गुरुवार, 20 नवंबर 2014

दिल में संसार थाइसलिए भटकना पडा


इतने समय तक हम संसार में भटके, यह किस कारण से? बाह्य दृष्टि से चार गतिरूप संसार भी कहा जाता है और अंतरदृष्टि से विषय-कषाय रूप संसार भी कहा जाता है। विषय-कषाय रूप संसार के प्रताप से चार गति रूप संसार में हम अनादिकाल से भटक रहे हैं। चार गति रूप संसार में भटकते-भटकते हमारा अनंतकाल बीत गया। इतने लम्बे समय तक चारगति रूप संसार में हम क्यों भटके? विषय-कषाय रूप संसार मौजूद होने से! विषय-कषाय रूप संसार मौजूद न होता तो इतने काल तक भटकना न पडता!

यह संसार दिल में कहां तक चिपका रह सकता है? जहां तक बोधि न आए वहां तक! जिसमें बोधि आ जाए, उसका दिल संसार में कदापि रंजित नहीं हो सकता। अतः दिल में से संसार को निकालना चाहिए। यह बात ज्ञानी कहते हैं या हम कहते हैं। लेकिन, ज्ञानियों की कही हुई यह बात हमारे हृदयों में बैठे और हमारी वाणी और व्यवहार में उतरे तो काम हो सकता है।

‘हमारा संसार अनादिकाल से चालू है, क्योंकि हमारे अंदर विषय-कषाय रूप संसार बैठा हुआ है। जहां तक बोधि प्राप्त न हो, वहां तक हृदय से संसार खिसकने वाला नहीं है और इसीलिए संसार में भटकना भी मिटने वाला नहीं है। संसार में सुख मिले भी तो वह क्वचित् स्वप्न जैसा और दुःख तो चालू है ही।’ ऐसा केवलज्ञानी ही कहें, ऐसा नहीं होना चाहिए; हम भी ऐसा कहें, ऐसा होना चाहिए। अब तक अनंतज्ञानी हो गए हैं और सबने यह बात कही है।

साधु भी बार-बार यही बात कहते हैं, फिर भी हम अब तक इस संसार में हैं, इसका कारण क्या है? ज्ञानियों द्वारा कही हुई बात जब तक हमारे दिल में पूरी दृढता के साथ जम न जाए, वहां तक हमारा संसार तो जैसा है वैसा ही बना रहने वाला है! यह बात यदि ठीक तरह से ध्यान में जम जाए तो बोधि की बहुमूल्यता का अनुभव हो सकता है। अर्थात् यह बात आपके हृदय से वाणीरूप में बाहर निकलनी चाहिए और यथाशक्ति व्यवहार में उतरनी चाहिए। ‘यह शरीर ‘मैं’ नहीं और यह शरीर या दुनिया का कोई पदार्थ ‘मेरा नहीं’, यह बात जिसके दिल में जमकर बैठ गई हो, उसका मन संसार में रंजित कैसे हो सकता है? फिर उसको किसी से न राग होगा और न द्वेष। किसी प्रकार के विषय-कषाय फिर उसे प्रभावित नहीं कर सकेंगे। वह रिश्तों में बैठा होकर भी रिश्तों में, मेरे-तेरे में उलझा हुआ नहीं होगा। कोई आकर उसे कहे कि ‘मैं आपका हूं’, तब वह मन में ऐसा समझता है कि बातों में तो ठीक है, व्यवहार को लेकर मेरा-तेरापन है, पर वास्तव में तो न मैं उसका और न वह मेरा है। ये सब सम्बंध कर्म के योग से ही पैदा होते हैं। वस्तुतः सम्बंध सच्चे हैं ही नहीं! ऐसा होते ही संसार पर विराम लग जाएगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 19 नवंबर 2014

सम्यग्दर्शन की महत्ता और दुर्लभता


अनंत उपकारी भगवान श्री जिनेश्वरदेवों के शासन में बोधि अर्थात् सम्यग्दर्शन को इस असार संसार में इतना अधिक दुर्लभ और साथ ही साथ इतने अधिक महत्त्व का माना गया है कि इस प्रकार की महत्ता और दुर्लभता, इस जीव के लिए और किसी भी वस्तु की नहीं मानी गई है। बोधि प्राप्त होने के पश्चात चारित्र आदि की प्राप्ति को भी दुर्लभ बताया गया है, परन्तु बोधि तो एक ऐसी दुर्लभ एवं महत्त्व की वस्तु है कि इसके योग से ही ज्ञान, सम्यग्ज्ञान की कोटि में और चारित्र, सम्यक चारित्र की कोटि में गिना जाता है। इसके अभाव में ज्ञान, सम्यग्ज्ञान की कोटि में नहीं गिना जाता और चारित्र भी सम्यक चारित्र की कोटि में नहीं गिना जाता।

संसार में कदाचित चाहे जितना सुख मिल जाए तो भी जहां तक आत्मा को बोधि की प्राप्ति नहीं होती, वहां तक अच्छे से अच्छा जन्म मिल जाने पर भी वह निष्फल होता है। इस संसार में अब तक हमारे अनन्त जन्म निष्फल गए हैं, वे एकमात्र इस बोधि के अभाव के कारण ही! इस जन्म में भी यदि सम्यग्दर्शन की बोधि की प्राप्ति न की जा सकी, तो अनंत जन्मों की तरह यह जन्म भी निष्फल हो जाएगा। इतनी सब सामग्रियों का सुयोग मिलने पर भी यदि बोधि प्राप्त न हो तो, क्या कहा जाए? इतनी सामग्री वाले हम लोगों का तो यह निर्णय होना चाहिए कि बोधि प्राप्त किए बिना इस जीवन को हम जाने नहीं देंगे।

दूसरों की दृष्टि केवल सांसारिक सुख की तरफ है और इससे वे राज्यादि ऋद्धि-सिद्धि को दुर्लभ कह कर रुक जाते हैं; परन्तु यह सब सामग्री वस्तुतः दुर्लभ नहीं है। ज्ञानी तो कहते हैं कि सचमुच दुर्लभ वस्तु तो सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन की अपेक्षा अन्य सब सांसारिक वस्तुएं सुलभ हैं। ऐसा होते हुए भी, मान लीजिए कि राज्यादि बडी ऋद्धि-सिद्धियां और भोग सुखों की सामग्रियां दुर्लभ हैं और पुण्य के कारण वे सब मिल भी गईं; परन्तु उसका परिणाम क्या? ये सब मिल जाए और सम्यग्दर्शन न हो तो क्या सही रूप में सुखी हो सकते हैं क्या? सम्यग्दर्शन के अभाव में ये सामग्रियां सुख देंगी या दुःख? सुख देंगी तो कितना और दुःख देंगी तो कितना देंगी? सुख तो नाम मात्र का और दुःख का पार नहीं!

जहां तक सम्यग्दर्शन प्राप्त न हो और उसके कारण जहां तक दिल संसार में रंजित रहा करता है, वहां तक संसार में भटकना भी चालू रहने वाला है। इसमें यदि क्वचित सुख मिलता है तो वह स्वप्न तुल्य है और शेष तो दुःख ही दुःख है। दिल में से संसार जब तक नहीं निकलता है, तब तक दुःख चालू रहने वाला है और संसार खडा का खडा रहने वाला है। आपको सुखी होना है या दुःखी? यदि सुखी होना हो तो इसके लिए सबसे पहले एक ही वस्तु आवश्यक है और वह है सम्यग्दर्शन।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

सम्यक्त्व का अनघ बीज धर्मश्रद्धा


जो भव्यात्मा मुक्ति को प्राप्त कर चुके हैं, प्राप्त करते हैं और प्राप्त करेंगे, वे सब भव्यात्मा ‘मनुष्यभव, आर्यक्षेत्र, धर्मश्रवण और धर्मश्रद्धा’ आदि समग्र सामग्री को पाकर ही मुक्ति में गए हैं, जाते हैं और जाएंगे। मनुष्यभव आदि जो सामग्री है, वह जीव को मिलना दुर्लभ है। परन्तु इस सामग्री में भी जीव को धर्मश्रद्धा प्राप्त होना अत्यंत सुदुष्प्राप्य है। मनुष्यभव से लेकर धर्मश्रद्धा को पाने के बाद भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूप मोक्षमार्ग की आराधना द्वारा ही भव्यात्मा मोक्ष को प्राप्त करते हैं।’

सम्यग्दर्शन गुण को पाने के पश्चात भी जो भव्यात्मा सर्वविरति, अप्रमत्तभाव और क्षपक श्रेणी अंगीकार करते हैं और क्षपक श्रेणी में राग-द्वेष का सर्वथा क्षय करने के बाद केवलज्ञान प्राप्त करते हैं; वे ही केवलज्ञान पाने के बाद आयुष्य के अंतिम भाग में अयोगीदशा पाकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। जो केवलज्ञान को पाते हैं, वे तो उसी भव में नियम से अयोगीदशा को पाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं, परन्तु क्षपक श्रेणी करने वाले सभी आत्मा केवलज्ञान को उसी श्रेणी में और उसी भव में पाते हैं, ऐसा एकांत नियम नहीं है। क्षपक श्रेणी का आरंभ कर दर्शन-सप्तक का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दर्शन गुण को पाकर भी कई आत्मा रुक जाएं, ऐसा भी हो सकता है। भव्यात्माओं को मोक्ष पाने के लिए इन सब सामग्रियों की अपेक्षा रहती है। इसलिए भव्यात्मा जिस समग्र सामग्री को पाकर मोक्ष पाते हैं, उन सब सामग्रियों की प्राप्ति दुर्लभ ही है, परन्तु उनमें धर्मश्रद्धा तो विशेष कर सुदुष्प्राप्य ही है।

धर्मश्रद्धा शब्द का प्रयोग सम्यक्त्व के कारण रूप में भी हो सकता है और सम्यक्त्व के अर्थ में भी। शास्त्रों में धर्मश्रद्धा शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग हुआ है। सहस्रावधानी आचार्य श्री मुनिसुंदर महाराज ने जयानंद केवली चरित्र में कहा है कि ‘धर्मश्रद्धा, सम्यक्त्व का अनघ बीज है।’ धर्मश्रद्धा का अर्थ धर्मकरणाभिलाषा भी हो सकता है। धर्म करने की जो अभिलाषा है, इसे भी धर्मश्रद्धा कहा जा सकता है। जो धर्मश्रद्धा सम्यक्त्व के अनघ बीजरूप है, उसी धर्मश्रद्धा की यहां बात है और इसीलिए धर्म श्रद्धा की प्राप्ति द्वारा सम्यग्दर्शन गुण की प्राप्ति होती है, ऐसा वर्णन किया गया है।

धर्मश्रद्धा को सम्यग्दर्शन का ‘अनघ बीज’ कहा गया है। अनघ बीज का अर्थ है ‘निर्दोष बीज’। निर्दोष बीज यदि योग्य भूमि में बोया गया हो और उसके बाद योग्य सामग्री मिल जाए तो वह बीज अपने संपूर्ण फल को देने वाला होता है। यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है। इससे आप समझ गए होंगे कि ‘धर्म श्रद्धा कितनी अनुपम वस्तु है।’ परन्तु यह धर्मश्रद्धा, जिसमें मोक्ष की अभिलाषा नहीं होती, उसमें प्रकट नहीं हो सकती।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 17 नवंबर 2014

सम्यग्दृष्टि की मनोदशा


‘मोक्ष सर्वोत्तम कोटि का साध्य है, धर्म उसका कारण है और मुझे धर्म के सेवन द्वारा मोक्ष को प्राप्त करना है’, इस प्रकार की मनोदशा को सम्यग्दर्शन गुण का बीज कहा जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि सम्यग्दर्शन गुण के प्रकटीकरण की तैयारी चल रही है। ऐसी मनोदशा अभव्यात्माओं में तथा दुर्भव्यात्माओं में प्रकट नहीं हो सकती। चरमावर्त को प्राप्त आत्माओं में भी जो मंद मिथ्यात्व वाले होते हैं, वे मिथ्यादृष्टि होते हुए भी ऐसी मनोदशा के स्वामी अवश्य बन सकते हैं। इस विषय में भी सम्यग्दृष्टि आत्माओं की मनोदशा और मिथ्यादृष्टि जीवों की मनोदशा में बहुत बडा अंतर होता है। चरमावर्त को प्राप्त मंद मिथ्यात्व वाली आत्माओं को मोक्ष की रुचि होने पर भी मोक्ष का जो एक मात्र सच्चा मार्ग है, उसकी रुचि नहीं होती है; धर्म के प्रति अभिरुचि होने पर भी श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित धर्म ही वास्तिक धर्म है; इसके अतिरिक्त दुनिया में जितने धर्म कहे जाते हैं, वे सही रूप में धर्म नहीं, अपितु कुधर्म हैं, ऐसी मान्यता उन मिथ्यादृष्टि आत्माओं की नहीं होती।

सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त पुण्यात्माओं की मान्यता तो ऐसी होती है कि ‘इस संसार में, इस जीव द्वारा साधने योग्य एक मात्र मोक्ष ही है। देवलोक के या मनुष्य लोक के श्रेष्ठ से श्रेष्ठ सुख भी वस्तुतः साधने योग्य नहीं हैं। भगवान श्री जिनेश्वर देवों ने मोक्ष की साधना का जो उपाय बताया है, वही एक मात्र मोक्ष का उपाय है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मोक्ष का उपाय नहीं है।

सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त पुण्यात्मा जीव हर किसी को देव मानने वाले नहीं होते, अपितु अठारह दोषों से रहित और अनंत गुणों के स्वामी भगवान श्री जिनेश्वर देव तथा श्री सिद्धिपद को प्राप्त परमात्माओं को ही सुदेव के रूप में मानने वाले और पूजने वाले होते हैं। वे अन्य सर्व देवों को कुदेव मानते हैं। सम्यग्दर्शन-गुण को प्राप्त पुण्यात्माओं ने ऐसे कुदेवों का त्याग किया होता है। इसी तरह गुरु तत्त्व के विषय में भी सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त पुण्यात्मा सुविवेकी होते हैं। जो भगवान श्री जिनेश्वर देवों की आज्ञानुसारिणी निर्ग्रंथता को धारण करने वाले नहीं होते और इसलिए रत्नत्रयी के स्वामी नहीं होते, ऐसे व्यक्ति दुनिया में गुरु के रूप में माने जाते हों या पूजे जाते हों, तो भी सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त पुण्यात्मा जीव उन्हें सुगुरु के रूप में नहीं मानते। उन्हें कुगुरु मानकर उनका त्याग करने वाले होते हैं। भगवान श्री जिनेश्वर देवों के द्वारा कहा हुआ मोक्षमार्ग ही मोक्ष का सच्चा उपाय है। यही एक सच्चा धर्म है। इसके सिवाय दुनिया में जो कोई धर्म कहे जाते हैं, वे वस्तुतः धर्म नहीं हैं, अपितु कुधर्म हैं, ऐसी मान्यता पूर्वक सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त पुण्यात्मा जीव कुधर्मों का त्याग करने वाले होते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 16 नवंबर 2014

धर्म-श्रद्धा बहुत दुर्लभ है!


परम उपकारी सहस्रावधानी आचार्य श्री मुनिसुन्दरसूरिजी महाराज ने दो प्रकार के भव्य जीवों को यथाविधि धर्मोपदेश के योग्य बतलाया है। जो जीव स्वभाव से भव्य नहीं होते, वे तो धर्मोपदेश के योग्य होते ही नहीं, परन्तु स्वभाव से भव्य जीवों में भी जिनका संसार काल एक पुद्गल परावर्तकाल से अधिक है, वे जीव भी धर्मोपदेश के योग्य नहीं गिने जाते। जिन भव्य जीवों का संसार काल एक पुद्गल परावर्तकाल से अधिक शेष नहीं है, अर्थात जो भव्य जीव चरमावर्तकाल को प्राप्त हैं, वे जीव ही धर्मोपदेश के योग्य हैं। चरमावर्त को प्राप्त जीव भी दो प्रकार के होते हैं। एक प्रकार तो सम्यग्दर्शन गुण को अप्राप्त जीवों का है और दूसरा प्रकार सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त जीवों का है।

चरमावर्तकाल को प्राप्त भव्य जीवों का संसारकाल जब तक अर्धपुद्गल परावर्तकाल से अधिक शेष रहता है, वहां तक तो वे जीव भी सम्यग्दर्शन गुण को प्राप्त नहीं कर सकते। इस प्रकार केवल चरमावर्तकाल को प्राप्त दो प्रकार के भव्यात्मा ही यथाविधि धर्मोपदेश के योग्य हैं। ऐसा जब प्रतिपादन करने में आता है, तब ऐसा प्रश्न उपस्थित होना असंभवित नहीं कि चरमावर्तकाल को प्राप्त जीव मिथ्यादृष्टि हो या सम्यग्दृष्टि हो, वे अधिक से अधिक एक पुद्गलपरावर्तकाल में नियम से सिद्धि पद को प्राप्त होने वाले हैं तो फिर उन जीवों को यथाविधि धर्मोपदेश की क्या आवश्यकता है? ऐसे प्रश्न का स्पष्टीकरण करते हुए परम उपकारी सहस्रावधानी आचार्यदेव श्री मुनि सुन्दरसूरीश्वरजी महाराज ने जयानंद केवली चरित्र में फरमाया है कि ‘श्री सिद्धिपद को देने वाली जो सामग्री है, उस सामग्री को पाए बिना भव्य जीव भी सिद्धिपद को नहीं पा सकते हैं। जो भी भव्यात्मा सिद्धिपद को प्राप्त करते हैं, वे श्री सिद्धिपद की समग्र सामग्री को प्राप्त करके ही श्री सिद्धिपद को प्राप्त करते हैं।’ ऐसा कहकर श्री सिद्धिपद को देनेवाली सामग्री क्या है, इसका वाचकों को ज्ञान कराने के लिए परम उपकारी चरित्रकार ने फरमाया है कि ‘मनुष्यभव, आर्यदेश, श्रुति और श्रद्धा आदि लक्षण वाली यह सामग्री है और इस सामग्री में भी धर्मश्रद्धा विशेष रूप से सुदुष्प्राप्य है। यद्यपि आर्यदेशादि सामग्री सहित मनुष्यत्व की प्राप्ति होने पर भी सद्गुरुओं का योग प्राप्त होना और सद्गुरुओं का योग प्राप्त होने पर भी धर्म श्रवण की प्राप्ति होना, इस जीव के लिए अति दुर्लभ ही है, परन्तु धर्म श्रद्धा की प्राप्ति होना तो इससे भी अतिशय दुर्लभ है। क्योंकि मनुष्यभव से लेकर धर्मश्रवण तक की सामग्री तो अभव्य जीवों तथा दुर्भव्य जीवों को भी प्राप्त हो सकती है, परन्तु धर्मश्रद्धा की प्राप्ति तो मात्र भव्यात्माओं को ही हो सकती है; और वह भी ऐसे भव्यात्माओं को ही प्राप्त हो सकती है, जिनका संसार काल एक पुद्गल परावर्त जितने काल से तो अधिक नहीं ही हो।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 15 नवंबर 2014

विवेक का अपलाप मत करो


मनुष्य भव, आर्यक्षेत्र आदि मिलने मात्र से और उत्तम कुल, जाति, बल, रूप, दीर्घायु और निरोग शरीर मिलने मात्र से श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित धर्म की प्राप्ति नहीं हो जाती। श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित धर्म की प्राप्ति के लिए तो सबसे अधिक सत्य-असत्य और ‘सु-कु’ का विवेक चाहिए। यह विवेक दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम पूर्वक ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय के क्षयोपशम के बिना संभव नहीं है। अतः आर्यदेशादि उत्तम सामग्री को प्राप्त पुण्यात्मा को उत्तम विवेक प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बनना ही चाहिए। यह विवेक प्राप्त करने के बाद सत्य-असत्य का और ‘सु-कु’ का विवेक कर, ‘कु’ का त्याग करने के लिए और ‘सु’ को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके बिना परमशुद्ध श्री जिनधर्म की प्राप्ति संभव नहीं है।

जो जीव स्वयं को धर्म के अभिलाषी कहते हैं और फिर भी ‘सत्य-असत्य’ तथा ‘सु-कु’ के विवेक से दूर रहना चाहते हैं, उन जीवों की विषम दशा सचमुच दयनीय है। एक तरफ, सत्य की पूजा का दावा करना और दूसरी तरफ सत्य-असत्य के विवेक के प्रति अरुचि बताना, यह सचमुच दंभ को ही सूचित करता है। ऐसे लोगों का सत्य की पूजा का दावा, सत्य-असत्य के विवेक के प्रति उनकी अरुचि से पंगु बन जाता है और दंभरूप सिद्ध हो जाता है। शुद्ध देव की उपासना करने का इच्छुक आत्मा सुदेव और कुदेव का विवेक करने से इनकार करे, यह संभव ही नहीं है। जिनके जीवन दोषों से दूषित हों, जिनके उपदेश विवेकहीन हों और जिनकी मूर्तियां रागादि चिह्रों से कलंकित हों, उन्हें देव के रूप में मानने और पूजने का मन तो उन्हीं का हो सकता है, जो अठारह दोषों से रहित शुद्ध मोक्षमार्ग के प्ररूपक और रागादि चिह्रों से अकलंकित मुद्रा वाले शुद्धदेव के स्वरूप आदि से अज्ञात हों। शुद्ध देव के स्वरूप को जानने का दावा करने वाला अशुद्ध देवों की उपासना में भी रुचि रखे तो मानना पडेगा कि बेचारा मिथ्यात्व के रोग से पीड़ित आत्मा है।

किसी का आयुष्य और पुण्य बलवान हो तो मरने के लिए किया गया विषपान भी उसका नाशक न होकर रोग-निवारक बन जाता है। इससे ‘विषभक्षण भी रोगनाशक है’, ऐसा कोई मानने लग जाए और यही बात उसके हृदय में स्थित हो जाए, तो वह स्वयं भी मरता है और अन्य को भी मारता है; इसी तरह देव-गुरु-धर्म के सम्बंध में भी विवेक की अपेक्षा न रखने वाले व्यक्ति कदापि श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित धर्म को प्राप्त नहीं कर सकते। शुद्धदेव के सच्चे उपासक किसी के निंदक नहीं होते; परन्तु वे अवसर पाकर शुद्ध-अशुद्ध के स्वरूप को प्रकाशित करने वाले न हों, यह संभव नहीं। विवेकीजन शक्ति होने पर और आवश्यकता पडने पर सत्य के समर्थक, असत्य के उन्मूलक न बनें तो सत्य की अभिलाषी आत्माओं को सत्य की प्राप्ति कैसे हो सकती है? -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

उन्मार्ग का पोषण


सामान्य लोगों की बात तो दूर रही, परन्तु आजकल कतिपय धर्माचार्य माने जाने वाले भी मध्यस्थता के नाम से उन्मार्ग का पोषण करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तविक रूप में मार्ग को न प्राप्त करने वाले, पाकर भी हार जाने वाले अथवा भयंकर महत्वाकांक्षा से पीड़ित धर्माचार्य भी सत्य के खून में और असत्य के प्रचार में मध्यस्थता की ओट में सहायक होते हैं, तो फिर बेचारे गाढ मिथ्यात्व के उदय से ग्रस्त व्यक्ति मध्यस्थता के नाम से आत्मा को सद्धर्म से वंचित रखें, इसमें आश्चर्य क्या है?

तथाकथित समझदार गिने जाने वाले आत्मा, सत्य-झूठ में मध्यस्थता तभी धारण कर सकते हैं, जब वे सत्य की अपेक्षा भी स्वयं को अधिक मूल्यवान मानते हों। इससे स्पष्ट है कि, मध्यस्थता एक गुण है, परन्तु वह स्वयं के पुजारियों के लिए, न कि सम्यग्दृष्टियों के लिए। क्योंकि सम्यग्दृष्टियों के लिए तो वह भी दोषरूप बन जाता है। इसी कारण से आचार्य भगवान श्री अकलंकसूरीश्वरजी महाराज ने फरमाया है कि- ‘सत्य और असत्य तथा ‘सु’ और ‘कु’ का विवेक करने की शक्ति से रहित आत्मा श्री जिनधर्म को नहीं प्राप्त कर सकता।’

ऐसे विवेक की प्राप्ति के लिए दर्शनावरण और ज्ञानावरण के क्षयोपशम के साथ दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम की अतिशय आवश्यकता है, दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम के लिए भी यह सच्चा उपाय है कि सत्य एवं असत्य का विवेक करने के लिए प्रयत्नशील बनना। ‘सफेद-सफेद सब दूध’ और ‘जो दूध कहा जाता है, वह भक्ष्य ही होता है’, ऐसा मानने की वृत्तिवाले बनने से जैसे अकारण मृत्यु का प्रसंग आ पडता है, वैसे ही तथाकथित गुरुओं को गुरु मान लेने से और तथाकथित धर्म को धर्म मान लेने से आत्मा का भयंकर अहित होता है।

दुनियादारी की किसी बात में भूल होने पर कदाचित एक जीवन बिगड सकता है, जबकि विवेक के अभाव में और माध्यस्थ भाव से तो बहुत अधिक बिगडने की संभावना रहती है। अविवेक अवस्था में सब देवों को देव मानने वाला, सब गुरुओं को गुरु मानने वाला और सब धर्मों को धर्म मानने वाला क्षंतव्य हो सकता है, क्योंकि मिथ्यात्व से पीड़ित होते हुए भी सुदेव और कुदेव, सुगुरु और कुगुरु तथा सुधर्म और कुधर्म में विवेक करने का वह विरोधी नहीं होता। ऐसा जीव विवेक करने की शक्ति आए, ऐसा ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करे तो क्षयोपशम पाकर विवेकयुक्त बन सकता है। विवेक को प्राप्त करने में सहायक हो, ऐसी क्रियाओं में उद्यमी बनी हुई आत्मा, मिथ्यात्व से युक्त होते हुए भी सुन्दर विवेक के मार्ग को पाकर उसकी सहायता से मिथ्यात्व का पराभव करके अनंतज्ञानी श्री वीतराग परमात्मा के द्वारा प्ररूपित धर्म को पा लेता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

दृष्टिराग, कामराग, स्नेहराग हलाहल विष-तुल्य हैं


तत्त्व के विषय में आप मरते समय तक अज्ञानी रहे तो यह इतना दुःखद नहीं, जितना मिथ्या सिर हिलाना और दुराग्रह सेवन करना दुःखद है। ज्ञानियों ने दृष्टिराग के विषय में तो स्पष्ट कहा है कि-

‘दृष्टिरागस्तु पापीयान्, दुरुच्छेदः सतामपि।’

यह पापी दृष्टिराग तो सत्पुरुषों के लिए भी कठिनाई से नष्ट किया जा सकने वाला है। इस राग के वश होकर बहुत से सत्पुरुष भी हार गए हैं। परीक्षक शक्ति होने पर भी दृष्टिराग के पाप के कारण सत्य-झूठ की परीक्षा न कर सके। अतः गुणानुराग के अभिलाषी को इस दृष्टिराग का सर्वथा त्याग करना चाहिए।

गुणानुराग को पाने के लिए और उसे विकसित करने के लिए स्नेहराग और कामराग पर भी विजय पाना चाहिए। स्नेहादि के आधीन भी इस तरह नहीं हो जाना चाहिए कि जिससे सत्य-झूठ की पहचान ही न हो। स्नेहराग और कामराग के आधीन बनने से तो कुटुम्ब में भी झगडे बढ जाते हैं। एक के प्रति अति स्नेह हो तो उसकी भूल भूलरूप में नजर नहीं आती और उसके कहने से दूसरों की भूल न होने पर भी भूल नजर आने लगती है। फिर भाई-भाई के बीच में भी झगडा होता है न? विवेकीजनों को स्नेहराग के इतने आधीन नहीं बनना चाहिए।

कामराग से क्या होता है, यह तो लगभग सबको अनुभव सिद्ध है न? आजकल के लडके प्रायः अपनी स्त्री की कही हुई बात को सच्ची मानते हैं और माता-पिता की कही हुई बात को झूठी मानते हैं। स्त्री ने झूठी बात कही हो और इसलिए माता-पिता लडके को कहें कि, ‘इसकी बात झूठी है’ तो भी सामने ऐसे बोलने वाले लडके भी हैं, जो कहते हैं कि ‘यह (पत्नी) झूठ नहीं बोलती है।’ प्रायः कामराग का जोर ही ऐसा बुलवाता है। अतः कामराग और स्नेहराग भी, यदि सावधानी पूर्वक व्यवहार करना न आए तो, मारक सिद्ध होते हैं। किसी के गुण-दोष का निर्णय करना हो तो उसके प्रति राग-द्वेष से अलग रहकर निर्णय करना चाहिए। राग, दोष देखने नहीं देता और द्वेष, गुण देखने नहीं देता।

प्रतिपक्षी का राग उसके गुण की उपेक्षा करने के लिए प्रेरित करता है और प्रतिपक्षी का द्वेष, उसके दोष की उपेक्षा करने को प्रेरित करता है। कहावत है कि ‘दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र होता है’। दृष्टिराग, स्नेहराग और कामराग वालों को ऐसी बहुत सावधानी रखने की आवश्यकता है। गुणराग और गुणीजनों के राग में यह अंतराय करने वाला नहीं हो, यह संभव है, परन्तु यदि आत्मा भान भूल जाए तो दृष्टिराग, स्नेहराग और कामराग भी गुणराग और गुणीजनों के राग में अंतराय करने वाला बनकर विशेष नाशक हो सकता है। मीठा लगता है, पर ये हलाहल जहर के समान हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 12 नवंबर 2014

जैन दर्शन गुण-प्रधान है, व्यक्ति केंद्रित नहीं


कामराग, स्नेहराग और दृष्टिराग के कारण मूढता और व्युद्ग्राहिता शीघ्र पैदा हो सकती है। जैसे कामराग और स्नेहराग विद्यमान हों, परन्तु यदि वे जोरदार न हों तो वे न तो गुणानुराग को ही रोक सकते हैं और न सम्यक्त्व की प्राप्ति को ही रोक सकते हैं; वैसे दृष्टिराग भी सामान्य कोटि का हो, कुटुम्बादि के कारण मिथ्यादर्शन मिल गया हो और वह रुच गया हो, परन्तु यदि ‘मेरा मिथ्या दर्शन ही अच्छा और सब खराब ही हैं’, ऐसा भाव पैदा करने वाला वह राग न हो तो, ऐसे राग की मौजूदगी में सामान्य गुणानुराग प्रकट न हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

यद्यपि दृष्टिराग सामान्य कोटि का भी जहां तक होता है, वहां तक सम्यग्दर्शन गुण तो प्रकट हो ही नहीं सकता। अतः सद्धर्म पाने के अभिलाषियों को तो इसकी छाया में भी नहीं जाना चाहिए। दृष्टिराग जब थोडा जोरदार बनता है, तब किसी भी तत्त्व की बात आए या देव-गुरु-धर्म के स्वरूप संबंधी बात आए, वहां यह अंतराय किए बिना नहीं रहता।

दृष्टिराग का यह स्वभाव है कि वह सद्-असद् का विवेक नहीं करने देता। वहां ‘मेरा सो सच्चा’, यह भाव होता है। परन्तु ‘सच्चा सो मेरा’ यह भाव नहीं होता। तत्त्व की बात जब तक समझ में न आए, तब तक मध्यस्थ भाव रखना चाहिए। कुदर्शन का राग, दृष्टिराग है और श्री जिनदर्शन का राग दृष्टिराग नहीं है। क्योंकि, इतर दर्शन में अशुद्धता अधिक है। तथा वहां ‘अमुक ही देव, अमुक ही गुरु और अमुक ही धर्म’, ऐसा ही माना जाता है। श्री जैनदर्शन में ऐसा नहीं है। श्री जैनदर्शन सब तरह से शुद्ध है और देव-गुरु-धर्म के वास्तविक स्वरूप का दर्शन करा कर श्री जैन दर्शन कहता है कि ‘ऐसे स्वरूप वाला जो कोई भी हो, वह देव कहलाता है, इस प्रकार के स्वरूप वाला कोई भी हो, वह गुरु कहलाता है और ऐसे स्वरूप वाला कोई भी हो, वह धर्म कहलाता है।

श्री जैन दर्शन गुण-प्रधान है, व्यक्ति केंद्रित नहीं है। यहां देव-गुरु-धर्म की मान्यता एवं व्याख्या गुणों के आधार पर की गई है और उनके ‘सु’ अथवा ‘कु’ का मापदण्ड गुणों के आधार पर होता है, किसी व्यक्ति अथवा जड मान्यता के आधार पर नहीं। जो अमुक-अमुक गुणों की कसौटी पर खरा है, राग-द्वेष रहित है, केवलज्ञानी है, वही सुदेव है, जो अमुक-अमुक गुणों का धारक है (आचार्य के 36 गुण, साधु के 27 गुण आदि), वही सुगुरु है और अमुक-अमुक गुणों से युक्त अथवा स्वरूप वाला (जिनाज्ञा, अरिहंत देवों द्वारा प्ररूपित मार्ग का दिग्दर्शन कराने वाला) ही सच्चा एवं सुधर्म है। हमारा देव-गुरु-धर्म के प्रति अनुराग गुण-राग है, दृष्टि-राग नहीं। यह गुणराग तो मुक्ति की ओर ले जाने वाला है। हम ‘हमारे देव-गुरु-धर्म ही सच्चे’, ऐसा कहते अवश्य हैं, परन्तु वह गुणों और उनके वास्तविक स्वरूप के आधार से ही कहते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

मान-कषाय मिथ्यात्व में धकेल देता है


जहां तक जीवों को अपनी अल्पता और भगवान श्री जिनेश्वर देवों की अनंतगुणी महत्ता का भान कायम रहता है, वहां तक तो जीव मिथ्यात्व से सहज ही बच जाता है। परन्तु, जब जीव अपनी अल्पता को भूल जाता है और अपनी ही महत्ता की कल्पना करने लगता है, तब मान-कषाय यह काम करता है कि ऐसे जीव को धकेल-धकेल कर यहां तक धकेल देता है कि ‘मैं सच्चा और भगवान श्री जिनेश्वर देव झूठे।’

कल्याण के अभिलाषी जीवों को तो ऐसा ही विचार करना चाहिए कि ‘भगवान श्री जिनेश्वर देव ऐसे थे कि वे कदापि कुछ भी मिथ्या नहीं कह सकते। जिनमें राग नहीं, द्वेष नहीं, मोह नहीं, जो वीतराग और सर्वज्ञ हैं, उन तारकों के वचन कदापि मिथ्या नहीं हो सकते।’

परन्तु, मान से अतिशय ग्रसित जीव इस बात को भूल जाते हैं। ‘कहां मैं अल्पज्ञानी और कहां वे अनंत ज्ञानी? इस बात को भूल कर अनंतज्ञानी के वचन की प्रामाणिकता के विषय में संशय ही किया करे; अथवा ‘उन तारक का वचन मिथ्या है’, ऐसा मानने की मूर्खता करे, तो यह मान-कषाय का साधारण प्रभाव है? महान समर्थ व्यक्ति भी इस मान-कषाय के आधीन बनकर पतित हो जाते हैं और वे ऐसे पाप के उपार्जन करने वाले बन सकते हैं कि जिस पाप के योग से वे लम्बे समय तक भी संसार में भटकने वाले बन जाते हैं। इसलिए मान-कषाय से हमेशा बचना चाहिए। इसके लिए जीवन में सरलता-ऋजुता चाहिए।

मान-कषाय से बचने के लिए सदैव इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि ‘वही सत्य और शंकारहित है जो भगवान श्री जिनेश्वर देवों ने प्ररूपित किया है’, इस वाक्य को और इस आशय वाले दूसरे भी वाक्यों को याद करके, भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचनों की प्रामाणिकता को हृदय में प्रमुख स्थान दिया जाए तो सूक्ष्मार्थ आदि के सम्बन्ध में प्रायः संशय उत्पन्न नहीं हो सकता और कदाचित उत्पन्न हो जाए तो वह टिक नहीं सकता। इससे गलत अर्थ में पडने पर भी अपनी मान्यता का आग्रह नहीं होगा और तुरन्त श्री जिनेश्वर देवों के ज्ञान की विशालता का स्मरण हो आएगा।

इसके साथ ही एक बात और, कि किसी भी प्रकार के मिथ्यात्व से बचने और दुर्गति को रोकने के लिए स्वाध्याय का क्रम निरंतर जारी रखना चाहिए। व्यक्ति कितना ही ज्ञानी और ऊंचे पद पर आसीन क्यों न हो वह आज के युग में उतना ज्ञानी अथवा केवलज्ञानी नहीं हो सकता, यह सर्वविदित है, इसलिए जितना भी अध्ययन स्वाध्याय किया जाए, कम है। सीखने की अंतिम सांस तक चेष्टा, यह व्यक्ति को सरल और विवेकी (सम्यग्दृष्टि) बनाए रखने में सहायक है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 10 नवंबर 2014

हमारा ज्ञान कितना?


भगवान श्री जिनेश्वर देवों का कोई वचन समझ में न आए और संशय पैदा हो जाए तो भी ऐसा लगे कि ‘मेरा ज्ञान कितना? हमारी बुद्धि कितनी? मैं तो छद्मस्थ हूं, मेरी समझ में न भी आए, परन्तु यह वचन भगवान श्री जिनेश्वर देवों ने कहा है, इसलिए यह वचन तो यथार्थ ही है।’ जिन किन्हीं आत्माओं को इस संशय आदि से बचना हो और मार्ग में सुस्थिर रहना हो, उन्हें श्री जिनेश्वर देवों के वचन की प्रामाणिकता की बात को इस तरह रट लेनी चाहिए कि किन्हीं भी संयोगों में यह बात याद आए बिना न रहे। और चाहे जैसे आवेश में भी भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचन की प्रामाणिकता में संशय पैदा न हो सके।

भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचन की प्रामाणिकता के विषय में संशय होने लगा कि सांशयिक मिथ्यात्व आया ही समझिए। जहां तक श्री जिनवचन की प्रामाणिकता के विषय में संशय पैदा नहीं हुआ, वहां तक शास्त्र वर्णित अर्थ के विषयों में संशय उत्पन्न होने पर भी सांशयिक मिथ्यात्व आ गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्री जिनवचन की प्रामाणिकता के विषयों में संशय पैदा होना ही सांशयिक मिथ्यात्व है। अपनी बुद्धि, कुशलता और समझ-शक्ति का गर्व करने वाला सम्यग्दृष्टि जीव, इस मिथ्यात्व का स्वामी बन जाए, यह संभव है।

किसी बात को न समझ पाने के कारण शंका पैदा हो और फिर विचार करे कि भगवान ने ऐसा कहा है, परन्तु यह इस प्रकार घटित कैसे हो सकता है? तो मिथ्यात्व को लेने जाना पडेगा या आ ही जाएगा? अथवा ऐसा विचार करे कि भगवान असत्य नहीं कहते, परन्तु यह बात सत्य हो तो मेरे जैसे बुद्धिमान को समझ में न आए, यह कैसे हो सकता है? ऐसा विचार संशय को स्थिर बनाता है और यदि इस विचार में परिवर्तन न आए तो कदाचित यह विचार मिथ्यात्व को उदय में ला सकता है।

स्वरस-वाहिता (अभिमान युक्त आग्रह) इतनी भयंकर वस्तु है कि महाज्ञानी और बुद्धिशाली सम्यग्दृष्टि आत्माओं को भी यदि वे सावधान न रहें और स्वरस वाहिता के वश में हो जाएं तो यह उनको सांशयिक मिथ्यात्व अथवा आभिनिवेशिक मिथ्यात्व के स्वामी बना देती है। सांशयिक मिथ्यात्व में तो भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचन की प्रामाणिकता के सम्बंध में ही संशय पैदा होता है, जबकि आभिनिवेशिक मिथ्यात्व में तो संशय नहीं, अपितु भगवान श्री जिनेश्वर देवों के वचनों के मिथ्यापन विषयक निर्णय है। जबकि सम्यकदृष्टि का सोच यह होना चाहिए कि उन तारकों ने जो कुछ प्ररूपित किया है, वह वैसा ही है। यदि वह मेरी समझ में न आए तो यह मेरा दोष है। परन्तु, भगवान श्री जिनेश्वर देवों ने जो प्ररूपित किया है, वह सत्य ही है; इसमें शंका नहीं है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा