रविवार, 14 जुलाई 2013

अधम आत्माएं दया की पात्र हैं


संसार में भटकते जीवों के आत्म-निस्तार में सहायक बनना और आत्म-निस्तार के एक बेजोड साधनरूप धर्मतीर्थ की प्रभावना करना, इससे बढकर दूसरा कोई उत्तम कार्य इस संसार में न था, न है और न होगा। ऐसे उत्तम कार्य करने-करवाने वाली आत्माएं तो उत्तम हैं ही, ऐसे कार्य की सच्चे हृदय से सद्भाव पूर्वक अनुमोदना करने वाली आत्माएं भी उत्तम हैं। अधम आत्माएं न तो ऐसे कार्य करती हैं, न करवाती हैं और न ही अनुमोदना कर सकती हैं। इतना ही नहीं, ऐसे पवित्र कार्यों की निन्दा करने वाली आत्माएं भी मौजूद है। ऐसी अधम आत्माएं बहुत ही दया की पात्र हैं, क्योंकि वे बेचारे अपनी आत्मा के लिए अपनी प्रवृत्तियों से कई प्रकार की विडम्बनाएं उपस्थित कर रहे हैं और उसका उन्हें कोई मलाल भी नहीं है। ऐसी अधम आत्माएं दया की पात्र हैं। हम चाहते हैं कि वे भी तीर्थयात्रा की महिमा को समझें, तीर्थ की आराधना करें और अपनी आत्मा का उद्धार करें। ऐसी दयाभावना से हो सके तो उन्हें उन्मार्ग से सन्मार्ग की ओर लाने का प्रयास करना चाहिए, साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण दूसरी आत्माएं तीर्थ सेवा से वंचित न रह जाएं और वे तीर्थों के संबंध में झूठे खयाल न फैला पाएं। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

विषय-कषाय की आधीनता बुरी है


‘विषय-कषाय की आधीनता बुरी चीज है’, ऐसी प्रतीति जब तक न हो, तब तक संसार को तारने वाले तीर्थ के प्रति प्रेम कैसे जागृत होगा? तीर्थ की यात्रा करने वालों में भी अधिकांश में यह विचार नहीं होता है। ऐसे लोगों की तीर्थयात्रा निरर्थक या मूल्यहीन हो जाए, तो कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है। ज्ञानियों ने फरमाया है कि ‘संसार तो सागर है और उसे तैरकर पार करने योग्य है। जब तक तैरकर किनारे नहीं पहुंचेंगे, तब तक विपत्तियों से घिरे रहेंगे।’ ज्ञानियों के इस कथन पर प्रतीति जागृत होनी चाहिए। अनंतज्ञानियों का एक-एक वचन शंका आदि दोषों से रहित है, ऐसी प्रतीति जागृत होगी तो ही आत्मा विपत्ति के कारण व निवारण के उपाय से सुपरिचित बनेगी और फलतः विपत्तियों के कारणों का त्याग व विपत्तियों के निवारण के उपाय का आचरण भी कर सकेगी। लेकिन, इस जागृति का अभाव ही अनर्थों की जड है। ‘आत्मा के साथ कर्म का योग’, यही संसार है और विषय-कषाय की आधीनता, यही कर्म के योग का कारण, इसलिए प्रकारांतर से विषय-कषाय ही संसार है’, लेकिन यह बात आपके दिल को जंचती नहीं है; किन्तु यह बात जंचे बिना सच्चा कल्याण होने वाला नहीं है। इसलिए परोपकारी बार-बार एक ही बात कहते रहते हैं। रूपक को बदले, शब्द को बदले, पद्धति को बदले, लेकिन उपदेश्य बात तो यह एक ही है। क्योंकि विषय और कषाय की आधीनता ही सब दुःखों की जड है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

कुसाधुओं के जाल में फंसने से बचें


आत्मा को परमात्मा बनाने का उपाय ही तीर्थ की सेवा है। स्थावर तीर्थ और जंगम तीर्थ, इन दोनों तीर्थों की सेवा अपनी आत्मा को रत्नत्रयी स्वरूप बनाने के ध्येय से हो तो आपका कल्याण दूर नहीं है। लेकिन, याद रखिए कि संसार के प्रति अरूचि और मोक्ष के प्रति रूचि प्रकट हुए बिना यह नहीं हो सकता। हम तो यही चाहते हैं कि आप में संसार के प्रति अरूचि और मोक्ष के प्रति रूचि प्रकट हो और इस रूचि के योग से आपकी आत्मा रत्नत्रयीमय बने। संसार के प्रति अरूचि और मोक्ष के प्रति रूचि प्रकट कराना, यही सच्चे साधु के लिए भूषणरूप है। संसार के प्रति रूचि को बढाने वाले साधु तो शासन के द्रोही हैं और स्व-पर के हित का कत्ल करने वाले हैं। यह बात आपकी समझ में आ जाए तो आप कुसाधुओं के जाल में फंसने से, रसातल में जाने से बच सकते हो और सुसाधुओं का योग प्राप्त कर के सरलता पूर्वक कल्याण के भी साधक बन सकते हो। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

तीर्थ जो संसार सागर से तिरा दे


अनंत उपकारी, अनंत ज्ञानी श्री जिनेश्वर देवों ने ‘तीर्थ’ किसे कहा है, तीर्थ कितने महत्त्व की चीज है, इस जीवन में तीर्थ की आराधना करने की कितनी आवश्यकता है और किस प्रकार से तीर्थ की सेवा करनी चाहिए; इन सब बातों को अनंत ज्ञानियों ने जिस प्रकार से फरमाया है, उसे यथार्थ रूप से समझ लेना चाहिए। यह समझ लेने के बाद ही तीर्थ की आराधना का सच्चा उल्लास और अंतरंग भाव प्रकट हो सकता है। तीर्थ अर्थात् क्या? जिसके योग से आत्मा संसार रूपी सागर को पार कर सकती है, उसी का नाम है तीर्थ! ‘तीर्थ’ शब्द में ज्ञानियों ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र रूप तीन अर्थ का समावेश किया है। रत्नत्रयी के उपदेश का नाम तीर्थ या रत्नत्रयी की आराधना करने वाले वर्ग का नाम है तीर्थ! ज्ञानियों ने आत्मा को भी तीर्थरूप कहा है, क्योंकि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र आत्मा के ही मौलिक गुण हैं। रत्नत्रयी की आराधना के बिना संसार सागर तैरना असंभव है; इतना समझ में आ जाए तो रत्नत्रयी तीर्थरूप लगेगी।

संसार यानी विषय और कषाय; जिस यात्रा से, जहां की यात्रा से विषय-कषाय से दूरी बढती हो, किन्हीं अंशों में कदम दर कदम उन विषय-कषायों से मुक्ति मिलती हो, वह तीर्थ। तीर्थयात्रा के योग से हमारी आत्मा लघुकर्मी बने बिना रहे नहीं, ऐसी हमारी तीर्थयात्रा होनी चाहिए। यों जंगम और स्थावर दो प्रकार के तीर्थ कहे गए हैं। जंगम में रत्नत्रयी के आराधक साधु भगवंत और स्थावर में रत्नत्रयी की आराधना के लिए हम जिन तीर्थ स्थानों पर जाते हैं वे आते हैं। इन दोनों के योग से हम भी रत्नत्रयी के आराधक बन सकते हैं। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

शरीर, धन आदि की मूर्च्छा कितनी कम हुई?


देव, गुरु, धर्म और साधर्मिक की भक्ति, शक्ति के मुताबिक करने के लिए जैसे उदारता, सदाचारशीलता और सहनशीलता जरूरी है, वैसे सद्विचारशीलता भी जरूरी है। सद्विचारशीलता के बिना तो कुछ भी यथार्थ रूप से नहीं बन सकता। शरीर पर से, धन पर से मूर्च्छा कितनी कम हुई? इन्द्रियों के ऊपर कितना काबू पाया? मन को वश में करने की कितनी कोशिश की गई? इन सब का तीर्थयात्रा पूर्ण होने के बाद हिसाब करना चाहिए। संघपति को तो अपनी आराधना के खयाल के साथ-साथ संघ में आने वाले सभी भाई-बहिन आराधना में अच्छी तरह शामिल हों, इसका भी खयाल रखना चाहिए। संघ यात्रा का हेतु सिद्ध हो सके, उस प्रकार बर्ताव करने की संघ आयोजक की तो खास इच्छा होनी चाहिए। संघपति बनना और शास्त्र-विधि के अनुसार थोडा भी बर्ताव नहीं करना, इस प्रकार के संघ में सच्चे साधु जान-बूझकर तो कभी नहीं जाते। इस देश और इसकी संस्कृति में तो उदार धनिक आत्माओं का सविशेष काम है। संघ के आयोजकों के साथ-साथ इसमें शामिल होने वाले यात्रियों को भी कम से कम एक थैली साथ में रखनी ही चाहिए। थैली का मतलब समझ गए न? और उसका पूरी उदारता से सदुपयोग करना चाहिए। संघ ऐसा निकलना चाहिए कि ‘संघ निकालने की जरूरत नहीं है’, ऐसा सोचने वालों को भी ऐसा लगे कि ‘ऐसा संघ हर साल एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार निकलना चाहिए’। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 8 जुलाई 2013

साधुता के अनुपम सुख का अनुभव


उदारता और सदाचार के साथ सहनशीलता भी उतनी ही रखनी चाहिए। समभाव पूर्वक मुसीबतें भुगतने के लिए तीर्थ में जाना है। कुछ दिन मिले तो भी ठीक, न मिले तो भी ठीक, उसका अनुभव करने के लिए तीर्थयात्रा है। साधु रोज अनुभव करते हैं। श्री वीतराग परमात्मा की साधुता में जो सुख है, वह सुख दुनिया के चक्रवर्ती पद में भी नहीं है, इसका कुछ अनुभव यथाविधि यात्रा करने वालों को हुए बिना नहीं रहता। जिस आत्मा को साधुता के सुख का अनुभव नहीं है, उसे सुख का कुछ भी खयाल नहीं है, उसको इन्द्रता या चक्रवर्ती पद में सुख भले ही दिखाई दे, लेकिन साधुता के सुख को जानने वाले को या उसका अनुभव करने वाले को इन्द्रता या चक्रवर्ती पद में सुख दिखाई दे, यह संभव ही नहीं है। सच्चा तीर्थयात्री तो सुर-नर के सुखों को भ्रान्ति की तरह ही मानता है और एकमात्र मुक्ति की कामना ही करता है। संघ में आने वाले को कम से कम आधे साधु की तरह तो जरूर बनना चाहिए, ताकि साधुता के अनुपम सुख का थोडा-सा भी अनुभव अवश्य हो पाए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 7 जुलाई 2013

उदारता के साथ सदाचार भी हो


गांव-गांव में धर्म की स्थापना, नामना और प्रभावना ठीक-ठीक हो, इसलिए ऐसी संघ-यात्राएं निकालने का ज्ञानियों ने विधान किया है। शक्ति अनुसार अवसर को सफल कर लेना, देव-गुरु-धर्म और धर्मियों की शक्ति के मुताबिक भक्ति कर लेना, संघ के आयोजक और संघ में चलने वाले यात्रियों दोनों का फर्ज है। संघ में मौजमजा करने के लिए या सेठ बनने के लिए नहीं जाना है, बल्कि धर्म साधना के लिए जाना है। उदारता के साथ सदाचार भी होना चाहिए। मेरी आँखें सिर्फ देव, गुरु और साधर्मिक आदि के दर्शन के लिए है, न कि अप्रशस्त दर्शनादि के लिए। मेरे कान जिनवाणी आदि के श्रवण के लिए हैं, न कि अप्रशस्त श्रवण के लिए। मेरी जिव्हा देव, गुरु और साधर्मिक आदि के गुणगान वगैरह के लिए है, न कि निंदादि में अप्रशस्त रूप से प्रवर्तन के लिए। इस प्रकार इन्द्रिय निग्रह पूर्वक धर्म सेवन करने का निश्चय प्रत्येक यात्री को कर लेना चाहिए। साधु भी संघ के साथ आते हैं, उस संघ में आने वालों को इन्द्रियों का सदुपयोग करवाना और रत्नत्रयी, तत्वत्रयी की आराधना कराना वगैरह हेतु धारण करने वाले होते हैं। अतः बात यह है कि श्री वीतराग परमात्मा की दर्शायी हुई आराधना और प्रभावना के लिए ही संघ का आयोजन किया जाता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 6 जुलाई 2013

‘तन-मन-धन सब अर्पण’


श्री जिनमन्दिर, धर्मस्थान, साधर्मिक भक्ति और अनुकम्पा वगैरह कार्य प्रत्येक गांव में हो सकें, इस प्रकार संघ निकलने चाहिए और इस प्रकार संघ के निकलने से धर्म और शासन की प्रभावना होती है। आज इस उदारता में प्रतिदिन कमी होती जा रही है। धर्म कार्य में उदारता वगैरह जितनी ज्यादा, उसका परिणाम भी उतना ही ज्यादा! धर्म कार्यों में अपनी शक्ति का गोपन न करें। धर्म कार्यों में ऐसा हिसाब तो नहीं ही गिनना चाहिए, जिससे धर्म कार्य का हेतु सिद्ध न हो और आराधना की मात्रा में विराधना बढ जाए। आप भगवान से कहते हो कि ‘तेरी सेवा में तन-मन-धन सब अर्पण’, लेकिन कहने मात्र से क्या होगा? जो कहते हो उसका आचरण करने से कार्य सिद्ध होता है। ‘तेरे दास का भी दास हूं’, ऐसा कहना और श्री वीतराग परमात्मा के दास सुखी हैं या दुःखी, उसकी जांच भी न करना, यह तो सिर्फ वाणी का आडम्बर है। ऐसा आडम्बर श्री वीतराग परमात्मा के शासन में नहीं चलता। साधन होते हुए अवसर पर देने में संकोच करना, यह उदारता की निशानी नहीं है। श्री वीतराग परमात्मा के शासन की जय-जयकार ऐसे लोग कभी नहीं कर सकते। उदारता के साथ कीर्ति के भी उतने ही अनभिलाषी बनने की जरूरत है, क्योंकि ऐसी अभिलाषा भी परम फल की प्राप्ति में विघ्नकर्ता ही है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

तीर्थयात्रा में विधि-बहुमान जरूरी


धर्मद्वेषी भले ही कितनी ही आलोचना करें, उसकी हमें परवाह नहीं करनी चाहिए, लेकिन हम अपना कर्त्तव्य पालन करने में कहीं भूल तो नहीं कर रहे हैं, इसका बराबर पूरा खयाल रखना चाहिए। संघ की महिमा कम होने में संघ के आयोजक या संघ के यात्रिक की कमियां भी जिम्मेदार हों तो उसके निवारण के लिए यथासंभव उपाय करने में भी तत्परता बरतनी चाहिए, इसमें प्रमाद नहीं करना चाहिए। उदारता, सदाचारशीलता, सहनशीलता, और सद्विचारशीलता; ये चारों चीजें अगर योग्य मात्रा में संघपति और यात्रियों के समूह में हों तो विधि का पालन कोई असंभव बात नहीं है। विधि का पालन जैसे-जैसे ज्यादा, वैसे-वैसे प्रभु शासन की प्रभावना भी ज्यादा, यह बात निश्चित है। इसलिए विधि-बहुमान का गुण तो आयोजक और यात्रियों दोनों में आवश्यक रूप से होना ही चाहिए, उसके बिना अच्छा प्रभाव नहीं पडता। लोगों को तीर्थ की महिमा और तीर्थयात्रा से होने वाले अवर्णनीय लाभ की समझ नहीं है, लेकिन यात्रियों में विधि-बहुमान हो तो भद्रिक और अद्वेष वर्ग पर अच्छा प्रभाव पडे बिना नहीं रहेगा। विधि-बहुमान नहीं होने के कारण ऊंची से ऊंची क्रिया भी विष्प्राण जैसी बन जाए, यह स्वाभाविक ही है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

सामुदायिक यात्रा का महत्त्व


सामुदायिक यात्रा का आयोजन करने से जो अनेक लाभ होते हैं, उनमें सबसे खास लाभ तो यह कि सैंकडों आत्माओं के लिए जिनपूजन का आयोजन और सद्गुरु द्वारा जिनवाणी के श्रवण का आयोजन बहुत अच्छी तरह से निश्चित किया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप धर्म से अपरिचित आत्माएं भी धर्म से परिचित हो जाते हैं और जो धर्म से परिचित आत्माएं हैं, वे अपने-अपने सम्यग्दर्शनादि गुणों की निर्मलता और दृढता आदि को प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार आत्म-गुणों के विकास का एक अभिक्रम चलता है। संघ-समाज में आध्यात्मिक समरसता का माहौल बनता है और इसके कई मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं। सामुदायिक तीर्थयात्रा आयोजन के संबंध में परम तारक श्री जैन शासन की उत्तम प्रकार की प्रभावना के योग से अनेक आत्माएं धर्म-सन्मुख और धर्म-स्थिर बन जाते हैं। तीर्थयात्रा के लिए जाने वाला समुदाय, अपने औदार्य और त्याग से सुशोभित बर्ताव से भी अनेक आत्माओं के अंतर में धर्म-जागृति प्रकट कर सकता है। पर्वत आदि स्थानों पर उत्तम कोटि के मन्दिरों की स्थापना पूर्वपुरुषों ने की है। इनमें कुछ स्थान तो ऐसे हैं, जहां पर अनंतानंत पुरुषों ने आत्म-साधना कर के मुक्ति प्राप्त की है। जो संसारी लोग आधि-व्याधि और उपाधि से घिरे हुए हैं, वे भी ऐसी भूमि पर आकर निवृत्ति प्राप्त करें और रत्नत्रयी की आराधना के सन्मुख हो जाएं, इस हेतु से तीर्थयात्रा की महिमा विशेष है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 3 जुलाई 2013

विषय-मुक्ति के बिना तीर्थ अच्छा नहीं लगता


जिन आत्माओं को विषयों से प्रेम है, उनको क्रोध आए बिना नहीं रहता। उनके मान-माया या लोभ की सीमा नहीं रहती है। ‘आज आपको कितने में संतोष है?’ ऐसा कोई प्रश्न करे तो बात कहां जाकर रुकेगी? पांच, दस, बीस, पचास लाख या इससे भी अधिक लोभ! लोभ की सीमा ही नहीं होती और लोभी प्रपंची बने बिना भी नहीं रहता। जिसमें विषय का राग है, उसमें क्रोध, मान, माया और लोभ चारों कायम होते हैं। इनकी आधीनता, इसी का नाम ही तो संसार है। यह आधीनता भयंकर लगे, तब ही उससे मुक्त होने की इच्छा होगी, तभी तीर्थ आवश्यक लगेगा और तभी तीर्थयात्रा का सच्चा भाव पैदा होगा। हृदय में से विषयों की लालसा हटती नहीं और विषयों की आधीनता के कारण कषाय चुगते नहीं और आत्मा को विषय-कषाय रूप संसार से तैरने की भावना प्रकट नहीं होती, तब तक तीर्थ अच्छा कैसे लगेगा? विषय दुनिया से जाने वाले नहीं हैं, हमें ही विषयों की आसक्ति से मुक्त होना है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

भोग से भोगवृत्ति तृप्त नहीं होती


भोग भोगने से भोगवृत्ति तृप्त होती है, यह बात पूर्णतया गलत है। भोग भोगने से जो भोगवृत्ति तृप्त होती हो तो संसार में कितने ही मनुष्य वृद्धावस्था को प्राप्त होने पर भी भोग के पीछे पागल बने हुए नजर आते हैं, वे दिखते नहीं। आज वृद्ध बने हुए भी जवान कैसे बनें, उसकी खोज में हैं। उसी के लिए दवाएं खाते हैं। वे इसके लिए अभक्ष्य, अपेय आदि का विवेकपूर्ण विचार भूल जाते हैं और आर्यदेश को शोभित न हो, शर्मसार करने वाले हों, ऐसे खान-पान मौज से खाते हैं। कारण कि उनकी भोग-लालसा बढ गई है। उनको चाहे जैसा भी पाप करके शक्ति प्राप्त करनी है और शक्ति प्राप्त कर वृद्धावस्था में भी युवक के समान भोग भोगने की इच्छा है।

आज के विषय-भोग में आसक्त बने हुओं की एक-एक कार्यवाही का पृथक-करण करके जो कहने लगे तो सुनना भी भारी हो जाता है, ऐसी आज की दुर्दशा है। विषय-भोग भोगने से विषय-भोग की वृत्ति तृप्त हो जाती है, यह बात बिलकुल ही असत्य है। ज्यों-ज्यों आदमी विषय-भोग भोगता जाता है, त्यों-त्यों उसकी भोगवृत्ति भी प्रायः बढती जाती है। कुछ ही आत्माएं भोग में पडने के बाद भी भोगवृत्ति को काबू में ले सकती हैं और भोगवृत्ति को एक बार काबू में लेने के बाद भी वैसे भुक्तभोगी आत्माओं में से थोडी-सी आत्माएं जीवन पर्यन्त उस वृत्ति को नियंत्रण में रख सकती हैं। इसलिए यह मिथ्या प्रलाप मात्र ही है कि भोग भोगे बिना उसका त्याग नहीं किया जा सकता और यदि बिना भोगे कोई त्याग करता है तो वह गिरे बिना नहीं रह सकता है। ऐसा मिथ्या प्रलाप जिन-शासन के विरोधियों, दीक्षा धर्म के विरोधियों की साजिश मात्र है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 1 जुलाई 2013

सन्मार्ग में जाते हुए को रोकना कुलकलंक


क्षत्रिय लोग युद्ध को अपना धर्म मानते हैं। जीत जाएंगे तो जय-लक्ष्मी से नवाजे जाएंगे और युद्ध में मर जाएंगे तो शहीद का दर्जा मिलेगा, वीर कहलाएंगे, देवांगना मिलेगी, ऐसा मानते हैं। युद्ध में जाते हुए पति को या पुत्र को पत्नी या माता कुंकुम तिलक से वधाती है और युद्ध में जाने से रोके तो वे क्षत्रिय-कुलकलंक मानते हैं। इसी प्रकार जैन कुल में माता, पिता, पत्नी आदि सन्मार्ग में जाने वाले को नहीं रोकते। स्वयं के पति या पुत्र सन्मार्ग में जाए तो उसमें प्रसन्न होते हैं। वे समझते हैं कि ‘इससे इस लोक में वे साधु के समान पूजे जाएंगे, अनेक भव्यों का उद्धार करेंगे और बाद में शुभ गति को पाकर परिणामतः मोक्ष में जाएंगे।’ सन्मार्ग में जाते हुए को रोके वह कुलकलंक माना जाता है। शास्त्रों की आज्ञा है कि ‘सोलह वर्ष की उम्र के बाद आज्ञा न मिले तो भी योग्य दीक्षार्थी दीक्षा ले सकता है और गीतार्थ गुरु उसे दीक्षा दे सकता है।’ माता-पिता की आज्ञा मिले तो आठ वर्ष का बालक दीक्षा ले सकता है, ऐसा शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है और भूतकाल में कई आत्माओं ने आठ वर्ष की आयु में भागवती दीक्षा ग्रहण कर आत्म-कल्याण किया है। धर्मी धर्म करे और उसके पीछे दूसरे लोग उत्पात मचाएं तो इसका पाप धर्मी के सिर पर नहीं है। दीक्षा आत्म-कल्याण का पवित्र मार्ग है, इसमें अडंगा उचित नहीं है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 30 जून 2013

बलिदान देकर भी धर्म की रक्षा करें


धर्म के ऊपर आफत आए और वीतराग नहीं बने हुए धर्मी बाह्य समता से चिपके रहें, यह उचित नहीं है। फिर भी यदि ऐसी बाह्य समता चिपक जाए तो उसका अर्थ होगा कि उस आत्मा के अन्तर में मोक्ष मार्ग के प्रति जैसा चाहिए वैसा राग अभी प्रकट हुआ ही नहीं है। स्वयं अशक्त हो और आक्रमण का सामना कर सके, ऐसी हालत न हो तो बात अलग है। सत्व के अभाव में कदाचित् सच्चा व्यक्ति भी प्रकट में न बोल सके, यह संभव है, किन्तु सच्चा राग होगा और उसके अन्तर में जलन नहीं होगी, यह संभव नहीं है। जिस वस्तु पर राग होता है, उस वस्तु की लूट रागी सहन नहीं कर सकता है। जिस वस्तु को आत्मा तारक मानती है, उस वस्तु के ऊपर आफत आए तो वह सहन नहीं कर सकती है। धर्म के रागी में प्रशस्त कषाय का उत्पन्न होना पूर्णतः स्वाभाविक है। सच्चा धर्मी दुनिया में संरक्षण करने योग्य एक मात्र मोक्ष मार्ग को ही मानता है, इसलिए वह पौद्गलिक ऋद्धि चली जाए तो इसे भाग्याधीन मान लेता है और स्वयं की निन्दा हो तो अपने अशुभ कर्म का उदय मान लेता है और समता रख लेता है, किन्तु मोक्ष मार्ग पर आफत आए तो वह इसे बर्दाश्त नहीं करता, अपना सम्पूर्ण बलिदान देकर भी वह उस आफत को टालने का प्रयास करता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 29 जून 2013

विषय-कषाय की अधीनता झगड़ों की जड़


विषय और कषाय की अधीनता कितनी भयंकर वस्तु है? विषय-कषाय की अधीनता ने जगत में कौनसे-कौनसे अनर्थों को उत्पन्न नहीं किया? विषय-कषाय की अधीनता ने भाई-भाई के बीच में, बाप-बेटों के बीच में, पति और पत्नी के बीच में कितने-कितने झगडे पैदा किए हैं? विषय-कषाय की अधीनता का अस्तित्व नहीं हो तो झगडों का अस्तित्व भी कहां से होगा? इसका विचार तो करो! कोई कुटुम्ब ऐसा बताओगे कि जिस कुटुम्ब में किसी भी समय अर्थ-काम की रसिकता से अथवा विषय-कषाय की अधीनता से झगडा उत्पन्न न हुआ हो या युद्ध क्रीडा नहीं हुई हो? भाग्य से ही कोई कुटुम्ब ऐसा मिलेगा? तब, इस प्रकार के झगडे क्या घर के बाहर भी कम होते हैं? ऐसा होने पर भी ‘धर्म के नाम पर ही अधिकांशतः झगडे हुए हैं’, इस प्रकार मिथ्या भ्रम फैलाया जाता है तो इसके पीछे मकसद क्या है? धर्म के प्रति तीव्र अरुचि और धर्मनाश की भावना का ही इसमें संकेत मिलता है न? यह ठीक नहीं है और ऐसे दुष्प्रचार को पूरी दृढता से रोकना चाहिए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

विषय-कषाय की अधीनता झगड़ों की जड़


विषय और कषाय की अधीनता कितनी भयंकर वस्तु है? विषय-कषाय की अधीनता ने जगत में कौनसे-कौनसे अनर्थों को उत्पन्न नहीं किया? विषय-कषाय की अधीनता ने भाई-भाई के बीच में, बाप-बेटों के बीच में, पति और पत्नी के बीच में कितने-कितने झगडे पैदा किए हैं? विषय-कषाय की अधीनता का अस्तित्व नहीं हो तो झगडों का अस्तित्व भी कहां से होगा? इसका विचार तो करो! कोई कुटुम्ब ऐसा बताओगे कि जिस कुटुम्ब में किसी भी समय अर्थ-काम की रसिकता से अथवा विषय-कषाय की अधीनता से झगडा उत्पन्न न हुआ हो या युद्ध क्रीडा नहीं हुई हो? भाग्य से ही कोई कुटुम्ब ऐसा मिलेगा? तब, इस प्रकार के झगडे क्या घर के बाहर भी कम होते हैं? ऐसा होने पर भी ‘धर्म के नाम पर ही अधिकांशतः झगडे हुए हैं’, इस प्रकार मिथ्या भ्रम फैलाया जाता है तो इसके पीछे मकसद क्या है? धर्म के प्रति तीव्र अरुचि और धर्मनाश की भावना का ही इसमें संकेत मिलता है न? यह ठीक नहीं है और ऐसे दुष्प्रचार को पूरी दृढता से रोकना चाहिए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 28 जून 2013

धर्म में विघ्न डालना भयंकर दुःख का कारण


एकान्त हितकर मार्ग के प्रति भी वे ही लोग सुश्रद्धालु बन सकते हैं, जो सुन्दर भवितव्यता को धारण करने वाले होते हैं। सन्मार्ग के प्ररूपक सद्गुरु का योग प्राप्त होना, यह बहुत ही कठिन है। और प्राप्त हुआ योग भी फलदायी होना, यह तो उससे भी अधिक कठिन है। सन्मार्ग की रुचि उत्पन्न होने में लघुकर्मिता परमावश्यक वस्तु है। परन्तु, ऐसे भी जीव इस संसार में विद्यमान हैं, जो जीव सद्गुरु के कथन की हंसी उडाने में ही आनंद मानते हैं। ऐसे जीवों को सन्मार्ग का कथन फलेगा किस प्रकार से? आज का वातावरण तो देखो। आज सद्गुरुओं के वचनों की मजाक करना, यह तो सामान्य बात हो गई है। ऐसे को सद्गुरु का योग सफल हुआ या फूट गया? ऐसे लोगों का भविष्य तो निःसंदेह अंधकारमय और दुःखमय ही है।

आज कितने ही जीव सन्मार्ग के आराधकों को त्रास देने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। स्वयं से आराधना नहीं होती हो तो दूसरों की आराधना में विघ्नकर क्यों बनना चाहिए? ये एकदम झूठे लोग भी विरोध करने की धुन में आज क्या लिख रहे हैं और क्या बोल रहे हैं? समाज-हित के नाम से ऐसी धमाल हो सकती है? तूफान स्वयं मचाना और दोष साधुओं को देना, इसका क्या अर्थ है? जिनमें प्रामाणिकता नाम की कोई चीज नहीं, वे गाली और कलंक न दें तो क्या करें? उनका मकसद एक ही है कि लोगों को किसी भी प्रकार से धर्मस्थानों में आने से रोकना। इस रीति से धर्म के सामने उत्पात मचाने वालों का हम भले ही बुरा न चाहें, उनका भी कल्याण हो, यही अभिलाषा है; परन्तु उनके पाप से उनका बुरा न हो, यह संभव नहीं है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 27 जून 2013

मोह-ममत्व ही दुःख का कारण


दुनिया में हजारों लोग प्रतिदिन मरते हैं, लेकिन क्या सभी के मरने का दुःख हमें होता है? किसी की अकाल मृत्यु सुनकर दया भावना के कारण क्षणिक दुःख-संवेदना हो, इसे छोड दीजिए तो बाकी दूसरा कोई मृत्यु को प्राप्त होता है तो दुःख नहीं होता है, जिसको अपना मान लिया हो, वैसा कोई मृत्यु को प्राप्त हो तो दुःख होता है। तब सोचिए कि इस दुःख को उत्पन्न करने वाला मरण है या ममत्त्व? जहां ममत्त्व नहीं है, वहां दयाभावना प्रकट हो अथवा कोई उपकारी चला जाए और इससे दुःख हो, यह बात पृथक है। किन्तु, इसके अतिरिक्त तो जिसके प्रति ममत्त्व नहीं है, उसकी मृत्यु से दुःख नहीं होता है, यह बात निश्चित है। पुत्र-पुत्री का मरण, माता-पितादि का मरण, संबंधियों का मरण, मोह के घर का दुःख उत्पन्न करता है। कारण कि यहां ममत्व बैठा हुआ है। तब इस दुःख में मुख्य कारण मरण है या ममत्व? यह ममत्व निकल जाए तो ऐसे मरण के कारण भी मोह के घर का दुःख उत्पन्न नहीं होगा, यह सुनिश्चित बात है। इसी प्रकार स्वयं के शरीर का ममत्व भी दूर हो जाए तो? स्वयं के शरीर पर आपत्ति आए, स्वयं का शरीर रोग से घिर जाए, ऐसे समय में समभाव को स्थिर रखने के लिए सहनशीलता की विशेष अपेक्षा रहती है। सामर्थ्यहीन जीव वैसे अशुभोदय के समय में असमाधि को प्राप्त हो जाते हैं, यह असंभव वस्तु नहीं है। सच्चा साधु स्वयं के शरीर को भी पर मानने वाला होता है। इस कारण वह प्रत्येक स्थिति में समभावजनित सुख का अनुभव कर सकता है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 26 जून 2013

निर्मल श्रद्धा ही सुखकारी


वर्तमान में सुख का अनुभव करने के साथ ही, भावीकाल को भी सुखमय बनाने का एकमात्र यही मार्ग है कि अनन्तोपकारी, अनंतज्ञानी श्री जिनेश्वरदेवों द्वारा प्रतिपादित यथावस्थित मुक्तिमार्ग के प्रति निर्मल श्रद्धा धारण करो और इस मार्ग की आराधना में ही दत्तचित्त बनो। जो निर्दोष और उसके उपरांत अनुपम सुख का अनुभव छः खण्ड के अधिपति चक्रवर्ती भी नहीं कर सकते और देवों के अधिपति इन्द्र भी नहीं कर सकते हैं, उस सुख का अनुभव सच्चे निर्ग्रन्थ कर सकते हैं। साधु साधुपन को प्राप्त हो तो जितने अंश में साधुपन की सुन्दरता होगी, उतने ही अंश में वह सुख का अनुभव कर सकता है। आज्ञाविहित मार्ग में समभाव से मस्त रहने वाले को बाह्य कारण दुःख उत्पन्न नहीं कर सकते। चक्रवर्ती या इन्द्र आदि को ऐसा समाधिसुख, इन्द्रत्व या चक्रवर्तीत्व से भी संभव नहीं है। आहार मिले, न मिले, मान मिले या अपमान, स्वागत हो या तिरस्कार, दोनों स्थितियों में पुण्य-पाप के उदय को समझने वाला समभाव में ही रहता है, यह सुख कोई सामान्य कोटि का नहीं है। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 25 जून 2013

लालसा सर्वविरति की हो


कर्मलघुता को नहीं पाए हुए आत्माओं को अनन्त उपकारियों द्वारा कथित कल्याणकारी बातें भी न रुचें तो यह स्वाभाविक है। इसलिए भगवान ने गृहस्थ धर्म का भी उपदेश दिया है, किन्तु गृहस्थाश्रम में रहने का तो उपदेश कतई नहीं दिया है। गृहस्थावस्था का त्याग करके संयमी बनना, यह जिन आत्माओं के लिए शक्य नहीं है, वे आत्माएं भी आत्मकल्याण की साधना से सर्वथा वंचित न रह जाएं और वे भी क्रमशः सुविशुद्ध संयममय जीवन वाले बन सकें, इसीलिए ही भगवान ने गृहस्थ धर्म का उपदेश दिया है। उपकारकगण स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ‘देशविरति धर्म का भी सच्चा आराधक वही है, जो सर्वविरति धर्म की लालसा वाला हो।’

गृहस्थावस्था को कल्याण का कारण मानने वाले अथवा गृहस्थावस्था में रचेपचे एक भी आत्मा को किसी काल में केवलज्ञान न हुआ है और न होने वाला है। गृहस्थावस्था में रहते हुए कल्याण की साधना वाले तो वे ही बन सके हैं और बन सकते हैं कि जो गृहस्थावास को हेय मानें और श्री जिनाज्ञानुसार संयमशील बनने में ही कल्याण मानने वाले बनें, असंयम का पश्चाताप करें और संयम का अनुसरण करें। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा