बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

धर्माधर्म का विवेक होना चाहिए


धर्माधर्म का विवेक हर समय होना चाहिए’, जैन लोग यह बात सरलता से कह सकते हैं, क्योंकि परिणामों के प्रति उनका लक्ष्य होता है। साधुओं को चौबीसों घंटे अच्छे परिणाम रखने चाहिए और श्रावकों-गृहस्थों को धर्म करते समय ही परिणाम अच्छे रखने चाहिए, ऐसा नहीं है। साधु का धर्म चौबीसों घंटों के लिए और गृहस्थ का धर्म यथाशक्ति, परन्तु धर्म के परिणामों के विषय में तो सब को हर समय ध्यान रखना ही चाहिए। जो धर्म कम करता है तो वह कम करने के लिए नहीं, किन्तु चौबीसों घंटे धर्म नहीं हो सकता, अतः वह कम समय के लिए धर्म करता है। धर्म करने की भावना तो चौबीसों घंटे रहनी चाहिए। अधर्म का आचरण करते हुए भी भावना धर्म की रखनी चाहिए। मैं दुर्बल हूं, अतः मुझे यह करना पडता है; कब ऐसा समय आएगा, जब एक क्षण भी धर्म के बिना न रहूं’, ऐसी भावना तो हृदय में जागृत रहनी ही चाहिए। धर्मस्थानों में धर्म करना और बाहर अधर्म करने में आपत्ति नहीं, ऐसी मान्यता श्रावक की नहीं होती। अधर्म करते हुए भी, यह करने लायक नहीं है, करने योग्य तो धर्म ही है, ऐसा मानना चाहिए।

ज्ञानियों ने परिणामों पर बहुत जोर दिया है। परन्तु भावों की निर्मलता और निर्मल भावों की स्थिरता, अभिवृद्धि आदि के लिए धर्मव्यवहार पर कम जोर नहीं दिया है। इस बात को नहीं समझने वाले कई लोगों ने देशना को निश्चय प्रधान बना दिया और धर्म व्यवहार को भूल गए। हम तो देशना को व्यवहार प्रधान रखकर निश्चय की तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं, क्योंकि धर्म-व्यवहार शुभ भावों से तारक बन सकता है। जिसके हृदय में मोक्ष का भाव प्रकट हुआ और भगवान द्वारा प्ररूपित मोक्ष मार्ग की आराधना का भाव जागृत हुआ, वह धर्म से अतिरिक्त व्यवहार न करे, ऐसा नहीं; परन्तु उसे धर्म-व्यवहार ही रुचिकर लगता है। अधर्म का व्यवहार करते हुए भी उसे यह छोडने योग्य प्रतीत होता है और धर्म का व्यवहार न हो तो भी वह करने योग्य लगता है। ऐसा विवेकी मनुष्य अधर्म-व्यवहार करता हो तो भी दुर्गति के आयुष्य का उपार्जन नहीं करता।

हम धर्म क्रिया करते हैं, इसलिए हमारी सद्गति ही होगी, ऐसा मानने वाले को सोचना चाहिए कि आयुष्य का बंध अधर्म व्यवहार करते समय पडे तो? और धर्म व्यवहार करते समय भी आत्मा यदि संक्लिष्ट परिणामवाला बना हो तो? आजकल बहुत से लोग कहते हैं कि यह सब सत्य है, परन्तु बाजार आदि की बात अलग है!ऐसा नहीं माना जा सकता। धर्माधर्म का विवेक जैसे मंदिर, उपाश्रय आदि धर्मस्थानों में होना चाहिए और धर्मक्रियाएं करते समय होना चाहिए, वैसे ही धर्माधर्म का विवेक बाजार, घर आदि अधर्म के स्थानों में भी और अधर्म की क्रियाएं करते समय भी होना चाहिए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

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