बुधवार, 11 जून 2014

पौद्गलिक वासनाएं विषतुल्य हैं


आत्म-स्वभाव की प्राप्ति के लिए पाप मात्र से निवृत्त होकर संयम और तप का विशिष्ट सेवन अत्यावश्यक है, लेकिन गृहस्थ जीवन में ऐसा उत्तम जीवन जीना संभव नहीं है। इसलिए सर्वश्रेष्ठ उपाय तो संसार का त्याग कर दीक्षा स्वीकार करना तथा दीक्षा स्वीकार करने के बाद अनंतज्ञानी वीतराग परमात्मा की आज्ञानुसार निर्ग्रन्थ आचार में अपनी शक्ति का उपयोग करना है। जो आत्माएं इसी तरह संसार का सम्पूर्ण त्याग कर साधु-धर्म के पालन में असमर्थ हों, वे आत्माएं भी देशविरति (आंशिक विरक्ति) हिंसा आदि पापों का त्याग कर सकती हैं। गृहस्थ के लिए दूसरा कोई धर्म नहीं है। धर्म तो जो है, वही है; परन्तु गृहस्थ सर्वांग रूप से धर्म का पालन नहीं कर सकते हैं, अतः उन्हें देशविरति (आंशिक) पालन के लिए कहा गया है और उसी को गृहस्थ धर्म कहा है।

गृहस्थ धर्म का पालन करने वाले का भी ध्येय तो उच्चकोटि के धर्म का पालन करने का ही होना चाहिए। जितने अंश में धर्म का पालन न हो उतने अंश में अपनी पामरता, कमजोरी समझकर पश्चाताप करते हुए अपने सत्व गुण को विकसित करने का प्रयत्न लक्ष्य-प्राप्ति तक लगातार करते रहना चाहिए। मदारी सांप से आजीविका चलाता है, किन्तु कितना सावधान रहता है। मदारी सांप का जहर निकाल देता है, फिर भी वह सांप नुकसान न पहुंचाए, इसलिए सावधान रहता है। जरूरत पडने पर व्यक्ति विषैली दवाई का उपयोग करता है, परन्तु वह जहर पेट में न चला जाए इसके लिए सावधान रहता है। इसी प्रकार संसार से भय लग जाना चाहिए, संसार के सुख भी दुःखरूप लगने चाहिए, क्योंकि संसार की पौद्गलिक वासनाएं आत्महित के लिए विषतुल्य हैं, यह खयाल सतत रहना चाहिए।

‘पाप बिना दुःख नहीं और धर्म बिना सुख नहीं’, ऐसा बोलने वालों की दुनिया में कमी नहीं है, परन्तु इस बात को स्वीकार कर जीवन में आचरण में लाने वाले बहुत थोडे ही लोग हैं। उसमें भी धर्म और पाप के वास्तविक स्वरूप को समझने वाले बहुत कम हैं। दुनिया में अधिकांश लोग पाप से डरते नहीं हैं, पाप करने से पीछे नहीं हटते हैं, इतना होने पर भी वे अपने आपको पापी नहीं मानते हैं। हित-बुद्धि से कोई उन्हें पाप से बचने के लिए कहे तो भी सहन नहीं होता, ऐसी स्थिति में दुःख कहां से जाए और सुख कहां से आए?

जो लोग समझते हैं कि पौद्गलिक वासनाएं आत्महित के लिए विषतुल्य हैं, उन्हें आत्म-स्वभाव को प्रकट करने में सहायक प्रवृत्तियों में रस पैदा करना चाहिए और आत्महित में बाधक प्रवृत्तियों में से रस उड जाना चाहिए। इस प्रकार करने पर ही दुःख-मुक्ति और सुख-प्राप्ति हो सकती है। इसके बिना अनंतकाल से दुःख का अनुभव करते आए हैं और धर्म में प्रयत्न नहीं होगा तो भविष्य में भी दुःख निश्चित है।- आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 10 जून 2014

लक्ष्य तो आत्म-कल्याण का ही हो


‘सुख हो या दुःख हो, हर अवस्था में मुझे समाधि मिले।’ समाधि अर्थात् समान धी (बुद्धि)। सुख आए तो छकना नहीं और दुःख आए तो थकना नहीं। मतलब कि सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों में समभाव से रहना। सुख में अलीन और दुःख में अदीन रहने की सिद्धि प्रभु से मांगी जा सकती है। दूसरी अपेक्षा से अरिहंत और सिद्ध ये दोनों देव-तत्त्व हैं तो इनसे अरिहंतपना और सिद्धपना मांगना; वहीं आचार्य, उपाध्याय एवं साधु गुरु-तत्त्व हैं तो इनसे साधुपना मांगना। अर्थात् आचार्य, उपाध्याय और साधुता के गुण मुझ में प्रकट हों, ऐसा मांगना।

मतलब यह कि हम मन में ऐसा संकल्प करें, ऐसी भावना भाएं, ऐसा पुरुषार्थ करें कि हम में भी वे सभी गुण प्रकट हों जो साधु, उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत प्रभु या सिद्ध भगवान में होते हैं और हम भी सिद्ध-बुद्ध-मुक्त हो जाएं!

मन्दिर में प्रवेश करते समय जिस प्रकार ‘निसीहि’ बोलकर सांसारिक पाप-व्यापार को छोडने का प्रणिधान (संकल्प) किया जाता है; उसी प्रकार उपाश्रय अथवा अन्य किसी धार्मिक स्थान में प्रवेश करते समय भी ‘निसीहि’ बोलने का विधान है। कारण कि मन्दिर की भाँति ही उपाश्रय या अन्य किसी धार्मिक स्थल में किसी भी प्रकार के सांसारिक पाप-व्यापार का मानसिक-वाचिक-कायिक प्रवर्तन नहीं किया जाता।

‘निसीहि’ का अभिप्राय है छोडना, त्यागना। मैं सांसारिक पाप-व्यापार को छोडता हूं। यह मन्दिर में प्रवेश के समय भी छोडना है और उपाश्रय या किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश के समय भी छोडना है। वहां हमें विशुद्ध रूप से आत्म-कल्याण का पुरुषार्थ ही करना है। यह आत्म-कल्याण की दिशा में पहला कदम है.- आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 9 जून 2014

अहिंसा सर्वोपरि है


जिस लक्ष्य से क्रिया करनी है, उस लक्ष्य के मद्देनजर वह क्रिया नहीं करे तो शास्त्र कहते हैं कि अजीर्ण हो जाता है। ज्ञान का अजीर्ण अहंकार है और तप का अजीर्ण क्रोध है। जो उसके हेतु (लक्ष्य) को नहीं सहेजते, उन्हें यह होता है। अहिंसा, संयम और तप : ‘धम्मो मंगल’ की गाथा में ज्ञानी ने यह क्रम कहा। वहां पहले अहिंसा क्यों? पहले संयम क्यों नहीं? तो कहा कि संयम भी अहिंसा के लिए ही है और तप संयम के लिए है। सबसे पहले अहिंसा; इसे सहेजने, पल्लवित करने और इसमें वृद्धि करने के लिए संयम है। जो संयम पालते हुए अहिंसा जाए, वह संयम नहीं है। ऐसा संयम नहीं चाहिए। शास्त्र ने बगुले के संयम को असंयम कहा है। बगुला स्थिर होता है, इन्द्रियों का गोपन करके रखता है, उसे लाभ होता है? नहीं। कारण कि वह यह सब हिंसा के लिए करता है। उसकी यह क्रिया तो अहिंसा की घातक है। अहिंसा यह तो धर्म का पाया है, आधार है, धर्म की नींव है और संयम आत्मा का स्वरूप है।

अहिंसा के लिए ही बाकी का सबकुछ है। जो स्वयं की हिंसा नहीं चाहते उनसे दूसरों की हिंसा नहीं चाही जा सकती। अहिंसा यह आत्मा का मूल गुण है। अहिंसा यह पहला महाव्रत है। बाकी के सभी व्रत अहिंसा की सुरक्षा और संरक्षण रूप बाड हैं। पहले व्रत की सुरक्षा के लिए बाकी के व्रत हैं। पहला व्रत नहीं हो तो ये दूसरे व्रत होते हुए भी व्रतधारी नहीं कहलाता। श्रावक के पहले पांच अणुव्रतों में मुख्य तो यही है, बाकी के चार इसे पल्लवित करने के लिए ही हैं। तीन गुण व्रत, ये पांच का पोषण करने के लिए और चार शिक्षाव्रत इनमें सुधार करने के लिए हैं। जिसे स्वयं का बिगाड अच्छा नहीं लगता, वह दूसरे का बिगाड नहीं करता। अहिंसा के लिए संयम है; अहिंसा भूले तो संयम व्यर्थ है। संयम की शुद्धि के लिए तप है। संयम पर चिल्लाए, क्रोध करे ऐसा तप वह तप नहीं है।- आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 8 जून 2014

संसार असार लगे तो धर्म समझ आए


संसार की असारता समझे बिना धर्म नहीं जचता। जो संसार को अच्छा मानते हैं, उन्हें धर्म कहने के लिए शास्त्रों में मनाही है। ‘ज्ञानसार’ में उपाध्यायजी महाराजा पहले ही पूछते हैं कि-

बिभेषि यदि संसारान्, मोक्षप्राप्ति च काङ्क्षसि ।

तदेन्द्रियजयं कर्तुं, स्फोरय स्फारपौरुषम् ।।

अर्थ : यदि तुम्हें संसार का भय लगा हो, मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा जगी हो तो इन्द्रियों को जय करने के लिए तुम पुरुषार्थ करो।

पहले सामने वाले को पूछा जाता है कि तुझे संसार असार लगा है? मुक्ति की चाहत है? इन दोनों बातों में जो हां कहे उसे ही धर्म सुनाया जाता है।

संसार की असारता बताना यह मुनि का पहला धर्म है, ऐसा लगता है या नहीं? मरते-मरते भी संसार को सारभूत कहने में न आ जाए इसकी मुनि सावधानी रखते हैं। कोई मुनि जरा मंद शक्ति वाला हो तो कदाचित अपने सहवासी को संसार की असारता नहीं समझा पाए, किन्तु वह खुद के पास से कोई संसार को सारभूत तो न ही समझ जाए, इसकी सावधानी तो रखता ही है न? भूलचूक से भी स्वयं का सहवासी ऐसा न समझ जाए यह सावधानी तो मुनि प्रतिक्षण रखता ही है। मुनि ढीला हो तो कडवा कभी न भी कहे, किन्तु सामनेवाले को खुश रखने के लिए ‘तुम तो बहुत सुखी, तुम्हारा संसार अच्छा है’, ऐसा तो नहीं ही कहेगा।

मुनिपन लिया है, संसार को खोटा मानता है, आगम हाथ में है, आगम में भी संसार को खोटा कहा गया है, फिर भी उसके मुँह से दूसरी बात कैसे निकलती है?

संसार छोडा यह बात सही है, किन्तु उसने जिसकी आज्ञा से संसार छोडा उसकी निश्रा में रहता तो यह परिणाम नहीं आता; अथवा आगमरूपी प्रकाश का उपयोग किया होता तो यह दशा नहीं आती। किन्तु जिसकी निश्रा से संसार छोडा उसकी निश्रा छूट गई, आगम का उपयोग दूर हो गया इसलिए आज यह परिणाम आया।- आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 7 जून 2014

संसार की असारता का विचार करो


हर समय दुनिया की तमाम वस्तुओं की सारता-असारता का अहर्निश विचार करो! प्रत्येक चीज के उपयोग से पूर्व ऐसा विचार करने की आदत डालो! कोई भी चीज हाथ में लो तब इसे पूछो कि यह किसकी है? अपनी या पराई? अच्छी या बुरी? सुखद या दुःखद? ऐसा करते-करते धर्म की जिज्ञासा जागृत होगी। किन्तु आप तो उल्टे उसके रंग में रंगजाते हो। भोजन में पांच चीजें आए कि आपको जल्दी से उनका स्वाद लेने का आदेश अंदर से आए, मुँह से लार टपकने लगे। वहां विचार करने के लिए जरा रुकते हो? रसना के ऐसे गुलामों को संसार की असारता कोई समझाने का प्रयास करे तो समझाए कैसे? कारीगर के हथियार अच्छे, किन्तु इनका उपयोग योग्य वस्तु पर ही संभव है; जहां-तहां उनका उपयोग करे तो उनकी धार ही समाप्त हो जाए और वे बोथरे हो जाएं। खेत साफ किए बिना हल नहीं जोता जाता; इसीलिए ज्ञानी ने सबसे पहले संसार की असारता का उपदेश दिया। संसार की असारता तो क्षणभर ठहरो तो महसूस हो न? लेकिन, आपको यह विचार करने की गरज ही नहीं है। घर से बाहर निकलते समय कोट पहिनते हो, तब विचार करने के लिए रुको तो कोट भी बोध प्रदान करता है। श्री हेमचन्द्रसूरिजी महाराजा कहते हैं कि इस प्रकार प्रत्येक क्रिया में विचार करें तो सभी क्रियाओं में से वैराग्य प्राप्त होता है। घर का मालिक मकान की सांकल बजते ही विचार करे कि ‘सुबह खोल सकूंगा या नहीं?’ तो वैराग्य नहीं आएगा? आएगा ही; किन्तु कौन विचार करे? अरे, कोई कहनेवाला मिले तो उल्टा उसे आँखें निकालकर डांटे कि ‘ऐसी अपशुकुनी बात क्यों करते हो? मुझे मारना चाहते हो?’ जबकि उस समय उसे यह लगना चाहिए कि ठीक चेतावनी मिल रही है। तिजोरी के ताला लगाकर सोनेवाले उसे खोलने के लिए वापस नहीं उठे, ऐसी घटनाएं नहीं हुई हैं? ऐसा नहीं होता? यह बात यदि विचारने में आए तो कृपणता जाए और उदारता आए, लक्ष्मी का मोह छूटे और धर्म जल्दी गले उतरे। यह सब विचार करने में ही दिवाला है, इसीलिए सारा दिवालियापन है।

श्री जिनेश्वरदेव के मंदिर तथा मूर्ति, निर्ग्रंथ गुरु और आगम का श्रवण ये वैराग्य का रेला नहीं बहा दें? किन्तु हृदय खोखला हो तो वहां क्या हो? संसार की असारता का आभास हुए बिना धर्म की जिज्ञासा नहीं होती और जिज्ञासा हुए बिना धर्म परिणाम प्राप्त नहीं करता। नींव की शुद्धि और मजबूती के बिना महल खडा नहीं किया जा सकता, मूल की शुद्धि बिना फल नहीं मिलता और हृदय की शुद्धि बिना इसमें वस्तु प्रवेश नहीं करती। इसलिए हृदय को शुद्ध बनाओ!

संसार में आपको जो चीजें मिली हैं, वे पुण्य के योग से मिली हैं, इससे इन्कार नहीं है, किन्तु इनसे सेवा करवाने में कल्याण है, इनकी सेवा करने में कल्याण नहीं है, यह बराबर विचार करो और समझो! ये तो धनतेरस के दिन दूध से धन को खूब धोते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे घर पर कायम रहना, दूसरी जगह मत जाना’, ऐसों को वैराग्य होगा? धर्म के प्रसंग में उपयोग करने की बात आती है तो वहां कहते हैं कि ‘अभी धंधे में मंदी चल रही है, दो लाख का घाटा हुआ है।’ लेकिन वहां तो दो की जगह पांच लाख का होगा तो भी भरेंगे, किन्तु यहां नहीं देंगे।

खाना, पीना, सोना, उठना, बैठना, मकान में घुसना और उसमें से निकलना, इस तरह प्रत्येक क्रिया के समय इस प्रकार सोचने की आदत डालोगे तो दीपक की तरह धर्म की जिज्ञासा प्रकट होगी और इस दीपक के प्रकाश में सबकुछ देखा जा सकेगा। अंधेरे में हाथ में दीपक हो तो दिक्कत नहीं आती।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 6 जून 2014

नई आग मत लगा देना


वानर जाति का न्याय है कि एक बंदर के यदि घाव हो जाए तो समझो कि उसकी मौत ही आ गई, क्योंकि सभी बंदर उसे देखने आएंगे और उसके घाव में अंगुली डाल-डालकर देखेंगे कि कितना घाव है, कैसा घाव है और इस प्रकार वे अनजाने में ही उस घाव को और बडा कर देते हैं। जितने बंदर आते हैं, सभी यही करते हैं और ऐसे में घायल बंदर नहीं मरता हो तो मर जाता है। जब आप अस्वस्थ व्यक्ति की तबीयत पूछने जाएं, तब वहां जाकर नमक-मिर्ची लगाकर चार नए झूठे-सच्चे किस्से सुनाकर नई आग मत लगा देना। समझदार, उत्तम व्यक्ति जब बीमार मनुष्य की साता पूछने जाता है, तब उस बीमार की आधी बीमारी, आधी चिन्ता तो स्वतः कम हो जाती है। जो समझदार होता है, वही दुःख में धैर्य बंधा सकता है। अन्य लोग तो उल्टे दुःख में वृद्धि कर के ही आते हैं। यही हाल नई बहुओं का होता है। जिसकी शादी होने वाली होती है, उस बच्ची के सामने पीहर की बडी-बुजुर्ग महिलाएं अन्य घरों के सुने-सुनाए किस्सों में नमक मिर्च का तडका लगाकर घर में बातें करती है, जिसका दुष्प्रभाव नई दुल्हन की कच्ची मानसिकता पर होता है और वह ससुराल में दिल में सुलगती नई आग के साथ प्रवेश करती है, जिसमें सभी को जुलसना पडता है। धार्मिक-संस्कारों का ही यह टोटा है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 5 जून 2014

जिज्ञासा होनी चाहिए


सम्यक्त्व से पहले का गुण है जिज्ञासा। यह आए तो सारे गुण आएं। जिज्ञासा यानी जानने की इच्छा। धर्म जानने की जिज्ञासा प्रकट हुई या नहीं, इसका क्या आधार? व्यक्ति जहां बैठा है वहां तमाम संयोग सारभूत नहीं दिखाई देते, इनके अतिरिक्त कुछ नया जानने की इच्छा जागृत हो, यही इसका आधार है। ‘यह भी ठीक और वह भी ठीक’ यह भावना हो तो यह जिज्ञासा नहीं है। जिज्ञासा प्रकटे तो गुरु के पास जाने की इच्छा अपने आप होती है। गुरु के पास जाए तो विनय और नम्रता उसके साथ चली आती है। ये आती हैं तो पूछने की भावना होती है। इस प्रकार पूछे गए सवालों का उत्तर प्रेम से सुना जाता है और जो प्रेम से सुना जाए वह हृदय में उतरता ही है। विधि और क्रम यही है। आज तो न जिज्ञासा है, न इच्छा है, न विनय या नम्रता, न सवाल और न उत्तर सुनने का प्रेम। प्रेम से सुनें तो हृदय में उतरे ही। हृदय कोई पत्थर नहीं, यह तो पोची जमीन है। उपजाऊ जमीन में थोडी सी भी बारिश हो तब भी किसान पेट भरने जितना तो कमा ही लेता है। वह बारिश निष्फल नहीं जाती। क्रमशः एक-एक गुण बढते-बढते आत्मा में असंख्यात गुणी निर्मलता बढती है। एक जिज्ञासा गुण से इस आत्मा को दुनिया की दूसरी आत्माओं की अपेक्षा असंख्यात गुणा निर्जरा होती है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 4 जून 2014

धर्म सबसे पहले


पडौसन आकर बालक को कहे कि ‘तेरी मां तो तुझे मारती है, इसलिए चल मेरे यहां मैं तुझे खेलाऊंगी’, तो भी वह बालक पडौसन के यहां नहीं जाएगा। अपने घर में रोटी और राबडी खाएगा, किन्तु हलवा-पुडी खाने के लिए वहां नहीं जाएगा। कोई उसे कहे कि ‘तेरी मां ने कल तो तुझे मारा था न?’ तो वह कहेगा कि ‘भले ही मारा, वह तो मेरी मां थी न?’ वहां श्रद्धा है कि ‘मां तो मां है।’ बालक को जिस प्रकार मां पर श्रद्धा है, उस प्रकार आपको ‘मेरे देव, मेरे गुरु, मेरा धर्म’, ऐसा कुछ है? माता तो प्रत्यक्ष दूध पिलाती है, किन्तु धर्म प्रत्यक्ष कुछ देता नहीं है न? माता के स्तन में दूध कौन देता है? धर्म नहीं दिखाई देता आपको? कचरे में से दूध? यहां धर्म का प्रभाव नहीं है? मल-मूत्र की कोटडी रूप शरीर में दूध कहां से आया? यह धर्म का प्रभाव नहीं तो और क्या है? ये तो नमकहराम ऐसे पक्के हैं कि जिन के योग से जन्मे, पोषण हुआ, बडे हुए उन्हें ही खत्म कर देने को तैयार हो गए हैं। आज माँ-बाप की उपेक्षा इसका जीवंत प्रमाण है.

जब काम-धंधा नहीं, तब भी धर्म नहीं होता तो फिर बाद में होगा? बैठने का ठिकाना नहीं तब धर्म नहीं होता, तो गादी मिलने के बाद धर्म होगा? जिनके योग से यह सबकुछ है वही पीछे है तो मानलो कि सबकुछ ही पीछे है। धर्मी तो कहता है कि सब बाद में, किन्तु जिनपूजा, सामायिक, गुरुवंदनादि धर्म ही पहले। सर्वस्व भले ही जाए, किन्तु धर्म नहीं छोडा जा सकता।

आप मनुष्य जन्म में आए वह पाप के योग से या धर्म के योग से? धर्म के ही योग से। आर्यदेश, आर्यजाति, आर्यकुल में जन्म मिला वह धर्म के योग से। माता के उदर से सही-सलामत जन्मे वह धर्म के ही योग से। माता ने गर्भ में ही गला क्यों नहीं दिया? गर्भपात क्यों नहीं कराया? जन्मते ही गला क्यों नहीं दबाया? दूध में जहर क्यों नहीं पिलाया? यह सब धर्म के ही योग से और यही धर्म इन सबके बाद? नमकहरामी में कोई कमी नहीं रखी है? धर्म आगे, उपकारी मां-बाप भी पीछे, तो दूसरी चीज की तो बात ही क्या है? मां-बाप तो उपकारी हैं, किन्तु धर्म के समक्ष इनको भी शास्त्र ने पीछे रखा है तो बाकी सब बाद में हो इसमें कौनसी नई बात है? यदि धर्म को बाद में रखा तो सबकुछ बाद में ही समझना। चाहे जिस धर्म वाला हो, किन्तु जो धर्म में मानता हो, वह यही कहेगा कि पहले धर्म और बाद में ही सब। यदि धर्म बाद में तो सब बाद में; कभी मिले तो भी वह भोग नहीं सकता। धर्म की अवगणना करने वालों का तो पूर्व पुण्य से प्राप्त किया हुआ राज्य भी नष्ट हो गया। अहंकार में डूबे हुए धर्म की अवगणना करने से भी नहीं घबराते। ऐसे अधर्मी और स्वार्थियों को धर्म की अवगणना करने में कितनी देर लगती है? ये लडखडाकर कहां जाएंगे, कहां गिरेंगे, इसका इन्हें भी पता नहीं चलेगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 3 जून 2014

विषय-कषाय ही विद्वत्ता या मूर्खता का पैमाना


जैसे-जैसे वर्ष बीते, बडे हुए, वैसे-वैसे पांचों आस्रव बढे या घटे? विषय-कषाय बढे या घटे? इन्द्रियां काबू में आई या बहकी? यह सब प्रतिदिन आत्मा से पूछो। यदि आस्रव घटे हों, विषय-कषाय कम पडे हों और इन्द्रियां काबू में आई हों तो तो आप बडे, चतुर, समझदार, पढे-लिखे; किन्तु यदि आस्रव बढे हों, विषय-कषाय उछले हों, बढ गए हों और इन्द्रियां बहकी हों तो बेवकूफ, अनपढ, अक्लहीन और गंवार। विषय-कषाय की घटत-बढत ही विद्वत्ता और मूर्खता का आधार है।

आप उम्र के आधार पर, दुनियादारी के अनुभव के आधार पर, किताबें पढने के आधार पर विद्वत्ता का मूल्यांकन करते हो, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। प्रभु की पूजा की, किन्तु विषय-कषाय बढे या घटे यह प्रतिदिन आत्मा से पूछो! आत्मा को पूछो कि मोह-ममता का जाल टूटा? मकडी के जाल की तरह खुद के जाल में खुद ही फंसते हैं और ऊपर से श्री जिनेश्वरदेव को पहिचानने का दावा करें तो यह चल सकता है? नहीं ही चल सकता है। आत्मा के साथ हुआ संवाद योग्य के समक्ष ही किया जाता है, जहां-तहां नहीं किया जा सकता है। इतनी आत्म-चिंता न हो, गवेषक शक्ति न आए, प्रतिदिन गवेषणा न हो तो पढने से क्या? पूजा करने से क्या? ऐसों की यहां गणना नहीं है।

बडों की पूजा स्वयं के दोषों में कमी लाने के लिए है। आज तो अपनी अनुकूलता में सारी अनुकूलता। ऐसों को यदि कहो कि ‘ये पूज्य व्यक्ति हैं’, तो वे तुरंत कहेंगे कि ‘हां, यह बात सही है, किन्तु इनसे मुझे क्या लाभ है? मुझे तो लाभ हो तो मैं पूजूं।’ ऐसी मनोदशा है।

आत्मिक लाभ तो है, किन्तु इस लाभ की परवाह कहां है? शारीरिक, मानसिक और महत्त्वाकांक्षा के सांसारिक लाभ की यह बात है। यह लाभ होता हो तो मानने को तैयार हैं। तब ये किसको मानते हैं अब यह विचार करो! जैन शासन की विनय-मर्यादा आज नष्टप्रायः होती जा रही है इसका यही कारण है। विषय-कषाय की आधीनता ही इसके मूल में है और इसी को लेकर विनय-वैयावच्चादि भी विपरीत मार्ग पर जा रहे हैं। प्रत्येक क्रिया आत्मकल्याण के लिए होनी चाहिए, यह आज विस्मृत हो गया है, भूल गए हैं। विनय, वैयावच्च, भक्ति आदि में कल्याण न होता तो शास्त्रकार यह सब करने के लिए नहीं कहते, किन्तु आजकल के लोगों ने तो नया कल्याण खोजा है। ‘अपने साथ अनुकूलता बरते उसके साथ योग्य प्रकार से व्यवहार करना’, ऐसा स्पष्ट कहा जाता है।

अयोग्य पात्र अच्छी चीज को भी विकृत कर देते हैं। विनय, भक्ति, प्रेम भी आज अपनी अनुकूलता के हिसाब से होता है, अनुकूलता मिले वैसा हो तो होता है। ‘जहां मुझे मान मिले उस मुनि को हाथ जोडूं’, ऐसी भावना वाला कितना बडा वर्ग? पिचत्तर फीसदी ऐसा वर्ग है। यह आज की विडम्बना है। ऐसी बीमार मानसिकता में अच्छे परिणामों की आशा कैसे की जा सकती है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 2 जून 2014

साधु का आहार


साधु आहार संयमपुष्टि के लिए लेता है, किन्तु ग्रास (कौर) मुँह में डालते समय आत्मा से पूछे कि ‘यह संयमपुष्टि के लिए लिया जा रहा है या स्वादपुष्टि के लिए?’ तो तुरंत जवाब मिलता है कि अभी संयमपुष्टि के लिए आहार की स्थिति में समय है; किन्तु ‘शास्त्र कहते हैं इसलिए सब संयमपुष्टि के लिए ही है’, ऐसा कहकर गाडी लुढकाए तो मारा जाए। यह कोई छिपा नहीं रहता। खाने में कंकर आए तो तुरन्त पता चल जाता है न? पता चल जाता है यह तो ठीक है, किन्तु मन और मुखाकृति में तुरन्त बदलाव हो जाता है। कदाचित् कोई समझदार हो, कुशल हो तो मुखाकृति में बदलाव न भी लाए, किन्तु मन? इसके लिए तो मुनि को नाना प्रकार के अभिग्रह करने पडते हैं। यह स्थिति लाने के लिए ही अभिग्रह हैं। छठ के पारणे छठ, पारणे में भी आयम्बिल और आयम्बिल में भी जिस पर मक्खी न बैठे ऐसा आहार लेने का धन्ना अणगार का अभिग्रह था। उनके जैसे मुनि को फिर छठ का तप करने, आयम्बिल करने और ऐसा आहार लेने का अभिग्रह किसलिए? क्योंकि आहार तो संयमपुष्टि के लिए है। ये आत्माएं अपनी परीक्षा सूक्ष्मता से कर सकती थीं।

जिव्हा (जीभ) को ऐसी बनानी कि उसे रस-कस का पता ही नहीं चले, स्वाद-लोलुपता ही समाप्त हो जाए, ऐसा ये मानते थे। साधु आहार ‘पुत्रमांसवत्’ करे यह विधि है। जंगल में गए हुए को न चाहते हुए भी किसी परिस्थिति अथवा मजबूरीवश पुत्र के शव का मांस खाना पडे तो वह कैसे हृदय से खाएगा? इस प्रकार मुनि आहार करे ऐसा शास्त्र कहते हैं। आज यह दृष्टि नहीं है। आज ढोंगियों का झुण्ड बढ गया है, स्वाद-लोलुपता बढ गई है, यह आज दुःख का विषय है। अपने दोषों को छिपाने के लिए इन दोषों को ही गुण के रूप में बतलाने की लालसा बढ गई है। इसलिए ऐसे लुच्चों के साथ मेल नहीं बैठता। अंतर से प्रेम नहीं होता।

यदि स्वयं विरक्त है तो निरस आहार आए वहां गुस्सा क्यों आता है? वहां ऐसा किसलिए? कहना चाहिए कि अमुक के बिना नहीं चलता। साधु प्रतिज्ञाहीन होता है अर्थात् उसे प्रतिज्ञा की जरूरत नहीं, लेकिन वह कब? जब साधना द्वारा ऐसी उच्च दशा आए तब। यदि ऐसी दशा आए बिना ही ऐसा मान ले तो तो फिर मुनिवेष पहिनने के बाद कुछ करने का रहता ही नहीं है; किन्तु ऐसा नहीं है। मुनि को अभिग्रह धारण करना ही चाहिए। साधुत्व स्वीकार करने के बाद, संयम अंगीकार करने के बाद तो जोखिमदारी बढती है। यदि इस बात को समझे तो तो मुनि आनंदमग्न रहता है, लेकिन नहीं समझते वे दुःखी हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

आत्म-निरीक्षण सन्मार्ग पर ले जाता है


व्यक्ति स्वयं को जैसा कहता है, बताता है अथवा लोग उसके संबंध में उसके बाह्य क्रियाकलापों को देखकर जैसी धारणा बनाते हैं; व्यक्ति वस्तुतः स्वयं वैसा है या नहीं, इतना विचार करनेवाली आत्मा मिथ्यादृष्टि होते हुए भी सन्मार्ग में जाती है, उन्मार्ग से बचती है। अमुक समय में गुरु की निश्रा चाहिए यह बात अलग है। ऐसी आत्माएं अपने संबंध में दुनिया कहे वैसा अपने आपको मान लेने के लिए एकदम तैयार नहीं होती और जो इस प्रकार अपने आपको मानने के लिए तैयार नहीं होती, वे ही अपने छुपे हुए दोषों को देख सकती हैं। लोगों ने जैसा माना है उसमें कोई फेरफार नहीं है, लोगों ने सही ही समझा है, ऐसा मानकर फूलने वाला स्वयं मरता है और मारता है। ऐसे विचार की भावना स्थूल न हो और सूक्ष्म हो तभी विचार करे तो समझ सकता है।

मुनि से भी वंदना को विघ्न मानने के लिए कहा गया है। मुनि लोगों को वंदना करते हुए देखकर फूले नहीं, अहंकार नहीं करे कि उसे कितने और कैसे लोग नमन कर रहे हैं, उसमें ऋजुता का भाव अखण्डरूप से रहना ही चाहिए। मुनि भी उस वंदना को पूर्व के ज्ञानी महापुरुषों को समर्पित करे और अपना आत्मनिरीक्षण करे कि वह उस योग्य कैसे बने? स्वयं का इस प्रकार आत्म-निरीक्षण मिथ्यादृष्टि भी उचित प्रमाण में कर सकता है और इससे वह अनायास ही बिना किसी अतिरिक्त श्रम के भी सन्मार्ग पर जा सकता है। उन्मार्ग में होते हुए भी सीधे मार्ग पर कैसे, यह विचार करो! वह कहता है कि "शास्त्र गहन हैं, मति अल्प है इसलिए शिष्ट पुरुष कहें वही प्रमाण"। अपनी मति पर वह नाचता-इतराता नहीं, इसलिए वह मार्गानुसारी कहलाता है। सतत आत्म-निरीक्षण कर अपने आपको कसौटी पर कसने वाला ही जीवन में सफल हो सकता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा