मंगलवार, 23 मई 2017

दुःख में धर्म से दूर न हों

दुःख में भी धर्म को दूर करने की भूल न करें। वर्तमान की तो स्थिति ही भिन्न है। गरीबों में से कितने ही इस प्रकार कहने वाले भी हो गए हैं कि ‘खाने की मुसीबत है तो धर्म किस प्रकार किया जाए?’ धर्म तो समृद्धिवान् करें। जबकि श्रीमन्तों में से कितने ही कहते हैं कि ‘हमको धर्म करने का अवकाश नहीं है। धर्म को बेकार आदमी ही करे।’ अर्थात् समान ही योग मिला है। समृद्धि के समय धर्म को कोई ज्ञानी समझदार आदमी ही करे, जबकि दुःख में तो धर्म करने के प्रेरणात्मक कारण भी हैं। किन्तु, आज तो स्वच्छन्द रूप से अज्ञानपूर्ण लिख कर पापात्माओं ने ऐसे संस्कार फैलाए हैं कि ‘जब तक खाने को रोटी न मिले, तब तक नवकार कहां से गिना जाए?’ कुछ वर्ष पहले तक चाहे जैसे दुःखी के मुँह से भी ऐसे शब्द नहीं निकलते थे। अरे! ऐसी स्थिति हो कि लडका पेट भरने लायक भी न कमाता हो, मां मजदूरी करती हो और बहिन भी बाहर का काम करती हो, तब तीनों जनें रोटी खाएं, तो भी इस मुश्किल के समय ‘धर्म नहीं होता’, ऐसा नहीं बोलते थे। आज के स्वच्छन्दी धर्महीन तो खुलेआम यह लिखते हैं और बोलते हैं कि ‘पेट में खाने की मुसीबत हो तो फिर धर्म कहां से होगा?’ आज के तथाकथित सुधारकों ने उपकार के नाम से इस प्रकार अपकार किया है। वे लोग इतना भी विचार नहीं करते हैं कि ‘कंठ पर्यन्त रोटी हो उसको भी धर्म कहां याद आता है?’
धर्म की उपादेयता समझने वाले तो रोटी मिलने की मुसीबत में से भी समय बचाकर धर्म करते हैं। स्वयं की वर्तमान में पडती मुसीबत को पूर्वकृत पापोदय समझते हैं। धर्मी को धर्म साधना में अनुकूल सामग्री मिले, ऐसी इच्छा हो, यह बात भिन्न है। परन्तु प्रतिकूल दशा में तो धर्म को लात मारने की, छोड देने की, धर्म से दूर रहने की तो इच्छा भी नहीं होनी चाहिए। आज जितने धर्म करते हैं, उन सब को रोटी प्राप्त करनी भी मुश्किल है, ऐसा? मात्र पेट भरने के लिए ही मेहनत करते हुए उनका समय बीत जाता है, ऐसा? सच्ची बात तो यह है कि आज पेट के भूख की अपेक्षा भी मन की भूख बढ गई है। मौज-मजा चाहिए, शौक चाहिए, व्यसनों की अधीनता चाहिए। ऐसे अनेक स्वच्छन्दाचारियों ने आज बेकारी को बढा दिया है। आवश्यक संयमशीलता हो, तो पेट पूरा भरने के बाद भी धर्म करने की इच्छा हो न?

आज तो धर्म करना ही नहीं है और धर्म तथा धर्मी की निन्दा करने के लिए रोटी का बहाना आगे रखते हैं। रोटी की ही भूख होने से, धर्म करने से रुकने वाले मेरे देखने में अभी तक नहीं आए हैं और रोटी के ऊपर बहुत सामग्री प्राप्त होने के बाद भी धर्म नहीं करने वाले ऐसे सैंकडों आदमी मेरे देखने में आए हैं। पेट के नाम से धर्म विरोध को पोषण दिया जाता है, इससे खूब ही सावचेत रहना चाहिए।-सूरिरामचन्द्र

सोमवार, 22 मई 2017

अपने दोष छिपाने के लिए दूसरे की निंदा

इस दुनिया में स्वयं के बचाव के खातिर, स्वयं के दुष्कर्म को ढँकने के खातिर, स्वयं के पाप को छुपाने की खातिर, ऊॅंची कोटि के महात्माओं को भी कल्पित रीति से कलंकित करने वाले कहां नहीं होते। आज तो अधिकांशतः यह दशा हो गई है कि स्वयं के दोष देखते नहीं और दूसरों के दोष खोजे अथवा कल्पित किए बिना रहना नहीं।
पिता और पुत्र के मध्य में कोई, जो पुत्र को शिक्षा देने जाए तो पुत्र पिता के कल्पित दोषों को भी गाने लग जाता है। और जो पिता को शिक्षा देने के लिए कोई जाए तो वह पुत्र के कल्पित दोषों को भी गाने लग जाता है। कारण कि दोनों को स्वयं के दोष छिपाने हैं। इस प्रकार का आज पति-पत्नी के बीच में, भाई-भाई के बीच में, माता-पुत्री के बीच में, मित्र-मित्र के बीच में, सगे-संबंधियों के बीच में प्रायः सर्वत्र कमोबेश प्रमाण में चल रहा है। राजनीति का तो मानो यह अविभाज्य अंग हो गया है.
इस दशा में धर्म के द्रोही सुसाधुओं के ऊपर भी कल्पित कलंक चढाते हैं, ईमानदार लोगों पर भी कलंक लगाकर उन्हें बदनाम करने की साजिश रचें तो इसमें आश्चर्य क्या है..? घर से और बाहर से अधिकांश भाग में उनको ऐसा ही शिक्षण मिला है कि स्वयं के दोष छिपाने के लिए अथवा किसी भी प्रकार का स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पराए व्यक्ति पर कल्पित दोषारोपण करना। आज कितनी ही बार कुशिष्य भी क्या करते हैं...? स्वयं उद्दण्ड बनकर गुरु की आज्ञा में न रहते हों, किन्तु कोई पूछे तो स्वयं खराब न कहलाने की दृष्टि से, वे गुरु पर भी कल्पित दोष लगाते हैं...। कितने ही पतित भी ऐसा धंधा करते रहते हैं। स्वयं पतित हुआ है, किन्तु निन्दा दूसरे साधुओं की और गुरु की करते हैं। ‘साधु और गुरु खराब थे, इसीलिए मुझे साधुपना छोडना पडा’, ऐसा कहने वाले पतित भी हैं...।
ऐसे स्वयं के बचाव के लिए कीर्ति की तुच्छ अभिलाषा के अधीन बनकर, पूर्णतया सच्ची भी अपकीर्ति से डरकर स्वयं के उपकारियों पर पूर्णतः झूठे आरोप-कलंक डालते हुए भी वे घबराते नहीं हैं। स्वयं के पतन को युक्तियुक्त बताने के लिए कल्याणकारी मार्ग की निन्दा करने वाले भी हैं। इससे भी खराब वस्तु तो यह है कि ऐसों के ऐसी पूर्णतः दाम्भिक और झूठी बातों को ताली बजाकर बिरदाने वाले पीठ थपथपाने वाले भी मिले रहते हैं। इसके पीछे ईर्ष्या एक बहुत बडा कारण है।

स्वयं का क्षुद्र स्वार्थ-साधन करने के लिए सामने वाले का कितना नुकसान होगा, धर्म की कितनी हानि होगी, यह देखने की या विचारने की बुद्धि उन स्वार्थियों के पास नहीं होती है। वैसे स्वार्थी स्वयं के भविष्य का भी विवेक पूर्वक विचार नहीं कर सकते। उनकी दृष्टि मात्र इस लोक के, दुनिया के स्वार्थ पर ही टिकी रहती है। ऐसी स्वार्थ-परायणता इस आर्यदेश में भी दिन-प्रतिदिन बढती जाती है और इससे सच्चरित्र को और सद्विचारों को देशनिकाला मिलता जा रहा है।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 21 मई 2017

सच्चा धर्म-प्रेमी

अज्ञानी आत्माएं पाखण्डी एवं स्वार्थी मनुष्यों के जाल में फंसने के कारण महान भयानक पाप को भी धर्म मान लेती है और धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के हिंसादि घृणित कार्य प्रारम्भ करती है। ऐसे मनुष्यों को यदि पाप-मार्ग से कोई उबारना चाहे और सत्य का ज्ञान कराना चाहे तो वह भी उन पापात्माओं से सहन नहीं होता। सत्य का ज्ञान कराने के लिए उपकारी पुरुष कठोर शब्दों का प्रयोग भी करते हैं और उसके लिए उन्हें अनेक कष्ट सहन करने पडते हैं।
सच्चा धर्म-प्रेमी मनुष्य धर्म की रक्षा के लिए अपनी ताकत का उपयोग करने में लेशमात्र भी प्रमाद अथवा उपेक्षा नहीं करता और उसी में उसके धर्म-प्रेम की कसौटी होती है। जिन्हें धर्म के प्रति प्रेम नहीं है वे तो बात-बात में यह कह देते हैं कि ‘होगा, करेगा वह भोगेगा, हम क्यों व्यर्थ समय नष्ट करें?’ ‘चलने दो’ अपने को क्या करना है, ऐसे मंद विचारों और लापरवाही से समाज सड जाता है और फिर सडे हुए समाज में हृदय को हर्ष या तृप्ति न मिलने से छोटा समाज निचोवाता (शोषित होता हुआ) चला जाता है। खेत के पाक को पूर्ण रीति से फलने देने के लिए पास ही उत्पन्न हुए कचरे का नाश करना ही चाहिए। ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भगवान की अथवा भगवान के मार्ग की आशातना को रोकने का प्रयत्न नहीं करने वाले और स्वयं के कार्य में ही रुचि लेने वाले धर्म के सच्चे प्रेमी नहीं हैं। धर्म का सच्चा प्रेमी तो ऐसे समय पर शान्त बैठा रह ही नहीं सकता।
केवल बातें करने वाले लोग धर्म की आराधना नहीं कर सकते। धर्म तो हमारे रोम-रोम में व्याप्त होना चाहिए। ज्ञानियों के एक-एक वचन के लिए सर्वस्व समर्पित करने की उत्कंठा हम में बलवती होनी चाहिए। इसके बिना योग्य आलंबनों का उचित लाभ नहीं लिया जा सकता। यदि उत्तम संगति प्राप्त होने पर भी आवश्यक सद्भावना की हृदय में उत्पत्ति न हो, तो हमारा महान् दुर्भाग्य ही माना जाएगा।
संसार में ख्याति प्राप्त करने के लिए अथवा किसी अन्य सांसारिक स्वार्थ के लिए जो लोग सत्य आदि धर्म के उपासक बने हों, वे सत्य आदि धर्म को हानि ही पहुंचाते हैं। उनका ज्ञान अज्ञान के समान, उनका संयम असंयम के समान और उनकी अहिंसा हिंसा के समान ही कार्य करती है।

जिससे धर्म दौडा हुआ हमारे पास आए, वही शिक्षा है, वही ज्ञान है। जो शिक्षा हमें धर्म से विपरीत ले जाए, ज्ञानी और उनके वचन की हंसी कराए, ज्ञानियों द्वारा कथित अनुष्ठानों की खुले बाजार में मजाक हो, उस ज्ञान के, उस शिक्षा के हम शतप्रतिशत खिलाफ हैं। मृत्यु पर्यन्त उसका विरोध करने की हमारी भावना रहेगी और आगामी भव में भी हम ऐसी गलत शिक्षा के विरोधी बनें, ऐसा नियाणा है, क्योंकि उसका विरोध करने में प्राणी-मात्र का श्रेय समाविष्ट है।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 20 मई 2017

धर्मी की समझ उसे सतत जागृत रखती है

यह संसार बहुत लम्बा-चौडा है। दुनिया बिना पैसे वालों पर दया खाती है, परन्तु मुझे पैसे वालों पर दया आती है कि उनकी क्या दशा होगी?
सुख के लोभ से आज कुछ कम खराबियां पैदा नहीं हुई है। बडे गिने जाने वाले लोग आज पैसे के पीछे मरने-मारने को तैयार हैं और पैसे से वे खरीदे जा सकते हैं। यह है उनकी स्थिति!
दुःख को सहन करना सीखना भी धर्म है। दुःख को निकालने का प्रयास करने से दुःख जाता नहीं है। कदाचित् चला जाए तो वापस आएगा ही। लेनदार आए और उसे आप धकेल दो तो भी वह पांचवें दिन फिर आएगा ही। शक्ति वाला तो देना चुकाकर ही उसे वापस भेजता है, जिससे दुबारा उसका मुंह न देखना पडे। इसी तरह शक्ति हो तो दुःख को सहन कर ही लेना चाहिए।
सुख आशीर्वाद नहीं, वह तो अभिशाप है। कर्मराजा जिसे दुर्गति में डालकर दुःखी करना चाहता है, उसे वह पहले सुख में सुला देता है।
शक्ति होने पर भी दुःख सहन न करना और सुख की सामग्री मिले तो आवश्यकता न होने पर भी उसका उपयोग करना, इतना ही नहीं; अपितु पाप करके भी उस सामग्री को प्राप्त करना, ऐसी स्थिति में धर्म हममें प्रवेश कैसे कर सकता है?
कर्म आज्ञा दे, तब धर्म करने की बात करने वाले कायर लोग कभी धर्म का आचरण नहीं कर सकते। समझदार वह है जो दुनिया की बातें कर्म पर छोडता है और धर्म की बात में पुरुषार्थ को आगे करता है। इस जन्म में धर्म की बात में समझ (विवेक) प्राप्त करना बडे से बडा धर्म है। कर्म संसार में भटकाने वाला है और धर्म संसार से तारने वाला है।

समझ ऐसी चीज है कि यदि उसे निकाली न जाए तो वह सतत साथ में बनी रहती है। व्यापार नुकसान में चल रहा हो तो व्यापारी के मन में सतत यह बात चलती रहती है कि व्यापार नुकसान में चल रहा है। भले ही वह यह बात मुँह पर नहीं लाता और सदा की तरह प्रवृत्ति करता रहता है, परन्तु हृदय में तो सतत चिन्ता चालू रहती है। इसी तरह सुख में या दुःख में धर्मी की समझ उसे सतत जागृत रखती है। धर्मी जीवन के हर व्यवहार में धर्म को आगे रखता है और सारे व्यवहार इस विवेक के साथ करता है कि उसके धर्म पर कहीं कोई आँच नहीं आए।-सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 19 मई 2017

महात्मा कौन?

इस संसार में सुख नाम का एक ऐसा कसाई है, जो अपनी शरण में आए हुए व्यक्ति से अनेक पाप करवाकर उसे नरकादि में धकेल देता है। संसारी सुख एक ऐसा शत्रु है, जो व्यक्ति का स्वागत करके उसको दुःख के गर्त में पटक देता है। वैसे ऊपरी तौर पर देखने से पुण्य अच्छा प्रतीत होता है, परन्तु सुख के लिए बांधा गया पुण्य बहुत खराब है।
संसार में जो सुख हैं, वही आपको संसार में भटकाते रहते हैं। धर्म करने वालों के लिए यह आधारभूत ज्ञान है। आपका पुण्य आज आपको पाप में ही प्रायः सहायक बन रहा है। इसीलिए तो आज आप घर में या बंगलों में आराम से बैठे हैं। यदि ऐसा न होता तो आज के अधिकांश लोगों का स्थान जेल में होता। आपके कर्म से सत्ता भी ऐसी है कि जो अयोग्य की ही सहायता करती है; अच्छे और प्रामाणिक लोग तो आज पिसा रहे हैं।
आपको देव, गुरु, धर्म का योग मिलने पर भी आज आपकी दशा ऐसी है कि आप अधिकांश में योगवंचक, क्रियावंचक और फलवंचक बने हुए हैं। आप देव, गुरु, धर्म के आसपास चक्कर लगाते हैं, परन्तु यह संसार बढाने के लिए या संसार की ममता उतारने के लिए?
योग न मिलना जिस प्रकार योगवंचकता है, वैसे ही योग मिलने पर भी उसका उपयोग न करना, यह भी योगवंचकता है। इतना ही नहीं, यह अपने आपको धोखा देना है। अपनी आत्मा के साथ छलावा है।
संसार जिसको बुरा लगता है और मोक्ष जिसको अच्छा लगता है, वही महात्मा कहा जाता है। उसके तीनों योग अवंचक होते हैं। उसको धर्म सामग्री ही अच्छी लगती है, संसार सामग्री नहीं। वह न दूसरे को छलता है और न अपनी आत्मा को।
आपको धर्म सामग्री का योग तो मिल गया है, परन्तु उसकी कीमत आपने नहीं समझी है। गृहस्थ के लिए हैसियत के अनुपात में धर्म सामग्री में जितना अधिक पैसा खर्च हो, वह पहले नम्बर पर है। उस पर से ही धर्म की सामग्री रुचने का माप निकलता है। श्रीमंत गृहस्थ पैसे बचाकर धर्म करना चाहता हो तो वह वास्तविक रूप में धर्म करता ही नहीं है।

योग की अवंचकता आते ही जीव का संसार-सामग्री के प्रति आकर्षण मिटकर धर्म सामग्री के प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है। अब तक जीव का संसार-सामग्री के प्रति आकर्षण था, उसमें जब बाधा पडती तब उसे सांधने के लिए ही उसे धर्म-सामग्री की आवश्यकता पडती, अन्यथा नहीं। परन्तु यह अवंचकता आते ही उसकी स्थिति बदल जाती है। संसार की सामग्री पर राग होता है, तब उसे अपना पापोदय लगता है।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 18 मई 2017

भाव-प्रधान धर्म

धर्म के चार प्रकार बताए गए हैं: दान, शील, तप और भाव! इन चारों को आप धर्म मानते हैं? यदि इन्हें आप धर्म मानते हैं, तो धन, भोग, आहार और संसार की सब इच्छाओं को अधर्म मानना ही पडेगा। इन चारों में भी ‘भाव’ सबसे प्रमुख है। भाव अर्थात् मन का पवित्र परिणाम! शालिभद्र ने ग्वाले के भव में जिस भाव से दान दिया था, वह भाव आने में अभी अनेक भवों की जरूरत पडेगी। उस ग्वाल-बाल जैसी भी आपकी मनोदशा नहीं है। जिसे किसी दूसरे का लेने में आनंद आता है, उसमें तो उस ग्वाले के लडके का नाम लेने की पात्रता भी नहीं है।
दान, शील और तप ये तीनों भाव सहित होने चाहिए। भाव रहित होने पर ये तीनों निरर्थक हैं, इतना ही नहीं, अपितु संसार बढाने वाले हैं। दान, शील और तप चाहे देशविरति संबंधी हों या सर्वविरति संबंधी, इनमें भाव के मिलने पर ही ये सफल होते हैं। भाव के प्रभाव से ही ये धर्म, धर्म बन सकते हैं।
धर्म बहुत मंहगी वस्तु है। मांगने आने पर इसकी कीमत समझाकर देने जैसी यह चीज है। परन्तु आजकल तो प्रायः धर्म का नीलाम हो रहा है। नीलामी में रुपयों का माल पैसे में बिकता है। ऐसी अधोदशा आज धर्म की हो रही है, इसका हमें अपार दुःख है। आज देश का उद्धार नहीं, अधःपतन हो रहा है। शक्ति (हैसियत) बढने के साथ आपके घरों में मौज-शौक के साधन तो बढते ही जाते हैं, परन्तु धर्म के साधन बढते हुए कहीं नजर नहीं आते हैं। बढेंगे कहां से जब तक कि मोक्ष पाने की प्रबल भावना और प्रयास नहीं हों?
भावनाओं का आज टोटा हो गया है। दान, शील और तप में भी आज आडम्बर, दिखावा, प्रदर्शन और स्वार्थ घुस गया है। भौतिक आकाँक्षाएं इसमें घुस गई हैं। विशुद्ध रूप से कर्म-क्षय और मोक्ष प्राप्ति की एक मात्र भावना आज तिरोहित हो गई हैं, क्योंकि धर्म का सही स्वरूप लोग नहीं जानते।

मोक्ष की इच्छा/भावना जहां तक न हो वहां तक सब धर्म भी औपचारिक, अधर्मरूप ही बनते हैं। अन्तर इतना ही है कि अधर्म सीधा दुःख देता है, जबकि प्रबल भाव रहित धर्म थोडा पुण्य बंध कराकर उस पुण्य के उदयकाल में महापाप का बंध कराकर, बाद में भारी दुःख देता है। धर्म-अधर्म सब प्रायः भावों की निर्मलता के आधार पर होते हैं और भावों की तरतमता, प्रगाढता के आधार पर ही परिणामों की तरतमता, प्रगाढता होती है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 17 मई 2017

परस्त्री का त्याग और स्व-स्त्री में संतोषवृत्ति

विषय सुख की वासना अच्छे-अच्छे आदमियों को भी हैवान एवं पाप से डरने वालों को भी पापासक्त बना सकती है। साधु पुरुषों के लिए तो काम-भावना के उद्देश्य से इन्द्रियों का यत्किंचित विचार भी धिक्कार और दोष रूप होता है। उन्हें तो मन, वचन, काया से सर्व प्रकार के सम्भोगों का त्याग ही करना होता है। गृहस्थों में जो सर्वथा ब्रह्मचर्य पालन करने में अशक्त होते हैं, ऐसे गृहस्थों को पर-स्त्री मात्र का त्याग करना चाहिए तथा अपनी विवाहिता स्त्री में ही संतोष वाले बनना चाहिए।
परस्त्री से विमुखता और स्वस्त्री से संतोष यह दो बातें गृहस्थ के रूप में उत्तम ब्रह्मचारी बनाने वाली मानी गई है। सच तो यह है कि गृहस्थ को भी विषय सेवन के प्रति ग्लानि होनी चाहिए। गृहस्थ को अपनी दृष्टि ऐसी निर्मल बनानी चाहिए कि कोई भी स्त्री नजर में आए तो उसके मन में विकार उत्पन्न न हो। अपनी पत्नी में भी काम का रंग चढाने की वृत्ति नहीं होनी चाहिए। वेदोदय रूप रोग के कारण यदि सहवास के बिना असमर्थ हो जाए तो बने जिस प्रकार रोगी दवा लेता है, उस प्रकार गृहस्थ भोग को भोगे, परन्तु मन को विषय-वासना का घर न बनने दे।
इन सबके लिए अनेक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। खराब संयोग भी आ जाए तो दृढ रहना एक बात है और खराब संयोगों में जानबूझकर जाना अलग बात है। विकार उत्पन्न करे, ऐसे प्रसंग मात्र से दूर रहने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी हेतु ज्ञानी पुरुषों ने ब्रह्मचर्य की नौ बाडों का वर्णन किया है। माता और बहन के साथ भी युवा पुत्र या भाई को एकान्त में नहीं रहना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक का इस प्रकार पतन हो, परन्तु ये भी पतन की ओर ले जाने वाले संयोग उत्पन्न कर सकते हैं।
आज तो इस विषय में अनेक अमर्यादाएं बढ रही है, इसका कारण है विषयाभिलाषा की तीव्रता। जवान लडके और लडकियां आज जिस छूट-छाट को भोगने के लिए ललचा रहे हैं, उनके कितने गंभीर परिणाम आते हैं? इसका विचार सबको करना चाहिए। सिनेमा आदि विषय-विकारों को बढाने वाले संसाधन आज बढते ही जा रहे हैं। आज की शिक्षा भी इस आग में घी का काम कर रही है। विषय-वासना के कारणों ने आज विवाह संबंधी प्रश्नों को भी विकट बना दिया है।

पहले तो मां-बाप समान कुल, शील आदि देखकर विवाह करते थे और विवाहित बच्चे भी संतोष से जीवन व्यतीत करते थे। आज विषय-वासनाएं बढ गई है और इसलिए पति-पत्नी में मनमेल भी नहीं रहता। प्रेम-विवाह के नाम पर भी अनेक अनाचार चल रहे हैं और इन सभी स्थितियों में तलाक की आँधी चल रही है। क्या आर्य देश में ऐसा होना चाहिए? ब्रह्मचर्य तो ऐसा गुण है कि उसके बिना अन्य कोई गुण शोभित ही नहीं हो सकता और न ही स्थिरता को प्राप्त कर सकता है।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 16 मई 2017

जो जितना बडा परिग्रही, वो उतना ही बडा चोर

धन का लोभी व्यक्ति, लूट-खसोट करता है। एक दूसरे को लूटता है। परिग्रह में आसक्त होता है। फिर वह परिग्रही चित्त वाला व्यक्ति, आसक्ति वाला व्यक्ति छः काय-जीवों की विराधना करता है। हिंसादि में दौडता है। वह, यह सब कुछ किसलिए करता है? वह व्यक्ति ये सब कुछ पाप करता हुआ सोचता है कि इससे मेरा मनोबल बढ जाएगा। मेरा आत्मबल बढ जाएगा और मेरे पास का संग्रह-परिग्रह अधिक हो जाएगा। तो फिर मेरा मित्र-बल भी बढ जाएगा। मेरा देव-बल बढ जाएगा। मेरा राजबल बढ जाएगा और गिनाते-गिनाते वह पाप कार्य में आसक्त व्यक्ति कहता है, सोचता है कि मेरा चोर-बल भी बढ जाएगा।
जो जितना ज्यादा परिग्रही होता है, उतना ही बडा चोर होता है। वह टेक्स की चोरी करता है, अब वह व्यक्ति धन्धे भी तो कैसे करता है? चोरी के धन्धे, तस्करी के धन्धे करता है। कालाबाजारी, ब्लेकमेल के धन्धे, (रिश्वतखोरी, भ्रष्ट कर्म) तो वह करता ही है और यह धन्धा सरकार से छुप-छुप कर किया जाता है, तो यह भी तो अपने आप में एक प्रकार की चोरी ही है। अब यह बात अलग है कि वह थोडा सभ्य चोर है। वे चोर जो चोरी करते हैं, सेठों के घर में धन चुराते हैं, वे थोडे असभ्य चोर होते हैं, गांठ खोलकर चोरी करते हैं। लेकिन ये चोर थोडी सभ्यता से चोरी करते हैं।
इस दुनिया में चारों ओर चोर ही चोर हैं। सारी दुनिया ही चोरों से भरी हुई है। परिग्रही व्यक्ति सत्ता वाला बन जाएगा, आसक्ति वाला बन जाएगा, तो वह बडा चोर बन जाएगा। और जब उसकी सत्ता बढ जाती है, तो फिर वह व्यक्ति सोचता है कि मेरा अतिथि-बल भी बढ जाएगा? अतिथि बल कैसे बढेगा? वह परिग्रही व्यक्ति समाज में बडा सम्मानी हो जाएगा, उसका मान-सम्मान बढ जाएगा। समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ जाएगी। फिर उसे लोग अपने यहाँ आमंत्रित करेंगे और उसके यहाँ भी आने-जाने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ जाएगी। फिर वह जहाँ भी जाएगा उसका बढ़िया से बढ़िया आतिथ्य किया जाएगा। क्योंकि उसके पास धन-सम्पत्ति बढ गई है और आज समाज में किसकी पूछ है? पैसे ही की तो पूछ होती है।

वह परिग्रही व्यक्ति चिन्तन करता है कि मैं भी लोगों का आतिथ्य-सत्कार करूँगा तो मेरी भी पूछ-परख बढ जाएगी। फिर मेरा श्रमण बल भी बढ जाएगा। साधु-सन्तों में भी मेरी पूछ-परख बढ जाएगी। साधु-सन्त मुझे ही पूछेंगे कि ओहो, सेठ साहब, सेठ साहब! शास्त्रकार कहते हैं कि वह व्यक्ति इस प्रकार का चिन्तन करता हुआ विविध प्रकार के हिंसादि कार्यों में रूचि लेने लगता है, अधिकाधिक आसक्त होता हुआ पाप कार्य की ओर गतिशील होता है और नरक का मेहमान बनता है।-सूरिरामचन्द्र