गुरुवार, 26 नवंबर 2015

पाप का मूल इच्छाएं



अनंत उपकारी महापुरुष फरमाते हैं कि ‘अहिंसा, संयम और तप रूप धर्म उत्कृष्ट मंगल है। जिन आत्माओं का अंतःकरण धर्म में सदा लीन रहता है, उन आत्माओं को देवता भी पूज्य मानते हैं।’ अहिंसा, संयम और तप रूप धर्म की उत्कृष्ट आराधना करने की जो शक्ति मनुष्य में है, वह देवों में नहीं है। इसी कारण देव भव से मनुष्य भव को ऊंचा माना गया है। यह बात बराबर खयाल में आ जाए तो अपना अनुचित वर्तन अखरे बिना और जीवन सुधरे बिना नहीं रहेगा।

ज्ञानियों ने धर्म के तीन भेद अहिंसा, संयम और तप बतलाए हैं। उसमें सबसे पहले तप को समझना चाहिए। तप के साथ संयम आने लगता है और संयम आएगा तो अहिंसा भी अवश्य आएगी। इसलिए कह सकते हैं कि व्यक्ति जब तक तपस्वी नहीं बनता है अथवा तपस्वी बनने की इच्छा नहीं करता है, तब तक इंसान नहीं बनता है। सिर्फ भूखे-प्यासे रहना, उसी को तप नहीं कहा जाता है। ज्ञानियों ने इच्छा निरोध को तप कहा है। आज अनेक तपस्वियों को यह बात खयाल में नहीं है। ज्ञानी निर्दिष्ट तप करने का प्रयास किया जाए तो व्यक्ति संयमी व सच्चा अहिंसक बने बिना नहीं रहेगा। सदाचार की नींव इच्छा निरोध है। सदाचारी बनने के लिए इच्छाओं का निरोध किए बिना नहीं चलेगा। इच्छा निरोध का अभाव आदमी को शैतान भी बना दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आज मनुष्य का व्यवहार-वर्तन कैसा है? हम सच्चे मनुष्य हैं या नहीं? इसका विवेक पूर्वक प्रतिदिन थोडा विचार किया जाए तो स्वयं को खयाल आ सकता है। मनुष्य को स्वयं अपना परीक्षक बनना चाहिए। इसके लिए अनंतज्ञानियों की दृष्टि का उपयोग करना चाहिए। हम अपने जीवन के परीक्षक बनेंगे तो अनंत ज्ञानियों ने मनुष्य जीवन की महत्ता का जो हेतु बताया है, उसे सिद्ध करने के लिए हम प्रयत्न कर सकेंगे।

मनुष्य जीवन की महत्ता का खयाल आए तो ही मनुष्य का जीवन सुधर सकता है। मनुष्य जीवन को सुधारने वाली चीज अहिंसा, संयम और तप है। अहिंसा, संयम और तप का जितना अधिक पालन होगा, उतना ही यह जीवन सार्थक होगा। यह बात हृदय में बैठ जानी चाहिए। जो पदार्थ आत्मा के नहीं हैं, आत्म-स्वरूप में जिन्हें स्थान नहीं है, जो आत्म-स्वरूप या आत्म-गुणों को विकसित करने में मददरूप नहीं हैं, ऐसे पदार्थों की इच्छा का निरोध करना, उसी को ज्ञानियों ने सच्चे अर्थ में तप कहा है। जब तक आत्मा संसार के बंधन में है, शरीर मन के बंधन में है, तब तक इच्छा हुए बिना नहीं रहेगी। आत्म-श्रेय के लिए आत्म-गुण व आत्म-शक्ति को विकसित करने के लिए जो इच्छा जरूरी है, उसे रोकना तप नहीं है, बल्कि जो आत्म-कल्याण में बाधक है, उसे रोकना तप है। दुनियावी सुख तथा नाशवंत इच्छाओं का निरोध करना, उसी का नाम तप है। यह तप आ जाए तो मानव, सच्चा मानव बन जाता है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 25 नवंबर 2015

स्थाई सुख के लिए प्रयत्नशील बनें



तत्वज्ञानी महापुरुषों ने संसार के सभी पदार्थों का विचार कर आत्मा के स्वभाव को प्रकट करने के लिए प्रयत्नशील बनने का उपदेश दिया है, क्योंकि आत्मा के शुद्ध स्वरूप के प्रकटीकरण के बाद शाश्वत काल वह शुद्ध ही रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं आता है। दुनियावी पदार्थ नाशवंत हैं, कितनी ही मेहनत व कितने ही पाप करके दुनियावी पदार्थ प्राप्त किए हों, फिर भी वे पदार्थ टिकने वाले नहीं हैं। कई लोग तो उन्हें प्राप्त करने के बाद इस जीवन में ही खो देते हैं। प्राप्त सुख चला जाए, यह किसी को पसन्द नहीं है, फिर भी पदार्थों का वियोग निश्चित है, तो फिर उन पदार्थों में संयोग का सुख पाने के लिए प्रयत्न करना कौनसी बुद्धिमत्ता है?

प्राप्त सुख का साधन स्थाई हो तो प्राप्त सुख स्थाई रह सकता है। वह सुख आत्मा सिवाय किसी में नहीं है। अतः अपनी आत्मा को ऐसी शुद्ध बना दें कि अनंतकाल के बाद भी शुद्धस्वरूप में परिवर्तन होने न पाए। जब तक आत्मा पुण्य-पाप से लिप्त है, तब तक आत्मा शाश्वत सुख प्राप्त नहीं कर सकती है। पुण्य-पाप से रहित बनने पर ही आत्मा शाश्वत सुख में स्थिर हो सकती है। आत्मा को पाप व पुण्य से रहित बनाने के लिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र की आराधना बताई है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र रूपी रत्नत्रयी ही मोक्षमार्ग है। इस रत्नत्रयी की आराधना करने से आत्मा का रत्नत्रयीमय स्वरूप प्रकट होता है। आत्मा पुण्य-पाप से सर्वथा रहित बनती है।

रत्नत्रयी की सर्वश्रेष्ठ आराधना करने के लिए अन्य सभी साधनाओं से मुक्त हो जाना चाहिए। उसके लिए ज्ञानियों ने संसार-त्याग पूर्वक संयम पालन का उपदेश दिया है। संसार में रहकर आत्मा रत्नत्रयी की आराधना नहीं कर सकती है। संसारी लोगों का जीवन पाप से सर्वथा मुक्त व सिर्फ रत्नत्रयी की आराधनामय संभव नहीं है। अतः इसके लिए साधु जीवन ही सर्वश्रेष्ठ जीवन है। इसमें शंका को कोई स्थान नहीं है। आत्म-कल्याण के लिए इच्छुक विवेकी आत्मा साधु जीवन को न चाहे या अनुमोदन न करे, यह संभव नहीं है, क्योंकि आत्मा के स्वभाव को प्रकट करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय साधु जीवन ही है। इसलिए शक्य हो तो साधु जीवन ही स्वीकार करना चाहिए, परन्तु इतनी उच्च भूमिका तक पहुंचना जिनके लिए अभी संभव न हो, उन्हें संसार में रहते हुए भी रत्नत्रयी की शक्य आराधना करनी चाहिए। साधु के लिए हिंसा-विरमण आदि महाव्रत हैं तो गृहस्थों के लिए स्थूल प्राणातिपात विरमण आदि अणुव्रत हैं। महाव्रतों के लिए जो असमर्थ हों वे अणुव्रतधारी बनें। अणुव्रतों के पालन में वह इस प्रकार प्रयत्नशील बनें कि जिसके प्रभाव से निकट भविष्य में महाव्रतों की प्राप्ति सुगम हो जाए।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

आत्मा का भान ही लाभदायी



दुनिया के लोगों को जागृत करने के लिए प्रयत्न करना, यह हमारा कर्त्तव्य है। संयम में मलीनता न आए और जनता को अदृष्ट वस्तु का भान हो, इस ध्येय से ज्ञानियों ने हमें सतत विहार करने की आज्ञा फरमाई है। सुख के इच्छुक जनसमूह को सच्चे सुख के स्थान का भान हो और उस स्थान पर पहुंचने के मार्ग का भान हो, उसमें उस मार्ग के अनुसरण की प्रबल इच्छा पैदा हो, ऐसे प्रयत्न हमें अपनी मर्यादा में रहकर करना है।

ज्ञानी महापुरुष फरमाते हैं कि दुःख से पीड़ित और सुख के इच्छुक जगत के जीवों को अदृष्ट वस्तु का भान हो, पुण्य-पाप का खयाल आए, आत्मा के स्वरूप का ज्ञान हो, अनंत शक्तिसंपन्न आत्मा की यह दुर्दशा क्योंकर हुई, उसका ज्ञान हो और जगत के जीवों में आत्म-कल्याण की भावना प्रकट हो, इसी में जगत का एकांत हित है। जगत के मनुष्यों को जितने अंश में यह ज्ञान कम होगा, उतने अंश में मनुष्य का ही नहीं, पशु-पक्षी आदि प्राणियों का भी अकल्याण होगा, अशान्ति बढेगी। जितने अंश में अदृष्ट वस्तु का ज्ञान बढेगा, आत्म-भान और आत्म-कल्याण की कामना पैदा होगी, उतने ही अंश में उनके जीवन में शान्ति बढेगी।

आत्मा, पुण्य, पाप आदि का जिसे खयाल नहीं और जो दुनियावी सुख का तीव्र पिपासु है, ऐसा मनुष्य, जगत के लिए श्रापरूप न बने तो एक आश्चर्य ही होगा। विषय-कषाय में आनंद और अर्थ-काम के योग में सुख मानने वाले मनुष्य हिंसक पशुओं से भी ज्यादा खतरनाक हैं। स्वार्थी मनुष्य जितना उपद्रव मचाता है, उतना उपद्रव पशु भी नहीं मचाते हैं। संसार में आसक्त मनुष्य में दुनियावी पदार्थ पाने व उन पदार्थों के संग्रह-संरक्षण की जो भूख होती है, वैसी भूख और संग्रहवृत्ति पशुओं में भी नहीं होती है। पाप के प्रति उपेक्षाभाव रखने वाला मानवी योजनापूर्वक जो अमर्यादित हिंसा करता है, उतनी हिंसा पशु भी नहीं करता है। मनुष्य योजनापूर्वक पाप करता है और उन पापों को छिपाता है। कई ऐसे ठग होते हैं जो सरकार से भी पकडे नहीं जाते हैं और कदाचित् पकडे जाएं तो वकीलों द्वारा अपना बचाव कर लेते हैं। आज मनुष्य मात्र के सभी पाप प्रकट हो जाएं तो कानून के हिसाब से ही कितने लोग जेल से बाहर रहने योग्य निकलेंगे? ऐसे मनुष्यों को मानव कहें या राक्षस, यही विचारणीय है। जगत में ऐसे मनुष्य ज्यों-ज्यों बढते हैं, त्यों-त्यों उपद्रव भी बढते हैं, यह स्वाभाविक है।

मनुष्य ऐसे अधम कार्य कर सकता है, इस कारण ज्ञानियों ने मनुष्य भव की प्रशंसा नहीं की है, बल्कि धर्मशास्त्रकारों ने उसी के मनुष्य भव की प्रशंसा की है, जो मुक्ति की साधना के लिए आगे बढे हों। मनुष्य भव की उत्तमता मुक्ति की साधना के कारण है। मनुष्य को मनुष्य बनना है और प्राप्त मानव भव को सार्थक बनाना है तो आत्मा का भान करना चाहिए, पशु सुलभ निर्विवेक तथा देव सुलभ भोगमयता का त्याग करना चाहिए।-सूरिरामचन्द्र

सोमवार, 23 नवंबर 2015

स्वार्थी मनुष्य के दिल में कितना जहर होता है?



आज स्वार्थवृत्ति इतनी अधिक बढ गई है कि अपने सामान्य स्वार्थ के लिए भी व्यक्ति अन्य जीवों के प्राण ले लेता है। सांप ने नहीं काटा हो तब भी ‘यह विषैला प्राणी है, कदाचित् काट लेगा’, इस भय से उसे मार दिया जाता है। आज स्वार्थी मनुष्य जितना हिंसक व क्रूर बन गया है, उतने हिंसक व क्रूर तो हिंसक व विषैले प्राणी भी नहीं हैं। सांप विषैला होने पर भी उस सांप से मदारी अपनी आजीविका चलाता है। सिंह, बाघ, चित्ता आदि हिंसक होने पर भी सर्कस वाले उनसे अपनी कमाई करते हैं। इस दृष्टि से वे विषैले और हिंसक प्राणी भी मनुष्य की कमाई कराने में सहायक बनते हैं, जबकि अति स्वार्थी मनुष्य किसी का सहायक नहीं बनता, बल्कि वह तो अनेकों का बुरा ही करता है।

‘सांप काट लेगा’,  इस भय से सांप को मारने वाला क्या कम विषैला है? सांप के तो दांत में जहर होता है, जबकि स्वार्थी मनुष्य के हृदय में जहर होता है। ज्ञानियों द्वारा निर्दिष्ट हिताहित का विवेक जिसमें नहीं है, ऐसा व्यक्ति अपना विरोध करने वालों को क्या-क्या नुकसान नहीं पहुंचाता है? सरकारी सजा के भय से स्वार्थी मनुष्य भले ही शान्ति रखता होगा, परन्तु उसके हृदय में तो इतना भयंकर जहर होता है कि वह अपने स्वार्थ के लिए सामने वाले का खून भी कर सकता है।

मनुष्य के हृदय में रहे जहर को दूर करने का काम धर्म करता है। जिसके हृदय में धर्म का प्रवेश होता है, उसके हृदय में से जहर दूर हो जाता है। आज मनुष्य के हृदय में इतना जहर उछल रहा है कि जिसके कारण संहार के साधन बढ रहे हैं। आज मानव, मानवता छोडकर राक्षस बनता जा रहा है। अपने स्वार्थ में बाधक बनने वाले का संहार किया जाता है, उसमें वीरता और सेवा मानी जाती है। आर्य देश में यह मनोवृत्ति नहीं होनी चाहिए, परन्तु आज वातावरण बिगड रहा है।

यह भव भोग के लिए नहीं, त्याग के लिए है। यह खयाल आए और उसे आचरण में लाया जाए तो वातावरण सुधर सकता है। दुनियावी पदार्थों की ममता दूर हो और आत्म-सुख प्रकट करने की कामना उत्पन्न हो, तब मानव, दानव के बजाय देव बन सकता है। आपको क्या बनना है, इसका निर्णय आप ही कीजिए। ‘अनंतज्ञानियों की आज्ञानुसार पाप-त्याग और धर्म-सेवन का मार्ग बताना हमारा काम है, परन्तु उसे आचरण में लाना तो आपके हाथ में है न?’ पाप से उपार्जित सभी वस्तुएं यहीं रहने वाली है और पाप साथ चलने वाला है, यदि ऐसा विश्वास हो तो पाप से बचने के लिए प्रयत्नशील बनो, स्वार्थी मनोवृत्ति का त्याग करो। स्वार्थ पाप कराता है, ‘पाप से दुःख और धर्म से सुख’, इस बात पर आपको विश्वास है, इसलिए सीधी बात करता हूं कि पाप छोडो और धर्म का सेवन करो, जिससे आपका दुःख चला जाए और सुख प्राप्त हो।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 22 नवंबर 2015

बालक के संस्कारों में मां की भूमिका



मां होते हुए, अपनी असावधानी की बदौलत वैद्य की जरूरत पैदा करे, वह मां ही नहीं है। मां कहलाती है बालक की हितैषी और उसकी सावधानी के अभाव में वैद्य बुलाना पडे, वह उचित है? सावधानी रखते हुए तीव्र कर्मोदय से आई व्याधि के लिए वैद्य की शरण वाजिब है। बालक बडा हो जाए तब व्याधि हुई हो तो वैद्य उसे औषधि देता है, किन्तु दूध पीते बालक को घुट्टी में अमुक औषधि तो मां-बाप ही देते हैं, क्योंकि उस समय तो मां-बाप खिलाएं वो वह खाता है और पिलाएं वो पीता है। सम्यग्दृष्टि माता बालक की बाल्यकाल से ही चिंता करके उसे अभक्ष्यभक्षण या अपेयपान नहीं करने देती है। खुद ऐसा खाए-पीए ही क्योंकि जिससे बालक के मुँह में ऐसी चीज जाए! खुद के बोलने में भी जरा भी असत्य नहीं आए। बोलना, चलना, रीतभाँत आदि ऐसे ही होते हैं कि बालक में कोई खोटे संस्कार पडें ही नहीं। बालक को झूठ नहीं बोलने दे। मां बोलते, चलते, हंसते, खेलते इस प्रकार अपने प्रत्येक वर्तन-व्यवहार द्वारा बालक को ऐसे संस्काररूपी औषधि देती ही रहती है। गोद में बैठे बालक पर मां जो कुछ बोलती है उसकी छाया पडती है। मां के शब्द निष्फल नहीं जाते। हालांकि बालक समझता नहीं हो उस समय बहुत अधिक मात्रा में असर नहीं होता, किन्तु नियमित रूप से उसके कानों में संस्कारों की बातें डाली जाए तो परिणाम निश्चित रूप से आते ही हैं। माता गाली बोले तो थोडे दिन तो उस पर असर नहीं होगा, लेकिन जैसे ही वह बोलना सीखेगा, उसके मुँह से वही गाली निकलेगी। तो यह क्या वह सीखकर निकला था? ना, तो यह किसने सिखाया? मां ने!

बालक बडा होता है वहां तक उसमें जो भी दुर्गुण आते हैं, वह माता-पिता के कारण ही आते हैं। बोलते, चलते, खाते-पीते, बात करते, मां-बाप बालक में जो संस्कार डालते हैं वे बालक में आते हैं। मां-बाप का जिस प्रकार का व्यवहार बालक देखता है, वैसे संस्कार बालक में आते ही हैं।

माता खुराक ही ऐसी खाती है कि बालक में कोई खोटी बुद्धि नहीं जन्मे। मां द्वारा खाई गई वस्तु से पेट में दूध बनता है और वह बालक पीता है। जैसी चीज जिस विचार से खाई गई है, उसके परमाणु दूध में गए, वे बालक के पेट में जाते हैं और परिणाम वैसा आता है। पहले क्षत्रिय राजाओं के पुत्रों को रानी के अलावा कोई दूध नहीं पिलाता था। सिंह का बच्चा सिंहनी का ही दूध पीता है।

हितैषी मां-बाप जन्म से ही बालक की संभाल ऐसी रखते हैं, दिखाव ही ऐसा रखते हैं कि बालक का जीवन मलिन न हो। यदि बालक को निर्विकारी बनाना हो तो उसे रंगरागवाले मकान में नहीं सुलाया जाता। अर्धनग्न शरीर से झूला झूलती स्त्रियों के फोटो वाले खण्ड में उसे नहीं रखा जाता। आज के सम्पन्न गृहस्थों के घरों में ऐसे फोटो होते हैं न? जीवों के साथ अनादिकाल से विषयवासनाएं तो लगी हुई ही है, फिर उसे ऐसे स्थानों में पाला-पोषा जाए तो वह विरागी होगा? देखे वैसे संस्कार पडते हैं।

मां-बाप द्वारा बालक के सामने अयोग्य खाना-पीना-पहिनना अथवा अयोग्य प्रकार से वर्तन करना, यह बालक के लिए नाशक है। बच्चे के देखते हुए बाप बीडी-सिगरेट पीए तो बच्चा इसे करणीय मानेगा ही। बाप थाली धोकर पीता है वह बच्चा जल्दी नहीं सीखता है, अमुक समय के बाद ही सीखता है, किन्तु बीडी पीना जल्दी सीखता है। बच्चे में जिन अच्छे गुणों का वपन करना होता है वे खुद में ही न हों और गलत क्रियाएं, गलत प्रवृत्तियां चालू ही हों तो फिर बच्चे में भी परिणाम वही आएं तो उसमें नई बात क्या है?-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 21 नवंबर 2015

लक्ष्य तो आत्म-कल्याण का ही हो



‘सुख हो या दुःख हो, हर अवस्था में मुझे समाधि मिले।’ समाधि अर्थात् समान धी (बुद्धि)। सुख आए तो छकना नहीं और दुःख आए तो थकना नहीं। मतलब कि सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों में समभाव से रहना। सुख में अलीन और दुःख में अदीन रहने की सिद्धि प्रभु से मांगी जा सकती है। दूसरी अपेक्षा से अरिहंत और सिद्ध ये दोनों देव-तत्त्व हैं तो इनसे अरिहंतपना और सिद्धपना मांगना; वहीं आचार्य, उपाध्याय एवं साधु गुरु-तत्त्व हैं तो इनसे साधुपना मांगना। अर्थात् आचार्य, उपाध्याय और साधुता के गुण मुझ में प्रकट हों, ऐसा मांगना।

मतलब यह कि हम मन में ऐसा संकल्प करें, ऐसी भावना भाएं, ऐसा पुरुषार्थ करें कि हम में भी वे सभी गुण प्रकट हों जो साधु, उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत प्रभु या सिद्ध भगवान में होते हैं और हम भी सिद्ध-बुद्ध-मुक्त हो जाएं!

मन्दिर में प्रवेश करते समय जिस प्रकार ‘निसीहि’ बोलकर सांसारिक पाप-व्यापार को छोडने का प्रणिधान (संकल्प) किया जाता है; उसी प्रकार उपाश्रय अथवा अन्य किसी धार्मिक स्थान में प्रवेश करते समय भी ‘निसीहि’ बोलने का विधान है। कारण कि मन्दिर की भाँति ही उपाश्रय या अन्य किसी धार्मिक स्थल में किसी भी प्रकार के सांसारिक पाप-व्यापार का मानसिक-वाचिक-कायिक प्रवर्तन नहीं किया जाता।

‘निसीहि’ का अभिप्राय है छोडना, त्यागना। मैं सांसारिक पाप-व्यापार को छोडता हूं। यह मन्दिर में प्रवेश के समय भी छोडना है और उपाश्रय या किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश के समय भी छोडना है। वहां हमें विशुद्ध रूप से आत्म-कल्याण का पुरुषार्थ ही करना है। यह आत्म-कल्याण की दिशा में पहला कदम है. -सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

अहिंसा सर्वोपरि है



जिस लक्ष्य से क्रिया करनी है, उस लक्ष्य के मद्देनजर वह क्रिया नहीं करे तो शास्त्र कहते हैं कि अजीर्ण हो जाता है। ज्ञान का अजीर्ण अहंकार है और तप का अजीर्ण क्रोध है। जो उसके हेतु (लक्ष्य) को नहीं सहेजते, उन्हें यह होता है। अहिंसा, संयम और तप : ‘धम्मो मंगल’ की गाथा में ज्ञानी ने यह क्रम कहा। वहां पहले अहिंसा क्यों? पहले संयम क्यों नहीं? तो कहा कि संयम भी अहिंसा के लिए ही है और तप संयम के लिए है। सबसे पहले अहिंसा; इसे सहेजने, पल्लवित करने और इसमें वृद्धि करने के लिए संयम है। जो संयम पालते हुए अहिंसा जाए, वह संयम नहीं है। ऐसा संयम नहीं चाहिए। शास्त्र ने बगुले के संयम को असंयम कहा है। बगुला स्थिर होता है, इन्द्रियों का गोपन करके रखता है, उसे लाभ होता है? नहीं। कारण कि वह यह सब हिंसा के लिए करता है। उसकी यह क्रिया तो अहिंसा की घातक है। अहिंसा यह तो धर्म का पाया है, आधार है, धर्म की नींव है और संयम आत्मा का स्वरूप है।

अहिंसा के लिए ही बाकी का सबकुछ है। जो स्वयं की हिंसा नहीं चाहते उनसे दूसरों की हिंसा नहीं चाही जा सकती। अहिंसा यह आत्मा का मूल गुण है। अहिंसा यह पहला महाव्रत है। बाकी के सभी व्रत अहिंसा की सुरक्षा और संरक्षण रूप बाड हैं। पहले व्रत की सुरक्षा के लिए बाकी के व्रत हैं। पहला व्रत नहीं हो तो ये दूसरे व्रत होते हुए भी व्रतधारी नहीं कहलाता। श्रावक के पहले पांच अणुव्रतों में मुख्य तो यही है, बाकी के चार इसे पल्लवित करने के लिए ही हैं। तीन गुण व्रत, ये पांच का पोषण करने के लिए और चार शिक्षाव्रत इनमें सुधार करने के लिए हैं। जिसे स्वयं का बिगाड अच्छा नहीं लगता, वह दूसरे का बिगाड नहीं करता। अहिंसा के लिए संयम है; अहिंसा भूले तो संयम व्यर्थ है। संयम की शुद्धि के लिए तप है। संयम पर चिल्लाए, क्रोध करे ऐसा तप वह तप नहीं है।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

संसार असार लगे तो धर्म समझ आए



संसार की असारता समझे बिना धर्म नहीं जचता। जो संसार को अच्छा मानते हैं, उन्हें धर्म कहने के लिए शास्त्रों में मनाही है। ‘ज्ञानसार’ में उपाध्यायजी महाराजा पहले ही पूछते हैं कि-

बिभेषि यदि संसारान्, मोक्षप्राप्ति च काङ्क्षसि ।

तदेन्द्रियजयं कर्तुं, स्फोरय स्फारपौरुषम् ।।

अर्थ : यदि तुम्हें संसार का भय लगा हो, मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा जगी हो तो इन्द्रियों को जय करने के लिए तुम पुरुषार्थ करो।

पहले सामने वाले को पूछा जाता है कि तुझे संसार असार लगा है? मुक्ति की चाहत है? इन दोनों बातों में जो "हां" कहे उसे ही धर्म सुनाया जाता है।

संसार की असारता बताना यह मुनि का पहला धर्म है, ऐसा लगता है या नहीं? मरते-मरते भी संसार को सारभूत कहने में न आ जाए इसकी मुनि सावधानी रखते हैं। कोई मुनि जरा मंद शक्ति वाला हो तो कदाचित अपने सहवासी को संसार की असारता नहीं समझा पाए, किन्तु वह खुद के पास से कोई संसार को सारभूत तो न ही समझ जाए, इसकी सावधानी तो रखता ही है न? भूलचूक से भी स्वयं का सहवासी ऐसा न समझ जाए यह सावधानी तो मुनि प्रतिक्षण रखता ही है। मुनि ढीला हो तो कडवा कभी न भी कहे, किन्तु सामनेवाले को खुश रखने के लिए ‘तुम तो बहुत सुखी, तुम्हारा संसार अच्छा है’, ऐसा तो नहीं ही कहेगा।

मुनिपन लिया है, संसार को खोटा मानता है, आगम हाथ में है, आगम में भी संसार को खोटा कहा गया है, फिर भी उसके मुँह से दूसरी बात कैसे निकलती है?

संसार छोडा यह बात सही है, किन्तु उसने जिसकी आज्ञा से संसार छोडा उसकी निश्रा में रहता तो यह परिणाम नहीं आता; अथवा आगमरूपी प्रकाश का उपयोग किया होता तो यह दशा नहीं आती। किन्तु जिसकी निश्रा से संसार छोडा उसकी निश्रा छूट गई, आगम का उपयोग दूर हो गया इसलिए आज यह परिणाम आया।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 18 नवंबर 2015

संसार की असारता का विचार करो



हर समय दुनिया की तमाम वस्तुओं की सारता-असारता का अहर्निश विचार करो! प्रत्येक चीज के उपयोग से पूर्व ऐसा विचार करने की आदत डालो! कोई भी चीज हाथ में लो तब इसे पूछो कि यह किसकी है? अपनी या पराई? अच्छी या बुरी? सुखद या दुःखद? ऐसा करते-करते धर्म की जिज्ञासा जागृत होगी। किन्तु आप तो उल्टे उसके रंग में रंगजाते हो। भोजन में पांच चीजें आए कि आपको जल्दी से उनका स्वाद लेने का आदेश अंदर से आए, मुँह से लार टपकने लगे। वहां विचार करने के लिए जरा रुकते हो? रसना के ऐसे गुलामों को संसार की असारता कोई समझाने का प्रयास करे तो समझाए कैसे? कारीगर के हथियार अच्छे, किन्तु इनका उपयोग योग्य वस्तु पर ही संभव है; जहां-तहां उनका उपयोग करे तो उनकी धार ही समाप्त हो जाए और वे बोथरे हो जाएं। खेत साफ किए बिना हल नहीं जोता जाता; इसीलिए ज्ञानी ने सबसे पहले संसार की असारता का उपदेश दिया। संसार की असारता तो क्षणभर ठहरो तो महसूस हो न? लेकिन, आपको यह विचार करने की गरज ही नहीं है। घर से बाहर निकलते समय कोट पहिनते हो, तब विचार करने के लिए रुको तो कोट भी बोध प्रदान करता है। श्री हेमचन्द्रसूरिजी महाराजा कहते हैं कि इस प्रकार प्रत्येक क्रिया में विचार करें तो सभी क्रियाओं में से वैराग्य प्राप्त होता है। घर का मालिक मकान की सांकल बजते ही विचार करे कि ‘सुबह खोल सकूंगा या नहीं?’ तो वैराग्य नहीं आएगा? आएगा ही; किन्तु कौन विचार करे? अरे, कोई कहनेवाला मिले तो उल्टा उसे आँखें निकालकर डांटे कि ‘ऐसी अपशुकुनी बात क्यों करते हो? मुझे मारना चाहते हो?’ जबकि उस समय उसे यह लगना चाहिए कि ठीक चेतावनी मिल रही है। तिजोरी के ताला लगाकर सोनेवाले उसे खोलने के लिए वापस नहीं उठे, ऐसी घटनाएं नहीं हुई हैं? ऐसा नहीं होता? यह बात यदि विचारने में आए तो कृपणता जाए और उदारता आए, लक्ष्मी का मोह छूटे और धर्म जल्दी गले उतरे। यह सब विचार करने में ही दिवाला है, इसीलिए सारा दिवालियापन है।

श्री जिनेश्वरदेव के मंदिर तथा मूर्ति, निर्ग्रंथ गुरु और आगम का श्रवण ये वैराग्य का रेला नहीं बहा दें? किन्तु हृदय खोखला हो तो वहां क्या हो? संसार की असारता का आभास हुए बिना धर्म की जिज्ञासा नहीं होती और जिज्ञासा हुए बिना धर्म परिणाम प्राप्त नहीं करता। नींव की शुद्धि और मजबूती के बिना महल खडा नहीं किया जा सकता, मूल की शुद्धि बिना फल नहीं मिलता और हृदय की शुद्धि बिना इसमें वस्तु प्रवेश नहीं करती। इसलिए हृदय को शुद्ध बनाओ!

संसार में आपको जो चीजें मिली हैं, वे पुण्य के योग से मिली हैं, इससे इन्कार नहीं है, किन्तु इनसे सेवा करवाने में कल्याण है, इनकी सेवा करने में कल्याण नहीं है, यह बराबर विचार करो और समझो! ये तो धनतेरस के दिन दूध से धन को खूब धोते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे घर पर कायम रहना, दूसरी जगह मत जाना’, ऐसों को वैराग्य होगा? धर्म के प्रसंग में उपयोग करने की बात आती है तो वहां कहते हैं कि ‘अभी धंधे में मंदी चल रही है, दो लाख का घाटा हुआ है।’ लेकिन वहां तो दो की जगह पांच लाख का होगा तो भी भरेंगे, किन्तु यहां नहीं देंगे।

खाना, पीना, सोना, उठना, बैठना, मकान में घुसना और उसमें से निकलना, इस तरह प्रत्येक क्रिया के समय इस प्रकार सोचने की आदत डालोगे तो दीपक की तरह धर्म की जिज्ञासा प्रकट होगी और इस दीपक के प्रकाश में सबकुछ देखा जा सकेगा। अंधेरे में हाथ में दीपक हो तो दिक्कत नहीं आती।--सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

जिज्ञासा होनी चाहिए



सम्यक्त्व से पहले का गुण है जिज्ञासा। यह आए तो सारे गुण आएं। जिज्ञासा यानी जानने की इच्छा। धर्म जानने की जिज्ञासा प्रकट हुई या नहीं, इसका क्या आधार? व्यक्ति जहां बैठा है वहां तमाम संयोग सारभूत नहीं दिखाई देते, इनके अतिरिक्त कुछ नया जानने की इच्छा जागृत हो, यही इसका आधार है। ‘यह भी ठीक और वह भी ठीक’ यह भावना हो तो यह जिज्ञासा नहीं है। जिज्ञासा प्रकटे तो गुरु के पास जाने की इच्छा अपने आप होती है। गुरु के पास जाए तो विनय और नम्रता उसके साथ चली आती है। ये आती हैं तो पूछने की भावना होती है। इस प्रकार पूछे गए सवालों का उत्तर प्रेम से सुना जाता है और जो प्रेम से सुना जाए वह हृदय में उतरता ही है। विधि और क्रम यही है। आज तो न जिज्ञासा है, न इच्छा है, न विनय या नम्रता, न सवाल और न उत्तर सुनने का प्रेम। प्रेम से सुनें तो हृदय में उतरे ही। हृदय कोई पत्थर नहीं, यह तो पोची जमीन है। उपजाऊ जमीन में थोडी सी भी बारिश हो तब भी किसान पेट भरने जितना तो कमा ही लेता है। वह बारिश निष्फल नहीं जाती। क्रमशः एक-एक गुण बढते-बढते आत्मा में असंख्यात गुणी निर्मलता बढती है। एक जिज्ञासा गुण से इस आत्मा को दुनिया की दूसरी आत्माओं की अपेक्षा असंख्यात गुणा निर्जरा होती है।-सूरिरामचन्द्र