सोमवार, 15 अगस्त 2016

श्रावक साधुओं के मां-बाप या सांप ?



शास्त्र में श्रावकों को साधु के माता-पिता कहा है। श्रावक को मां-बाप जैसा भी कहा है और सांप जैसा भी कहा है। आप यदि मां-बाप बनो तो हमारा काम हो जाए। मां-बाप बनोगे? लेकिन जिनको अपने स्वयं के बच्चों का मां-बाप बनना नहीं आया, वे साधुओं के किस प्रकार बनेंगे? महाव्रतधारी के मां-बाप बनना क्या इतना सरल है? श्रावक मां-बाप जैसे बन जाएं तो तो साधुओं की सारी चिन्ता खत्म हो जाए; साधुओं के संयम की चिन्ता आपको होने लगे कि साधुओं के संयम में किस प्रकार वृद्धि हो, किस प्रकार टिके, किस प्रकार शुद्ध हो, कैसे फैले, ये सब चिन्ताएं श्रावक करें तो फिर बाकी क्या रहे?

व्यवहार में बेटा अच्छा कैसे बने, लाख के करोड कैसे करे, आलीशान गाड़ियों में कैसे घूमे; यह सारी चिन्ता मां-बाप को होती है न? इसी प्रकार साधुओं का संयम कैसे पले, कैसे बढे, कैसे जगत में उस संयम का फैलाव हो; यह चिन्ता श्रावक करे तो इसमें हमें आनन्द होगा या दुःख? मैं तो मांग करता हूं कि आप ऐसे मां-बाप बनें। आपने मां-बाप का फर्ज छोड दिया, उसी की यह परेशानी और चर्चा है। आपको यह बात महसूस होनी चाहिए।

आज साधुओं में शीथिलाचार आया कहां से? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? सांप अपने ही बच्चों को नष्ट कर देता है, श्रावक ही साधुओं को संयम से नीचे गिरने के साधन सुलभ कराते हैं। मां-बाप ही बच्चे की कमजोरियों पर पर्दा डालकर उसे बिगाडते हैं। ऐसे मां-बाप क्या वाकई अच्छे मां-बाप हैं जो अपनी औलादों को गलत रास्ते पर धकेल देते हैं? नहीं। आप अच्छे मां-बाप बनिए! -सूरिरामचन्द्र

रविवार, 14 अगस्त 2016

धर्म पर विपत्ति के समय कर्तव्य



कलिकालसर्वज्ञ, भगवान श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज फरमाते हैं कि ‘धर्म के नाश के समय, उत्तम क्रिया का लोप हो रहा हो या होने की संभावना लगती हो उस समय और स्व-सिद्धान्त यानी कि कोई गलत अर्थ अथवा अपना अर्थ थोपकर श्री जिनेश्वरदेव द्वारा प्ररूपित सिद्धान्त के अर्थ का अनर्थ करता हो, गलत व्याख्या करता हो; तब उसे रोकने के लिए बिना पूछे भी समर्थ आत्मा को अवश्य बोलना चाहिए।’

ऐसे समय बनावटी, दिखावटी और नाशक शान्ति के जाप नहीं जपे जाते। खोटी शान्ति और समता के पाठ पढकर तो वस्तु को गुमा देंगे। ऐसी खोटी समता-शान्ति का पाठ पढाने वाले कोई गुरु हों तो वे सुगुरु नहीं हैं। सन्मार्ग का लोप होता हो, तब श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा जैसे भी फरमाते हैं कि सामर्थ्यवान आत्मा बिना पूछे भी ऐसी प्रवृत्ति का निषेध करती है, विरोध करती है। ‘जो करेगा वो भरेगा’, तो आप क्या करोगे?

ऐसे प्रसंग के समय घर के कोने में दुबकने की बजाय मर-खपजाना श्रेयस्कर है। शासन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है। ज्ञानी फरमाते हैं कि सत्य का अनुरागी उत्तम क्रियाओं के लोप के समय गूंगा बनकर नहीं रहता है। जो शक्ति होते हुए भी मूक बनकर रहे, उसकी परिणाम स्वरूप आस्तिकता चली जाती है और उसमें नास्तिकता आ जाती है। आपकी सामर्थ्य न हो तो आपकी भावना और चिन्तन तो यही होना चाहिए कि कोई सामर्थ्यवान जागे, कोई उन्मार्गियों को रोके’। और कोई जागे तो आपको खुश होना चाहिए। ‘ऐसा कोई जागे तो अच्छा’, ऐसा हृदय में बार-बार होना चाहिए। सच्चा सन्मार्ग प्रेम तो यही है।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 13 अगस्त 2016

उन्मार्ग का उन्मूलन/सन्मार्ग का स्थापन

सत्य बातों को प्रकाशित करते हुए, खण्डन करने योग्य का खण्डन भी करना पडता है। इसके बिना सत्य का यथार्थ ज्ञान नहीं होता। चावल खाने हों तो धान (तुष सहित चावल) को खाण्डना ही पडता है। इसके लिए ऊखल और मूसल चाहिए। अपने में खाण्डने की शक्ति न हो तो मजदूर बुलवाने पडते हैं। कोई भी अनाज छिलके उखाडे बिना नहीं खाया जाता। आडे आने वाले आवरणों को हटाए बिना, आत्मा पर चिपके हुए कर्म और विरोधियों के विरूद्ध युद्ध किए बिना आराधना का सच्चा आनन्द, सच्चा स्वाद नहीं मिल सकता।
कस वाली किसी भी चीज के अन्तिम सत्व को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सब क्रियाएं करनी पडती हैं और कचरे को दूर करना पडता है। सच्चा दर्शन पाने के लिए, सब कुदर्शनों और दुनिया की सब अवास्तविक मान्यताओं का त्याग करना ही पडता है। खण्डन की बात आते ही कितने ही लोग मौन रहने को कहते हैं। पाप वाली भाषा न बोलना ही सच्चा मौन है और पाप के प्रतिकार के लिए बोलना, यह भी मौन ही है। उन्मार्ग के उन्मूलन बिना, सन्मार्ग की स्थापना शक्य ही नहीं है। उन्मार्ग के उन्मूलन में जैसे आवश्यक उग्रता चाहिए, वैसे सन्मार्ग की स्थापना में वास्तविक शान्ति चाहिए। अकेली ठंडक तो हिम जैसी है, उससे फसल जल जाती है, जबकि वर्षा में ठंडक और गर्मी दोनों हैं। इसीलिए वह फसल को पकाती है। उन्मार्ग का उन्मूलन कर के सन्मार्ग का स्थापन करने में दोनों चीजों की आवश्यकता रहती है।-सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

दुःख में दुःख और सुख में सुख मानना मूर्खता


यह संसार सुख-दुःख का मेला है। दुःख अधिक है, सुख थोडा है। इन दो के सिवाय संसार में और है ही क्या? ऐसे संसार के दुःख में दुःख मानना और सुख में सुख मानना मूर्खता है। इसके विपरीत, दुःख में जिन्होंने आनन्द माना वे ही मोक्ष में गए। सुख को जिन्होंने लात मारी वे ही त्यागी बन सके। पाप से प्राप्त दुःख में नाराजी और पुण्य से प्राप्त सुख में प्रसन्नता, इसी का नाम अविरति है। जगत को ‘अविरति’ का भान नहीं। यह बात जैन शासन में ही है। परन्तु, जैन भी आजकल ‘अविरति’ को नहीं समझते। आजकल इस संसार रूपी नक्कारखाने में अविरति की ही नौबत बज रही है, ऐसे में हमारी तूती कौन सुने? सुख के साधनों में मौज करने वाले, उसकी अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करने वाले और उसकी कमी के लिए खेद प्रकट करने वाले; सब अविरति में फंसे हुए हैं।
मिथ्यात्व कहता है कि ‘जहां तक मेरी अविरति आनन्द में है, वहां तक मुझे कोई चिन्ता नहीं। जब अविरति रोने लगती है, तब मुझे घबराहट होती है।’ कर्म के उदय से जीव को दुःख आने ही वाला है। उस समय कदाचित् ऐसे संयोग मिल जाएं कि उस पर दया करने वाला कोई न रहे। आज हजारों जानवर बिना किसी अपराध के काटे जा रहे हैं और किसी के पेट का पानी नहीं हिल रहा है। जानवरों के पाप का उदय भी ऐसा आया है कि वे काटे जा रहे हैं और उन पर दया करने वाला कोई नहीं है; आपके लिए भी दुःख के प्रसंग में ऐसा नहीं होगा, इस बात का क्या भरोसा है? इसलिए इस बात को गहराई से समझो और दुःख में दुःख व सुख में सुख मानना और वैसा व्यवहार करना छोडो। समभाव से रहो।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सुख का दुःख



आप दुनिया में जिस-जिस सुख की कल्पना करते हैं, उनमें से एक भी सुख ऐसा नहीं है, जिसमें दुःख रहा हुआ न हो। वह सुख अमुक काल से अधिक काल के लिए एकधारा में नहीं भोगा जा सकता। आपकी दृष्टि से मान लें कि खाने में सुख है, परन्तु क्या कोई दिनभर खाता रह सकता है? पीने में सुख है तो क्या बिना प्यास ही पानी पीते रहा जा सकता है? इसी तरह संसार का कोई भी सुख लीजिए, वह निरंतर नहीं भोगा जा सकता। साथ ही ऐसे सुख, दुःख के होने पर ही भोगे जा सकते हैं। भूख लगे बिना खाना क्या सुखरूप लगता है? तब आप भूख को दुःख ही कहेंगे न? प्यास को भी दुःख ही कहेंगे न? जितना भूख-प्यास का दुःख अधिक होता है, उतना ही खाने और शीतल जल पीने का सुख अधिक होता है। जो सुख स्वतंत्र नहीं होता, उस सुख की अनुभूति करने से पहले दुःख अवश्य होना चाहिए। ऐसे सुख को सुख मानना मूर्खतापूर्ण ही है।

भूख न लगे तो दवा लेने पहुंच जाते हो न? भूख दुःख है। यह दुःख न आए तो मरने का भय लगता है। खाते-खाते कभी ऐसा विचार आया क्या कि कर्म के अधीन होकर मैं कैसा रागी बन गया हूं कि जो सुख स्वतंत्र नहीं, उसका स्नेही बनकर, यदि दुःख न आए तो भी जी न सकूं, ऐसी मेरी दुर्दशा हो गई है। ऐसा विचार आए तो भूख ही न लगे, आहार की अपेक्षा ही न रहे। ऐसी दशा का विचार आए तो सच्चे सुख को पाने हेतु मोक्ष की मुसाफिरी करने का मनोरथ जागे। भौतिक सुख का यही एक बडा दुःख है कि उसमें सुख देने की स्वतंत्र शक्ति नहीं है। दुःख की मात्रा के अनुसार ही वह सुख देता है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 10 अगस्त 2016

शरीर और इन्द्रियों के प्रति कठोर बनिए



शरीर और इन्द्रियों के प्रति जब तक कठोरता का व्यवहार न किया जाए, तब तक कर्मों को धक्का लगता ही नहीं। शरीर को पंपोलने, शरीर की सार-संभाल करने और उसी की सेवा में लगा व्यक्ति वास्तविक धर्म कर ही नहीं सकता। शरीर की पूजा में से सब पाप पैदा होते हैं। भगवान की सच्ची पूजा करने की फुरसत शरीर के पुजारी को नहीं मिलती। आजकल शरीर की गंदगी दूर करने के लिए आत्मा में गंदगी भरी जा रही है, यह कैसी मूर्खता है। भगवान शरीर के प्रति कठोर थे, इसीलिए कर्मों के लिए कठोर बन सके। भगवान ने उपसर्गों और परीषहों को जिस प्रकार सहन किया, यह उक्त बात की साक्षी देता है।

शरीर कष्ट भोगने का साधन है या सुख भोगने का साधन? शरीर से सुख भोगने से संसार घटता है या समभाव पूर्वक कष्ट भोगने से संसार घटता है? जिस शरीर से सुख भोगा जा सकता था, उस शरीर से भगवान ने कष्ट ही सहन किए, यह बात आप जानते हैं न? ‘यह जन्म भोग के लिए है’, ऐसा मानने वालों ने दरअसल भगवान को माना ही नहीं है। ‘यह जन्म त्याग के लिए है’, ऐसा मानने वालों ने ही भगवान को सही रूप में माना है। संसार में लगभग सभी जीव सुख में सडने के लिए और दुःख में संतप्त होने के लिए सर्जित हैं। सुख के समय में इन जीवों में ऐसी सडान पैदा हो जाती है, जिसके कारण ये जीव दुःख में संतप्त होने के लिए चले जाते हैं। ऐसा क्रम चलता रहता है। दुःख से घबराकर भवोद्वेग पैदा हो, यह विराग नहीं है, यह तो दुःख पर द्वेष ही है। इसमें जागृति आए और सुख के प्रति विरक्ति पैदा हो तो बेडा पार हो जाए।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

आज की प्रगति भयानक अवगति का मूल



कर्म हरे, वह हरि। दुःख हरे, वह हरि नहीं। दुःख हरने की बात स्वार्थ से पैदा हुई है। कर्म हरने की बात परमार्थ से पैदा हुई है। ऐसा अर्थ जैनेत्तर को समझाने पर यदि वह योग्य है तो खुश-खुश हो उठता है। इस संसार में सुख एक ऐसा पदार्थ है, जो सब जीवों को अच्छा लगता है और फिर विचित्रता यह है कि यह सुख ही जीव को दुःख दिलवाता है। जगत को सुखमय संसार पाने की आदत है और जैन को सुखमय संसार छोडने की आदत होती है। धर्म से मिलने वाली संसार की छोटी से छोटी चीज भी अच्छी या उपयोग करने योग्य जिसे न लगे, वह धर्मी और ‘धर्म से प्राप्त वस्तुओं को भोगने में क्या दोष’, ऐसा जिसे लगे, वह मिथ्यादृष्टि। श्रीमन्तों की बात छोड दें, मध्यम वर्ग के लोग भी यदि अपने घरों से बेकार का कचरा निकाल फेंके, जरूरी वस्तुओं से ही जीने का संकल्प करें तो आज के बहुत से दुःख भाग जाएं। श्रीमन्ताई की हमारी व्याख्या अलग ही है। श्रीमन्ताई जिसके पीछे फिरे वह श्रीमन्त। श्रीमन्ताई के पीछे जो फिरे वह भिखारी। आज के वादों का सच्चा लक्षण ही कोई नहीं बतलाता और खूबी यह है कि वादों के अग्रगण्य सब पूँजीवादी ही हैं। स्वयं मौज उडाकर लोगों को वाद और वादों के चक्कर में डालते हैं। जब श्रीमन्त सच्चे अर्थों में श्रीमन्त थे, तब आज के एक भी वाद और वादे का जन्म ही नहीं हुआ था, सिवाय अध्यात्मवाद के। आज ज्ञाति-जाति और कुटुम्ब की सब अच्छी रीतियों का नाश कर दिया गया है और पापमय कानूनों का ढेर लगा दिया गया। परन्तु, यह मंच एक दिन टूट पडनेवाला है। आज की प्रगति भयानक अवगति का मूल है। इसे जितना जल्द समझ लें, उतना ठीक है।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

धर्म के प्रति समझ पैदा करो



सुख का अर्थी जीव पाप करने में कांपता है। क्योंकि वह जानता है कि ‘मुझे चाहिए तो सुख और मैं कर रहा हूं पाप, तो मुझे सुख कहां से नसीब होगा और दुःख आने से कैसे रुकेगा?’ आपकी संतान धर्म को न जाने, इसका आपको दुःख नहीं; आप स्वयं भी धर्म को नहीं समझ पाए, इसका भी आपको दुःख नहीं और ऐसे लोग यहां श्रद्धालु समझे जाते हैं। ऐसे श्रद्धालुओं को हमें धर्म सुनाना पडता है, यह क्या कम दुर्भाग्य का विषय है?

आप भगवान को नहीं पहचानते, इसलिए भगवान की फजीहत करवा रहे हैं। जिन्हें साक्षात् भगवान मिले थे, वे भी भगवान को नहीं पहचान पाए तो भव में भटके। हमें तो भगवान साक्षात् मिले नहीं, उनके शास्त्रों के आधार से ही हमें तिरना है। लेकिन, आपने यह नहीं समझने का निर्णय किया है, अतः हमें बहुत समझाने की इच्छा नहीं होती। आपको सुखी बनाने की अपेक्षा समझदार बनाने के लिए हमारा प्रयास है। सुखी लोग हमको भी संसार में खींच लेते हैं, जबकि समझदार हमारी रक्षा करते हैं। मोह आपसे बहुत मजदूरी करवाता है और उसकी कदर भी नहीं करता। मोह अपनी इच्छानुसार सब काम कराकर आपको नरक-तिर्यंच गति में धकेल देता है; तो भी आपकी दृष्टि नहीं खुलती। समझदार वह है जो दुनिया की बातों को कर्म पर छोडता है और धर्म की बात में पुरुषार्थ को आगे करता है। इस जन्म में धर्म की बात में समझ-विवेक प्राप्त करना बडे से बडा धर्म है। आज तक समझ रहित धर्म बहुत किया, इसलिए आज तक संसार में लटकते रहे। इसलिए धर्म के प्रति समझ पैदा करो। धर्म की सच्ची समझ पैदा हो गई तो भविष्य में कल्याण हो सकेगा।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 7 अगस्त 2016

सुख कैसे मिले, दुःख कैसे टले ?



आप दिन भर जो मेहनत-मजदूरी करते हैं, उसका कोई टाइम-टेबल बनाते हैं क्या? आप स्वयं-स्फूर्त सोना, उठना, खाना, पीना, शोच आदि नित्यकर्म करते हैं, क्योंकि यह सब आपके वर्तमान शरीर की जरूरतें हैं और आत्मा की जरूरत के लिए? जन्म से लेकर पूरे बचपन और तरुणावस्था तक माता का मुँह ताकते रहना, जवानी में पत्नी का मुँह ताकते रहना और बुढापे में लडकों का मुँह ताकते रहना ही है तो फिर आत्मा की तरफ अपनी दृष्टि कब गुमाओगे? बाल्यकाल नासमझी और मूर्खताभरी क्रीडाओं में बीत जाए, यौवन विषयों की परवशता में बीत जाए और वृद्धत्व कच-कच में पूरा हो जाए तो आत्मा का साधन किस काल में होगा?

यहां मरे इसका अर्थ सब कुछ समाप्त होना नहीं है और यहां के नाते-रिश्तेदार या धन-दौलत, साधन-सुविधाएं भी साथ आने वाले नहीं हैं। मरने के बाद आत्मा अन्य स्थान में जाता है, स्थान-परिवर्तन होता है, परन्तु कर्म तो बने रहते हैं। कर्म साथ रहते हैं, तो दुःख बना रहता है। अतः प्रयत्न यह करना चाहिए कि आत्मा कर्म-रहित बने। यह ध्येय निश्चित कर लो। इसके बाद छोटी-सी भी धर्मक्रिया आपको सच्चे सुख की सच्ची दिशा में आगे बढने में सहायक बनेगी।

आज की दुनिया की एक मात्र इच्छा यही है कि सुख मिले और दुःख टले। प्राणी मात्र की प्रवृत्ति भी सुख पाने की और दुःख टालने की है। तथापि यह सत्य है कि दुनिया दुःखी है। ऐसा क्यों? कहना होगा कि मूल में भूल है। सुख-दुःख की सच्ची समझ ही नहीं है। सच्चे सुख की समझ आ जाए और इसे पाने का ध्येय निश्चित हो जाए तो सुख मिले बिना न रहे और दुःख टले बिना न रहे।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 6 अगस्त 2016

भिखारियों की तरह मत बनो



यदि आप थोडा-सा भी समझदार बनकर सोचें तो आपको अपनी वर्तमान स्थिति में तो अत्यंत सरलता से निर्वेद उत्पन्न हो सकता है। सुख मनचाही वस्तु होने से सुख के समय में निर्वेद उत्पन्न होने जैसा विचार आना थोडा कठिन है, परन्तु दुःख जैसी अनचाही वस्तु के समय तो निर्वेद उत्पन्न होने जैसा विचार आना अत्यंत सरल होता है। परन्तु भिखारी जिस तरह केवल एक टुकडा रोटी का प्राप्त करने पर भी प्रसन्न हो जाता है, उसी तरह दुःख अधिक हो और सुख अल्प एवं तुच्छ हो तो भी उतने से ही प्रसन्न होने वाले अधिक होते हैं।

भिखारी यह नहीं देखता कि उसे एक रोटी के टुकडे के लिए कितनी अनुनय-विनय करनी पडी है। वह तो केवल इतना ही देखता है कि उसे रोटी का टुकडा प्राप्त हो गया और उसे प्राप्त कर वह इतनी प्रसन्नता अनुभव करता है कि घडी भर के लिए तो वह अन्य सभी कष्टों को भूल-सा जाता है। जिसकी संसार के सुखों के संबंध में ऐसी मनोदशा हो, उसे निर्वेद उत्पन्न होने जैसा विचार आए भी कैसे? बाकी तो आप यदि प्राचीन काल के पुण्यशालियों के सुख का वर्णन सुनो और उनके सुख की आपके वर्तमान सुख से तुलना करो तो भी आपका अपने सुख का सारा आनंद हवा हो जाए और आपकी इच्छा संसार-सुख त्याग कर मोक्ष-सुख प्राप्त करने की हो जाए।

ये सब निमित्त हैं, परन्तु आप में उस प्रकार की योग्यता हो अथवा आप में ऐसी योग्यता आए तो ही ये निमित्त आपको वैराग्य की ओर प्रेरित करने वाले और वैराग्य होने पर आपको धर्माराधक बनाने में सहायक सिद्ध होंगे।-सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

धर्म बिना की आधुनिक शिक्षा विनाशक है



आत्म-शुद्धि के विचार और उस विषयक बात करने से पूर्व आत्मा का खयाल न हो तो क्या हो? आपको यदि किसी भी तरह अपना और अपनी संतान का कल्याण करना हो, उनका उद्धार करना हो तो सर्व प्रथम मनुष्यत्व प्राप्त करना होगा। मनुष्यत्व आने के पश्चात यह निश्चित होगा कि ‘मैं विश्व का रक्षक हूं, भक्षक नहीं; सहायक हूं, विनाशक नहीं और परमार्थ के लिए वचनबद्ध हूं।’ प्राचीन समय में सब कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने वाले के लिए भी जब तक वह धर्म-कला से अनभिज्ञ होता, तब तक उसकी सारी कलाएं व्यर्थ मानी जाती थी। धर्म के बिना सारा ज्ञान, विवेकहीन गुणों के समान होता है। शरीर अत्यंत सुन्दर हो, परन्तु नाक न हो; वैसे ही धर्म के बिना का ज्ञान है।

सब जानता हो, परन्तु ‘आत्मा क्या है और आत्म-सुख के साधन कौनसे हैं’, यह नहीं जानता हो, तब तक समस्त ज्ञान निष्फल है, विनाशक है। धर्म-कला पर ही समस्त कलाओं की सफलता अवलम्बित है। उसके बिना समस्त कलाएं निष्फल हैं। धर्म के बिना सारा ज्ञान अधूरा और विनाश की ओर ले जाने वाला है। आज जो धांधली और शोरगुल हो रहा है, जो विनाशक-विकास हो रहा है, जो उत्पात और हिंसा का विभत्स ताण्डव दिखाई दे रहा है; उसका सबसे बडा कारण धार्मिक-शिक्षण का अभाव है। बडे भारी डिग्रीधारी बन गए, पदवी प्राप्त कर ली, लेकिन उनकी इंसानियत मर गई, मनुष्यता मर गई, जीने का सलीका नहीं आया; कारण कि धार्मिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, पुण्य-पाप आदि तत्त्व नहीं समझे, हेय-ज्ञेय-उपादेय को नहीं समझा तो विवेक कहां से आएगा, उदय कैसे संभव है, कल्याण कैसे होगा? -सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

धोखेबाजों से सावधान



‘धर्म के नाम पर आज जो त्याग की बातें चल रही हैं, वे अनावश्यक हैं।’ इस तरह की बातों का आज स्थान-स्थान पर प्रचार हो रहा है। ‘बीसवीं शताब्दी में त्याग की बातें करना मूर्खता है। त्याग की क्या आवश्यकता है?’ इस तरह कहने वालों को सच्चे उपकारियों का आदेश समझने के साथ-साथ मैं कहना चाहता हूं कि ‘जिसे सुख से जीना हो, उसे त्याग की भावना हृदय में अपनाए बिना चलेगा ही नहीं।’ वर्तमान समय प्राचीन काल से भयंकर है। प्राचीन समय में जो धार्मिक बंधन थे, उनमें इस समय अनेक गुनी वृद्धि करने की आवश्यकता है, क्योंकि दम्भ, अहंकार में वृद्धि होती जा रही है। आज जो शठ हैं, वे अपने आपको सेठ लिखवाते हैं। मनुष्यत्व नहीं है फिर भी मनुष्य के रूप में प्रकाश में आने हेतु प्रयासरत हैं।

उदारता का नाम नहीं, फिर भी दानवीर की उपाधि लेने वाले अनेक हैं। ‘आते हैं पूर्व से और भागते हैं पश्चिम में’, ऐसे कायर भी वीरता का दम्भ बताकर हर्ष से घूम सकते हैं। तिजोरी खाली है, फिर भी लाल पगडी बांधकर आज अनेक व्यक्ति मोटरों में फिरते हैं। प्राचीन समय में जितना धन पास में होता था, उसमें से भी थोडा घर में रखकर ही व्यापार करते थे; जबकि आज तो पांच रुपये हों तो पचास का व्यापार करते हैं, क्योंकि उनके भाव भिन्न हैं। कमा गए तो ठीक है और हानि हो जाए तो पगडी ही उल्टी फिरानी है, इस तरह की मनोवृत्ति हो गई है। वे समाज के साथ-साथ स्वयं की आत्मा को भी धोखा दे रहे हैं। ऐसों के सामने आत्म-शुद्धि के उपाय रखने में भी खतरा है। ऐसे लोग अपने दोष छिपाने के लिए आत्म-शुद्धि के उपायों और धर्म को भी कलंकित कर सकते हैं। इसलिए बहुत सावधानी रखनी है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 3 अगस्त 2016

धर्म में सहायक कौन?



धर्म में सहायक कौन? अनुकूलता या प्रतिकूलता? इन दो परिस्थितियों में से कौनसी परिस्थिति जीवन में धर्म के लिए सहायक है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि निश्चय नय की दृष्टि से धर्म करने के लिए न तो अनुकूलता सहायक है और न ही प्रतिकूलता। केवल जीव के अध्यवसाय, उसकी भावना और विवेकयुक्त अहिंसक क्रिया ही सहायक होते हैं, यह निश्चय नय का उत्तर है।

व्यवहार नय कहता है कि योग्य जीव के लिए अनुकूलता अधिक सहायक कही जा सकती है। यदि जीव सत्वहीन है तो प्रतिकूलता में किसी समय कठिनाइयां पैदा हो जाती हैं, इसलिए ऐसे व्यक्तियों के लिए अनुकूलता को धर्म में सहायक कहा जा सकता है। अनुकूलता हो तो ही धर्म हो सकता है, यदि ऐसा हो तो धर्म के लिए अनुकूलता चाहने वाला क्षम्य है। उनमें प्रतिकूलताओं का सामना करने का माद्दा नहीं होता। ऐसे लोग प्रतिकूलता आने पर धर्म करने से पीछे हट जाते हैं।

अन्यथा जिसे धर्म करना है, वह जीव तो धर्म करेगा ही चाहे अनुकूलता हो या प्रतिकूलता। भूतकाल के महापुरुषों ने तो प्रतिकूलता में अधिक से अधिक और अच्छे में अच्छा धर्म किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने तो अनुकूलता को ठोकर मारी है। जिसे साधुपना पालना है, उसे अनुकूलता छोडनी होगी और प्रतिकूलता को अपनाना होगा, तभी साधुपने में सच्चा स्वाद आएगा। साधु तो अनुकूलता का वैरी होता है। वह जितनी अनुकूलता लेने जाता है, उतने ही दोषों की वृद्धि होती है। ज्यों-ज्यों दोष बढते हैं, त्यों-त्यों पाप बढता जाता है और वह धीरे-धीरे साधुत्व से स्खलित होने लगता है। अतः साधु में तो प्रतिकूलता में संयम-पालन की शक्ति होनी ही चाहिए।-सूरिरामचन्द्र

जर-जमीन-जोरू के मोह से निकलो



जर, जमीन एवं जोरू का मोह शान्त होना कठिन है। इन तीनों वस्तुओं का मोह छूट जाए तो-तो तीर्थ की स्थापना हो जाती है। इनकी ममता न हो तो मार-काट भी न हो, इन्हीं का सब वैर-विरोध है। इनके फंदे में फंसने पर निकलना कठिन है। लेकिन, जो इनके फंदे से निकल जाता है, वह तिर जाता है। हमारी भावना पीडा देने की नहीं है। हमारी भावना तो सबको संसार से निकालने की है। या तो पूरी तरह निकलो या आधे रूप में निकलो। आधे रूप में भी निकलो तो इस भावना से निकलो कि हमें पूरी तरह निकलना है। तूफान उठेगा, पर घबराना नहीं है। हमारी भावना एवं ध्येय सच्चा है। हमारे नायक तो देवाधिदेव हैं। उन देवाधिदेव की आज्ञा का आधार है। हमारी भावना आपको संसार से निकालकर मुक्ति नगरी की ओर भेजने की है। इच्छा और भावना उत्तम है तो फिर शोरगुल से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परिणाम तो उत्तम ही होगा। जिस वस्तु का परिणाम उत्तम हो, वह वस्तु यदि कडवी भी हो तो भी घोलकर पी लेनी चाहिए। उकाला यदि रक्त-शोधक है तो कडवा होने पर भी पी लेना चाहिए।

कडवा होने के कारण सिर के बाल उखड जाएं पर ज्वर अवश्य उतर जाएगा। आपके भी सिर के बाल उखड जाएं तो संसार के प्रति राग तो घट जाएगा न? जब आग लगी हो तो जल के पम्प प्रारम्भ करने ही पडते हैं, तब आग बुझेगी। सामने वाले को आग से भी बचाना है और आग की कालिमा भी न लगे, यह भी ध्यान रखना है। हम में भी यदि कालिमा आ गई तो हमारे डूबने के लिए भी खड्डे तैयार हैं, यह निश्चित बात है, इसमें तनिक भी शंका नहीं है।-सूरिरामचन्द्र

सोमवार, 1 अगस्त 2016

मन व इन्द्रियों को साधो



मन-शुद्धि और मन की शान्ति तभी आ सकती है, जब आत्मा में भविष्य के लिए चिन्ता जागृत हो और विवेक पूर्वक आगे-पीछे का हम विचार कर सकें। जीवन को सार्थक करने के लिए हमें अपने मन में उठने वाली अनुचित एवं नकारात्मक, विनाशक तरंगों, इच्छाओं और अनुचित तृष्णाओं को दबा देना चाहिए। विषय-वासनाओं में लीन पांचों इन्द्रियों पर अंकुश लगाना चाहिए और उनके कारण जो पाप हो रहा है, उससे बचकर इस जीवन को सुन्दर बनाना चाहिए। ऐसा करने से आप झूठ, चोरी, अनाचार और लोभ के वशीभूत होकर किसी भी प्राणी को दुःखी करना नहीं चाहेंगे और इस प्रकार की उत्तम नीति यदि जीवन में उतारोगे तो इस लोक में उच्च कोटि की उत्तम आत्म-शान्ति अनुभव करते हुए, जहां जाओगे वहां भी अनुकूल स्थिति और सामग्री प्राप्त करके, उन्नतगामी बनकर आधि, व्याधि और उपाधि से मुक्त होकर जैसा सुख चाहते हो वैसा प्राप्त कर सकोगे। उस सुख को प्राप्त करने की स्थिति में आप पहुंच सकें, तभी आपका जीवन सार्थक होगा।

हमें मन की इच्छा के आधीन नहीं होना है, अपितु उसे अपनी इच्छा के आधीन बनाना है। मन जो कुछ मांगे, वह उसे नहीं देना है, बल्कि हम जो उसे देना चाहें, वही उसे देना है। मन पर अंकुश रखने के लिए उसे तृष्णा से सदा दूर रखना चाहिए। जो-जो बुरी इच्छाएं हैं, उन्हें पूरी नहीं करना चाहिए और अच्छी इच्छाओं को पूरा करने का प्रबल पयत्न करना चाहिए। केवल साधुओं को ही नहीं, गृहस्थियों को भी सुखी होना हो तो उन्हें अपने मन पर अंकुश रखना चाहिए। मन और इन्द्रियों को नहीं साधा तो चौरासी लाख जीव-योनियों में ही भटकते रहना पडेगा।-सूरिरामचन्द्र