षा देने-लेने वाली कई पुण्यात्माओं को तो शायद इस बात का इल्म भी नहीं होगा।

स्वयं उनको त्रिभुवन पाल (आचार्य श्रीमद् विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा) को दीक्षा लेने से रोकने के लिए अनेकों प्रयास हुए, लेकिन वे सब नाकारा साबित हुए। अंत में पादरा के जानेमाने वकील मोहनलाल ने एक अंतिम किन्तु प्रभावशाली प्रयास किया। पादरा कोर्ट के पारसी मजिस्ट्रेट नानाभाई पेस्तनजी नवसारीवाला के साथ मोहनलाल वकील के निजी संबंध थे और वे उनके पडौस में भी रहते थे। इस मजिस्ट्रेट ने पंन्यास श्री दानविजयजी महाराज को संदेश कहलवाया कि यदि आप त्रिभुवन को दीक्षा देंगे तो आपके खिलाफ भी फौजदारी कार्रवाही की जाएगी। पंन्यास श्री दानविजयजी महाराज ऐसी धमकी से डरनेवाले नहीं थे। वे अपनी पूर्वावस्था में पुलिस पटेल रह चुके थे, इसलिए कानून के जानकार थे। पंन्यास श्री दानविजयजी महाराज के सामने उनकी या मजिस्ट्रेट की दाल नहीं गलेगी, इसका अहसास मोहनलाल वकील को हो गया। इसलिए एक दिन उन्होंने त्रिभुवन को किसी काम के बहाने अपने घर बुलाया और उसे मजिस्ट्रेट के सामने खडा कर दिया।

मोहनलाल वकील के उकसावे में पारसी मजिस्ट्रेट भी बराबर तैयारी करके ही बैठे थे। उसने अनेक तर्कों द्वारा त्रिभुवन को दीक्षा न लेने के लिए समझाने की कोशिश की। मजिस्ट्रेट ने कहा, ‘धर्म करने के लिए गृह त्याग करने और साधु बनने की क्या जरूरत है? घर पर रहकर धर्म का पालन नहीं किया जा सकता?’ त्रिभुवन ने कहा, ‘आप घर पर रहकर कितना धर्म का पालन करते हैं?’ मजिस्ट्रेट ने कहा, ‘इतनी कम उम्र में दीक्षा लेने की क्या जरूरत है? बडे होकर दीक्षा नहीं ली जा सकती?’ त्रिभुवन ने कहा, ‘आप तो उम्र में बडे हैं तो भी दीक्षा क्यों नहीं लेते? और फिर उम्र (जीवन) की क्या गारंटी है? क्या एक क्षण का भी भरोसा है?’ मजिस्ट्रेट ने अंतिम शस्त्र फेंका, ‘तुम्हे जो साधु दीक्षा देगा, उसे मैं दण्डित करूंगा।’ त्रिभुवन ने कहा, ‘मैं स्वयं ही दीक्षा ले लूंगा तो आप किसे दण्डित करेंगे?’ अंत में मजिस्ट्रेट ने उनके साहस, आत्मबल और दृढता को देख कर ठण्डे पडते हुए कहा, ‘दुनिया की कोई ताकत इस किशोर को दीक्षा लेने से नहीं रोक सकती।’

अपने 96 वर्ष के जीवनकाल में सैंकडों साधु-साध्वियों को दीक्षा प्रदान करने वाले और 121 उत्तम शिष्यों का गुरुपद शोभित करने वाले विश्वविख्यात जैनाचार्य स्व. गच्छाधिपति श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा की दीक्षा इतनी गुप्तता, चिंता और निर्जनता के बीच हुई, यह हकीकत ही रौंगटे खडे कर देनेवाली है। पूरी दुनिया में दीक्षा का डंका बजाने वाले इस गच्छाधिपति श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा की दीक्षा के लिए न कोई निमंत्रण पत्रिका छपवाई गई, न वरसीदान दिया गया। दीक्षा महोत्सव में पधारने के लिए अखबार में विज्ञापन तो नहीं दिया गया, बल्कि इसके विपरीत दीक्षा देने के विरूद्ध नोटिस जरूर छपवाया गया था। दीक्षा में न वरघोडा निकला और न मंडप बनाया गया। दीक्षार्थी के सम्मान में न किसी समारोह का आयोजन हुआ और न ही वायणा कराने का विचार आया। इसके बावजूद यह दीक्षा विक्रम की बीसवीं सदी के इतिहास की सबसे यादगार दीक्षा बन गई थी। (क्रमश:)

रविवार, 6 जनवरी 2013

किया जैन जगत पर उपकार, खोले संयम के द्वार (1)


अब से 100 साल पहले तत्कालीन समाज में जहां “बालक को यम को दे दो, लेकिन यति को न दो”, ऐसी कहावत प्रचलित थी, वहां किसी की दीक्षा कितनी दुष्कर होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। उस समय पूरे समाज की मनोदशा ऐसी थी कि दीक्षा लेकर साधु नहीं बना जा सकता। किसी भी साधु के किसी भी युवा को दीक्षा देने की बात करने पर मानो उसने कोई बडा गुनाह करने की तैयारी की हो, उस तरह से लोग उस पर टूट पडते थे।

उस समय के समाज का ऐसा मानना था कि साधु कम उम्र के बच्चों पर जादू-टोना कर उन्हें साधु बना देते हैं। किसी भी व्यक्ति को दीक्षा देने को अपहरण जैसा अपराध माना जाता था। दीक्षा देने वाले गुरुओं को लोग धिक्कार की नजर से देखते थे।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि लगभग 450 वर्ष पूर्व मुगल सम्राट अकबर बादशाह को उपदेश देकर मांसाहार छुडानेवाले अकेले जगद्गुरु जैनाचार्य श्री विजयहीरसूरीश्वर जी महाराज ने 300 साधुओं और 700 साध्वियों के समुदाय के साथ गांधार में तीन-तीन चातुर्मास किए थे। मतलब कि उस समय तक दीक्षा और बालदीक्षा या यों कहें कि संयम मार्ग में जाने के खिलाफ कोई उग्र वातावरण नहीं था और जैन शासन में हजारों की संख्या में साधु-साध्वी बिराजमान थे। अकेले तपागच्छ संघ में ही 18 हजार से ज्यादा साधु-साध्वीजी थे।

औरंगजेब के समय (सन् 1658 से 1707 के मध्य) से इस संख्या में तेजी से कमी होना शुरू हुई। सन् 1669 में औरंगजेब ने मन्दिरों को लूटने, उन्हें तोडने और बलात् धर्म परिवर्तन कराने का फरमान जारी किया। जैन साधु-साध्वियों ने औरंगजेब के समय काफी अत्याचार सहन किए। औरंगजेब द्वारा जैन मन्दिरों में भयंकर लूटपाट और तोडफोड की गई। साधु-साध्वियों के साथ भयंकर अत्याचार किया गया और कई साधु-साध्वियों ने अपने संयम धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया, संथारा ग्रहण कर कालधर्म को प्राप्त हो गए।

औरंगजेब के आतंक से त्रस्त व भयग्रस्त समाज में नई दीक्षाएं बन्द-सी हो गई। इससे समाज में धीरे-धीरे जडता-सी आती गई। लोग धीरे-धीरे धर्म-स्थानों और अपने कुलीन संस्कारों से दूर होते गए।

लगभग 200 वर्षों का कालखण्ड ऐसा रहा, जिसमें नई दीक्षाएं अत्यंत न्यून हुई और लोगों के सोच, संस्कारों व चरित्र में भारी बदलाव हुआ। औरंगजेब की मृत्यु के बाद भी उसके आतंक का साया समाज पर बना रहा। हजारों की संख्या में रहे साधु-साध्वी की संख्या सैंकडों में हो गई और यह भी घटती-घटती संवत् 1969 (सन् 1911-12) तक तो श्वेताम्बर संघ में लगभग 150 रह गई। इनमें भी अधिकांश साधु-साध्वीजी महाराज बुजुर्ग थे। प्रभु महावीर के शासन में संभवतया इतनी कम साधु संख्या इससे पूर्व कभी नहीं रही। ऐसे कालखण्ड में समाज में जडता आ जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि संस्कारों को तो नहीं संभालो तो जाते देर न लगे और बुराई को खूब लातें मारो तब भी वह चली जाए, यह जरूरी नहीं।

भारत में अनेक छोटी-छोटी रियासतें थीं और कतिपय रियासतों ने तो दीक्षा और खासकर बालदीक्षा पर तो रोक लगाकर इसके खिलाफ कानून ही बना दिया था। बडोदरा में गायकवाडी राज्य था और वहां बालदीक्षा के विरूद्ध सख्त कानून लागू था। किसी युवक के नाबालिग होने और उसके माता-पिता अथवा पत्नी के विरोध करने पर उसे दीक्षा लेने के बाद भी घर वापस लौटने की घटनाएं घटित हो चुकी थी, इसलिए गायकवाडी राज्य की सीमा में दीक्षा नहीं दी जा सकती थी। (क्रमश:)

शनिवार, 5 जनवरी 2013

अभक्ष्य पर प्रहार


शास्त्र ही जिनके चक्षु थे, शासन का अनन्य राग जिनके रोम-रोम में व्याप्त था, शास्त्रों की वफादारी ही जिनका जीवन-मंत्र था, चाहे जैसा प्रलोभन देने पर भी जो सिद्धान्त से तनिक भी आगे-पीछे होने के लिए तत्पर नहीं थे, जो विरोध के प्रचण्ड तूफानों में भी त्रिकालाबाधित सिद्धान्तों तथा सनातन सत्यों का ध्वज फहराता रखने वाले थे और वीर शासन के अडिग सैनानी थे; ऐसे 20वीं सदी में जैन धर्म संघ के महानायक, श्रमण संस्कृति के उद्धारक, पोषक, जैन शासन शिरताज, धर्मयोद्धा, व्याख्यान वाचस्पति, दीक्षायुगप्रवर्तक, विशालतपागच्छाधिपति पूज्य आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा  की वाणी में जो सत्व था, जो ओज और प्रखरता थी, चरित्र का जो तेज था, उनकी कथनी-करनी की जो एकरूपता थी, उसी का परिणाम है कि संयम ग्रहण करने के छः-सात साल बाद ही सन 1920 में जब वे पहली बार अहमदाबाद आए और उन्हें पता चला कि अहमदाबाद में अनेक होटल खुल रहे हैं और लोग अभक्ष्य खानपान की ओर मुडते जा रहे हैं तो मुनिश्री ने कहा कि ये होटल तो अतिथि को देव मानकर सत्कार करने का संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति पर काले दाग हैं।

होटलों के विरूद्ध तब मुनिश्री रामविजयजी की मुहिम जैनों और जैन उपाश्रयों तक ही सीमित नहीं रही। पहली बार जैन मुनि उपाश्रय के बाहर आए और जगह-जगह उनकी सभाएं होने लगीं। अहमदाबाद के माणक चौक में उस समय बडा मैदान था और रविवार को इस मैदान में मुनिश्री का प्रवचन होने से प्रवचन में इतनी भीड होती थी कि यहां पांव रखने की भी जगह नहीं रहती थी। कई बार तो इतनी भारी भीड होती थी कि प्रवचनकर्ता मुनिश्री को आसन तक पहुंचने में समस्या पैदा हो जाती थी। मुनिश्री के हृदयवेधक प्रवचनों का लोगों के रहनसहन और जीवन पद्धति पर जोरदार प्रभाव पडा। लोगों ने होटलों में खाना-पीना बंद कर दिया और वहां सन्नाटा छा गया। होटल मालिक भी चिन्ता में डूब गए।

अहमदाबाद शहर में इस समय गांधी रोड के नाम से जानाजाता मार्ग पहले रिची रोड के नाम से जाना जाता था और वह अहमदाबाद का एक मात्र राजमार्ग था। रिलीफ रोड तो कई वर्षों बाद बना था। इस रोड पर स्थित लक्ष्मीविलास और चन्द्रविलास होटलों में खानपान के रसिकों की भारी भीड दिखाई देती थी। चन्द्रविलास की चाय तो काफी विख्यात थी। कुछ युवकों को तो इस चाय का नशा न करने तक चैन नहीं मिलता था। ऐसे युवक अब मुनिश्री के प्रवचन नियमित रूप से सुनने लगे और होटल में कदम भी न रखने का संकल्प करने लगे। एक समय चन्द्रविलास होटल में मात्र चाय बनाने के लिए प्रतिदिन 340 लीटर दूध की खपत होती थी। यह खपत घटकर 25-30 लीटर तक आ गई। मात्र 24 वर्ष के मुनिश्री रामविजयजी का ऐसा प्रभाव लोगों के जीवन पर दिखाई दिया। यह उनके अदम्य साहस और ओजस्वी वक्तव्य का ही परिणाम था।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

चरित्र निर्माण के प्रबल पुरोधा (2)


शास्त्र ही जिनके चक्षु थे, शासन का अनन्य राग जिनके रोम-रोम में व्याप्त था, शास्त्रों की वफादारी ही जिनका जीवन-मंत्र था, चाहे जैसा प्रलोभन देने पर भी जो सिद्धान्त से तनिक भी आगे-पीछे होने के लिए तत्पर नहीं थे, जो विरोध के प्रचण्ड तूफानों में भी त्रिकालाबाधित सिद्धान्तों तथा सनातन सत्यों का ध्वज फहराता रखने वाले थे और वीर शासन के अडिग सैनानी थे; ऐसे 20वीं सदी में जैन धर्म संघ के महानायक, श्रमण संस्कृति के उद्धारक, पोषक, जैन शासन शिरताज, धर्मयोद्धा, व्याख्यान वाचस्पति, दीक्षायुगप्रवर्तक, विशालतपागच्छाधिपति पूज्य आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा  इसलिए महान थे कि बडे से बडे तूफान के बीच भी वे अपनी सच्ची बात से थोडा भी पीछे नहीं हटते थे और साथ ही यह कहते कि ‘मेरी कोई भी बात भगवान महावीर के उपदेश के विपरीत हो तो मुझे बताएं, मैं सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए तैयार हूं’। बालदीक्षा के प्रश्न पर तथाकथित सुधारक जैनों के आचार्यश्री के सामने आ जाने पर वातावरण काफी उग्र था। विरोधियों में जितना जुनून था, उससे दो गुनी खुमारी आचार्यश्री के संसारी भक्तों में थी। आचार्यश्री के विरोधी उन्हें मार्ग से हटाने के लिए तरह-तरह के पत्र भेजते। कुछ में खून करने की धमकी भी दी जाती थी। ऐसी स्थिति में बडे से बडा दृढ साधु भी ठंडा पड जाता। खुद आचार्यश्री के भक्त और शुभेच्छु भी उन्हें दीक्षा का आग्रह छोडने के लिए समझाते, तब वे कहते कि ‘इनके सामने एक बार झुक जाने पर इनकी गलत बात प्रस्थापित हो जाएगी’। आचार्यश्री के विरोधी उन्हें किसी भी समय समाप्त कर सकते हैं, ऐसा भय उत्पन्न होने पर उनके दादागुरु विजयदानसूरि जी काफी सजग रहते। उन्हें भीक्षा में कोई जहरीला पदार्थ न खिला दे, इसके लिए उनके वफादार शिष्य मुनिश्री चारित्रविजय जी हमेशा उनके साथ रहते थे। अपने गुरु को कोई भी आहार देने से पूर्व वे स्वयं चखते और आधा घंटा उसका प्रभाव देखने के बाद अपने गुरु को आहार देते थे।

मुम्बई में तथाकथित सुधारवादियों के बवाल, उग्र विरोध और हमला करने की संभावनाओं के मद्देनजर डर के मारे समाज के कुछ अग्रणीय कहे जाने वाले लोगों ने आचार्य भगवन् को सुरक्षा की दृष्टि से प्रवचन बंद रखने की सलाह दी तो पूज्य श्री ने निर्भीकता से कहा, ‘हमारी सुरक्षा की आप तनिक भी चिन्ता न करें। हमारी रक्षा करने वाला श्री जिनशासन जयवंत है। कोई हमारी रक्षा करेगा, इस विश्वास पर हमने यह संयम अंगीकार नहीं किया है।’

ऐसे उग्र विरोध के वातावरण में आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी का मुम्बई में प्रवेश होने पर रास्ते में जगह-जगह काले झण्डे लगाए गए थे, मार्ग में कांच बिखेरा गया था और मकानों से उन पर पत्थरों की वर्षा की गई, फिर भी उनके हृदय में विरोधियों के प्रति मैल पैदा नहीं हुआ और विरोध से डरकर उन्होंने कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाए।

महाराजश्री की महानता अनेक प्रश्न पर उनके द्वारा की गई लडाई में नहीं थी, बल्कि लडाई के अन्त में विरोधियों के प्रति उनके मन में करुणा और मैत्रीभाव में थी। सिद्धान्त के लिए लडना, परन्तु व्यक्ति के लिए जरा भी द्वेष नहीं। इससे उनके विरोधी भी उनका आदर करते थे। तिथि के प्रश्न पर आचार्यश्री सागरानंदसूरिजी के साथ संघर्ष होने के बावजूद सूरत में उनके बीमार होने पर महाराजश्री स्वयं उनका हालचाल पूछने और क्षमापना करने के लिए उनके पास गए थे। यह कार्य हृदय की विशालता के बिना संभव नहीं है।

आचार्य श्री की दृढता यही बताती है कि वे अपना लक्ष्य कभी नहीं भूले। क्यों उन्होंने संयम लिया, क्या उनका धर्म, कर्म और लक्ष्य है? और उन्होंने कभी इस बात की भी परवाह नहीं की कि कौन उनका साथ देगा, कौन नहीं। वे तो बस जिनाज्ञा के साथ सन्मार्ग पर बढते चले गए, कारवां स्वतः ही बनता गया। उन्हें इसी में आत्म-संतोष था कि-

मंजिल मुझे मिले न मिले, इसका गम नहीं ।

मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है ।।

और सफलताएं उनके चरण चूमती। वे तत्कालीन जैन समाज में सबसे बडे तपागच्छ संघ के सबसे बडे आचार्य बन गए। यह निस्पृह भाव से जिन शासन की सेवा करने का उनका जज्बा ही था कि दीक्षा के मार्ग को सरल बनाने में और लोगों में स्वीकार करने जैसा बनाने में सबसे बडा योगदान उनका ही रहा है। एक बार उन्होंने खंभात में एक साथ 24 और अमलनेर में एक साथ 26 मुमुक्षुओं को साधु जीवन में पदार्पण करवाया। 20 वीं सदी के जैन शासन की यह सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएं थीं। उनके पास दीक्षा लेने वालों में बडे-बडे मिल मालिकों से लेकर तत्कालीन समाज में शालीभद्र माने जाने वाले करोडपति भी शामिल थे।

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

चरित्र निर्माण के प्रबल पुरोधा (1)


आज के विश्व में जब चारों ओर भौतिकता की चकाचौंध है और हर कोई अधिकाधिक भौतिक संसाधन जुटाने, विनाशक विकास और अभक्ष्य खाने के लिए अंधी दौड लगा रहा हो, इसी के कारण व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र से लेकर विश्व स्तर तक तनाव व्याप्त हो, समाज नानाविध व्याधियों से ग्रस्त और त्रस्त हो; ऐसे समय में धारा के विपरीत चरित्र निर्माण, संस्कार और आर्य संस्कृति, श्रमण संस्कृति की सुचिता व संरक्षण की बात करना और न केवल सतही अथवा लोक दिखावे के लिए बात करना; बल्कि उस पर पहले स्वयं आचरण करना और फिर उसके लिए इतनी प्रामाणिकता व अधिकारिकता के साथ एक अभियान एक आन्दोलन की तरह जीवन पर्यन्त चलना, इस अभियान को मनोवैज्ञानिक और तर्क संगत तरीके से प्रस्तुत करना बहुत ही मुश्किल का काम है, जोखिम और साहस भरा काम है, जो कोई बिरला व्यक्ति ही कर सकता है।

दशवैकालिक सूत्र की चूलिका में प्रभु महावीर की वाणी है-

अणुसोय-पट्ठिए+बहुजणम्मि पडिसोयलद्धलक्खेणं ।

पडिसोयमेव अप्पा, दायव्वो होउकामेणं ।।

अणुसोयसुहो लोगो, पढिसोओ आसवो सुविहियाणं ।

अणुसोओ संसारो, पडिसोओ तस्स उत्तारो ।।

तम्हा आयारपरक्कमेण संवर-समाहि-बहुलेणं ।

चरिया गुणा य नियमा य, होंति साहूण दट्ठववा ।।

‘(नदी के जल-प्रवाह में गिर कर प्रवाह के वेग से समुद्र की ओर बहते हुए काष्ठ के समान) बहुत-से लोग अनुस्रोत (विषय प्रवाह के वेग से संसार-समुद्र) की ओर प्रस्थान कर रहे (बहे जा रहे) हैं, किन्तु जो मुक्त होना चाहता है, जिसे प्रतिस्रोत (विषय-भोगों के प्रवाह से विमुख-विपरीत हो कर संयम के प्रवाह) में गति करने का लक्ष्य प्राप्त है, उसे अपनी आत्मा को प्रतिस्रोत की ओर (सांसारिक विषय भोगों के स्रोत से प्रतिकूल) ले जाना चाहिए।’

‘अनुस्रोत (विषय-विकारों के अनुकूल प्रवाह) संसार (जन्म-मरण की परम्परा) है और प्रतिस्रोत उसका उत्तार (जन्म-मरण के पार जाना) है। साधारण संसारी जन को अनुस्रोत चलने में सुख की अनुभूति होती है, किन्तु सुविहित साधुओं के लिए प्रतिस्रोत आस्रव (इन्द्रिय-विजय) होता है।’

‘इसलिए (प्रतिस्रोत की ओर गमन करने के लिए) आचार (-पालन) पराक्रम करके तथा संवर में प्रचुर समाधियुक्त हो कर, साधुओं को अपनी चर्या, गुणों (मूल-उत्तर गुणों) तथा नियमों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए।’

जैन शासन शिरताज, धर्मयौद्धा, व्याख्यानवाचस्पति पूज्य आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा का जीवन इसी प्रकार संसार की धारा, भीड और भेडचाल के विपरीत, सदैव प्रतिस्रोतगामी रहा है। कच्ची मानसिकता, चारित्रिक शीथिलता और झूठ बोलने वाले लोग, अभक्ष्य का सेवन करने वाले लोग उनके सामने थर-थर कांपते थे।

वैराग्यावस्था से लेकर जीवन के अंतिम क्षण 96 वर्ष की अवस्था तक वे सदासर्वदा चारित्रपालन, संयम में दृढता और चरित्र निर्माण, संस्कार और आर्य संस्कृति, श्रमण संस्कृति की सुचिता व संरक्षण के लिए सजग रहे, सक्रिय रहे। (क्रमश:)