शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

आपके लिए आदर्श कौन?



शरीर-शुद्धि के लिए, उसमें प्रविष्ट रोगादि निकालने के लिए कितने प्रयास होते हैं? बाह्य सौन्दर्य के लिए जिस प्रकार प्रयत्न हो रहे हैं, क्या उसी प्रकार से आत्म-शुद्धि के लिए आपके प्रयास होते हैं? देह में तनिक गर्मी बढ जाए तो स्वतः ही चिकित्सक के पास जाना पडता है; भूख लगते ही तुरंत खाने लग जाते हैं; धन प्राप्ति के लिए विद्याध्ययन करना चाहिए, यह कहने की आवश्यकता नहीं रहती है; मौज-शौक के लिए क्या करना चाहिए, यह सिखाने की आवश्यकता नहीं है, यह तो सभी सीखे हुए ही हैं। धर्म-गुरु को तो यही सिखाना-समझाना है कि "जितनी बाह्य-शुद्धि की आप चिन्ता करते हैं, उतनी ही चिन्ता आप आत्म-शुद्धि की भी करिए।" यह गुरु को सिखाना है, क्योंकि आप यह अपने आप करने वाले नहीं हैं।

किसी से पैसे वसूलना, मार्ग में पैसे मिलें तो तिजोरी में रखना, पराया धन अपना बनाना, दूसरों से चालाकी करके अपना काम निकालना तो आप जैसों को सिखाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसके विपरीत सिखाना है। अतः मुझे तो आप लोगों को यह कहना चाहिए कि आप मार्ग भूल गए हैं, दिशा भूल गए हैं। पौद्गलिक स्वार्थ के लिए, देह की हाजरी बजाने के लिए पाप-कर्म आप न करें। आपके पास सबकुछ है, केवल एक मनुष्यत्व ही आप में नहीं है और आपके बंगले, बगीचे, शान-शौकत, परिवार, ऋद्धि-सिद्धि, गाडी-घोडे, मोटर आदि वस्तुएं मनुष्यत्व के बिना सब भयंकर हैं’, यह तनिक भी भूलना नहीं चाहिए।

आप किसे आदर्श के रूप में अपने समक्ष रखें तो आपके अन्तर में उठती विषय-वासनाओं की इच्छाएं और पापमय तृष्णाएं अपने आप नष्ट हो सकें? आप त्यागी को आदर्श के रूप में रखेंगे या रागी को? लालची को अपने समक्ष रखेंगे कि संतोषी व्यक्ति को? किसी लक्ष्मी के लोभी को आदर्श बनाएंगे या विरक्त व्यक्ति को? परन्तु, आपके हृदय में तो ऐसा विचार ही कहां है? आपका व्यवसाय जीवन के लिए है या व्यवसाय के लिए यह जीवन है? धन के लिए आप हैं या आपके लिए धन है? घर के लिए आप हैं या आपके लिए घर है? यदि पूछें कि क्या आप धर्म करते हैं?’ तो उत्तर मिलेगा कि समय नहीं है। व्यापार इतना बढ गया है कि विवश हैं। नींद भी अपने आप नहीं आती।ऐसा क्यों है? जीवन से धर्म चला गया, इसलिए नींद नहीं आती कि धर्म रह गया इसलिए? मनुष्यत्व का विकास हुआ है इसलिए सीधी नींद नहीं आती है या कि पशुता का विकास हुआ है इसलिए? आज धर्म-भावना नष्ट हो गई है, अतः आदर्श कौन हो सकता है, उसका भी ध्यान नहीं रहा। धर्म-वृत्ति नष्ट होने का कारण आत्मा के संबंध में विचारों का अभाव और पुद्गल एवं जड वस्तुओं के प्रति प्रेम है। आत्मा का ध्यान हो तो आत्म-हित का ध्यान आएगा और आत्म-हित का ध्यान आए तो धर्म-वृत्ति प्रकट होगी।-सूरिरामचन्द्र

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