शुक्रवार, 6 मई 2016

पढे हुए कैसे होते हैं ?



पहले के शिक्षक तो विद्यार्थी क्या पढे इसकी सावधानी रखते थे। पचास प्रश्न पूछते, दो थप्पड भी मारते और घण्टे की बजाय दो घण्टे बैठकर भी पक्का पढाते। खुद का विद्यार्थी मूर्ख नहीं रहे, इसकी उनको चिंता रहती थी; किन्तु ये पढनेवाले भी विद्या के अर्थी होते थे। आज तो ऐसे विद्यार्थी हों तो पढाएं न? पढाई बढे तो ऐसी प्रवृत्ति चलती है? पढे-लिखे जहां-तहां जैसा-तैसा खाते हैं? पढे-लिखे रास्ते में थूंकते हैं? किसी को गाली देते हैं? जैसी-तैसी बकवास करते हैं? आज का विद्यार्थी तो पूछता है कि मुझे क्या मास्टर की सेवा करनी है?’ मैं कहता हूं कि जरूर करनी है। पगचंपी भी करनी पडती है। पहले के राजपुत्र भी करते थे। पाठक खुद का चित्त प्रसन्न हो तब पढाता है। राजपुत्र उपाध्याय के वहीं रहते थे और उनकी सेवा-भक्ति करते थे। विनय, विवेक में जरा भी कमी नहीं और भाषा ऐसी मधुर व आनंददायी बोलते कि मानो मुख से मोती खिरते हों। उस वक्त विद्या फलती थी, आज तो विद्या फूटती है।-सूरिरामचन्द्र

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