सभी जीव शान्ति चाहते हैं, अशान्ति कोई नहीं चाहता, लेकिन
शान्ति और अशान्ति के साधन के बारे में अनेक मतभेद हैं। एक जिसे अशान्ति का कारण
मानता है, दूसरा उसे शान्ति का साधन मानता है। एक को जिसके योग में शान्ति लगती है, दूसरे
को उसी के योग में अशान्ति लगती है। आजकल सभी लोग येन-केन-प्रकारेण अपना स्वार्थ
साधने में लगे हैं,
उससे दूसरे को कष्ट पहुंच रहा है, इसकी
रत्तीभर चिन्ता उन्हें नहीं है। यह वृत्ति कई बार इंसान को जानवर से भी बदतर बना
देती है। विवेकी मनुष्य के मन में होता है कि मुझे जिस तरह अनुकूलता पसंद है और
प्रतिकूलता पसंद नहीं है,
वैसे सभी जीवों को अनुकूलता अच्छी लगती है और प्रतिकूलता
खराब लगती है। इसलिए मुझे ऐसा व्यवहार करना चाहिए जो किसी के लिए प्रतिकूल न हो और
जिसके कारण किसी को अशान्ति न हो। ऐसी वृत्ति से आपको अवश्य ही शान्ति मिलेगी और
धर्म आए बिना नहीं रहेगा,
क्योंकि किसी की पसंद में बाधक न बनना हो तो ‘मुझे
कैसे जीना चाहिए’,
यह भाव पैदा हुए बिना नहीं रहेगा और इससे आज जो मनुष्य, मनुष्य
कोटि में आने लायक नहीं रहा है, वह सच्चा मनुष्य बन जाएगा।-सूरिरामचन्द्र
शुक्रवार, 16 जून 2017
गुरुवार, 15 जून 2017
शान्ति दे, वह धर्म
धर्म की एक सर्वसाधारण व्याख्या है कि ‘जो आत्मा की अशान्ति को हटाकर
शान्ति प्रदान करे,
उसे धर्म कहते हैं।’ जीवन में अशान्ति पैदा करने
वाली परिस्थितियों के बावजूद जिसके कारण शान्ति का अनुभव किया जा सके और जिसके
कारण क्रमशः सम्पूर्ण शान्ति बिना मांगे मिले, वही धर्म है। जीवन में शान्ति
की कितनी जरूरत है और यह कितनी कीमती है, इसका पता वास्तव में तब चलता
है, जब अशान्ति के समय आदमी को रास्ता नहीं सूझता है। जीवन में कुछ ऐसे प्रसंग, कुछ
ऐसे संयोग उपस्थित होते हैं कि आदमी अपनी सुध-बुध खो बैठता है, मन
पर काबू खो बैठता है। उस समय उसकी बुद्धि काम नहीं करती। क्या करे, क्या
न करे, यह समझ में नहीं आता और उसे अशान्ति की आग घेर लेती है। ऐसे समय में कितना भी
धृष्ट आदमी क्यों न हो,
उसे शान्ति का महत्त्व ज्ञात हो ही जाता है। इसी शान्ति को
जो प्राप्त कराए और अशान्ति को दूर करे, वह धर्म है। जो शान्ति से
जीने दे और शान्ति से मरने दे, वह धर्म है। इतना होने पर भी दुःख की बात
यह है कि इस आर्य देश में जन्म पाए मनुष्य ऐसी चीजों में उलझ गए हैं कि उन्हें
इतने महत्त्व की बात पर सोचने-विचारने की मानो फुरसत ही नहीं हो। वास्तव में
शान्ति और अशान्ति देने वाले कारणों पर तात्त्विक विचारों के आदान-प्रदान की
प्रवृत्ति हमारे यहां लगभग बंद सी हो गई है।-सूरिरामचन्द्र
बुधवार, 14 जून 2017
तप के बिना इंसान शैतान हो जाता है
‘अहिंसा, संयम
और तप रूप धर्म उत्कृष्ट मंगल है। जिन आत्माओं का अंतःकरण धर्म में सदा लीन रहता है, उन
आत्माओं को देवता भी पूज्य मानते हैं।’ अहिंसा, संयम
और तप रूप धर्म की उत्कृष्ट आराधना करने की जो शक्ति मनुष्य में है, वह
देवों में भी नहीं है। इसी कारण देव भव से मनुष्य भव को ऊंचा माना गया है। यह बात
बराबर खयाल में आ जाए तो अपना अनुचित वर्तन अखरे बिना और जीवन सुधरे बिना नहीं
रहेगा।
धर्म के तीन भेद अहिंसा, संयम और तप बतलाए हैं। उसमें सबसे पहले तप
को समझना चाहिए। तप के साथ संयम आने लगता है और संयम आएगा तो अहिंसा भी अवश्य
आएगी। इसलिए कह सकते हैं कि व्यक्ति जब तक तपस्वी नहीं बनता है अथवा तपस्वी बनने
की इच्छा नहीं करता है,
तब तक इंसान नहीं बनता है। सिर्फ भूखे-प्यासे रहना, उसी
को तप नहीं कहा जाता है। ज्ञानियों ने इच्छा निरोध को तप कहा है। आज अनेक
तपस्वियों को यह बात खयाल में नहीं है। सदाचार की नींव इच्छा-निरोध है। इच्छा
निरोध का अभाव आदमी को शैतान भी बना दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आज मनुष्य
का व्यवहार-वर्तन कैसा है?
हम सच्चे मनुष्य हैं या नहीं? इसका विवेक पूर्वक
प्रतिदिन थोडा विचार किया जाए तो स्वयं को खयाल आ सकता है।-सूरिरामचन्द्र
मंगलवार, 13 जून 2017
पशुओं से अधिक हिंसक है स्वार्थी मनुष्य
आत्मा, पुण्य, पाप आदि का जिसे खयाल नहीं और जो संसार-सुख का तीव्र पिपासु है, ऐसा
मनुष्य, जगत के लिए श्रापरूप न बने तो एक आश्चर्य ही होगा। विषय-कषाय में आनंद और
अर्थ-काम के योग में सुख मानने वाले मनुष्य हिंसक पशुओं से भी ज्यादा खतरनाक हैं।
स्वार्थी मनुष्य जितना उपद्रव मचाता है, उतना उपद्रव पशु भी नहीं
मचाते हैं। संसार में आसक्त मनुष्य में दुनियावी पदार्थ पाने व उन पदार्थों के
संग्रह-संरक्षण की जो भूख होती है, वैसी भूख और संग्रहवृत्ति
पशुओं में भी नहीं होती है। मनुष्य योजनापूर्वक जो अमर्यादित हिंसा करता है, उतनी
हिंसा पशु भी नहीं करता है। मनुष्य योजनापूर्वक पाप करता है और उन पापों को छिपाता
है। कई ऐसे ठग होते हैं जो सरकार से भी पकडे नहीं जाते हैं और कदाचित् पकडे जाएं
तो वकीलों द्वारा अपना बचाव कर लेते हैं। आज मनुष्य मात्र के सभी पाप प्रकट हो
जाएं तो कानून के हिसाब से ही कितने लोग जेल से बाहर रहने योग्य निकलेंगे? ऐसे
मनुष्यों को मानव कहें या राक्षस, यही विचारणीय है। जगत में ऐसे मनुष्य
ज्यों-ज्यों बढते हैं,
त्यों-त्यों उपद्रव भी बढते हैं, यह
स्वाभाविक है।-सूरिरामचन्द्र
सोमवार, 12 जून 2017
पुण्य-पाप ही साथ जाने वाले हैं
यह सत्य है कि जो जन्मे हैं उनका मरण निश्चित है। इच्छा या अनिच्छा से, मरे
बिना चलता नहीं है। किन्तु,
यह विचार करो कि मरता कौन है? आत्मा मरती नहीं है।
आत्मा तो है और रहने वाली है। यहां से मरण के बाद सारा खेल समाप्त हो जाता होता तो
ज्ञानियों ने धर्म का उपदेश न दिया होता। किन्तु, यहां से मरने के बाद
खेल समाप्त नहीं होता है। यहां से मर कर जो आत्माएं मोक्ष में नहीं जाती है, उन
समस्त आत्माओं के लिए यह नियम है कि यह शरीर छूटा और कृतकर्मानुसार निश्चित समय
में नूतन शरीर का संबंध बन जाता है। मनुष्य मरता है, उसके साथ उसके
पुण्य-पाप नहीं मरते हैं।
आप जानते हैं कि यह शरीर यहां रहेगा, किन्तु कार्मन और तेजस शरीर
साथ में जाता है। मनुष्य यहां से मरता है, इसलिए पुण्य-पाप के योग से
दूसरे स्थान पर निश्चित समय पर वह आत्मा नवीन शरीर धारण करता है। इससे यह स्पष्ट
है कि पुण्य-पाप यह सभी आत्मा के साथ ही जाते हैं। इसीलिए बांधे हुए कर्म शान्ति
पूर्वक भोगने के सिवाय या तप आदि से उन्हें खपाए बिना सुख के अर्थी को छुटकारा
नहीं है। कर्म का संबंध छूटे नहीं, वहां तक मरण के पीछे जन्म
निश्चित है। कर्म से छूटना और कर्म छूटने के योग से दुःख और जन्म से मुक्त होना ही
सच्चे सुख का मार्ग है।-सूरिरामचन्द्र
रविवार, 11 जून 2017
मौत तो निश्चित है !
जिनका जन्म हुआ, उनका मरना निश्चित है। मरण के बाद जन्म
नियम से होता ही हो,
ऐसा नहीं है। जो-जो मरते हैं, वे-वे जन्म लेते हैं, ऐसा एकान्त
नियम नहीं है। किन्तु जो-जो जन्मते हैं, वे मरण प्राप्त किए बिना नहीं
ही रहते, यह तो निश्चित ही है। अनंतकाल में अनंत आत्माओं ने मरण के बाद वापस जन्म नहीं
लिया, ऐसा हुआ है। किन्तु अनंतकाल में एक भी आत्मा ऐसा नहीं जन्मा कि जो वापस मरा
नहीं हो। मृत्यु के साथ जन्म यह एकान्त नियम नहीं है, किन्तु
जन्म के साथ मुत्यु यह एकान्त सत्य है। यहां से मरकर श्री सिद्धगति को प्राप्त
आत्माएं यानी मोक्ष में जाने वाली आत्माएं पुनः जन्म नहीं लेतीं। जो जन्म लेगा, उसकी
मृत्यु निश्चित है।
आप मरोगे या नहीं?
आज जिस शरीर का आप संस्कार करते हैं, बारम्बार
साफ किया करते हैं,
जिसके ऊपर अत्यंत मोह रखते हैं, वह
एक दिन अग्नि में भस्मीभूत हो जाएगा, ऐसा आपको लगता है? शरीर
यहां रहेगा और आपको अपने कर्मों के साथ किसी अन्यत्र स्थान पर जाना पडेगा, ऐसा
लगता है? आपका सर्वाधिक प्रिय स्नेही आपके शरीर को मोटी-मोटी लकड़ियों पर सज्जित करेगा, आपके
शरीर पर बडे-बडे लकडे रखेगा और उसके बाद उसमें आग लगा देगा, इतना
ही नहीं आपका शरीर जल्दी से जल्दी भस्मीभूत हो इसके लिए वह आग में घी और डालेगा, राल
फेंकेगा ताकि जल्दी से जल्दी आग पकडे और दाह-संस्कार फटाफट हो, ऐसा
आपको लगता है?
लोगों को मरते हुए या उनके शव के दाह संस्कार को तो आपने आपकी जिन्दगी में कई
बार अवश्य देखा होगा। कभी आपको लगा कि एक दिन मेरे शरीर की भी यही हालत होनी है? किसी
के अंतिम संस्कार के लिए,
किसी को जलाने के लिए श्मशान गए हो, तब
कभी आपको ऐसा लगा कि इस प्रकार से किसी दिन मेरे शरीर को भी स्नेहीगण, संबंधीगण, पडौसी
आदि ले जाएंगे और मेरा खून ही मेरे शरीर को आग लगा देगा? धन-सम्पत्ति
कुछ भी साथ नहीं लेजा सकोगे।
आपको यह निश्चित हो कि मेरा यह शरीर अमर रहने वाला है तो बोलो..! किन्तु भयंकर से भयंकर पापात्माएं भी अंतिम कोटि के नास्तिक होने पर भी
यह बात तो अंत में जानते हैं कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि जिस दिन इस शरीर को कोई
संग्रह करने वाला नहीं है। या तो जला देंगे या तो दफनाकर छोड देंगे। मानो कि अशुभ
के योग से जो कोई ऐसे स्थान में मरे हों तो जंगल में पशु-पक्षी, चील-कौए
उसका भक्षण करेंगे। समुद्र इत्यादि में फेंक देंगे, किन्तु शरीर के लिए
ऐसा कुछ न कुछ होने वाला ही है, यह निश्चित बात है। तो फिर संसार में
संसार को और बढाने की लालसा या हायतौबा क्यों, राग-द्वेष, छल-कपट किसके लिए....? -सूरिरामचन्द्र
शनिवार, 10 जून 2017
अहंकार और चापलूसी डुबोने वाले हैं
वर्तमान मौजशोख के साधन व भौतिकता की चकाचौंध में ही जो स्वर्ग व मोक्ष की
कल्पना करता हो,
उसे तो धर्मशास्त्र भी सिर्फ बोझारूप लगेंगे। भावी जीवन को
सुधारने और आत्महित की चिंता के प्रति जो बेपरवाह हैं, उन्हें
अपने स्वयं के दोष सुनने की इच्छा भी नहीं होती है, फलस्वरूप शिष्ट
पुरुषों का समागम और तत्त्वचिंतन आदि गुणों का आगमन बन्द हो जाता है और जीवन में
अहंकार आ जाता है। ऐसे लोगों को फिर चापलूसी ही अच्छी लगती है, जो
स्वयं भी डूबता है और दूसरे को भी डुबो देता है। चापलूसी तीन घोर घृणित दुर्गुणों
का मिश्रण है- असत्य,
दासत्व और विश्वासघात। आज अधिकांश लोगों को चापलूसी ही पसंद
है, उनमें अपनी कमियां या क्षतियां सुनने की ताकत नहीं रही है, इस
कारण कोई खरी-खरी कहे तो बुरा लगता है; परन्तु जब आत्मज्ञान होगा, तब
अपनी भूल बताने वाले उपकारी लगेंगे।-सूरिरामचन्द्र
शुक्रवार, 9 जून 2017
मर्यादा का दिवाला निकल रहा है
मर्यादा रहेगी वहां तक धर्म रहेगा। महापुरुष भी किसी की निश्रा में रहते थे, उनकी
आज्ञानुसार चलते थे। आज चारों ओर मर्यादा का दिवाला निकलता जा रहा है। कोई किसी की
सुनने या मानने को तैयार नहीं। पुत्र माता-पिता की बात नहीं मानते और विद्यार्थी
शिक्षक का उपहास करते हैं। आज युवकों की क्या दशा है, यह
तो अखबार पढनेवाले आप लोगों को मालूम ही है, ये युवक अपने बाप के भी बाप
बन गए हैं। और प्रोफेसर के भी प्रोफेसर बन गए हैं। कॉलेजों के संस्थापक कॉलेजों को
कैसे चलावें,
इस चिंता में हैं। दुनिया में पढे-लिखे गिने जानेवाले अपनी
होंशियारी का उपयोग भी दुनिया को परेशान करने में और स्वयं का स्वार्थ साधने में
कर रहे हैं।
आत्मा का ज्ञान हुए बिना, जितना अधिक पढा जाए उतना अधिक गंवारपन आता
है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज के कॉलेज हैं। आत्म-ज्ञान से रहित व्यक्तियों को
ज्ञान देने का यह परिणाम है। आत्म-ज्ञान से, धर्म से जीवन में मर्यादा आती
है और मर्यादा होने से घरों का संचालन भी ठीक तरह से होता है। मर्यादा से रहित
घरों में हमेशा झगडे हुआ करते हैं। मिथ्याज्ञान पाकर आपके लडके आपके न रहें यह आप
सहन कर सकते हैं,
परन्तु सम्यग्ज्ञान से आपके लडके आपके न रहकर साधु बन जाएं
तो यह आप सहन नहीं कर सकते। कैसी गजब की बात है? -सूरिरामचन्द्र
गुरुवार, 8 जून 2017
वृद्धाश्रम समाज के लिए शर्म की बात
आज आप लोगों के घरों में बुजुर्गों की स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘जो
कमावे वह खावे और दूसरा मांगे तो मार खावे’। ऐसी स्थिति हो जाने के कारण
ही इस देश में वृद्धाश्रम या विधवाश्रम की बातें चलने लगी हैं। ऐसे आश्रम स्थापित
हों, यह कोई गौरव की बात नहीं है; अपितु उन बुजुर्गों और विधवाओं के
परिवारों के लिए तथा समाज और संस्कृति के लिए शर्म की बात है।
आपसे मेरा पहला प्रश्न यह है कि आपका राग आपके माता-पिता पर अधिक है या
पत्नी-बच्चों पर अधिक है?
भगवान पर राग होने का दावा करने वाले को मेरा यह
महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। योग की भूमिका में माता-पिता की पूजा लिखी है, पत्नी-बच्चों
की नहीं। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि आज के लोगों को कम से कम कीमत की कोई चीज
लगती हो तो वह उसके मां-बाप हैं।-सूरिरामचन्द्र
बुधवार, 7 जून 2017
जंगली जमाना
देश बरबाद हो रहा है। मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य
जीवों को तो मानो जीने का अधिकार ही नहीं, ऐसी हवा फैलगई है। वर्तमान
युग, हिंसक युग है। जिस युग को आप अच्छा मानते हैं, वह घोर घातकी युग है।
लाखों जीव काटे जाते हैं;
वह भी कानून का ठप्पा लगाकर। आप इस हिंसा को रोक भी नहीं
सकते। यदि रोकने का प्रयत्न करो तो ‘देशप्रेमी’ न
गिनाओ। आज मनुष्य,
मनुष्य से घबराकर चलता है। जानवर से तो थोडी दूरी पर रहे तो
निर्भय, परन्तु मनुष्य तो पीछे पडजाता है। अतः उससे डरकर रहना पडता है। ऐसा यह युग है।
कैसा विचित्र है यह युग !! इतनी अधिक अधोगति हो रही है, तथापि
‘प्रगति हो रही है’
ऐसा बोलने वालों को लज्जा तक नहीं आती। यह अचरज की बात नहीं
है? ऐसा जंगली जमाना तो कभी नहीं रहा होगा।
आजकल एकता की बातों के नाम पर ही एकता के टुकडे हो रहे हैं। धर्म के नाम पर
जाति के नाम पर राजनीति हो रही है। भूतकाल में जो एकता थी, वह
आज देखने को नहीं मिलती। अमेरिका का अनाज यहां आता है, परन्तु
यहां के एक प्रांत का अनाज दूसरे प्रांत के काम नहीं आता। विदेशी भी अनाज देकर कोई
उपकार नहीं करते! वे अपना कचरा यहां सरका देते हैं और यहां की अच्छी चीज वहां जाती
है। कैसी विरोधाभासी और विनाशक नीतियां है और कहते हैं कि प्रगति हो रही है। यह
कितने शर्म की बात है! आज देश का उद्धार नहीं, अधःपतन हो रहा है। शक्ति बढने
के साथ आपके घरों में मौज-शौक के साधन तो बढते ही जाते हैं, परन्तु
धर्म के साधन बढते हुए कहीं नजर नहीं आते हैं।-सूरिरामचन्द्र
मंगलवार, 6 जून 2017
तृष्णा का आतंक
मन की तृष्णा ने आज कितना भयानक आतंक फैलाया है? पिता-पुत्र, पति-पत्नी, बडा
भाई, छोटा भाई,
सास-बहू इन सब लोगों के बीच का व्यवहार देखो। जरा सोचो तो
सही एक दूसरे के लिए कितनी ईर्ष्या, द्वेष-भावना दिल में भरी हुई
है? मन की तृष्णा बढी है। पर-वस्तुओं को प्राप्त करने की व भोगने की लालसा बढी है
और त्याग-भावना नष्टप्रायः हो गई है। इसके परिणामस्वरूप आज के संसार में भयानक
भगदड और भागदौड मच रही है। लोग भौतिकता की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं। जब तक मन
की भयानक भूख नहीं मिटेगी और त्याग की भावना पैदा नहीं होगी, तब
तक ऐसी भगदड और भागदौड मची रहेगी, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। इस तरह
विचार किया जाए तो अवश्य समझ में आएगा कि मन की भौतिक भूख ही सारे विनाश का कारण
है। संसार के प्रति अरुचि न हो तो, धर्म किस काम का? अधिक
प्राप्त करने के लिए धर्म किया जाता हो तो वह धर्म, धर्म रहता ही नहीं, धंधा
हो जाता है, बिना पैसे के धंधे जैसा। आज आपको साधुओं की आवश्यकता क्यों है? बहराने
के लिए? इनके पगल्ये हों तो घर में लक्ष्मी के पगल्ये हो जाएं इसलिए? या
धर्म करने हेतु शास्त्र की विधि का ज्ञान आवश्यक है इसलिए?
पूर्व के कई जन्मों के असीम पुण्योदय से यह मानव जीवन मिला, आर्य
संस्कृति और उच्च कुल मिला,
धर्म गुरुओं का सान्निध्य और धर्म श्रवण का लाभ मिला, वैभव
मिला। पूर्व संचित पुण्य से जो कुछ मिला उसे भोग कर नष्ट कर रहे हो और पुराना
पुण्य का खाता बन्द कर रहे हो और भौतिक संसारी सुख में बेभान होकर नया पाप का खाता
चालू कर रहे हो तो आगे क्या बनोगे- कीडे मकोडे, सांप-बिच्छू? अरे
कुछ तो समझो!-सूरिरामचन्द्र
सोमवार, 5 जून 2017
धर्म संघ के लिए पांच बातें
जो अर्थ-काम को हेय माने, धर्म-मोक्ष को उपादेय माने, वही
संघ में गिना जाए। संघ छोटा हो तो हर्ज नहीं, लेकिन वह भगवान की आज्ञा
मानने वाला हो।
धर्म संघ के चारित्र का मूलाधार तादात्म्य तथा प्रेम है। यह मेरा संघ है, मैं
इसका अंश हूं,
इसकी भलाई में ही मेरी भलाई है; यह
भाव जब उत्पन्न होता है,
तब संघ-चरित्र का निर्माण होता है। मेरे कार्य से संघ को
भले ही लाभ न हो,
कम से कम हानि तो न हो; यह भाव उत्पन्न होने पर संघ
का चारित्र प्रकट होता है। जब यह विचार जाग्रत होता है और अहो रात्र संघ का चिन्तन
होता है, संघ को उठाने का,
संघ-समाज को सुखी करने का, संघ के प्रत्येक
व्यक्ति के प्रति कर्त्तव्य पूर्ति का विचार होता है, मैं
रहूं या न रहूं,
उससे क्या; संघ रहना चाहिए, यह
सोच बनना चाहिए।
चरित्र या स्नेह का आधार एकात्मता है। जो इस एकात्मता को पहचानेगा, वही
स्नेह कर सकेगा,
वही असुखी होते हुए भी प्रेम करेगा। अतः केवल चारित्र्य का
आग्रह करने से चारित्र्य निर्माण नहीं होगा, उसके लिए ठोस आधार लेना
पडेगा। प्राचीन काल से चला आनेवाला हमारा संस्काररूप जीवन, जिसे
संस्कृति कहते हैं,
वही सामान्य अधिष्ठान है। उसके जागरण से ही एकात्मता संभव
है। प्रत्येक व्यक्ति एकात्मता का व्यक्त रूप है, यह समझ कर समाज की
सेवा करना ही धर्म है। जैसे जीवाणु शरीर की सेवा करते हैं, कोई
भी आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करता; वैसे ही समाज को एकात्मस्वरूप
जानकर (केवल मानकर नहीं) जीवन को समष्टिरूप समाज की सेवा में लगा देना ही जीवन का
साफल्य है। एकात्मता का भाव ही समाज को सुसंगठित रूप दे सकेगा।
शारीरिक शक्ति आवश्यक है, किन्तु चरित्र उससे भी अधिक महत्व का है।
बिना चरित्र के केवल शारीरिक शक्ति मनुष्य को पशु बना देगी। चरित्र की शुद्धता ही
वैभव एवं महानता की जीवन-प्राण होती है।
यदि महान जागतिक लक्ष्य में हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें प्रथमतः
अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। हमें वादों की मानसिक श्रृंखलाओं और आधुनिक जीवन
के व्यवहारों तथा अस्थिर फैशनों से मुक्ति कर लेनी होगी। परानुकरण से बढकर संघ की
अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती। हम स्मरण रखें कि अन्धानुकरण का अर्थ प्रगति नहीं, वह
तो आत्मिक पराधीनता की ओर ले जाता है।
समाज इसे समझे और वैश्विक आवश्यकताओं पर खरा उतरे। आज चहूं ओर जो घोर निराशा व
भय का वातावरण है,
उसमें धर्म-संघ के
सिद्धान्त ही आशा की एक किरण हैं।-सूरिरामचन्द्र
रविवार, 4 जून 2017
अन्याय-अनीति का प्रतिकार होना ही चाहिए
जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, साधु का वेष पहिनकर
कोई अपने विपरीत आचरण द्वारा साधुता को ही कलंकित कर रहा हो, विरोधी
लोग देव-गुरु-धर्म की खुलेआम निंदा कर रहे हों, उन पर चोट पहुंचा रहे हों या
फिर अन्याय-अनीति से धर्म की हानि हो रही हो, अहिंसा को जड-मूल से उखाडने
की बातें चल रही हो;
ऐसे संकट की घडी में कोई सत्पुरुषों को सहनशील बनने की सलाह
दे तो उस सलाह को वे कभी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। उस समय वे खुलेआम कहते कि “ऐसे प्रसंगों पर ‘सहनशीलता’
धारण करने वाला ‘सहनशील’ नहीं
है, अपितु काम को बिगाडने वाला है, कायर है। यह सहनशीलता का गलत
अभिप्राय है। अरिहंत परमात्माओं ने, हमारे महापुरुषों ने ऐसी
सहनशीलता का सहारा कभी नहीं लिया, बल्कि इसके विपरीत ऐसी सहनशीलता का उपदेश
देने वालों को धिक्कारते और समाज को भी सावधान करते कि ऐसे लोगों से बचकर रहना, अन्यथा
तुम लुट जाओगे।
जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, देव-गुरु-धर्म पर हमला
हो, अन्याय हो;
तब उसका प्रतिकार न करना मानवता के लिए घोर कलंक है, श्रावकत्व
पर कलंक है, समाज पर कलंक है। सच्चा धर्मवीर ऐसे अन्याय के विरूद्ध अलख जगाता है। वह न तो
स्वयं अन्याय करता है और न अपने सामने होने वाले अन्याय को देख सकता है। वह सदैव
अन्याय और अनीति के प्रतीकार के लिए कटिबद्ध रहता है। अन्याय का प्रतिकार करने के
लिए देव-गुरु-धर्म-समाज-संस्कृति के चरणों में वह अपने प्राणों को हंसते-हंसते
बलिदान कर देता है।-सूरिरामचन्द्र
शनिवार, 3 जून 2017
मोक्ष-साधक यज्ञ
शरीर वेदिका है,
आत्मा यज्ञ की कर्ता है, तप अग्नि है, ज्ञान
घी है, कर्म समिधा (काष्ठ) है,
क्रोध आदि पशु हैं, सत्य यज्ञ स्तम्भ है, समस्त
प्राणियों की रक्षा ही दक्षिणा है और रत्नत्रयी (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
और सम्यग्चारित्र) त्रिवेदी है। इस प्रकार किया गया यज्ञ मोक्ष का साधन होता है।
रत्नत्रयी (सम्यग्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र) रूपी त्रिवेदी में स्थिर
होने वाली आत्मा स्वयं ही यज्ञ की कर्ता है और वेदिका अपना शरीर ही है। उसमें वह
तपस्या रूपी अग्नि जलाता है और उस अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए ज्ञानरूपी घृत
की धारा अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित रखी जाती है। उस प्रज्वलित अग्नि में कर्मरूपी
काष्ठों को डालकर क्रोध आदि कषायोंरूपी पशुओं की उसमें आहुति दी जाती है। सत्य
यज्ञ का स्तम्भ है। प्राणी-मात्र की रक्षा करना दक्षिणा है। इस प्रकार का मन, वचन
और कायारूपी तीनों योगों की तल्लीनतापूर्वक यज्ञ करने वाला मनुष्य उस यज्ञ को
मुक्ति का साधन बनाता है।-सूरिरामचन्द्र
शुक्रवार, 2 जून 2017
भोजन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
रात्रि को क्यों नहीं खाना? रात्रि भोजन के
परिणाम स्वरूप हमारे पेट में विजातीय द्रव्य इकट्ठा हो जाता है जो कि गैस्टिक
ट्रबल पैदा करता है। गैस्टिक ट्रबल से कोष्ठबद्धता कब्ज पैदा हो जाती है, जो कि अन्य नाना प्रकार की बीमारियों का कारण है। प्रमुखतया
नजला, जुकाम, बालों का छोटी उम्र में ही सफेद हो जाना और जडना (टूटना), बालों का पतला हो जाना, सिर दर्द, पेट में सडांध पैदा
होने के कारण पेट का बडा हो जाना, दाँतों में पायरिया
हो जाना, यानि मसूडों में पीप पड
जाना, गले में गिल्टियों का हो
जाना, काग का छिटक जाना आदि-आदि।
यदि हम अपने बढे हुए पेट को कम करना चाहें और अन्य बीमारियों से बचना चाहें तो
हमें भोजन दिन में ही करना होगा।
जो भोजन दिन में बनाया जाता
है, उसमें एक तो ओसजन गैस मिलती है, दूसरे उसमें जहरीले किटाणु जो सूर्य की गरमी के कारण नष्ट
हो जाते हैं, नहीं मिलते, जिसके कारण भोजन हल्का तथा सुपाच्य होता है। रात्रि में
बनाए भोजन में कार्बनडाई ऑक्साइड (जहरीला धुंआ) तथा जहरीले किटाणुओं का मिश्रण
होता है, जिसके कारण भोजन विषाक्त
तथा पचने में भारी होता है। अतः भोजन दिन का बना हुआ ही प्रयोग में लाना चाहिए।
भोजन जीने के लिए किया जाता
है, किन्तु आज लोग भोजन करने के लिए जीना चाहते हैं।
जब देखो खाना चलता ही रहता है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। श्रमजीवी लोगों को भोजन
दो बार करना उचित है। एक दिन में प्रातःकाल और दूसरा सांयकाल। किन्तु
विद्यार्थियों तथा बुद्धिजीवियों को भोजन दिन में एक बार करना चाहिए और वह भी अधिक
से अधिक 5 बजे
तक, ताकि दिन छिपने तक अर्थात्
जब तक ओसजन प्रचुर मात्रा में होती है, भोजन पच जाए। इसके बाद तो भोजन सडेगा ही।
जैन कुलों के लिए तो यह बात रूढ होनी चाहिए। कितना
अद्भुत है जैनाचार, लेकिन हम उसका पालन करें तो न..! हमारे पूर्वज इनका पालन करते
थे। ऐसा आचरण हमारे कुल के गौरव को बढाता था और पाप कर्मों के बंधनों से बचाता था, लेकिन आज? यदि जैनों को जो
मिला है, उसकी कीमत होती तो आज भी जैन शासन की अनोखी जाहोजलाली होती..! आज इस पर गंभीरता पूर्वक
चिन्तन की जरूरत है।-सूरिरामचन्द्र
गुरुवार, 1 जून 2017
कषाय पतले पड़े हैं?
सामान्य रूप से आपके लिए ऐसा माना जाता है कि आप में लोभ, आसक्ति, ममता
आदि हों, यह संभव है,
परन्तु इसमें आप प्रसन्न न हों; अर्थात्
आपको इसके लिए खटक तो होनी ही चाहिए। आप दान नहीं देते, ऐसा
नहीं; शील नहीं पालते,
ऐसा नहीं, तप नहीं करते, ऐसा नहीं; यहां
आप कितनी सारी धर्म-क्रियाएं करते हैं? आपके धर्म को देखकर सहज ऐसा
विचार होता है कि जो इतना अधिक धर्म करते हैं, उनमें अति लोभ, अति
आसक्ति, अति ममता आदि नहीं हो सकते!
अर्थात् आप जो ऐसा कहते हैं कि- निरूपाय (लाचारी वश) हमें करना पडता है, तो
इतने मात्र से क्या आप असत्य कहते हैं, ऐसा नहीं माना जा सकता? इन
धर्मक्रियाओं को करने वाला अति लोभी आदि हो, तो इससे इन धर्मक्रियाओं की
भी लघुता होती है। यदि योग्य रीति से इन धर्मक्रियाओं को किया जाए तो लोभ आदि घटने
ही चाहिए, चाहे संयोगवश निवृत्ति न ली जा सके।
जैसे कतिपय आत्माओं को अधर्म में इतना समय लगाना पडता है कि वे धर्म के लिए
कठिनाई से समय निकाल पाते हैं; तो भी ऐसी आत्माओं में से उत्तम हृदय की
आत्माएं भी होती हैं कि जो इस प्रकार मनोमन दुःखी होती हैं कि ‘मेरे
और मेरे आश्रितों का पेट भरने के लिए, धर्म लज्जित न हो, इस
तरह जीवन जीने के लिए,
मुझे ऐसा करना पडता है।
ऐसी सुन्दर देव-गुरु-धर्म की सामग्री मिली है, इसलिए धर्म करने की
बहुत इच्छा होती है। परन्तु, पुण्य की अपेक्षा पाप भी ऐसा किया कि ऐसी
सामग्री का लाभ नहीं उठा पाता। लोभ जोरदार नहीं, आसक्ति भान भुलाने
जैसी नहीं, परन्तु संयोग ऐसे हैं कि छोडे नहीं जा सकते। संयोग अच्छे हों तो धर्म के
अतिरिक्त कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती।’ क्या इस प्रकार का
अन्तर्द्वंद्व आपके भीतर चलता है? पाप क्रियाएं करते हुए मन में दुःख और
घुटन का अनुभव होता है?
क्या आपको बार-बार यह बात कचोटती है कि मुझ से संसार नहीं
छूट रहा, विरति नहीं ले पा रहा और घर-गृहस्थी में फंस गया हूं, इसलिए
मुझे निर्वाह के लिए यह सब करना पड रहा है, अन्यथा तो करने योग्य तो
सिर्फ धर्म ही है। यह चिंतन अनवरत रूप से चलना चाहिए।
‘विवशता
के कारण निवृत्ति नहीं ले सकते।’ यदि आपने इस रीति से धर्म किया होता और
चिंतन किया होता कि ‘करने योग्य तो धर्म ही है। मुझे पूरे समय धर्म में ही रत रहना चाहिए, लेकिन
नहीं रह पाता,
यह मेरी कमजोरी, विवशता, अशक्ति
है!’ तो इतने वर्षों में आपके कषाय बहुत पतले पड गए होते और विषय-सुख के प्रति भी आपको
अरुचि पैदा हो गई होती!-सूरिरामचन्द्र
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