शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मान-सम्मान की अभिलाषा मत रखो


संसार का यश तो तुच्छ वस्तु है। मिला तो भी क्या और न मिला तो भी क्या? हमें मान-सम्मान की अभिलाषा ही नहीं रखनी चाहिए। ऐसी तुच्छ वस्तुओं के पीछे आत्मा बर्बाद न हो जाए, इसके लिए इस जीवन में केवल जिनाज्ञा की आराधना अधिकतम करने के लक्ष्य वाला बनना चाहिए। हम स्वयं शुद्ध हैं अथवा नहीं, यह अवश्य देखना चाहिए। हम स्वयं सन्मार्ग पर हैं अथवा नहीं, उसका ध्यान रखने में तनिक भी उपेक्षा नहीं आने देनी चाहिए। हम सन्मार्ग पर हों, शुद्ध रहने के लिए प्रयत्नशील हों, केवल शासन-सेवा के आशय से ही आज्ञानुसार कार्य कर रहे हों, फिर भी गालियां सुननी पडे, कष्ट सहने पडें, तो उसका सत्कार करें। परिणाम में एकांत लाभ ही होता है।

भक्ष्याभक्ष्य के एवं शील-मर्यादा आदि के उत्तम आचार-विचार दिन-प्रतिदिन घिसते जा रहे हैं। अभक्ष्य व अनंत काय का उपयोग अधिक होता जा रहा है। अभक्ष्य एवं अनंत काय का उपयोग जैन कुलों में नहीं होना चाहिए, ऐसी-ऐसी बातें कोई करे तो उसकी भी मजाक की जाती है। शील-मर्यादा-विषयक उत्तम आचार छोडने के विरूद्ध हित शिक्षा दी जाए, तो उन्हें यह कहने में भी लज्जा नहीं आती कि ‘इन्हें जमाने का होंश नहीं है’। समस्त श्रावक-कुल ऐसे हो गए हों, यह बात नहीं है। कतिपय श्रावक-कुलों में अभी भी उत्तम आचार-विचार कायम हैं, परन्तु ऐसा अत्यंत अल्प प्रमाण में है। जडवाद की हवा का वेग इतने प्रमाण में है कि यदि उसके समक्ष सचेत न रह सके तो आत्महित का नाश हुए बिना नहीं रहेगा।

‘मुझे तो जीवन में अपनी आत्मा का कल्याण करना है और कल्याण करने का एकमात्र मार्ग अनंत उपकारी श्री जिनेश्वर देवों की आज्ञा की आराधना करना है।’ हृदय में ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए और आज्ञा की आराधना में मन-वचन-काया को जोडने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। यह दशा होगी तो कर्तव्य से च्युत नहीं होंगे और किसी भी पौद्गलिक लालसा के अधीन नहीं बनेंगे। भक्ष्याभक्ष्य के सेवन से बचेंगे, आचार, विचार और व्यवहार शासन के अनुरूप होगा।

इतनी सावधानी रखने पर भी किसी तीव्र पापोदय से आत्मा का पतन हो भी जाए, तो भी कालांतर में उस आत्मा का उत्थान हुए बिना नहीं रहता, उस आत्मा का मोक्ष निश्चित हो जाता है और जो आराधना की हो वह तो निष्फल जाती ही नहीं, अपितु कल्याण-कामी हो। इसलिए यही ध्येय रखना चाहिए और ऐसे प्रयत्न करने चाहिए, जिससे सुख पूर्वक आराधना हो सके। उसके लिए पतन के संयोगों से बचने का प्रयत्न भी लगातार रखना चाहिए। पौद्गलिक लालसा से यथासंभव बचते रहना चाहिए। यश की कामना, मान-सम्मान प्राप्त करने की इच्छा भी पौद्गलिक लालसा है। गीतार्थ महात्मा इस प्रकार की लालसा से परे रहेंगे।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 10 सितंबर 2014

कुलीन संस्कारों को बचाने की जरूरत


आज श्रावक-कुल जैसे उत्तम कुल के संस्कार कितने अधिक नष्ट हो गए हैं? घर के मुखिये को घर का कोई भी व्यक्ति आराधना से वंचित रह न जाए उसकी चिन्ता हो, ऐसे घर कितने हैं? आपको अपना पुत्र इज्जतदार, पेढीदार या धनवान बनाने की जितनी चिन्ता है, उतनी ही चिन्ता वह धर्म का आराधक बने इस बात की है क्या? पुत्र पेढीदार अथवा धनवान न बन पाए, उसमें अधिक हानि है या वह धर्महीन बनकर इस मंहगे जीवन को नष्ट कर दुर्गति के कर्मों का बंध करे, उसमें अधिक हानि है?

अपनी संतानों को सांसारिक कार्यों में कुशल बनाने में आप जितने उत्सुक हैं, उतनी उत्सुकता उन्हें धर्मात्मा बनाने में है? पुत्र पूजा, सामायिक आदि न करे तो उसके लिए कितना खटकता है और विद्यालय अथवा दुकान पर न जाए तो उसके लिए कितना खटकता है? इन दोनों के मध्य का अंतर तो निकाल कर देखें। सचमुच, आज पारस्परिक सच्ची कल्याण भावना लुप्त होती जा रही है। आज तो प्रायः यह दशा है कि पिता, पुत्र, माता, भगिनी आदि संबंधी एवं स्नेही परस्पर आत्मा के शत्रु रूप बने हैं।

संबंधी अथवा स्नेही के आत्मा की क्या दशा होगी, यहां से मृत्यु के पश्चात उनकी क्या गति होगी, उन्हें धर्म पुनः कब प्राप्त होगा और कब वह जन्म-मरण आदि के इन अनन्त काल से भोगे जाते दुःखों से मुक्त होगा? इस प्रकार के वास्तविक कल्याणकारी विचार करने का भाव तो आज प्रायः नष्ट हो गया है। मानो पर-भव है ही नहीं, पुण्य-पाप है ही नहीं, इस प्रकार आत्मकल्याण की अवहेलना करके आज अनेक व्यक्ति वर्तन कर रहे हैं। इस दशा से सुकुल भी मुक्त नहीं रह सके। अतः सुकुलों में भी धार्मिक आत्मा उत्पन्न न हो अथवा धर्म में तत्पर बने आत्मा भी कुसंग से धर्महीन बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है।

श्रावक जैसे उत्तम कुल में तो परस्पर कल्याण-भावना के झरने बहते रहने चाहिए। जो कोई पुण्यात्मा श्रावक-कुल को प्राप्त करे, वह इस जीवन में ऐसा कर जाए कि जिससे उसका संसार अत्यंत परिमित बन जाए, ऐसा श्रावक-कुल का वातावरण होना चाहिए। श्रावक-कुल में रहे हुए नौकर, इतर जाति के होते हुए भी धर्म में रुचि वाले बन जाएं, ऐसे उत्तम कोटि के आचार एवं विचार श्रावक-कुलों में प्रवर्तमान होने चाहिए।

श्रावकों के घर के पशुओं पर भी उत्तम छाँया पडे, ऐसा श्रेष्ठ रहन-सहन उत्तम श्रावकों का होना चाहिए। इसके साथ जब हम आज के श्रावक-कुलों की दशा का विचार करते हैं, तब स्वाभाविक ग्लानि उत्पन्न हुए बिना नहीं रहती। उत्तम गिने जाते श्रावक परिवारों में भी आज बिगाडा प्रविष्ट होता जा रहा है। नामांकित कुलों में भी आज धर्म-संस्कार नष्ट होता जा रहा है। खाने-पीने की, पहनने-ओढने की और घुमने-फिरने आदि की स्वच्छंदता बढती जा रही है, यह चिंता का विषय है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

मानसिक अस्वस्थता का मतलब पागलपन नहीं


World Suicide Prevention Day 10th September special

मानसिक अस्वस्थता का मतलब पागलपन नहीं

कई लोग डिप्रेशन, तनाव और कई प्रकार की मानसिक परेशानियों से गुजरते हुए भी मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए आते हुए इसलिए संकोच करते हैं या हिचकिचाते हैं कि ‘लोग क्या सोचेंगे’ या मनोवैज्ञानिक परामर्श का यह कह कर विरोध करते हैं कि ‘मैं पागल थोडे ही हूं’।

दरअसल यह एक मिथ्या धारणा है कि मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए पागल लोगों को ले जाया जाता है। पागलों की जगह सिर्फ पागलखाने में है। मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए तो अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवी, विद्वान, अधिकारी, राजनेता, होनहार-प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थी और कई बडी हस्तियां भी पहुंचती है, क्योंकि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में भविष्य की चिन्ता और दौड, काम के दबाव, व्यावसायिक उतार-चढाव या पारिवारिक कारणों आदि से कोई भी तनावग्रस्त या अवसादग्रस्त हो सकता है, एकाग्रचित्तता या आत्म-विश्वास में कमी आ सकती है। कई बार चिन्ताओं, संशयों, परीक्षा आदि से भी व्यक्ति भयग्रस्त हो कर, चिन्तातुर हो कर अवसाद का शिकार हो सकता है, उसका नकारात्मक सोच व व्यवहार बन सकता है। मानसिक परेशानियों, उलझनों के कई कारण हो सकते हैं और इन परिस्थितियों से उबरने के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श लेना पागलपन नहीं; समझदारी है। महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन लर्निंग डिसऑर्डर के शिकार हुए थे, बिजली के बल्ब का आविष्कार करने वाले एडीसन को बचपन में मंदबुद्धि समझा जाता था। ऐसे एक-दो नहीं सैकडों उदाहरण हैं, जब कई महान हस्तियों ने मनोवैज्ञानिकों की सेवाएं ली हैं।

अमरीका जैसे विकसित राष्ट्र की अधिकांश आबादी ने कभी न कभी मनोवैज्ञानिक परामर्श अवश्य लिया है और आधी से ज्यादा आबादी नियमित मनोवैज्ञानिकों के सम्पर्क में है। यहां विद्यार्थियों के लिए भी प्रत्येक स्कूल-कॉलेज की हर कक्षा के लिए अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों की सेवाएं निर्धारित हैं। स्कूल-कॉलेजों, उद्योगों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में मनोवैज्ञानिक परामर्श केन्द्र हैं। यहां तक कि किसी भी प्रकार की कोई बडी गंभीर बीमारी है, हार्ट का मामला है या किसी प्रकार की अन्य बडी सर्जरी का मामला है, डॉक्टर मरीज को पहले साइकोलॉजिस्ट के पास रेफर करता है और फिर अपना उपचार या सर्जरी करता है। कमोबेश यही स्थिति ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की है। रूस और चीन में भी मनोवैज्ञानिकों की मांग निरंतर बढ रही है।

खेल प्रतिस्पर्धाओं में और प्रत्येक टीम के आत्म-विश्वास व मनोबल को बनाए रखने के लिए मनोवैज्ञानिकों की भूमिका जग-जाहिर है। मनोवैज्ञानिक परामर्श के समय हमें अपनी मन की उलझनें खुलकर बतानी चाहिए, ताकि सही समाधान का रास्ता मिल सके। परामर्श केन्द्र में आपकी पूरी गोपनीयता रहती है।

आत्महत्या के कारण

  • ब्रेन में सेरोटोनिन की कमी। प्रोजेस्ट्रोन हारमोन की गडबडी। मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन, अवसाद एवं अन्य मानसिक बीमारियां, अनिद्रा और दुश्चिंताएं।
  • भौतिकता की चकाचौंध में टिक पाने अथवा अत्यधिक महत्वाकांक्षाओं के दबाव में मां-बाप की बच्चों से उनकी क्षमता से अधिक अपेक्षाएं।
  • मां-बाप से बच्चों की बढती दूरियां।
  • परीक्षा में असफलता।
  • प्यार के संबंध में गलत अवधारणा, आकर्षण को प्यार मान बैठना और प्यार में असफलता। 
  • क्षमता से अधिक कर्ज। 
  • शराब, नशीले पदार्थों, एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का दुष्प्रभाव।
    फास्ट फेक्ट

  • हत्या की तुलना में आत्महत्या से ज्यादा मौतें।
  • मध्यम वर्गीय परिवारों में आत्महत्याएं ज्यादा हो रही है।
  • एड्स, केंसर, दिल की बीमारी और फेंफडों की बीमारी से मरने वालों की संख्या की तुलना में आत्महत्या करने वालों की संख्या ज्यादा है।
  • 15 से 44 वर्ष की आयु में होने वाली मौतों में आत्महत्या तीसरा सबसे बडा कारण।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पिछले 45 वर्षों में आत्महत्या करने वालों की संख्या में 60 फीसदी बढोतरी हुई है। भारत में पिछले बीस वर्षों में ढाई गुनी हुई।
  • आत्महत्या करने वालों की तुलना में इसका प्रयास करने वालों की संख्या 20 गुना।
  • अवसाद ला-ईलाज बीमारी नहीं। इसके लिए जीवन भर दवाएं लेना भी जरूरी नहीं।
    आत्महत्या का विचार आने पर

  • परिवार के लोग घर का माहौल सकारात्मक बनाएं और ऐसे व्यक्ति के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाएं। उदास व्यक्ति से अधिक बातचीत करें, उसे ध्यान से सुनें.
  • सैर-सपाटे, धार्मिक या मनोरंजन के आयोजन कि व्यवस्था करें.
  • उसे भावनात्मक समर्थन दें, धैर्य-समझ-स्नेह और प्रोत्साहन दें.
  • दिनचर्या में व्यस्तता लाएं.
  • उसे डायरी लिखने को प्रेरित करें.
  • कार्य योजना बनाएँ.
  • साइकोलोजिस्ट से सम्पर्क करें।
  • घर में हथियार, एसीड या जहरीली वस्तुएं न रखें।
  • नशे और नींद की गोलियों का सेवन न करें।
  • सावधानी पूर्वक ऐसे मित्र का चयन करें, जिसे आप अपने दिल का दर्द या परेशानियां बता सकें।
  • कभी भी रोनी सूरत और शिकायती लहजा न रखें.
  • मनोवैज्ञानिक परामर्श केन्द्र में परामर्श प्राप्त करें।
    सावधानियां बरतें

  • लोग समझते हैं कि आत्महत्या करने वाले कभी किसी को बताते नहीं हैं या जो बोलते हैं वे आत्महत्या नहीं करते, किन्तु अध्ययन बताते हैं कि आत्महत्या करने वालों में 80 फीसदी ऐसे हैं, जो मरने से पहले किसी को न किसी को अपने आत्महत्या का विचार बता देते हैं।
  • यह मिथ है कि आत्महत्या करने पर आमादा व्यक्ति किसी की नहीं सुनता और मर जाता है। सच्चाई यह है कि आत्महत्या करने वालों में से अधिकांश के मन में यह भावना होती है कि मैं आत्महत्या का प्रयास करूं और कोई मुझे बचा ले, मेरा दर्द कोई सुने, मेरी तकलीफ या कारणों की तरफ किसी का ध्यान जाए और समाधान हो जाए। ऐसे मामलों में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका भी काफी कारगर होती है।
  • आत्महत्या के विचार वाला व्यक्ति बार-बार आत्महत्या का प्रयास कर सकता है।
  • आत्महत्या करने वाले सभी लोग मानसिक रोगी हों यह जरूरी नहीं, कई लोग क्षणिक आवेग में भी ऐसा कदम उठा सकते हैं।
    रिस्क फेक्टर्स

  • लगातार उदासी या खालीपन. दो सप्ताह से ज्यादा काम-काज में मन नहीं लगना.
  • जिंदगी व भविष्य के बारे में निराशाजनक विचार आना.
  • अकेलापन अच्छा लगना व बहुत कम बात करना.
  • ध्यान लगाकर काम नहीं कर पाना, कमजोर स्मृति महसूस करना, थकावट महसूस करना.
  • जिन परिवारों में पहले कोई आत्महत्या कर चुका है, उन्हें मामूली से डिप्रेशन में भी सावधानी बरतनी चाहिए।
  • कोई पहले आत्महत्या का प्रयास कर चुका है।
  • कोई पहले डिप्रेशन, एंग्जाईटी, ओसीडी, सिजोफ्रेनिया, हिस्टीरिया या अन्य किसी मानसिक रोग का शिकार रहा है या वर्तमान में मानसिक रोगों से ग्रस्त है।
  • कोई नींद की गोलियां अथवा अवसाद निरोधक दवाएं ले रहा है।
  • परिवार में किसी की आकस्मिक मृत्यु, तलाक या प्रेम में असफलता।
  • सामाजिक प्रताडना या उपेक्षा का शिकार।
  • नशीली दवाओं, नशीले पदार्थों या शराब का बहुत ज्यादा सेवन करने वाले।
  • बहुत क्रोधी अथवा पारिवारिक लडाई-झगडों से प्रभावित।
  • जिनके घरों में हथियार अथवा जहरीली चीजें हैं।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

सत्य की गवेषणा करें !


सत्य की गवेषणा करें !

सत्य की गवेषणा कब हो सकती है? क्या आपको आपकी दशा से प्रतीत होता है कि ‘आप सत्य के अर्थी हैं’? संसार के प्रति रोष और मोक्ष के प्रति गाढ राग रखे बिना क्या पारमार्थिक सत्य प्राप्त हो सकता है? नहीं प्राप्त हो सकता है, क्योंकि जो अर्थ एवं काम के रसिक हैं, जो अर्थ एवं काम में अपना कल्याण मानते हैं और इसके लिए धर्म को भी ताक में रख देते हैं, जो संसार की सुरक्षा और वृद्धि के लिए ही उत्सुक हैं, जो अवकाश मिलने पर जैसे भी देव-गुरु मिल जाएं उन गुरु की इच्छानुसार सेवा करने से अधिक कुछ करने के लिए तत्पर नहीं हैं, वे सत्य की गवेषणा नहीं कर सकते हैं।

सत्य की गवेषणा करनी हो तो पुद्गल की ओर से दृष्टि हटनी चाहिए और आत्म-कल्याण की ओर दृष्टि जमनी चाहिए। आत्म-कल्याण करना है, ऐसा आपका ध्येय बन जाना चाहिए और उसके लिए मोक्षार्थी बनना चाहिए। आप यदि मोक्षार्थी बन जाओ तो आपके लिए सत्य की गवेषणा अत्यंत सरल हो जाए। आत्मा को डूबने से बचाए, पुद्गल की ओर जाने से रोके और आत्मा के गुणों को विकसित करने की प्रेरणा दे, ऐसे चारित्रवान सुगुरुओं की शरण प्राप्त कर आत्मा इस काल में भी मोक्षमार्ग की शक्ति अनुसार आराधना कर सकते हैं। ऐसे चारित्रवान सुगुरु अल्प मात्रा में ही सही, लेकिन आज भी हैं और इस काल के अंत तक रहेंगे, बात सिर्फ उन्हें पहचानने की है और कुगुरुओं से बचने की है।

केवल काल की महिमा यही है कि वंचक भी अधिक उत्पन्न होंगे। जिस शासन के नाम पर मौज करते हैं, जिस शासन के नाम पर मान-सम्मान का उपभोग करते हैं, जिस शासन के नाम पर लोगों में पूजे जाते हैं और जिस शासन के नाम पर संसार में गुरु बने घूमते हैं; उसी शासन के लिए वे वंचक शत्रु का कार्य करेंगे। जिनकी ओर से शासन की प्रभावना की आशा कर सकते हैं, वे ही शासन की बदनामी करेंगे और शासन की बदनामी के कारणभूत होते हुए भी, शासन के प्रति वफादार निर्दोष एवं पवित्र मुनियों पर झूठे कलंक लगाएंगे।

यद्यपि शासन समर्पित साधुओं को वस्तुतः व्यक्तिगत आक्रमणों की परवाह नहीं होती, परन्तु उन वंचक वेशधारियों के पाप से कतिपय आत्मा सन्मार्ग से च्युत हो जाएंगे और वे उन्मार्ग पर बढ जाएंगे। ऐसे समय में कल्याणार्थियों को तो अधिकाधिक सावधान होना चाहिए। अशक्ति के कारण आराधना कम-अधिक हो उसकी वैसी चिन्ता नहीं है, परन्तु आराधना के मार्ग से भ्रष्ट न हो जाए, इसकी तो पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। जहां तक हो सके वहां तक आराधना अधिक करने की भावना तो सम्यग्दृष्टि की होती ही है, परन्तु किसी वंचक के जाल में फंसकर मार्ग न चूक जाए, यह विशेष संभालने योग्य है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 7 सितंबर 2014

कोतवाल के वेश में चोर


आज वेशधारी वंचक लाखों रुपयों का व्यय उन्मार्ग की पुष्टि में करवा रहे हैं। अधर्म में भी धर्म मनवा कर वेशधारी वंचक उदार एवं विवेकी श्रावकों के धन का भी पानी करवा रहे हैं। जो क्षेत्र आज अभावग्रस्त हैं और जिन सुक्षेत्रों की पुष्टि एवं वृद्धि के लिए आज बहुत कुछ करने की जरूरत है, उन सुक्षेत्रों की ओर वेशधारी वंचक उदार श्रावकों के हृदय में अरुचि उत्पन्न कर रहे हैं और अपनी ख्याति आदि के लिए धर्म के नाम पर कितना ही धन व्यय करवा रहे हैं। इस प्रकार भी श्री जैन शासन पर आक्रमण करने वाले पुष्ट बनें और बढें, उन वेशधारी वंचकों की जय-जयकार होती रहे, ऐसा भी आज बहुत-बहुत हो रहा है। यह कतई उचित नहीं है। धन का व्यय करने वाला यदि धर्म के, शासन के लिए समर्पण की भावना से अनुप्रेरित होकर कर रहा है तो यह उसकी भावनाओं का शोषण है, इसमें शासन की हानि है।

सोचो कि वेशधारी वंचक किस प्रकार इस शासन को हानि पहुंचाने वाले हैं और आराधना के कार्य में विक्षेप डालने वाले हैं। भगवान की अनुपस्थिति में रक्षक तो वे ही हैं न? वे रक्षक मिटकर भक्षक बनें तब भयानक अनर्थ मचेगा, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। ऐसा समय भी आ जाए कि सुसाधुओं को भीतर ही भीतर जलते रहना पडे। शासन का भयानक अहित हो रहा हो, उसे देख तो सके नहीं और वेशधारी वंचकों ने वातावरण ऐसा बना दिया हो कि बोलना भी कठिन हो जाए। उस दुःख के कारण अन्तर में ही जलता रहना पडे अथवा अन्य कुछ हो?

सहस्रावधानी, समर्थ महापुरुष, आचार्य भगवान् श्री मुनिसुन्दरसूरिश्वर जी महाराजा को कहना पडा है कि ‘कोतवाल के वेश में बहुत चोर घूमते हैं, वहां क्या हो? राजा-विहिन राज्य जैसी इस शासन की दशा हो गई है’। भगवान श्री महावीर परमात्मा को सम्बाधित करके उन महापुरुषों ने श्री अध्यात्म-कल्पद्रुम के देव-गुरु-धर्मशुद्धि नामक बारहवें अधिकार में बताया है कि, ‘हे वीर! मुक्ति-मार्ग के वाहक के रूप में आप द्वारा स्थापित शासन में, इस कलियुग में बहुत लुटेरे उत्पन्न हुए हैं, जो यति नाम धारण करके भी भोले मनुष्यों की पुण्य रूपी लक्ष्मी को लूट रहे हैं। राजा रहित राज्य में क्या कोतवाल चोर नहीं होते हैं?’

ऐसे शब्दों का उच्चारण कब हुआ होगा? शासन में साधु कोतवालों के स्थान पर हैं, परन्तु उन कोतवालों में से बहुत से चोर बन गए हैं। और जहां कोतवालों के रूप में नियुक्त व्यक्तियों में से ही अधिकांश व्यक्ति चोर बन जाएं तो फिर शेष बचे कुछ प्रामाणिक, वफादार, सत्वशील कोतवालों को भी घबराहट हो जाए तो आश्चर्य की बात नहीं है। कोतवालों के वेश में चोर बने साधुओं से शासन श्रेष्ठ कैसे रह सकता है? जो पुण्यात्मा चकोर बनकर विराधना से बचेंगे और आराधना में तत्पर बनेंगे, वे इस काल में भी अपना कल्याण सर्वोत्तम प्रकार से कर सकेंगे, बाकी तो जिसका जैसा भाग्य! -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा