गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

सवाल-5

कृपया मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त करें....
शिक्षा की तरह ही बुरी स्थिति चिकित्सा की है। आजादी के 70 साल बाद भी आज आम आदमी को बुनियादी चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है। गांवों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की तो क्या बात करें, शहर के जिला अस्पतालों, संभागीय मुख्यालय के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की सुविधा, आधुनिक संसाधन और पर्याप्त दवाएं उपलब्ध नहीं है। वहीं निजी अस्पतालों में पूरी लूटमार मची हुई है। पूरा पैसा है तो उपचार है, अन्यथा उपचार संभव नहीं है। तो क्या इसी प्रकार गरीब आदिवासियों और आम आदमी को मरने के लिए छोड दिया जाएगा? सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही सेवाओं में अपना बजट घटा रही है, जो सरकार की मूलभूत जिम्मेदारी है। चिकित्सा के भी निजीकरण और व्यापारीकरण को बढावा दे रही है...। क्या यह देश के और आम आदमी के हित में है...? क्या आम आदमी केवल बरगला कर वोट लेने के लिए ही है...? यदि नीतियां नहीं बदली गई तो आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र का तो और भी विभत्स रूप देखने को मिलेगा, जब आम आदमी के जीवन भर की कमाई मामूली बिमारी में ही साफ हो जाएगी। क्योंकि आज जिस प्रकार एक करोड और दो करोड रुपये फीस लेकर डॉक्टरी की खेती की जा रही है, क्या ऐसे डॉक्टर गरीबों के लिए श्राप सिद्ध नहीं होंगे...?
चिकित्सा सेवाओं के हाल-बेहाल
एक महिला के पुत्रवत् देवर राजस्थान के माने हुए सर्जन रहे हैं। देवर भी उस महिला का मातृवत् बहुत खयाल रखते हैं। महिला की पुत्री और दामाद दोनों बहुत अच्छे डॉक्टर और उनके पुत्र-पुत्री भी डॉक्टर। यानी, महिला का दिलोजान से ध्यान रखने वाले घर के पांच-पांच डॉक्टर। इसके बावजूद उस महिला को देश के माने हुए दिल्ली के सर गंगाराम होस्पिटल, फोर्टीज होस्पिटल के डॉक्टरों की लापरवाही ने मौत के मुंह में धकेल दिया। पिछले 6-7 माह में परिवार वालों ने पानी की तरह पैसा खर्च किया। उदयपुर के अमरीकन होस्पिटल में महिला का लम्बे समय तक इलाज चला। फेंफडों में संक्रमण के कारण श्वांस लेने में तकलीफ हो रही थी। डॉक्टरों ने बिना सोचे-समझे खूब एंटीबॉयोटिक दवाएं दी, जिनका किडनी पर असर पडने लगा। तबियत थोडी ठीक लगने लगी तो यहां से जयपुर और जयपुर से कुछ दिनों बाद दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में ले जाया गया। वहां वेंटीलेटर पर..... 15 दिनों में इतनी हेवी एंटीबॉयोटिक दी गई कि दोनों किडनियां पूरी तरह फेल हो गई। किडनियों के लिए डॉयलिसिस करना था तो गले और कंधे के बीच एक वेन में नली डाली गई, उसमें ध्यान नहीं रखा तो उस नली डालने में हुई जोर आजमाईश से अंदर काफी ब्लडिंग हो गई और यह खून छाती में जमने लगा, जिससे श्वांस नली पर दबाव और बढ गया। यहां से फोर्टीज में शिफ्ट किया गया। दूसरी नली डाली गई और डायलिसिस शुरू हुआ, लेकिन अंदर का खून साफ नहीं हुआ। अंततोगत्वा महिला की हालत और बिगड गई। महिला तो अचेत थी, वेंटीलेटर पर ही थी। परिवार ने विचार किया कि वेंटीलेटर और डॉयलिसिस पर ही रखना है तो अब उदयपुर ले जाते हैं, वहां गीतांजलि में सुविधा कर लेंगे। दिल्ली के दोनों अस्पतालों में घर के पांचों डॉक्टर बेबस थे। प्लेन में विशेष सुविधा से महिला को उदयपुर लाया गया। 40 दिन गीतांजलि में रखने के बाद आखिर महिला को नहीं बचाया जा सका।
एक दूसरा उदाहरण- मेरे पास बछार गांव से एक आदिवासी परिवार एक महिला को लेकर आया। लम्बे समय तक महाराणा भूपाल चिकित्सालय में उपचार करवाने के बाद वहां महिला की बच्चेदानी में केंसर की गाँठ है, यह कहकर अमरीकन केंसर होस्पिटल ले जाने के लिए बोल दिया। परिवार वालों ने मुझ से पूछा तो मैंने स्पष्ट रूप से कह दिया कि यहां एक बार पूछ लो, गीतांजलि में भी ऑपरेशन हो सकता है, वहां भी पूछ लो, नहीं तो इसे अहमदाबाद के सिविल होस्पिटल में ले जाओ। परिवार वाले अमरीकन होस्पिटल में गए तो बहुत भारी खर्चा बताया, वे गीतांजलि में गए तो कहा गया कि जांच के तीन हजार लगेंगे और फिर ऑपरेशन करना पडेगा तो उसके चार लाख रुपये लगेंगे, जिसमें अस्पताल में रहने का खर्च शामिल है। परिवार वाले वापस मेरे पास आए और कहने लगे कि इतना पैसा तो मैं अपनी जमीन-घर सबकुछ बेच दूं तो भी नहीं जुटा सकता। मैंने उन्हें अहमदाबाद के सिविल होस्पिटल जाने को कहा। आश्चर्य होगा आपको यह जानकर कि उस परिवार के वहां जाने-आने-ठहरने-खाने और उपचार के लगभग 15 हजार रुपये मात्र खर्च हुए। ऑपरेशन हो गया और महिला पूरी तरह स्वस्थ है।

अब डॉक्टरों की, निजी अस्पतालों की और आने वाले समय में पांच-पांच करोड रुपये खर्च कर जो डॉक्टरों की नई खेप तैयार होने वाली है, उन सबका विचार करिए। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का और हमारा क्या हाल होने वाला है, यदि समय रहते कुछ नहीं किया गया तो.......

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