गुरुवार, 19 सितंबर 2013

चेपी रोग से सावधान!


तम्बोली की कतरनी (कैंची) चलती ही रहती है। पान खण्डित हुआ तो कतरनी चलाता ही रहता है। सडा हुआ भाग निकालता है, न निकाले तो सम्पूर्ण करण्डिया-टोकरा (पान रखने का स्थान) बिगाड देता है। सडे हुए भाग को दूर करना, उसके प्रति उसका द्वेष नहीं है। किन्तु सम्पूर्ण टोकरे को न बिगाडे, इसीलिए ही तम्बोली की कतरनी चलती रहती है। पान खिलाने वाला सामग्री कितनी रखता है? कत्था, चूना, जिनतान की गोली सब रखता है। पान की पेटी होती है, किन्तु कतरनी पहले। तम्बोली को तो कतरनी के बिना चलता ही नहीं है।

इसी प्रकार शास्त्रकारों ने कहा है कि श्रीसंघ को यदि स्वयं का बचाव करना हो तो निह्नवता, उन्मार्गगामिता आदि सडे भाग पर कतरनी चलानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो आगम का और धर्म का कितना नाश होगा? एक सडा हुआ हजार को सडाता है। कारण कि यह चेपी रोग है। शास्त्रों में श्रीसंघ को सावचेत रहने की भलामण पूरी दी है। जितने अंश में इस भलामण का स्वीकार, उतने ही अंशों में कल्याण है।

सडा हुआ भाग दूर रखना, इसमें कोई वैरभाव नहीं है। वहां दुर्भावना नहीं है। किन्तु सडे हुए को साथ रखकर या उसके साथ रहकर सडने का या शक्ति के होते हुए भी उसका दुर्लक्ष्य करने का अथवा उसको बढने देने का शास्त्र मनाई करते हैं। दया का मतलब यह नहीं कि आत्मा का घात हो। किन्तु, दोषों को निभाने की भावना भी नहीं होनी चाहिए। यदि यह नियम नहीं रखेंगे तो अपना भी नाश होना सम्भव है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 18 सितंबर 2013

धर्मस्थान कल्याण कब कर सकते हैं?


आजकल ज्यों-ज्यों धर्म करने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है, त्यों-त्यों धर्मस्थान प्रायः खतरे में पडते दृष्टिगोचर होते हैं, क्योंकि वे किसी की आज्ञा में रहना नहीं चाहते। बिना स्वामी वाले बडे-बडे कारखानों की कैसी विषम स्थिति हुई है, यह किसी से छिपा नहीं है। स्वयं के स्वामित्व में जो कारखाने अपार लाभ कमाते थे, वे ही कारखाने सरकारी अधिग्रहण के बाद भीख मांगते हो गए। स्वामी के हाथ से सेवकों के हाथों में काम जाने का ही यह परिणाम है। धर्म क्षेत्र में भी स्वामी के अभाव में ऐसी स्थिति होगी ही।

आपको समझना चाहिए कि मन्दिर, उपाश्रय इच्छानुसार तमाशा करने के अखाडे नहीं हैं। ये तो विधिपूर्वक धर्म-क्रिया करने के तारणहार धर्म-स्थल हैं। जो लोग यह बात नहीं समझते, उनका कल्याण धर्म स्थानों से भी नहीं हो सकेगा, यह निश्चित है। धर्मात्मा लोग गुरुओं के अधीन होने चाहिए। यदि इस तरह हों तो ही मन्दिर और उपाश्रय कल्याणकारी सिद्ध हो सकते हैं। आपकी दाढी पर हाथ फिरा-फिराकर आपका धन धर्म में व्यय कराने से धर्म को कोई बडा लाभ होता हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। ज्ञान और आवश्यकता दोनों का अभाव होने से ऐसे धर्मात्माओं से तो यदि ध्यान नहीं रखा जाए तो साधु भी लुट जाएं। आज तो अविधि ही मानो विधि हो गई है। यदि इसी प्रकार चलता रहा तो आत्म-कल्याण तो कोसों दूर ही रहेगा। धन को त्याज्य मानने वाला व्यक्ति ही धन से धर्म कर सकता है। जिसे धन त्याज्य ही न लगे, वह धन से धर्म कर ही नहीं सकता। वह तो धर्म को टुकडा फेंकता है। ऐसे व्यक्ति से तो दान कराना भी खतरनाक हो सकता है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

पाप के बाप


संसार का सुख भोगना, यह चौथा पाप और उस सुख की सामग्री, यह पांचवां पाप है। यदि ये दोनों आपको पाप रूप लगें तो ही मेरा धर्मोपदेश आगे चलता है। ‘संसार असार है और मनुष्य जन्म दुर्लभ’, हमारी ये बातें आज हवा में उड जाती हैं। दुर्लभ मनुष्य जन्म भी यदि मुक्ति की साधना में उपयोगी न हो तो वह महापाप का बंध कराता है। अरिहंत देवों ने दुनिया के जीवों से सांसारिक सुख, जिसके पीछे दुःख छिपा हुआ है, उसे ही छुडवाने के लिए मेहनत की है, सांसारिक सुख, सुखाभास या क्षायिक सुख देने के लिए मेहनत नहीं की। अपितु जीव अक्षय सुख-शान्ति पा सके इसके लिए सारी मेहनत है। किसी भी सांसारिक सुख के विषय में सुख का अनुभव करना मैथुन है! मैथुन की यह विशद व्याख्या है। चौथा और पांचवां पाप नरक व तिर्यंच का कारण है। यह जानने के बाद भी दोनों पापों में आनन्द आए और उस आनन्द आने का दुःख भी न हो, यह मूर्खता नहीं तो और क्या है? मैथुन और परिग्रह नाम के इन चौथे पांचवें पाप के बल से ही आगे-पीछे के अन्य पाप पनपते हैं। ये ही सारे पापों के बाप हैं, ऐसा कहा जा सकता है। जो इन दो पापों का आचरण नहीं करता, उन्हें अन्य पाप नहींवत् लगते हैं। इन पापों को पाप मानने की योग्यता वाले जीव ही संसार को असार समझने की योग्यता रखते हैं। परिग्रह को पाप बताते समय, ‘पैसे से ही मन्दिर उपाश्रय बनते हैं’, ऐसा कहने वालों से मेरा प्रश्न है कि ‘कितने पैसों से मन्दिर उपाश्रय बनवाए और कितने पैसे मौज-मजे में खर्च किए?’ मैं जब पैसे को बुरा कहता हूं, तब मन्दिर-उपाश्रय मेरी आँखों से ओझल नहीं होते। ‘पैसा अच्छा है’, इस बात में आप हमारी स्वीकृति लेने का प्रयास मत करिए। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 16 सितंबर 2013

श्रावक साधुओं के मां-बाप या सांप


शास्त्र में श्रावकों को साधु के माता-पिता कहा है। श्रावक को मां-बाप जैसा भी कहा है और सांप जैसा भी कहा है। आप यदि मां-बाप बनो तो हमारा काम हो जाए। मां-बाप बनोगे? लेकिन जिनको अपने स्वयं के बच्चों का मां-बाप बनना नहीं आया, वे साधुओं के किस प्रकार बनेंगे? महाव्रतधारी के मां-बाप बनना क्या इतना सरल है? श्रावक मां-बाप जैसे बन जाएं तो तो साधुओं की सारी चिन्ता खत्म हो जाए; साधुओं के संयम की चिन्ता आपको होने लगे कि साधुओं के संयम में किस प्रकार वृद्धि हो, किस प्रकार टिके, किस प्रकार शुद्ध हो, कैसे फैले, ये सब चिन्ताएं श्रावक करें तो फिर बाकी क्या रहे?

व्यवहार में बेटा अच्छा कैसे बने, लाख के करोड कैसे करे, आलीशान गाड़ियों में कैसे घूमे; यह सारी चिन्ता मां-बाप को होती है न? इसी प्रकार साधुओं का संयम कैसे पले, कैसे बढे, कैसे जगत में उस संयम का फैलाव हो; यह चिन्ता श्रावक करे तो इसमें हमें आनन्द होगा या दुःख? मैं तो मांग करता हूं कि आप ऐसे मां-बाप बनें। आपने मां-बाप का फर्ज छोड दिया, उसी की यह परेशानी और चर्चा है। आपको यह बात महसूस होनी चाहिए।

आज साधुओं में शीथिलाचार आया कहां से? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? सांप अपने ही बच्चों को नष्ट कर देता है, श्रावक ही साधुओं को संयम से नीचे गिरने के साधन सुलभ कराते हैं। मां-बाप ही बच्चे की कमजोरियों पर पर्दा डालकर उसे बिगाडते हैं। ऐसे मां-बाप क्या वाकई अच्छे मां-बाप हैं जो अपनी औलादों को गलत रास्ते पर धकेल देते हैं? नहीं। आप अच्छे मां-बाप बनिए! -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 15 सितंबर 2013

धर्म पर विपत्ति के समय कर्तव्य


कलिकालसर्वज्ञ, भगवान श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज फरमाते हैं कि- ‘धर्म के नाश के समय, उत्तम क्रिया का लोप हो रहा हो या होने की संभावना लगती हो उस समय और स्व-सिद्धान्त यानी कि कोई गलत अर्थ अथवा अपना अर्थ थोपकर श्री जिनेश्वरदेव द्वारा प्ररूपित सिद्धान्त के अर्थ का अनर्थ करता हो, गलत व्याख्या करता हो; तब उसे रोकने के लिए बिना पूछे भी समर्थ आत्मा को अवश्य बोलना चाहिए।’

ऐसे समय बनावटी, दिखावटी और नाशक शान्ति के जाप नहीं जपे जाते। खोटी शान्ति और समता के पाठ पढकर तो वस्तु को गुमा देंगे। ऐसी खोटी समता-शान्ति का पाठ पढाने वाले कोई गुरु हों तो वे सुगुरु नहीं हैं। सन्मार्ग का लोप होता हो, तब श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा जैसे भी फरमाते हैं कि सामर्थ्यवान आत्मा बिना पूछे भी ऐसी प्रवृत्ति का निषेध करती है, विरोध करती है। ‘जो करेगा वो भरेगा’, तो आप क्या करोगे?

ऐसे प्रसंग के समय घर के कोने में दुबकने की बजाय मर-खपजाना श्रेयस्कर है। शासन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है। ज्ञानी फरमाते हैं कि सत्य का अनुरागी उत्तम क्रियाओं के लोप के समय गूंगा बनकर नहीं रहता है। जो शक्ति होते हुए भी मूक बनकर रहे, उसकी परिणाम स्वरूप आस्तिकता चली जाती है और उसमें नास्तिकता आ जाती है। आपकी सामर्थ्य न हो तो आपकी भावना और चिन्तन तो यही होना चाहिए कि कोई सामर्थ्यवान जागे, कोई उन्मार्गियों को रोके’। और कोई जागे तो आपको खुश होना चाहिए। ‘ऐसा कोई जागे तो अच्छा’, ऐसा हृदय में बार-बार होना चाहिए। सच्चा सन्मार्ग प्रेम तो यही है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 14 सितंबर 2013

उन्मार्ग का उन्मूलन/सन्मार्ग का स्थापन


अरिहंत परमात्मा के शासन की सत्य बातों को प्रकाशित करते हुए, खण्डन करने योग्य का खण्डन भी करना पडता है। इसके बिना सत्य का यथार्थ ज्ञान नहीं होता। चावल खाने हों तो धान (तुष सहित चावल) को खाण्डना ही पडता है। इसके लिए ऊखल और मूसल चाहिए। अपने में खाण्डने की शक्ति न हो तो मजदूर बुलवाने पडते हैं। कोई भी अनाज छिलके उखाडे बिना नहीं खाया जाता। परमात्मा का शासन मिला तो आडे आने वाले आवरणों को हटाए बिना, आत्मा पर चिपके हुए कर्म और शासन के विरोधियों के विरूद्ध युद्ध किए बिना आराधना का सच्चा आनन्द, सच्चा स्वाद नहीं मिल सकता।

कस वाली किसी भी चीज के अन्तिम सत्व को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सब क्रियाएं करनी पडती हैं और कचरे को दूर करना पडता है। सच्चा दर्शन पाने के लिए, सब कुदर्शनों और दुनिया की सब अवास्तविक मान्यताओं का त्याग करना ही पडता है। इन आवरणों को हटाने से ही ‘जैन शासन’ की प्राप्ति सार्थक हो सकती है। खण्डन की बात आते ही कितने ही लोग मौन रहने को कहते हैं। पाप वाली भाषा न बोलना ही सच्चा मौन है और पाप के प्रतिकार के लिए बोलना, यह भी मौन ही है। उन्मार्ग के उन्मूलन बिना, सन्मार्ग की स्थापना शक्य ही नहीं है। उन्मार्ग के उन्मूलन में जैसे आवश्यक उग्रता चाहिए, वैसे सन्मार्ग की स्थापना में वास्तविक शान्ति चाहिए। अकेली ठंडक तो हिम जैसी है, उससे फसल जल जाती है, जबकि वर्षा में ठंडक और गर्मी दोनों हैं। इसीलिए वह फसल को पकाती है। उन्मार्ग का उन्मूलन कर के सन्मार्ग का स्थापन करने में दोनों चीजों की आवश्यकता रहती है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

दुःख में दुःख और सुख में सुख मानना मूर्खता


यह संसार सुख-दुःख का मेला है। दुःख अधिक है, सुख थोडा है। इन दो के सिवाय संसार में और है ही क्या? ऐसे संसार के दुःख में दुःख मानना और सुख में सुख मानना मूर्खता है। इसके विपरीत, दुःख में जिन्होंने आनन्द माना वे ही मोक्ष में गए। सुख को जिन्होंने लात मारी वे ही त्यागी बन सके। पाप से प्राप्त दुःख में नाराजी और पुण्य से प्राप्त सुख में प्रसन्नता, इसी का नाम अविरति है। जगत को ‘अविरति’ का भान नहीं। यह बात जैन शासन में ही है। परन्तु, जैन भी आजकल ‘अविरति’ को नहीं समझते। आजकल इस संसार रूपी नक्कारखाने में अविरति की ही नौबत बज रही है, ऐसे में हमारी तूती कौन सुने? सुख के साधनों में मौज करने वाले, उसकी अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करने वाले और उसकी कमी के लिए खेद प्रकट करने वाले; सब अविरति में फंसे हुए हैं।

मिथ्यात्व कहता है कि ‘जहां तक मेरी अविरति आनन्द में है, वहां तक मुझे कोई चिन्ता नहीं। जब अविरति रोने लगती है, तब मुझे घबराहट होती है।’ कर्म के उदय से जीव को दुःख आने ही वाला है। उस समय कदाचित् ऐसे संयोग मिल जाएं कि उस पर दया करने वाला कोई न रहे। आज हजारों जानवर बिना किसी अपराध के काटे जा रहे हैं और किसी के पेट का पानी नहीं हिल रहा है। जानवरों के पाप का उदय भी ऐसा आया है कि वे काटे जा रहे हैं और उन पर दया करने वाला कोई नहीं है; आपके लिए भी दुःख के प्रसंग में ऐसा नहीं होगा, इस बात का क्या भरोसा है? इसलिए इस बात को गहराई से समझो और दुःख में दुःख व सुख में सुख मानना और वैसा व्यवहार करना छोडो। समभाव से रहो। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

सुख का दुःख


आप दुनिया में जिस-जिस सुख की कल्पना करते हैं, उनमें से एक भी सुख ऐसा नहीं है, जिसमें दुःख रहा हुआ न हो। वह सुख अमुक काल से अधिक काल के लिए एकधारा में नहीं भोगा जा सकता। आपकी दृष्टि से मान लें कि खाने में सुख है, परन्तु क्या कोई दिनभर खाता रह सकता है? पीने में सुख है तो क्या बिना प्यास ही पानी पीते रहा जा सकता है? इसी तरह संसार का कोई भी सुख लीजिए, वह निरंतर नहीं भोगा जा सकता। साथ ही ऐसे सुख, दुःख के होने पर ही भोगे जा सकते हैं। भूख लगे बिना खाना क्या सुखरूप लगता है? तब आप भूख को दुःख ही कहेंगे न? प्यास को भी दुःख ही कहेंगे न? जितना भूख-प्यास का दुःख अधिक होता है, उतना ही खाने और शीतल जल पीने का सुख अधिक होता है। जो सुख स्वतंत्र नहीं होता, उस सुख की अनुभूति करने से पहले दुःख अवश्य होना चाहिए। ऐसे सुख को सुख मानना मूर्खतापूर्ण ही है।

भूख न लगे तो दवा लेने पहुंच जाते हो न? भूख दुःख है। यह दुःख न आए तो मरने का भय लगता है। खाते-खाते कभी ऐसा विचार आया क्या कि कर्म के अधीन होकर मैं कैसा रागी बन गया हूं कि जो सुख स्वतंत्र नहीं, उसका स्नेही बनकर, यदि दुःख न आए तो भी जी न सकूं, ऐसी मेरी दुर्दशा हो गई है। ऐसा विचार आए तो भूख ही न लगे, आहार की अपेक्षा ही न रहे। ऐसी दशा का विचार आए तो सच्चे सुख को पाने हेतु मोक्ष की मुसाफिरी करने का मनोरथ जागे। भौतिक सुख का यही एक बडा दुःख है कि उसमें सुख देने की स्वतंत्र शक्ति नहीं है। दुःख की मात्रा के अनुसार ही वह सुख देता है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 11 सितंबर 2013

शरीर और इन्द्रियों के प्रति कठोर बनिए


शरीर और इन्द्रियों के प्रति जब तक कठोरता का व्यवहार न किया जाए, तब तक कर्मों को धक्का लगता ही नहीं। शरीर को पंपोलने, शरीर की सार-संभाल करने और उसी की सेवा में लगा व्यक्ति वास्तविक धर्म कर ही नहीं सकता। शरीर की पूजा में से सब पाप पैदा होते हैं। भगवान की सच्ची पूजा करने की फुरसत शरीर के पुजारी को नहीं मिलती। आजकल शरीर की गंदगी दूर करने के लिए आत्मा में गंदगी भरी जा रही है, यह कैसी मूर्खता है। भगवान शरीर के प्रति कठोर थे, इसीलिए कर्मों के लिए कठोर बन सके। भगवान ने उपसर्गों और परीषहों को जिस प्रकार सहन किया, यह उक्त बात की साक्षी देता है।

शरीर कष्ट भोगने का साधन है या सुख भोगने का साधन? शरीर से सुख भोगने से संसार घटता है या समभाव पूर्वक कष्ट भोगने से संसार घटता है? जिस शरीर से सुख भोगा जा सकता था, उस शरीर से भगवान ने कष्ट ही सहन किए, यह बात आप जानते हैं न? ‘यह जन्म भोग के लिए है’, ऐसा मानने वालों ने दरअसल भगवान को माना ही नहीं है। ‘यह जन्म त्याग के लिए है’, ऐसा मानने वालों ने ही भगवान को सही रूप में माना है। संसार में लगभग सभी जीव सुख में सडने के लिए और दुःख में संतप्त होने के लिए सर्जित हैं। सुख के समय में इन जीवों में ऐसी सडान पैदा हो जाती है, जिसके कारण ये जीव दुःख में संतप्त होने के लिए चले जाते हैं। ऐसा क्रम चलता रहता है। दुःख से घबराकर भवोद्वेग पैदा हो, यह विराग नहीं है, यह तो दुःख पर द्वेष ही है। इसमें जागृति आए और सुख के प्रति विरक्ति पैदा हो तो बेडा पार हो जाए। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

जगत और जैन


कर्म हरे, वह हरि। दुःख हरे, वह हरि नहीं। दुःख हरने की बात स्वार्थ से पैदा हुई है। कर्म हरने की बात परमार्थ से पैदा हुई है। ऐसा अर्थ जैनेत्तर को समझाने पर यदि वह योग्य है तो खुश-खुश हो उठता है। इस संसार में सुख एक ऐसा पदार्थ है, जो सब जीवों को अच्छा लगता है और फिर विचित्रता यह है कि यह सुख ही जीव को दुःख दिलवाता है। जगत को सुखमय संसार पाने की आदत है और जैन को सुखमय संसार छोडने की आदत होती है। धर्म से मिलने वाली संसार की छोटी से छोटी चीज भी अच्छी या उपयोग करने योग्य जिसे न लगे, वह धर्मी और ‘धर्म से प्राप्त वस्तुओं को भोगने में क्या दोष’, ऐसा जिसे लगे, वह मिथ्यादृष्टि। श्रीमन्तों की बात छोड दें, मध्यम वर्ग के लोग भी यदि अपने घरों से बेकार का कचरा निकाल फेंके, जरूरी वस्तुओं से ही जीने का संकल्प करें तो आज के बहुत से दुःख भाग जाएं। श्रीमन्ताई की हमारी व्याख्या अलग ही है। श्रीमन्ताई जिसके पीछे फिरे वह श्रीमन्त। श्रीमन्ताई के पीछे जो फिरे वह भिखारी। आज के वादों का सच्चा लक्षण ही कोई नहीं बतलाता और खूबी यह है कि वादों के अग्रगण्य सब पूँजीवादी ही हैं। स्वयं मौज उडाकर लोगों को वाद और वादों के चक्कर में डालते हैं। जब श्रीमन्त सच्चे अर्थों में श्रीमन्त थे, तब आज के एक भी वाद और वादे का जन्म ही नहीं हुआ था, सिवाय अध्यात्मवाद के। आज ज्ञाति-जाति और कुटुम्ब की सब अच्छी रीतियों का नाश कर दिया गया है और पापमय कानूनों का ढेर लगा दिया गया। परन्तु, यह मंच एक दिन टूट पडनेवाला है। आज की प्रगति भयानक अवगति का मूल है। इसे जितना जल्द समझ लें, उतना ठीक है। -आचार्यश्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 9 सितंबर 2013

क्षमा किसके लिए ? स्वयं आपके लिए !


क्षमापर्व पर विशेष (क्षमा का वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक महत्त्व)

क्षमा आपके लिए है, भले ही दूसरा व्यक्ति उसे मांगे या नहीं, अपनी भूल स्वीकारे या न स्वीकारे। यह आपके स्वास्थ्य, कुशलता और आने वाले जीवन के लिए है

किसी को क्षमा करना या किसी व्यक्ति से क्षमा माँगना दोनों ही कार्य अत्यधिक साहस, हिम्मत व विशाल हृदय होने पर ही पूर्ण हो सकते हैं। क्षमा की सीधी-सादी परिभाषा है- माफ करना या अपने कृत्य के लिए माफी माँगना या प्रायश्चित्त करना। ‘जिस नाराजगी के आप हकदार हैं, उसे छोडना और जिन लोगों ने आपको ठेस पहुंचाई है और आपकी दोस्ती पाने के हकदार नहीं हैं, उनसे दोस्ताना व्यवहार करना’, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से क्षमा को कुछ इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जो लोग ठेस पहुंचाने वालों को माफ करने से इन्कार कर देते हैं, वे न सिर्फ खुद अपने साथ बोझ ढोते हैं, बल्कि उस घटना को अपनी सारी ताकत दे देते हैं। जो व्यक्ति जिसके साथ क्रोधित रहना चुनता है, दरअसल वह उसी के वश में रहता है, भले ही वह खुद इस बात को अस्वीकार करे।

दूसरों की भूल को क्षमा करना फिर भी आसान है, परंतु अपनी भूल या गलती बताने वाले को माफ करना बहुत ही कठिन कार्य है। गलती किससे नहीं होती? सवाल यह है कि सामने वाला उसे किस रूप में लेता है? साधारण या दुश्मनी या झगडा; परंतु कुछ भी निर्णय लेने के पहले ठंडे दिमाग से विचार करना चाहिए। दोस्त की/सहयोगी की, अधिकारी की या कर्मचारी की छोटी-सी भूल, अपराध या कृत्य को हम अपने दिमाग में स्थान देकर कहीं अपना ही दिमाग तो खराब नहीं कर रहे हैं? अगर सामने वाला अपने कृत्य के लिए आपसे क्षमा माँगता है, तो उसे तुरंत क्षमा कर दें। इससे दोनों का बोझ कम हो जाएगा और संबंध सरल बने रहेंगे। लेकिन कदाचित वह अपनी गलती के लिए माफी नहीं मांगता है, तब भी आप अपनी ओर से अपने मन की शान्ति के लिए तो उसे माफ कर ही दीजिए और उसके अपराध को अपने दिमाग में स्थान मत दीजिए। इससे आपके मन पर बोझ नहीं रहेगा, आपका दिल-दिमाग हलका रहेगा। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

क्षमा करने वाले को अकडना नहीं चाहिए कि मैंने माफ कर दिया, मैं बडा आदमी हूँ। माफी भी विनम्र स्वरूप में दी जानी चाहिए और इस बात का ध्यान रहे कि उसे यह अहसास न कराया जाए कि आप माफ करके उसके ऊपर अहसान कर रहे हैं, बल्कि परस्पर सहयोग करना चाहते हैं। वैज्ञानिक शोध के अनुसार द्वेष व्यक्ति के भावनात्मक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास को रोक देता है।

जो लोग अपने को ठेस पहुँचाने वाले, अपमानित करने वाले व्यक्ति को माफ नहीं करते, वे इस घटना का बोझ अपने साथ ढोते हैं व अपनी ऊर्जा इस बोझ को ढोने में खर्च कर देते हैं। माफी आपके भले के लिए है, चोट को दिल से लगाए रखना दूसरे के बनिस्बत अपने आपको अधिक तकलीफ पहुँचाता है। यह आपकी मानसिक शांति को ठेस पहुँचाती है।

क्षमा या माफी एक ऐसी रामबाण दवा है, जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। वह प्रेम व सौहार्द को खत्म करने वाले धीमे जहर को खत्म कर देती है। माफी नहीं देना, क्षमा नहीं करना हमारे शरीर में हार्मोनल परिवर्तन पैदा करती है, जो शरीर के लिए घातक है। क्षमा माँगने में विलंब नहीं करना चाहिए, नहीं तो क्षमा माँगना कठिन हो जाएगा। खुले दिल से अपनी गलती स्वीकार की जाए।

क्षमा करते समय भी किसी प्रकार के तल्ख भाव या उसको गलती का अहसास कराने की चेष्टा न करें। गले मिलकर, मौन रूप से भी गिले-शिकवे दूर किए जा सकते हैं। स्पर्श से जादू की प्यार भरी झप्पी देकर। इस दुनिया में उन्हें खुशी नहीं मिलती जो अपनी शर्तों पर जिंदगी जीते हैं, बल्कि उन्हें खुशी मिलती है जो दूसरों की खुशी के लिए जिंदगी की रफ्तार बदल लेते हैं, शर्तें बदल देते हैं। दो अक्षर का शब्द क्षमा अपने अंदर कई गूढ अर्थों को समाए हुए है।

हालांकि जो लोग क्षमा के रास्ते अपने परिवार के सदस्यों से झगडे नहीं सुलझाते, खुद इस तथ्य से अनजान वे इस बोझे को अपने वर्तमान रिश्तों में भी घसीटते चलते हैं। मैंने यह कई बार देखा है, जो कुछ भी दमित होता है, उसका दोहराव जरूर होता है। द्वेष व्यक्ति के भावनात्मक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास को रोक देता है। ऐसा मैंने न केवल बीते 40 वर्षों के अपने कार्यकारी जीवन में कदम-कदम पर देखा है, क्षमा का झुंनझुना लेकर घूमते समाज में देखा है, वरन स्वयं अपने परिवार में देखा है, अनुभव किया है। ऐसे लोग झुंझलाने को सदा तैयार रहते हैं, यहां तक कि इसके अवसर भी ढूंढते हैं। क्योंकि, उनके भीतर कमी ढूंढने की आदत उन्हें खुद अपना व्यवहार देखने से रोकती है और वे असामाजिक व्यवहार की व्याख्या करना जारी रखते हैं। बहुत से साधारण लोगों में चूंकि झगडे सुलझाने के अच्छे गुण नहीं होते, इसलिए उनमें नाराज होने की प्रवृत्ति बनी रहती है। यानी छोटी-छोटी बातों में खुद के निर्धारित अन्याय ढूंढना और इकट्ठा करना। उनके इस प्रकार के व्यवहार के पीछे सात मिथक हैं।

1. क्षमा करना भूलने के समान है। 2. क्षमा करना बहाने के समान है। 3. क्षमा का मतलब समाधान या मेल-मिलाप करना है। 4. क्षमा आपको कमजोर बनाती है। 5. क्षमा एक कार्य या निर्णय है। 6. क्षमा आपको आसानी से चोट पहुंचा सकने वाला व्यक्ति बनाती है। 7. क्षमा उकसाने वाले की अपने गलत व्यवहार की स्वीकृति पर निर्भर करती है।

ये सभी सामान्य भ्रम हैं और इनमें से एक भी सही नहीं है।

माफी या क्षमा, भूलने के समान नहीं है। यह सच है कि व्यक्ति कुछ चीजें कभी नहीं भूलेगा, पर इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसमें ही बस जाएं। क्षमा बहाने के समान नहीं है। आप उस व्यवहार से छुटकारा नहीं पा रहे या फिर यह नहीं दिखा रहे कि सामने वाले ने आपको ठेस नहीं पहुंचाई। असल में क्षमा के लिए मेल-मिलाप की जरूरत नहीं है, हालांकि यह एक वांछनीय परिणाम है। क्षमा आपको कमजोर नहीं बनाती, क्योंकि इसके लिए आपको निजी साहस की आवश्यकता होती है। असल में यह आपको ज्यादा शक्तिशाली और एक बेहतर व्यक्ति बनाती है। क्षमा कोई कार्य नहीं है; यह एक प्रक्रिया है और इसमें लम्बा समय लग सकता है। यदि ठेस परिवार के सदस्य से है या फिर एक निजी धोखे से, तो क्षमा करने के लिए प्रार्थना और कई समान चीजों की आवश्यकता पड सकती है। अंतिम भ्रम या गलतफहमी सबसे बडा गतिरोध है। अधिकतर को यह लगता है कि जब तक दूसरा व्यक्ति उसके द्वारा किए गए नुकसान को स्वीकार नहीं करता, तब तक वे उसे माफ नहीं कर सकते। यह सही नहीं है। हो सकता है कि वह अपनी गलती को ना माने या स्वीकार करे, क्षमा के लिए यह जरूरी नहीं है। यहां पर एक सामान्य सच यह है कि क्षमा आपके लिए है, भले ही दूसरा व्यक्ति उसे मांगे या नहीं, अपनी भूल माने न माने। यह आपके स्वास्थ्य, कुशलता और आने वाले जीवन के लिए है।

जो लोग बदले की भावना रखते हैं, उनमें हृदयगति के तेज होने की और ब्लडप्रेशर की संभावना बढ जाती है। अपने मन ही मन में क्रोध को बनाए रखने वाले गंभीर मानसिक रोगों के शिकार जल्दी होते हैं। गौर करने योग्य बात यह है कि जिन लोगों ने माफ किया, वे कम उदास और कम चिंतित रहते हैं। आवेश और बदले की कल्पनाओं से मुक्त रहते हैं। हम जिस दुनिया में रहते हैं, उसकी रचना हम स्वयं करते हैं। संसार आपका आईना है। शान्ति प्रिय व्यक्ति शान्तिपूर्ण जीवन में रहता है। एक गुस्सैल व्यक्ति क्रोधित दुनिया बनाता है........एक रूखे व्यक्ति को जब उससे मिलने वाला व्यक्ति देर-सवेर रूखी प्रतिक्रिया दे तो उसे आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

जीवन भर न्याय-नीति के लिए संघर्ष करने और मनोविज्ञान के गहन अध्ययन के बाद अब उम्र के जिस मुकाम पर मैं आया हूं, मैंने क्षमा करने के लिए कुछ जरूरी कदम इकट्ठा किए हैं-

·        स्वीकार करें कि वर्तमान स्थिति आपके लिए अच्छी नहीं है और यदि कोई बदलाव आएगा तो वह आपको लाना होगा। आगे आपका दूसरों की सोच, भावनाओं और व्यवहार पर कोई काबू नहीं है। स्वयं को ही बदलना होगा।

·        नजरियों में बहुत अंतर होता है, हम इस बात से अनजान होते हैं कि हमारा दूसरों पर क्या प्रभाव है। हम में खुद को आदर्श मानने की प्रवृत्ति होती है।

·        दुनिया में सबसे आसान है दूसरों पर दोष मढना। इसलिए अपने आपको शान्त रखना चाहिए। वक्त ही इसे अपने आप साफ कर देगा कि दोष किसका है।

·        महसूस करें कि माफी देना आपके भले के लिए है, चोट को दिल में रखना किसी और से ज्यादा खुद आपको तकलीफ पहुंचाता है। यह आपको अपने उस वर्तमान को पूरी तरह जीने से रोकता है, जिसे आप शान्ति से कल की नकारात्मक बातों को भूलकर जी सकते हैं।

·        क्या रिश्ते को बेहतर करने की कोशिश से आपको अच्छा महसूस होगा या आप अपने आपको बेहतर इंसान महसूस कर सकेंगे?

यह समझिए कि क्षमा करने का मतलब भूलना या अनदेखा करना नहीं है। ‘क्योंकि मैं भूल नहीं सकता, इसलिए माफ नहीं कर सकता’, यह अन्यथा स्थिति है और सच नहीं है। क्षमा करना एक सीधा सा निर्णय है, जहां आप चोटिल भावनाओं के बारे में बार-बार नहीं सोचेंगे। ऐसा करने की कुंजी है कि आप ऐसे चिंतन को इनकार करते रहें और सोचें कि जिसके कर्म जिसके साथ। यह वह निर्णय है जो आपको बार-बार लेना पड सकता है, जितनी बार जरूरी हो उतनी बार।

·        आप विश्वास करें या नहीं, क्षमा 100 प्रतिशत आपकी जिम्मेदारी है और इसके लिए यह जरूरी नहीं कि दूसरा व्यक्ति आकर स्वीकार करे कि गलती उसकी है। उसका इंतजार आपको भूत और भविष्य दोनों में फंसाए रखेगा और आप अपना वर्तमान खराब कर देंगे। बहुत से लोग पछतावे और ग्लानि के दो पाटों के बीच खुद को सजा देते रहते हैं और फिर यह मानकर चलते हैं कि दूसरे लोग या फिर दुनिया उनके साथ ऐसा कर रही है।

·        परिवार के किसी नजदीकी सदस्य द्वारा चोट बहुत गहरी और गंभीर होती है, इसके जख्म बहुत गहरे होते हैं, जिसे भरने के लिए लगातार प्रार्थना का सहारा लेना पडता है। लम्बे समय तक प्रार्थना करने से हम माफ करने की स्थिति में आते हैं।

·        लगातार ध्यान, विचार, अनासक्ति, यह जानना कि कष्ट झेलना मानव जीवन का हिस्सा है और हित सभी जीवों के प्रति करुणा भाव रखने में है। खुद के विचारों से मोह रखना सभी कष्टों का मुख्य स्रोत है।

‘मैं अपनी गलती के लिए माफी चाहता हूं.......’, कहकर शुरू कीजिए। भले ही दूसरा व्यक्ति प्रतिक्रिया करे या न करे, बदले या न बदले। उसके लिए प्रेम और अच्छाई की भावना रखना और उसके लिए अच्छा चाहना क्षमा करने का अंतिम कदम है। सनद रहे माफी देना और चाहना एक-दो या आठ दिनों की बात नहीं है; यह जीवन में अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। जैन धर्म में इसका बहुत महत्त्व बताया गया है।

 

 

कैसे करें गलती स्वीकार?
अपनी गलती स्वीकार करना जीवन की एक सुन्दर कला है। बहुत कम लोग जानते हैं कि क्षमायाचना कैसे की जाए। उससे भी कम खेद को स्वीकार करने की कला जानते हैं। क्षमा मांगते और क्षमा करते समय कुछ मूल बातों का ध्यान रखकर इस प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है।
·         जितना जल्दी हो सके उतना। क्षमा मांगने में आप जितना ज्यादा इंतजार करेंगे, यह उतना ही मुश्किल हो जाएगा। अपने उस बर्ताव को लेकर स्पष्ट रहिए, जिसे लेकर आप माफी मांग रहे हैं।
·         जिससे क्षमा मांग रहे हैं, उसे उस घटना के बारे में और वर्तमान में अपनी भावनाओं के बारे में बताइए। कुछ इस तरह शुरू कीजिए ‘मैं शर्मिन्दा हूं कि मेरी लापरवाही से...........या मेरे अविवेक से..........
·         उसे बताइए कि यह आपका रोजमर्रा का व्यवहार नहीं है, कुछ गलतियों या गलतफहमियों से ऐसा हो गया है.........
·         किसी की गलती स्वीकार करते समय ऐसा कभी नहीं कहें कि मुझे खुशी है कि आखिर तुमने अपनी गलती मान ली या फिर समय-समय की बात है या फिर मैं अब भी चोटिल हूं या और कोई तीखा वाक्य जो तनाव बढाए।
·         यदि आप ईमानदारी से कह सकें तो कहें कि ‘कोई बात नहीं, नए सिरे से चलते हैं।’ या फिर कहें कि ‘मैं अपनी तरफ से भी क्षमा मांगता हूं।’

 

·        क्षमा एक ऐसी औषधि है, जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। यह उस जहर को खत्म कर देती है, जो प्रेम और सौहार्द को खत्म करता है।

 

·         माफी न देना शरीर के महत्त्वपूर्ण हार्मोन के उत्पादन को नष्ट कर देता है और संक्रमण, जीवाणुओं और अन्य शारीरिक परेशानियों जैसे हल्की मौसमी बीमारियों से लडने वाली हमारी कोशिकाओं को भी बाधा पहुंचाता है। माफी न देने से कई प्रकार के मानसिक विकार भी पैदा होते हैं। ऐसे व्यक्ति की रोग प्रतिरोधी क्षमता कमजोर हो जाती है.

 

·       गलती किससे नहीं होती? बहुत कम लोग गलती के लिए किसी से माफी मांग पाते हैं या फिर किसी को उससे हुई गलती के लिए माफ कर पाते हैं। अक्सर कहा जाता है कि गलती करना मानव स्वभाव है, जबकि क्षमा करना ईश्वरीय गुण। किसी को क्षमा कर देने से न सिर्फ उससे मिले कष्ट को भूलने में मदद मिलती है, बल्कि उस घटना से उबर कर वापस जीवन की मुख्य धारा के साथ जुडना आसान हो जाता है।