सोमवार, 19 मई 2014

तप-संयम मुक्ति के लिए


अहिंसा, संयम और तप मुक्ति के लिए हैं, संसार की साधना के लिए नहीं हैं। तपस्वी की लोग भले ही पूजा करें, परन्तु लोगों के पूजने के कारण तपस्वी तो यह मानता है कि जिस तप की संसार पूजा करता है, उस तप की मुझे तो सर्वाधिक पूजा करनी चाहिए। अपनी पूजा के लिए तप नहीं होना चाहिए। तप के कारण तपस्वी की पूजा है, संयम के कारण संयमी की पूजा है; इस पूजा से अहंकार नहीं आना चाहिए, बल्कि तपस्वी को तप में, संयमी को संयम में और अधिक दृढ होना चाहिए, ताकि लोगों का तप और संयम के प्रति विश्वास बढे, वे भी मोक्ष-मार्ग के लिए तप और संयम के मार्ग पर अग्रसर होने के उत्सुक बनें।

आज धर्म कदाचित् कतिपय धर्मात्माओं के अज्ञान के कारण बिगड रहा हो, ऐसा कई लोगों को दिखाई देता होगा, कई लोग ऐसी बातें भी करते हैं; परन्तु आपका संसार तो पूर्णतः सड-गल गया है। बिगडे हुए को तो फिर भी सुधारा जा सकता है; सडे हुए को सुधारा नहीं जा सकता। सडे हुए को तो काट कर फेंक ही देना पडेगा। सडे-गले की सर्जरी करने की आपकी तैयारी होगी तो बिगडे हुए अपने आप सुधर जाएंगे।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 18 मई 2014

पापात्माओं से बचें


धर्मीति ख्यातिलोभेन, प्रच्छादितनिजाश्रवः।
तृणाय मन्यते विश्वं, हीनोऽपि धृतकैतवः।।1।।
आत्मोत्कर्षात्ततो दम्भी, परेषां चापवादतः।
बध्नाति कठिनं कर्म्म, बाधकं योगजन्मनः।।2।।

'कपट को धारण करने वाली आत्मा धर्मीपन की ख्याति के रूप से स्वयं के आस्रव को छुपाकर, स्वयं हीन होते हुए भी जगत को तृण के समान मानते हैं।'

'उस कारण से दम्भी आत्मा स्वयं का उत्कर्ष करके और दूसरों के अपवाद बोलकर, योगजन्म के बाधक बनने वाले कठिन कर्म को बांधते हैं।'

इस विश्व में मायावी और प्रपंची आत्माओं का पंथ ही अलग होता है और इसी कारण से ऐसी आत्माएं स्वयं के पंजे-परिचय में आने वाली आत्माओं का जितना अहित न करे, उतना ही कम है तथा विश्व के उपकारियों को नीचा दिखाने की बेशर्मी की, जितनी कार्यवाही न करे, उतना कम है! ऐसी आत्माओं के द्वारा कोई भी अच्छा कार्य करवाने की आशा रखना, उसके जैसी भयंकर मूर्खता दूसरी एक भी नहीं है। इसलिए कल्याण के अर्थी सभी आत्माओं का तो यह कर्त्तव्य है कि ‘ऐसे शासन के सत्य की और इस सत्य का प्रचार करने वाली आत्माओं को गलत रीति से नीचा दिखाने की कोशिश करने वाली, कराने वाली और करने वाले को इरादापूर्वक सहयोग देने वाले पापात्माओं से स्वयं की जात को बचानी चाहिए, ऐसे पापात्माओं के सहवास से बचने में ही कल्याण है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 17 मई 2014

आत्मा को न ठगें


मनुष्य तो बहुत कुछ कर सकता है, पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, उसका विवेकपूर्ण विचार उसे स्वयं को करना चाहिए। जैन शासन की मान्यता है कि बाल्यकाल में ही संसार त्यागा जा सके तो अत्यंत आनंद की बात और न त्यागा जा सके तो आत्मा ठगी गई समझना चाहिए। त्याग कर जाने की प्रतीक्षा करता रहे और सिर पर श्वेत बाल उगने से पूर्व घर से निकल जाए, तब तो फिर भी ठीक है कि इंसान संभल गया। श्वेत बाल चेतावनी देते हैं कि अब यहां से जाने की तैयारी है। उस समय तक भी यदि कुछ न हो सके तो समझना चाहिए कि वह इंसान बेपरवाह, बेभान है और अपने अगले जन्म की उसे कोई चिन्ता नहीं है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 16 मई 2014

कितना लज्जाजनक है?


जिन तारणहारों के हम अनुयायी हैं, उनके समान बनने की हमारे अन्तःकरण में अभिलाषा है या नहीं? हम जिनका अनुकरण करते हैं, उनके समान बनने की हृदय में तमन्ना तो होती है न? इसलिए वे ऐसे महान कैसे बने, यह ज्ञात करने का भी हम प्रयत्न करते हैं न? उनके जैसा बनने की इच्छा न भी हो, तब भी हम जैन कुल में जन्में हैं और जैन कुल जिन महापुरुषों के कारण गौरवान्वित है, हमें उन भगवान श्री जिनेश्वरदेवों के जीवन-चरित्रों से सम्पूर्णतया परिचित होना ही चाहिए न? अन्यथा हमें जैन कहलाने का भी क्या हक है?

तो हम इस अवसर्पिणीकाल में हुए भगवान श्री ऋषभदेव आदि चौबीस तीर्थंकरों के जीवन-चरित्रों से तो परिचित होंगे न? खासकर वर्तमान शासन के संस्थापक भगवान श्री महावीर परमात्मा के चारित्र से तो हम अच्छी तरह सुपरिचित होंगे ही न? ऐसे सवालों के समय जब आप मौन की स्थिति में रहते हैं तो क्या यह स्थिति श्री जिनेश्वरदेवों के अनुयायियों के लिए शोभनीय है? स्वयं का श्री जिनेश्वरदेवों के अनुयायी के रूप में परिचय देने वालों को उनके चरित्रों का भी ज्ञान न हो तो हमारे लिए लज्जा की बात तो है ही।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 15 मई 2014

बुद्धि पर पर्दा


आप में बुद्धि तो बहुत है, परन्तु पैसे के प्रेम ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है। आप जैसे लालचियों पर देवी-देवता खुश हों तो समझ लेना चाहिए कि वे भी कर्म के अधीन हैं। वे भी आपकी पूजा-भक्ति के लालची बने हैं, इसी कारण वे चोरों की सहायता करने निकल पडे हैं। अन्यथा तो वे भगवान की अवगणना करने वालों पर खुश होते ही नहीं।

पुण्योदय में सुख-मग्न हो जाए और पापोदय में रोने बैठ जाए, उसे पुण्य-पाप मानने वाला नहीं कहा जा सकता। पुण्य-पाप को मानने वाला तो बने वहां तक पाप करता ही नहीं और अल्प से अल्प देकर भी पुण्य किए बिना रहता ही नहीं। ऐसे पुण्यशाली के पीछे अधिष्ठायक देव घूमा करते हैं और इनके पीछे पडे हुओं से ये अधिष्ठायक देव दूर-दूर भागते हैं।

इस देश में पिछले दशकों में जो-जो घटनाएं हुई हैं और जो-जो उथल-पुथल हुई है, उन्हें देखने वालों को धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, पुण्य-पाप की पूरी श्रद्धा हो जानी चाहिए। परन्तु, आज के जीवों की बुद्धि इतनी कम हो गई है कि इस बात को समझने वाले बहुत विरल ही हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 14 मई 2014

आप उठें या गिरें, हमें क्या?


आप यदि अच्छी बातों को अंगीकार न करें और बुरी बातों को त्यागें नहीं, उसमें हमें क्या हानि है? ‘आप हमें पूजेंगे या हमें गाली देंगे’, ऐसी बातों का भय हमें नहीं है। हम तो उपकारियों की आज्ञानुसार जो-जो वस्तु आपको बिगाडने वाली है, उन्हें बिना किसी लाज-संकोच के आपको कह देना चाहते हैं। जो समझेंगे और मानेंगे उनका कल्याण हो जाएगा और जो विपरीत भाव वाले हों उनके लिए तो यही है कि ‘जैसा उनका भाग्य’। यदि हम आप से प्रभावित हो जाएं तो हम कर्तव्य च्युत होते हैं। इसलिए ठकुर सुहाती नहीं, खरी-खरी कहने का ही हमारा कर्तव्य है। आप अर्थ और काम में लिप्त व आसक्त हैं, उनसे आपको बचाने का प्रयत्न हमें करना है। आप बचना चाहते हैं या नहीं, आप बच सकेंगे या नहीं; परन्तु विशुद्ध बुद्धि से विशुद्ध प्रयत्न करने वाले को तो लाभ ही होगा। जब तक हम में उपकार वृत्ति और आज्ञापालन है, तब तक हम अपने कर्तव्य से भ्रष्ट नहीं होंगे, यह निश्चित है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 13 मई 2014

बोझारूप धर्मशास्त्र


वर्तमान मौजशोख के साधन व भौतिकता की चकाचौंध में ही जो स्वर्ग व मोक्ष की कल्पना करता हो, उसे तो धर्मशास्त्र भी सिर्फ बोझारूप लगेंगे। भावी जीवन को सुधारने और आत्महित की चिंता के प्रति जो बेपरवाह हैं, उन्हें अपने स्वयं के दोष सुनने की इच्छा भी नहीं होती है, फलस्वरूप शिष्ट पुरुषों का समागम और तत्त्वचिंतन आदि गुणों का आगमन बन्द हो जाता है और जीवन में अहंकार आ जाता है। ऐसे लोगों को फिर चापलूसी ही अच्छी लगती है, जो स्वयं भी डूबता है और दूसरे को भी डुबो देता है। आज अधिकांश लोगों में अपनी कमियां या क्षतियां सुनने की ताकत नहीं रही है, इस कारण कोई खरी-खरी कहे तो बुरा लगता है; परन्तु जब आत्मज्ञान होगा, तब अपनी भूल बताने वाले उपकारी लगेंगे।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 12 मई 2014

मरने के बाद मेरा क्या होगा?


‘मुझे यह शरीर छोडकर अन्यत्र जाना है’, इस बात को आज लगभग सभी भूल गए हैं। ‘यहां से जाने के बाद मेरा क्या होगा?’ यह चिन्ता आज लगभग नष्ट हो गई है। "मैं मरने वाला हूं", यह खयाल हर पल रहे तो जीवन में बहुत-सी समझदारी आ जाए। भावी जीवन को मोक्ष मार्ग का आधार बनाने के प्रयत्न शुरू हो जाएं। सिर्फ वर्तमान की क्रियाएं, पेट भरना, बाल-बच्चे पैदा करना और मौजमजा करना, ये क्रियाएं तो कौन नहीं करता है? तुच्छ प्राणी भी अपने रहने के लिए घर बना देते हैं, वर्तमान की इच्छापूर्ति करते हैं और विपत्ति में भागदौड भी करते हैं। मात्र वर्तमान का विचार तो क्षुद्र जंतुओं में भी होता है। भावी जीवन का विचार छोडकर जो सिर्फ वर्तमान के ही विचारों में डूबा रहता है, वह अपने कर्त्तव्य पालन से च्युत हुए बिना नहीं रहता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 11 मई 2014

देव-गुरु-धर्म पर हमला बर्दाश्त नहीं


सहनशीलता तो तभी प्रकट करनी चाहिए, जब खुद के ऊपर मुसीबतों का पहाड टूट पडा हो। जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, विरोधी लोग देव-गुरु-धर्म की खुलेआम निंदा कर रहे हों, उन पर चोट पहुंचा रहे हों या फिर अन्याय-अनीति से धर्म की हानि हो रही हो, अहिंसा को जड-मूल से उखाडने की बातें चल रही हो, और ऐसे संकट की घडी में कोई सहनशील बनने की सलाह दे तो ऐसी सलाह कभी भी बर्दाश्त करने योग्य नहीं है। ऐसे प्रसंगों पर ‘सहनशीलता’ धारण करने वाला ‘सहनशील’ नहीं है, अपितु काम को बिगाडने वाला है, कायर है। यह सहनशीलता का गलत अभिप्राय है। अपने फर्ज से आँखें मूंदने के लिए ऐसी सहनशीलता का सहारा कभी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके विपरीत ऐसी सहनशीलता का उपदेश देने वाले धिक्कारने योग्य हैं और समाज को भी सावधान होकर ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए, अन्यथा लुट जाएंगे। जब धर्म के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हों, देव-गुरु-धर्म पर हमला हो, अन्याय हो; तब उसका प्रतिकार न करना मानवता के लिए घोर कलंक है, श्रावकत्व पर कलंक है, समाज पर कलंक है। सच्चा धर्मवीर ऐसे अन्याय के विरूद्ध अलख जगाता है। वह न तो स्वयं अन्याय करता है और न अपने सामने होने वाले अन्याय को देख सकता है। वह सदैव अन्याय और अनीति के प्रतीकार के लिए कटिबद्ध रहता है। अन्याय का प्रतिकार करने के लिए देव-गुरु-धर्म-समाज-संस्कृति के चरणों में वह अपने प्राणों को हंसते-हंसते बलिदान कर देता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 10 मई 2014

मां तुम्हें प्रणाम्!


मां, इस एक शब्द में इतना प्यार, ममता, त्याग, तपस्या भरी हुई है कि किसी और तरह की व्याख्या की जरूरत ही नहीं है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की सन् 2005 की एक घटना है। 36 साल की एक मां तम्मी चेलवी ने खुद को पंखे से लटका कर आत्महत्या कर ली। हालांकि मैं उसके इस कदम को सिरे से खारिज करता हूं और उसके आत्महत्या करने को बिलकुल गलत और महापाप मानता हूं, लेकिन आप जानते हैं, उसने आत्महत्या क्यों की? इसलिए कि उसके दो बेटे कुमारन (17 वर्ष) और मोहन कुमार (15 वर्ष) दृष्टिहीन हैं और वह चाहती थी कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी दो आँखों में से एक-एक दोनों को मिल जाए, ताकि वे दुनिया देख सकें।

दरअसल चेलवी का पति शंकर और वह स्वयं कई स्थानों से कोशिश कर हार चुके थे कि उनके बेटों को ऑंखें दान में मिल जाएं। जब कहीं से मदद नहीं मिली तो पति-पत्नी ने तय किया कि दोनों में से जो पहले मरेगा, उसकी ऑंखें बच्चों को मिलेंगी। मां जल्दी में थी, बच्चे दुनिया देखें। वह फांसी चढ गई और दुर्भाग्य देखिए, उचित समय पर ऑंखें नहीं निकाली जा सकीं और दोनों रोते-बिलखते बच्चे मां की ‘कृपा-दृष्टि’ से वंचित हो गए।

विचार करें चेलवी का। वह मां थी। मां ऐसी ही होती है। हर मां चेलवी होती है। मां अपना हर दिन, हर घडी, हर पल बच्चों पर कुर्बान कर देती है और बच्चे हैं कि उनके पास इस दौडती-भागती, लडती-झगडती दुनिया में मां के लिए वक्त नहीं है, क्योंकि मां के लालन-पालन, आशीर्वाद से वे बडे हो गए, खडे हो गए हैं, बडे आदमी हो गए हैं, उनकी शादी हो गई है, उनकी पत्नी और बच्चों को वक्त की दरकार है, इसलिए वे अपनी मां के लिए वक्त नहीं निकाल सकते, मां के साथ मुस्कराने का भी वक्त नहीं।

मां के लिए इतना तो करें, उसे प्रणाम करें। बार-बार करें। हम मां के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते, हर पल हमारे मन में मां के प्रति और दुनिया की समस्त माताओं के प्रति कृतज्ञता भाव रहे।

मां स्नेह की, प्यार की, विश्वास की, प्रोत्साहन की और सम्पूर्ण त्याग की मां है। मां जादू है, मां शब्द उच्चारते ही लब खुल जाते हैं, मानो कह रहे हों, लो दिल के दरीचे खुल गए, अब भावनाओं की गांठें खोल दो, बहने दो मन को- मां जो सामने है। “मां” एक छोटे-से शब्द में समाए पूरे संसार के, हर इंसान के अस्तित्व के, परवरिश, प्यार और विश्वास के प्रमाण का नाम है। यह नाम तो हर पल के, हर तार में धडकता है। इसे एक दिन याद नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे तो किसी भी पल भुलाया ही नहीं जा सकता। महसूस करके देखिए, मां किस जादू का नाम है।

बच्चों की भलाई के लिए मां को कभी-कभी कठोर बनना पडता है, पर इसमें उसका दिल कितना दुखता है, यह तो बस वही जानती है। बच्चा अपनी बात, जिद, भावनाएं मां से बेझिझक कहलेता है, पर कई बार मां चाहकर भी बच्चों से कह नहीं पाती है, मैं हूं न!

बच्चे को मां नौ महीने तक गर्भ में रखती है, अपनी बाहों में तीन साल तक और अपने हृदय में तब तक, जब तक कि खुद उसकी मृत्यु न हो जाए।

मां और बच्चे के बीच ‘अमूक’ समझ होती है। मां की बच्चे से मनोभौतिक और बोधात्मक एकता होती है, इस एकता के लिए कोई अलग से प्रयास नहीं करना पडता, यह स्वतः स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से विकसित हो जाती है। यह मजबूत बोधात्मक बंधन जीवनपर्यन्त उपस्थित होता है, क्योंकि इसकी जडें जितनी चेतन में होती हैं, उतनी ही अचेतन में। मातृत्व की यह स्थिति दुनिया की सबसे प्राकृतिक अवस्था है, जो सबसे अधिक रहस्यमयी और सांसारिक है। यदि इसके तत्त्वों का विश्लेषण करना शुरू कर दिया जाए तो वहां मापने योग्य कुछ नहीं है, क्योंकि इसकी सीमाएं मानवीय बुद्धि से परे है, जिनकी गिनती संभव नहीं है।

जीवन की हर परिस्थिति में एक सच्चे मित्र और मार्गदर्शक की भाँति वह अपने शरीर के अंश का साथ देती है। जब भारी और अचानक आई विपत्तियां मनुष्य को घेर लेती हैं, जब समृद्धि का स्थान दुर्भाग्य ले लेता है, जब सुख में साथ देने वाले मित्र साथ छोड देते हैं और दुःख अपना घेरा चारों ओर बना देता है, तब वह अकेली इन विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं मोर्चा लेती है और कोशिश करती है कि उसके अंश पर कोई आंच न आए, वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अंश के लिए प्रोत्साहन का माध्यम बनती है। प्रेम और वात्सल्य की यह अवस्था उस स्थिति में भी बरकरार रहती है, जब बालक जिद्दी, कृतघ्न, चिडचिडा या बुरा हो, लेकिन मां को ऐसे में भी इस बात का गर्व रहता है कि उसने एक इंसान को जन्म दिया है, जो उसकी दृष्टि में दयालु, विनम्र, बहादुर और बुद्धिमान है।

पूर्वाभास की क्षमता

मां का हृदय बच्चे के लिए एक पाठशाला है, जहां एक शिक्षक की तरह अनुशासन और पालना देने वाली मां का एक स्पर्श तक शब्दों की दुनिया से परे होता है, जो बालक को एक सुरक्षित आवरण प्रदान करता है। यह अद्भुत् क्षमता मां की प्राकृतिक विशेषता है, जो मातृत्व-पूर्वाभास से जुडी है। मातृत्व पूर्वाभास में उपस्थित शक्ति मां को अपने बच्चे की अनकही पीडाओं और तकलीफों का आभास करवाती है, चाहे वह अपने बच्चे के साथ हो या उससे मीलों दूर। मां का यह स्वचालित शस्त्र इतना अधिक शक्तिशाली होता है कि बच्चा जब तक स्वयं खतरे का अनुभव कर पाए या उससे निबटने के लिए प्रभावी कदम उठा पाए, मां को उसकी विपत्तियों का आभास हो जाता है। दरअसल मानव के मस्तिष्क और आत्मा में संवाद के कई माध्यम होते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है और ये क्षमताएं मां और बच्चे में नैसर्गिक रूप से होती हैं; जहां भयानक मुसीबतों में बच्चे को बचाने की अद्वितीय शक्तियां मां के पास होती हैं। किसी बीमार या अक्षम बच्चे की देखभाल अपने जीवन के अंत तक करना या उसके जीवन के लिए अपनी जिंदगी का बलिदान देना, ऐसी ही विलक्षण शक्तियों का उदाहरण है।

मां की दुर्दशा और घर की इज्जत

यह मां की भूमिका, दायित्व और भावनात्मक अनुभूतियां हैं; लेकिन आज ऐसी ही कई माताओं की कैसी दुर्दशा है? इस सवाल पर सोचते हुए भी मन घबराता है, आकुल-व्याकुल होता है, उन संतानों को धिक्कारते हुए मन में एक अजीब-सा आक्रोश, वितृष्णा, दुःख और अफसोस का भाव अन्तर हृदय से उमडता है, जिन संतानों को मां की कद्र नहीं है, जो मां की उपेक्षा करते हैं, जो अपनी पत्नी को मां और मातृत्व का बोध नहीं करा सके, वे बहुएं निश्चित रूप से दुर्भाग्यशाली हैं, जो अपनी सासु मां का तिरस्कार करती हैं, ऐसी बहुएं जब मां बनती हैं तो उनका मां बनना सिर्फ वासनायुक्त परिणति होती है, वे उन अद्भुत् शक्तियों से वंचित रह जाती हैं जो एक मां को सहज रूप से प्राप्त होनी चाहिए। उनमें संवेदन शून्यता पैदा होती है जो कालांतर में उन्हें भी बेटे से दूर कर देती है।

अभी हाल ही कोटा की प्रेमलता जैन को उसका इकलौता बेटा-बहू पांच दिन के लिए मकान में बन्द कर ताला लगाकर मुम्बई-तिरूपति घूमने चले गए। वे पांच दिन का लुक्का-सूखा खाना एक साथ बनाकर मां के लिए छोड गए। तीन दिन बाद पडौसियों को भनक लगी कि मकान के अन्दर मांजी बन्द हैं तो उन्होंने पुलिस को बुलाया, पुलिस ने मकान के ताले तोडकर मांजी को बाहर निकाला। चौथे दिन अखबार में खबर पढकर ब्यावर से बेटी-दामाद कोटा पहुंचे और मां को अपने पास ले गए।

जयपुर के हीरे-जवाहरात के एक व्यापारी के यहां एक्साईज वालों ने छापा मारा तो घर पर कोई नहीं मिला, व्यापारी की मां छत पर सामायिक में बैठी थी, पास में एक टिफिन रखा था। छापा मारने वाली टीम का अधिकारी भी दरडा जैन था। वह समझदार/विवेकवान था। उसने मांजी के सामायिक पालने तक की प्रतीक्षा की। सामायिक पूरी होने पर अधिकारी ने परिवार के बाकी लोगों के संबंध में पूछा। मांजी ने बताया कि वे सभी बाहर पिकनिक पर गए हैं। अधिकारी ने उन्हें फोन कर बुलवाया। उनके आने तक अधिकारी ने मांजी से पूछा, इस टिफिन में क्या है? मांजी एकदम टिफिन पर लपकी और गोद में छुपाने लगी। अधिकारी ने कहा मांजी यह टिफिन हमें देखने दीजिए। मांजी ने विरोध किया, यह टिफिन मैं आपको नहीं दे सकती, इसमें मेरे घर की इज्जत है। अधिकारी ने महिला पुलिस के जरिए टिफिन जब्त कर खुलवाया तो उसमें लुक्की-सूखी बासी रोटियां और आचार था, जो मांजी की बहुएं मांजी के खाने के लिए छोडकर पिकनिक गई थीं।

यह तस्वीर का एक और रूप है, मां का एक और रूप कि घर में प्रताडना, उपेक्षा के बावजूद घर की इज्जत, बेटे की इज्जत को बचाना। समाज में ऐसी एक-दो नहीं, सैकडों घटनाएं घटित हो रही है। धिक्कार है ऐसे बेटे-बहुओं को।

मां के दिल की गहराइयों और सहनशक्ति को नापना संभव नहीं है। मां को अनेक तरह से परिभाषित किया जा सकता है, किन्तु किसी एक परिभाषा में बांधा नहीं जा सकता। मां हमारे जीवन की पहली पाठशाला है। वह हमारे सारे दुःख हर लेती है और हमारे जीवन को सुख, खुशियों से भर देती है। वह चिरस्मरणीय है, जीवन के अंतिम क्षण तक हम उन्हें नमन करें, उनके चरण पखार कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

शुक्रवार, 9 मई 2014

बुजुर्गों की हालत


आज आप लोगों के घरों में बुजुर्गों की स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘जो कमावे वह खावे और दूसरा मांगे तो मार खावे’। ऐसी स्थिति हो जाने के कारण ही इस देश में वृद्धाश्रम या विधवाश्रम की बातें चलने लगी हैं। ऐसे आश्रम स्थापित हों, यह कोई गौरव की बात नहीं है; अपितु उन बुजुर्गों और विधवाओं के परिवारों के लिए तथा समाज और संस्कृति के लिए शर्म की बात है।

मर्यादा रहेगी वहां तक धर्म रहेगा। महापुरुष भी किसी की निश्रा में रहते थे, उनकी आज्ञानुसार चलते थे। आज चारों ओर मर्यादा का दीवाला निकलता जा रहा है। कोई किसी की सुनने या मानने को तैयार नहीं। पुत्र माता-पिता की बात नहीं मानते और विद्यार्थी शिक्षक का उपहास करते हैं। मर्यादा होने से घरों का संचालन भी ठीक तरह से होता है। मर्यादा से रहित घरों में हमेशा झगडे हुआ करते हैं।

आपसे मेरा पहला प्रश्न यह है कि आपका राग आपके माता-पिता पर अधिक है या पत्नी-बच्चों पर अधिक है? मां-बाप ने आपको जन्म दिया है या पत्नी कहीं से लाई है? मां-बाप ने आपको पाला-पोषा है या पत्नी ने? भगवान पर राग होने का दावा करने वाले को मेरा यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। योग की भूमिका में माता-पिता की पूजा लिखी है, पत्नी-बच्चों की नहीं। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि आज के लोगों को कम से कम कीमत की कोई चीज लगती हो तो वह उसके मां-बाप हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा