शनिवार, 1 नवंबर 2014

जैन धर्म का सापेक्षवाद


सामान्य तौर पर अन्य दर्शन एक-एक नय को पकड कर चलने वाले हैं, जबकि श्री जैन दर्शन में सर्व नयों को अपने-अपने स्थान पर मान्य किया गया है। इस कारण किसी एक नय से मिलता हुआ प्रतिपादन भी श्री जैन शास्त्रों में मिलता है और इससे तत्त्व को नहीं समझने वालों को ऐसा लग जाता है कि जैन शासन सब दर्शनों को सच्चा मानता है। वस्तुतः जितने नयवादी दर्शन हैं, वे जहां तक अपने मत का निरूपण करते हों वहां तक, अर्थात् एक नय का प्रतिपादन करने मात्र से ही असत्य नहीं ठहराए जा सकते। परन्तु एक-एक नय को पकडकर चलने वाले दर्शन यहीं नहीं रुक जाते। ये दर्शन अन्य नयवादों को मिथ्या ठहराकर स्वयं को सत्य सिद्ध करना चाहते हैं। यहीं ये भूल करते हैं। श्री जैन शासन किसी भी एकांत नयवाद को असत्य मानता है। तो भी यह भूलना नहीं चाहिए कि श्री जैन शासन प्रत्येक नयवाद की बात अन्य नयवाद की अपेक्षा रखकर ही करता है।

जैन शास्त्रों में सब नयों को अपने-अपने स्थान पर विनियोग करते हुए मान्य किया गया है। अर्थात् निश्चय से परिकर्मित मतिवाले सम्यग्दृष्टि आत्माओं में सब नयों के विषय में सुन्दर माध्यस्थ्य भाव होता है, परन्तु इन आत्माओं का सब नयों के विषय में जो श्रद्धान होता है, वह सर्वनयों को अपने-अपने स्थान पर सत्य मानना होता है। जो जैन शास्त्रों को पढे हुए हैं, परन्तु उनके सच्चे अर्थ को समझे हुए नहीं हैं, वे जैन शास्त्रों में आई हुई सर्व-नय-श्रद्धा की बात को गलत रीति से प्रस्तुत करते हैं, परन्तु तत्त्ववेत्ता ऐसी बातों से भ्रमित नहीं होते।

इसी तरह कतिपय व्यक्ति जैन शास्त्रों के सब वाक्य मिथ्यात्वी हैं, ऐसा प्रतिपादन भी अविवेक के कारण करते हैं। जैन शास्त्रों की प्रत्येक बात सापेक्ष रूप से ही कही गई है। निश्चय नय का भी प्रतिपादन है और व्यवहार नय का भी प्रतिपादन है। परन्तु, किसी भी एक का प्रतिपादन करते समय अन्य नय अपने-अपने स्थान पर भी असत्य हैं, ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता। श्री जैन शास्त्रों के रचयिता स्याद्वादी थे और इसलिए उनके वचनों में अन्य नयों की अपेक्षा को सूचित करने वाला स्यातपद साक्षात् न भी हो तो भी वह पद है ही’, ऐसा मानकर उन उपकारियों के वचनों को समझना चाहिए और उनका वर्णन करना चाहिए। श्री जैन शास्त्रों के सब वाक्य मिथ्यात्वी हैं’, ऐसा कहने का अर्थ तो यह है कि श्री जैन शास्त्र मिथ्यात्वी वाक्यों के समूह रूप हैं’, ऐसा प्रकट करना! ऐसा कहकर श्री जैन शास्त्रों की आशातना करने का उद्देश्य न हो तो भी ऐसा बोलने से श्री जैन शास्त्रों की भयंकर कोटि की आशातना तो होती ही है। इसमें भी अनुपयोग से ऐसा बोल दिए जाने पर यदि बोलने वाले को वैसा आग्रह हो जाता है तो वह आभिनिवेशिक मिथ्यात्व का स्वामी बन जाता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

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