रविवार, 9 अगस्त 2015

आज की युवा-शक्ति कहां जा रही है?



जो युवक अपने बल का प्रयोग दूसरों को सताने में करता हो, वह युवक सचमुच युवक नहीं है; अपितु अपने उस कार्य के प्रताप से वह राक्षस तुल्य लगता है। आज विश्व में जो उपद्रव चल रहे हैं, वे इस तथाकथित युवावस्था के नाम पर उन्मत्त बनकर भटकने वाले राक्षसों के प्रताप से हैं। जिस देश में युवक बहुसंख्यक हों, युवकों का बोलबाला हो क्या उस देश में बिचारे निर्बल दुःखी होंगे? जिस नगर में पुलिस अधिक हो, उस नगर में चोरियां कम होनी चाहिए या अधिक? जहां युवक नूतन सृष्टि का सर्जनहार माना जाता हो, वहां होना क्या चाहिए और हो क्या रहा है? आप अपने आपको युवक मानते हैं तो सोचो कि आपने किया क्या और करना क्या चाहिए था? युवक किधर जा रहे हैं, इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम अच्छे नहीं निकलेंगे, यह मानकर चलिए। इसलिए आज युवा पीढी को संभालने की सबसे ज्यादा जरूरत है।

‘काले सिर वाला मानव भला क्या नहीं कर सकता?’ यह बात कही जाती है तो यह किस विचार से कहा गया होगा? आज लोग कहते हैं कि ‘जहां युवक अधिक संख्या में एकत्र हों, वहां से चला जाना चाहिए, क्योंकि जब कोई युवक तर्क करते-करते परास्त होने लगेगा तो वह अंत में आपकी पगडी (इज्जत) उछालने की नीचता तक कर बैठेगा।’ आज के युवकों की यह इज्जत? यह प्रतिष्ठा? यह ख्याति? यह समस्त युवा वर्ग पर कलंक है। जिस सभा-समुदाय में युवक हों, वहां से क्या बुजुर्गों को भागना पडे? बालक तो बिचारे कहीं दब जाएं, क्योंकि वे ऐसे माहौल में सीखेंगे भी तो क्या? इस प्रकार की पैठ वाले युवकों का संसार में साम्राज्य हो जाए तो वे कैसी नवीन सृष्टि का सृजन करेंगे?

आज क्रान्ति शब्द खूब फैल गया है। बस, क्रान्ति करो, विद्रोह जगाओ, परन्तु क्रान्ति का सही अर्थ क्या है? अरे, आज तो क्रान्ति की डींग हाँकने वालों में से, क्रान्ति का नारा लगाने वालों में से अधिकांश तो उसका भावार्थ तक नहीं जानते। क्रान्ति किसे कहते हैं? क्रान्ति की संभावना कहां है? किसकी क्रान्ति होती है? क्रान्ति में से किसका सृजन होना चाहिए? कुछ पता नहीं! युवकों की प्रतिष्ठा ऐसी होनी चाहिए कि ‘वे स्वयं अपना बलिदान देकर भी बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की जान बचाएंगे, धर्म पर आँच नहीं आने देंगे।’ अपने विचार दूसरों पर थोपने हैं, पर किस तरह? क्या वकील अपना पक्ष न्यायाधीश को जंचाने के लिए स्टेज पर चढकर उसका गला पकडता है? युवक यदि अपने विचारों से लोगों को सहमत करना चाहते हों तो उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए? विद्रोह सुख का साधन न होकर, सब कुछ जला कर राख कर देने वाला साधन है। आप अपने विचारों को इतना प्रौढ और परिपक्व बनाइए कि समस्त संसार आपकी ओर झुक जाए, लोग स्वयंस्फूर्त आपकी शरण आएं।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 8 अगस्त 2015

युवावस्था में इन्द्रियों पर नियंत्रण जरूरी


युवावस्था में इन्द्रियों पर नियंत्रण जरूरी

सभी अवस्थाओं में युवावस्था अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। प्रायः इसके सदुपयोग और दुरुपयोग पर जीवन की सार्थकता अथवा निरर्थकता निर्भर करती है। आत्मा यदि सोच ले तो यह एक ऐसी अवस्था है, जिसमें मन वांछित कार्य सिद्ध किए जा सकते हैं। इस अवस्था में आत्मा यदि सन्मार्ग की ओर उन्मुख हो जाए तो वह विशिष्ट प्रकार की साधना करने में सक्षम होती है। इसी तरह यह अवस्था अत्यंत भयंकर, खतरनाक भी सिद्ध हो सकती है, क्योंकि यौवन के उन्माद में चढी आत्मा अपने सम्पूर्ण जीवन का सौन्दर्य नष्ट कर देती है और उसका भविष्य भी अनेक विपत्तियों से घिर जाता है। युवावस्था से यदि अधिक लाभ उठाना हो तो इस अवस्था को उचित दिशा दिए बिना चलेगा ही नहीं, क्योंकि उचित दिशा की ओर प्रवृत्त युवावस्था जितनी उपयोगी और लाभदायक सिद्ध हो सकती है, उतनी ही अनुचित दिशा की ओर प्रवृत्त होने पर अनुपयोगी एवं भयंकर सिद्ध होगी।

जिस मनुष्य ने अपनी युवावस्था किसी प्रकार के अपवाद, दोष अथवा उद्दण्डता के बिना व्यतीत कर ली, उसके समान पुण्यशाली आत्मा मिलना दुर्लभ है। मानव-जन्म का जो फल प्राप्त करना था, समझ लीजिए उस मनुष्य ने प्राप्त कर लिया, जिसने अपनी युवावस्था बिना अपवाद के व्यतीत कर ली। इस बात पर श्रद्धा रखने वालों के लिए विचारणीय है कि ‘युवावस्था में कौनसी क्रियाएं करें तो अपवाद मानी जाएं और कौनसी क्रियाएं करने पर अपवाद से बचा जा सके?’ युवावस्था में मन और इन्द्रियां मजबूत होती हैं। बाल्यकाल विषय-वासनाओं के योग्य नहीं होता और वृद्धावस्था शिथिल होती है। जीवन की सफलता-असफलता का आधार युवावस्था में तीव्र इन्द्रियों का सदुपयोग और दुरुपयोग है। यदि इन इन्द्रियों के आधीन हो जाएं तो कदम-कदम पर अपवाद आने में विलम्ब नहीं होगा। संसार में ऐसा कौनसा पाप है जो इन्द्रियों के आधीन हुई आत्मा न करे? संसार में ऐसा कौनसा बुरा कार्य है जो इन इन्द्रियों के वशीभूत मनुष्य नहीं कर बैठे? उस समय जो आत्मा इन्द्रियों के आधीन न हो, इन्द्रियों की विषय-लोलुपता से बच जाए, वह सचमुच बचा हुआ समझा जाएगा।

युवावस्था भयानक भी है और यदि इसका उपयोग उचित ढंग से किया जाए तो सुन्दर भी है। इन्द्रियों में जो शक्ति युवावस्था में होती है, वह किसी भी अन्य अवस्था में नहीं होती। इसलिए ज्ञानी भी लिख गए हैं कि ‘यदि युवावस्था में सावधानी से जीवन यापन न हो तो योगियों के मन भी विकार-वश हुए बिना नहीं रहते। यौवन अच्छे-अच्छों को उलझा देता है, जो न उलझे वो महात्मा है। ऐसा विकारों के वश में नहीं होने वाला युवक ही जीवन का सर्वाधिक सफल उपयोग कर सकता है। उसी युवक की वृद्धावस्था शान्त, स्थिर और सदाचार युक्त बन सकती है। और वही संसार में सद्विचारों का प्रसार कर सकता है।-सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

धर्म-सुख के तीन प्रमुख साधन



‘जो अपने लिए प्रतिकूल हो, उसका दूसरे के प्रति आचरण नहीं करना’, यह सुख प्राप्ति का, धर्म प्राप्ति का आदर्श माध्यम है, लेकिन आज जिस प्रकार की जीवन-शैली के हम आदी बन गए हैं, उसमें यह कह देना जितना सरल है, आचरण में लाना उतना ही मुश्किल। इसलिए इसे जीवन में लाने के लिए तीन प्रमुख साधन ज्ञानियों ने बताए हैं-

साधुसेवा सदाभक्त्या, मैत्री सत्त्वेषु भावतः।

आत्मीयग्रहमोक्षश्च, धर्म हेतु प्रसाधनम्।।

सदा भक्ति पूर्वक हृदय में सम्मान से साधुजनों की सेवा करने के लिए तत्पर रहना, यह सच्चे सुख का पहला साधन है। यह गुण जिस मनुष्य में हो, उसमें विनय, लघुता, ऋजुता, सरलता एवं नतमस्तक होकर चलने की आदत होगी। वह नम्र होगा, उसमें अक्कडपन नहीं होगा। गुरु-सेवा से इस लोक में प्राप्त होने वाले तीन महाफल हैं- 1. सदा शुभ उपदेश, 2. धर्माचरण करने वाले महापुरुषों के दर्शन और 3. विनय। इससे हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार आदि दुःख उत्पादक पापों से बचने के स्वाभाविक रूप से प्रयत्न होते हैं। परिणामतः सम्पूर्ण, शाश्वत व दुःख रहित सुख प्राप्त होता है।

विश्व में जितने प्राणी हैं, उन सबके प्रति परमार्थ वृत्ति से किसी भी प्रकार के लाभ की आशा किए बिना प्रीति, यह सुख प्राप्ति का दूसरा साधन है। निःस्वार्थ प्राणी मात्र के प्रति मित्रता की भावना वाली आत्मा में शुभ भाव उत्पन्न होते हैं और उस भाव रूपी पानी से द्वेष रूपी अग्नि शान्त हो जाती है, जिससे आत्मा अनुपम कोटि की शान्ति का अनुभव कर सकती है।

संसार के नश्वर पदार्थों से ममता का त्याग सुख प्राप्ति का तीसरा साधन है। घर, परिवार, ऋद्धि-सिद्धि, राज्य-सिंहासन, महल, सम्मान, मौज-शौक सब नश्वर हैं। ये सब आपके नहीं हैं। इन्हें नहीं त्यागोगे तो भी छोडकर जाना पडेगा। स्त्री, बच्चों के हाथ जोडकर कहोगे कि ‘मुझे जीवित रखो’ तो वे भी आपको जीवित नहीं रख सकेंगे। आयुष्य पूरा होने के बाद मरने वालों को कोई जीवित नहीं रख सकता। अधिक दुःख लगता होगा तो निकट खडे होकर रोएंगे और कष्ट में तनिक वृद्धि ही करेंगे। सभी पदार्थ इच्छा अथवा अनिच्छा से, हंसते अथवा रोते मन से अथवा बिना मन के त्याग कर जाना ही है, अतः वे आपके नहीं हैं, नश्वर हैं। उन पदार्थों के प्रति ममता को आत्मीयग्रह कहते हैं और उसका त्याग करना है। आत्मीयग्रह के त्याग से समस्त दोषों को उत्पन्न करने वाली और समस्त गुणों को नष्ट करने वाली ‘तृष्णा’ भी नष्ट हो जाएगी। जिस दिन सब पदार्थों के प्रति ममता नष्ट हो जाएगी, उस दिन प्राणी मात्र के प्रति प्रीति करने में और साधु की सेवा करने में कोई अडचन नहीं आएगी। ये तीनों अहिंसादि धर्म-प्राप्ति के साधन हैं।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्

प्राणी मात्र सुख चाहता है, इसमें कोई दो राय नहीं है। संसार की शानौशोकत और राग-रंग में सुख नहीं है; दुःख रहित, सम्पूर्ण और शाश्वत सुख धर्म में ही है। पाप से दुःख और धर्म से सुख होता है, यह भी तय है। तो हम इस पर विचार करें कि जिससे सुख मिलता है, वह धर्म कौनसा है? आर्यावृत्त के सर्वोत्तम आदर्शों के अनेक प्रतिबिम्बों में से एक सुन्दर प्रतिबिम्ब हृदय में धारण कर एक कवि ने संसार के प्राणियों को संक्षेप में सभी धर्मों का सार तत्त्व समझाने का प्रयास किया है-
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्।।
अर्थात् ‘धर्म का सर्वस्व जिसमें समाया है, ऐसे धर्म का सार सुनिए और सुनकर हृदय में उतारिए कि अपनी आत्मा को जो दुःखदायी लगे, वैसा आचरण दूसरों के साथ मत करिए।’
अपमान, तिरस्कार, मारपीट, गाली क्या आपकी आत्मा को अच्छी लगेगी? कोई बलवान मनुष्य यदि आपको सताए, आपका गला दबाए तो उससे आपको दुःख होगा या हर्ष? दुःख ही होगा। अतः मन में यह पक्का करना है कि ‘जितनी वस्तु मुझे दुःख रूप लगे, उनका मैं दूसरों के प्रति आचरण न करूं।’ इतना यदि प्रत्येक व्यक्ति सीख जाए तो संसार में कोई झगडा ही न रहे। यही उत्तम कोटि का धर्म है।
आप में मात्र इतना विवेक और विचार आ जाए कि ‘मेरा धन कोई चुरा ले तो मुझे कष्ट होगा, अतः मुझे भी किसी का धन नहीं चुराना है। मेरी अमानत कोई छीन ले या हडप कर जाए तो मुझे बुरा लगेगा, अतः मैं किसी की अमानत हडपने का विचार ही न करूं, मेरे साथ कोई छल-षडयंत्र करे तो मुझे बुरा लगेगा, अतः मैं किसी के साथ छल-षडयंत्र न करूं, मुझे कोई सताए तो मुझे दुःख होगा, अतः मैं किसी को नहीं सताऊं, मेरी कोई हंसी उडाए, उपहास करे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा, अतः मैं भी किसी की हंसी न उडाऊं, किसी का उपहास न करूं’, तो सारी समस्या ही समाप्त हो जाए। इसी का नाम मनुष्यत्व और मानवता है। यदि आप में यह विवेक नहीं है तो आप में मानवता नहीं है। यदि इस प्रकार का विवेक और विचार आ जाए तो अनीति, हिंसा, असत्य, चोरी, दूसरों के घर में बलात् घुसना, दूसरों का धन छीनना, क्रोध अथवा अक्कडपन रहेगा ही नहीं।
जो मनुष्य स्वार्थ, रस, लालसा, मौज-शौक आदि के लिए हजारों मनुष्यों, जीवों को कष्ट पहुंचाने में हिचकिचाते, लजाते नहीं हैं और ऐसी हिंसा में ही जिन्हें आनंद आता है, वे वास्तव में तो कभी सुखी नहीं हो सकते। ‘मैं कभी भी, किसी हालत में, किसी के प्रति प्रतिकूल आचरण नहीं करूंगा’, यह बात पूरी तरह पालन करने की भावना जिस दिन आप में आ जाएगी, समझिए सच्चे सुख का प्रारम्भ हो गया।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 5 अगस्त 2015

संसार के पदार्थों से सच्चा सुख नहीं



सभी सुख चाहते हैं, मांगते हैं, सुख की इच्छा करते हैं, फिर भी सभी को जब-तब यही शंका रहती है, मन में यही सवाल खडा होता है कि आखिर सुख का साधन है क्या? सुख है कहां? यह कितना आश्चर्यजनक है? किसी ने बताया कि पैसे में सुख है, तो उसमें भी दिवाला निकल गया। दूसरे ने कहा, ‘पैसे तो मिले पर पल भर की भी शान्ति नहीं है।’ तीसरा बोला, ‘लक्ष्मी तो बहुत है, पर खाने वाला कोई नहीं है।’ चौथा कहने लगा, ‘खाने वाला तो है, पर वह पागल हो गया है।’ और पांचवें ने कहा, ‘सब कुछ है, पर शरीर बिगड गया है।’ हिन्दुस्तान के शहंशाह कहते हैं कि ‘देश में विद्रोह भडक उठा है।’ वे भी दुःखी हैं। उनके मन की वे जानें, आपके मन की आप जानें। बहरहाल, सुख-शान्ति कैसे मिले, हमें तो यह सोचना है। जहां राज्य, जाहोजलाली, लक्ष्मी, रिद्धि-सिद्धि, बडप्पन, मान-सम्मान हो; वहां भी सुख-शान्ति न दिखे तो शास्त्र की शरण पकडनी चाहिए न? शास्त्र बताते हैं कि सुख किसी भिन्न वस्तु में है।

आप जिन वस्तुओं की प्राप्ति में सुख मान रहे हैं, उनसे सर्वथा भिन्न किसी अन्य वस्तु में सुख निहित है। यह बात आपके हृदय में बैठ जाए तो अच्छा है। सुख का उत्तम साधन वही है जो सबको समान सुख दे सके। जो किसी एक को सुख पहुंचाए और दूसरे को मारे, वह सुख का साधन नहीं है। सुख का साधन समष्टिगत होना चाहिए। संसार की कोई भी वस्तु अपनी आत्मा को सुख प्रदान नहीं कर सकती। संसार को तो दुःख रहित, पूर्ण और स्थाई सुख चाहिए। जो सुख प्राप्त होने के पश्चात् कभी दुःख का प्रभाव होने ही न पाए और न किसी की ईर्ष्या हो। आज अनेक मनुष्य तो ईर्ष्या से दुःखी हैं। जब तक निम्न कोटि की भावना रहेगी, तब तक ईर्ष्या भी जीती-जागती रहेगी। ईर्ष्या से जलकर राख होना पडता है। संसार के पदार्थ आपको सुख देने में समर्थ नहीं हैं, अतः हम मौज-शौक, ऐशोआराम और अमन-चैन में मस्त लोगों को त्यागी बनने की प्रेरणा और परामर्श देते हैं। बडे-बडे बंगलों में से भी अन्त में एक दिन बाहर निकलना पडेगा और आपका अपना खून ही आपको आग में राख कर देगा।

संसार की समस्त सामग्री निरर्थक है। उसमें फंसकर कहीं आपके सुख के मनोरथ चूर-चूर नहीं हो जाएं, इसलिए सर्वस्व परित्याग कर बाहर निकलने का हम आपको आह्वान करते हैं। कोई यह न कह दे कि हमें आप भिखारी क्यों बना रहे हैं? भिखारी तो वे होते हैं जो रोटी के लिए रोते हैं, बडों के प्रेम, कृपा और अनुकम्पा के लिए खुशामद करते हैं। जो अपने स्वरूप में स्थिर रहें, वे भिखारी नहीं हैं। जिस वस्तु में घुसकर आप बैठे हैं, वह दुःखदायी है। इसलिए हम आपको वहां से बाहर निकलने को कहते हैं, क्योंकि तभी आप सुख प्राप्त कर सकते हैं। -सूरिरामचन्द्र