सोमवार, 13 जून 2016

बिना संस्कारों के तो रोना ही पड़ेगा



प्रत्येक मानव परम आनंद की प्राप्ति करना चाहता है, किन्तु आज चारों तरफ अंधकार के सघन बादल आच्छादित हो रहे हैं। प्रायः हर व्यक्ति ने अपनी जिन्दगी की नाव को पाप व पीडा के बोझ से भर रखा है, फिर वह भवसागर में डूबेगी नहीं तो क्या होगा? इस डूबने के लिए हमारे संस्कार ही बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। क्यों न हम भावी पीढी में सुसंस्कारों का बीजारोपण करें, ताकि वह वास्तविक आनंद-परमानंद की प्राप्ति कर सके। किन्तु, आजकल माता-पिता अपने बच्चों के संस्कारों की तरफ कितना ध्यान दे पाते हैं? दोनों अर्थोपार्जन या भौतिक उपलब्धियों की दौड में बेतहाशा दौड रहे हैं या आधुनिक बनने के चक्कर में कॉकटेल पार्टियों व क्लबों में ही व्यस्त हैं। ऐसे में बच्चे कई बार माता-पिता के वात्सल्य प्रेम को तरस जाते हैं और बचपन से ही सुसंस्कारों के बीजारोपण के बजाय वे तनावग्रस्त होकर भटक जाते हैं। बडे होकर वे अपने माता-पिता, समाज या देश के लिए समस्या नहीं बनेंगे क्या? क्या ऐसे बच्चे अपने आत्मगौरव को प्राप्त कर सकते हैं? अपना कल्याण साध सकते हैं? आप जितना महत्त्व आधुनिक शिक्षा और शिक्षापद्धति को देते हैं, उतना संस्कारों और धार्मिक शिक्षण को देते हैं क्या? इसके बिना बच्चों का जीवन सफल कैसे हो सकता है? जरूर आपको और आपके बच्चों को भविष्य में रोना ही पडेगा। यदि नहीं रोना चाहते हैं तो अपने बच्चों में सुसंस्कारों का सिंचन करिए, उन्हें सन्मार्ग की ओर अग्रसर करिए।-सूरिरामचन्द्र

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