रविवार, 21 फ़रवरी 2016

मरण सुधारने के लिए जीवन सुधारो



मरण निश्चित है, यौवन फूल जैसा है और ऋद्धि चंचल है। इतना जानने के बाद भी मरण आने के पहले साधने योग्य साधन की तरफ बेफिक्र होना, यौवन में भान भूलकर रहना और ऋद्धि का गुलाम बनकर धर्म से परांगमुख बने रहना, इसमें क्या चातुर्य है? कुसुम को कुमलाते हुए कितना समय लगता है? और कुमलाए हुए फूल की कीमत कितनी होती है? यौवनरूप फूल कुमला जाए, उसके पूर्व ही यौवन में मोक्षमार्ग की उत्कृष्ट साधना-आराधना करने के लिए तैयार होना चाहिए। इसी प्रकार ऋद्धि चंचल होने से उसके घमण्ड में न रहकर, संभव हो वहां तक उसका भी अधिक से अधिक सदुपयोग कर लेना चाहिए। यौवन भोग में जाए और ऋद्धि का दुरुपयोग हो, तो मरण सुधरता है या बिगडता है? बिगडता ही है। अधिकांशतः ऐसा ही होता है।

इसलिए मरण को सुधारना हो तो जीवन को सुधारो। ऐसा न हो कि जीवन के अंत में पश्चाताप करना पडे कि ‘मरण निश्चित है, यौवन फूल के जैसा है और ऋद्धि चंचल है, यह जानने के बाद भी मैंने प्रमादवश धर्म नहीं किया और विषयों के अधीन बनकर, प्रमाद में पडकर मैंने यह जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया।’ हालांकि जीवन व्यर्थ गंवाने वालों में भी पुण्यात्माओं को ही मरण के समय ऐसा विचार आता है। अंतिम क्षणों में भी ऐसे विचारों से कर्मों की कुछ निर्जरा होती है, कर्मबंध ढीले पडते हैं, लेकिन घर में आग लगी हो, तब कुआं खोदने की शुरुआत होती है क्या? सांप के डंक मारने के बाद मंत्र-जाप का अवसर होता है क्या? ऐसे विचार आने पर भी गति पूरी तरह सुधर जाएगी, ऐसा नहीं समझना चाहिए। इसलिए मरण सुधारने के लिए जीवन सुधारना ही श्रेयस्कर है।

फिर भी मृत्यु कब और किस अवस्था में आएगी यह अनिश्चित है, उन क्षणों में सामान्य चिन्तन का अवसर भी मिलेगा या नहीं, यह विचारणीय है। यदि मृत्यु पूर्व चिन्तन का जरा भी अवसर मिलता है तो विचार करें कि ‘मैं मरण अवस्था में पडा हूं, जीवन का संदेह स्पष्ट दिखता है। इस समय कुछ विशेष धर्म करने का समय नहीं है, मैं कितना पामर और अधम हूं कि मुझे वीतरागी श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्रणीत जैन धर्म मिला और मैं आत्म-कल्याण के लिए कुछ कर नहीं पाया, मैं अपने किए गए पापों का गहन पश्चाताप करता हूं और श्री अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, साधु भगवंतों को नमस्कार करता हूं। मैं श्री अरिहंत, श्री सिद्ध, श्री साधु भगवंतों और श्री केवली भगवन्तों द्वारा प्ररूपित धर्म की शरण ग्रहण करता हूं। ये चार शरण ही मंगलभूत हैं।’ इस प्रकार श्री नवपद की आराधना में आत्मा को लीन बनाओ। श्री नवपद की आराधना करने वाले का कल्याण न हो, यह अशक्य है।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

कर्म परिणामों को समभाव से सहन करें



कर्म के अधीन सुख-दुःख को अवश्य ही भोगना पडता है। सुख-दुःख कर्म के अधीन हैं और कर्म के नाश के बिना उनका नाश संभव नहीं है। इस कारण कर्माधीन जीवों को यह अवश्य ही भोगने पडते हैं। जिस वस्तु (कर्म-परिणाम) को भोगे बिना कोई चारा नहीं, कोई रास्ता नहीं, कोई विकल्प नहीं, उसे भोगते हुए शोक किसलिए? खेद करने से क्या होगा? रोने से क्या होगा? इससे तो और नए दुष्कर्मों का उपार्जन होगा। जब कर्माधीन सुख-दुःख भोगने ही पडें वैसे हैं, तो उन्हें इस प्रकार से क्यों न भोगे जाएं कि जिस रीति से उनको भोगते हुए आत्मा नवीन दुष्कर्म का उपार्जन करने वाला नहीं बने और उदय में नहीं आए हुए ऐसे भी दूसरे बहुत कर्मों की निर्जरा साधने वाली बने। दुःख आने वाला है, यह बात निश्चित है। उसको भोगे बिना छुटकारा नहीं है। रोने से या माथा कूटने से कुछ नहीं होना है। तो धीर और वीर बनकर समभावपूर्वक आए हुए दुःखों को सहन करने में आपत्ति क्या है? इसमें लाभ है या नुकसान? एकान्ततः लाभ ही है।

आत्मा सच्चा धीर और वीर बनता है तो उसका दुःख कुछ भी बिगाड नहीं सकता। आया हुआ दुःख उल्टा उपकारक बन जाता है। सोचो कि भयंकर दुःख में भी सुन्दर भाव के योग से उत्पन्न होने वाला समाधि-सुख, यह कैसा अनुपम सुख है? यह दशा तो वर्तमान में भी सुख देती है और भविष्य को भी सुखमय बना देती है। इसके विपरीत, दुष्कर्म के उदय के समय व्यथित होने वाले, अस्वस्थ बनने वाले, रोने वाले अथवा माथा कूटने वाले आदि तो, उदय में आए हुए दुष्कर्म को भोगने के साथ दूसरे अनेक दुष्कर्मों को उपार्जित कर स्वयं के दुःख को बढा देते हैं। इससे नहीं तो वर्तमान में शान्ति मिलपाती है और न भविष्य में शान्ति मिलना संभव है।

कर्मसत्ता की अधीनता से मुक्त बनाने वाली धर्मसत्ता है। धर्मसत्ता की शरण में रहने वाली आत्माएं कर्मसत्ता से सर्वथा मुक्त न बने, वहां तक भी समाधिमय मानसिक स्वास्थ्य को सुन्दर प्रकार से भोग सकती हैं। विपत्ति के समय में दूसरे किसी की भी शरण सफल नहीं होती है, केवल मात्र एक धर्म की शरण ही सही राह दिखा सकती है। विपत्ति से उद्धार करने में वास्तविक प्रकार से कोई समर्थ है तो वो केवल धर्म ही है और धर्म भी वह कि जो श्री जिनेश्वर देवों द्वारा प्ररूपित है। हम जैन हैं, इसलिए हम ऐसा कहते हैं, ऐसा नहीं है। जो वास्तविकता है, वही हम कहते हैं। सम्यक्त्व अर्थात् क्या है? जो जैसा है, उसको वैसा ही मानना। चेतन और जड का जो वास्तविक स्वरूप है, उसी स्वरूप को मानना और उससे विपरीत स्वरूप को मिथ्या मानना। हेय को हेय और उपादेय को उपादेय मानना, यही सम्यक्त्व है। श्री जिनोक्त तत्त्वों में रूचि को ही सम्यक्त्व कहते हैं। श्री जिनेश्वरदेवों ने तत्त्वों का स्वरूप जैसा है, वैसा ही फरमाया है, इसलिए वही सच्चा धर्म है और वही विपत्ति से उद्धार करने वाला है।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

शान्ति चाहिए तो परभाव से मुक्त बनो!



किसी की अनुकूलता में बाधक न बनने और हमको जो प्रतिकूल हो, ऐसे व्यवहार का दूसरों के प्रति आचरण न करने के लिए सबसे पहली बात है कि हम पर-पदार्थों को अपना मानना छोड दें। समझ लीजिए कि जो कुछ आप देख रहे हैं, वह सब ‘पर’ हैं और आप इनसे ‘पर’ हैं। जब तक इन दृष्टव्य भौतिक पदार्थों से मेरी आत्मा दूर नहीं होगी, तब तक मेरी आत्मा आधि, व्याधि और उपाधि से बच नहीं पाएगी। भौतिक पदार्थ भी इच्छा करने या प्रयत्न मात्र से नहीं मिल जाते, क्योंकि मैं चाहे कितनी भी चाहना करूं या उन्हें पाने के लिए कितने ही प्रयत्न करूं, वे मिल ही जाएं यह जरूरी नहीं, क्योंकि वे भाग्याधीन हैं। ऐसे पदार्थों के पीछे जीवन बर्बाद करना और जो मेरा है, उसे भूल जाना, यह निरी मूर्खता है। जो मेरा है, उसका प्रादुर्भाव तब होगा जब मैं पर से मुक्त बन जाऊं।

इस प्रकार स्व-पर का विवेक करने के बाद स्व को उन्नत बनाने की कोशिश कीजिए। अनंतज्ञानियों द्वारा बताए गए मार्ग का इस प्रकार अनुसरण कीजिए कि किसी भी संयोग में जो अपने को प्रतिकूल व्यवहार है, उसका आचरण किसी के प्रति न हो। इस प्रकार यथासंभव सबके अनुकूल बतार्व का प्रयत्न शुरू होगा तो जीवन में हिंसा की जगह अहिंसा का आगमन होगा, असत्य की जगह सत्य आएगा, अनीति का स्थान नीति ले लेगी, विषय-विलास की जगह विषय-वैराग्य का प्रादुर्भाव होगा, पर-पदार्थ की मूर्च्छा जाएगी और दुनिया की वस्तुओं के प्रति जो ममत्व बुद्धि है, वह खत्म हो जाएगी।

इससे क्रोध की जगह क्षमा, मान की जगह मृदुता, माया के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष आएगा। इसके साथ वैराग्य, समभाव आएगा और कलह-क्लेश का नाम भी नहीं रहेगा। किसी पर आरोप लगाना, चुगली करना, सांसारिक सुख के पदार्थों के वियोग के कारण हर्ष-शोक करना, पर-निंदा की बुरी आदत इत्यादि पाप खत्म हो जाएंगे। जीवन में धर्म आने लगेगा और अठारह प्रकार के पाप अपने आप जाने लगेंगे। ऐसी आत्मा कभी किसी के लिए दुःखरूप नहीं बनेगी या किसी को दुःखी नहीं बनाएगी।

जिसके जीवन में धर्म नहीं है, उसको शान्ति तो नहीं ही मिलेगी, वह दूसरों के लिए भी शापरूप बन जाएगा। इस बात का विचार करके, धर्म को अपना साथी बनाने का आपको प्रयत्न करना होगा। जो पुण्यात्माएं धर्म को साथी बनाकर अपना जीवन जीने का निर्णय करेंगी, वे इस भव में भी सुख और शान्ति का अनुभव करेंगी और पर-भव को भी सुधारकर अन्ततः परम् शान्ति को प्राप्त कर सकेंगी। सभी इस प्रकार का वर्तन करें और परम् शान्ति को प्राप्त करें, यही शुभेच्छा है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

पर पदार्थ में ममत्व भी व्यभिचार है



आर्यों में भी जो उत्तम कोटि के आर्य हैं, उन्होंने पर स्त्री के सामने विकार भरी दृष्टि डालने को भी व्यभिचार माना है। इस बात को लेकर जैन शासन के महापुरुष तो यहां तक फरमाते हैं कि पर-भाव में ममत्व की बुद्धि भी एक प्रकार का आत्मा का व्यभिचार है।

‘पर’ अर्थात्? शरीर से लेकर यह समस्त जगत हम से ‘पर’ (भिन्न) है। जिसे हम ‘मेरा शरीर’ कहते हैं, वह भी वास्तव में अपना नहीं है। अनादिकाल से जिसका ‘अस्तित्व’ है और जो भिन्न-भिन्न शरीर में रही है, ऐसी आत्मा ही ‘मैं’ हूं। ‘मैं’ अर्थात् शरीर नहीं, अपितु शरीर में रही आत्मा। उस आत्मा के स्वयं के गुणों के सिवाय, मेरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का भान हमें यह जैन शासन प्रारम्भ से ही कराता है।

आत्मा के गुणों को छोडकर मेरा कुछ भी नहीं है और फिर भी इस शरीर आदि में हमें ‘ममत्व’ बुद्धि है। शरीर आदि में ममत्व बुद्धि, यह आत्मा का अनादिकालीन व्यभिचारी स्वभाव है। जब तक शरीर आदि के ऊपर से ममत्व बुद्धि दूर नहीं होगी, तब तक आत्मा का अनादिकालीन व्यभिचारी स्वभाव दूर नहीं हुआ है, यह मानना ही पडेगा।

मनुष्य जन्म को सफल बनाना हो तो उस व्यभिचारी स्वभाव को छोडना ही होगा। जब तक शरीर आदि के विषय में ममत्व बुद्धि दूर नहीं होगी और जब-जब भी ममत्व बुद्धि हो जाए, तब-तब खयाल आते ही उससे रुकें नहीं.... आकुल-व्याकुल न हों, तब तक अनंतज्ञानी आदि तारकों ने रत्नत्रयी के भाजन रूप मनुष्य जन्म की जो पहिचान कराई है, उसे हम पढें-सुनें तो भी यह बात हृदय में स्थिर नहीं होगी। जैन कुल में तो यह शिक्षण बचपन से ही मिलना चाहिए। शरीर और अन्य पदार्थों के प्रति ममत्व बुद्धि हो जाए तो उसका खयाल आते ही कंपन का अनुभव हो, ऐसे जैन कितने?

शरीर और अन्य पदार्थों के प्रति ममत्व बुद्धि का सर्वथा अभाव हो, यह स्थिति अभी दूर है। क्योंकि उसके लिए तो अत्यधिक सामर्थ्य चाहिए। परन्तु हृदय से मूल सिद्धान्त की रुचि पैदा हुए बिना शरीर आदि के प्रति रही ममत्व बुद्धि का हृदय में डंक भी कहां से रहेगा? अनादिकालीन अभ्यास आदि के कारण समझदार आत्माओं में भी कभी-कभी शरीर आदि के प्रति ममत्वभाव हो जाए, यह भी कोई असंभव बात नहीं है। परन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ममत्व भाव आ जाए तो वह हृदय में खटकता है या नहीं? उसे मूल में से निकालने का मन होता है या नहीं? मनुष्य जन्म, एक मात्र रत्नत्रयी का ही भाजन है, यह बात हृदय में बराबर जच जाए तो ही शरीर आदि के प्रति रहा ममत्व भाव हृदय में कांटे की भाँति डंक देगा और उस ममत्व भाव से सर्वर्था मुक्त बनने का प्रयत्न होगा।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

तृष्णा का आतंक



मन की तृष्णा ने आज कितना भयानक आतंक फैलाया है? पिता-पुत्र, पति-पत्नी, बडा भाई-छोटा भाई, सास-बहू इन सब लोगों के बीच का व्यवहार देखो। जरा सोचो तो सही एक दूसरे के लिए कितनी ईर्ष्या, द्वेष-भावना दिल में भरी हुई है? मन की तृष्णा बढी है। पर-वस्तुओं को प्राप्त करने की व भोगने की लालसा बढी है और त्याग-भावना नष्टप्रायः हो गई है। इसके परिणामस्वरूप आज के संसार में भयानक भगदड और भागदौड मच रही है। लोग भौतिकता की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं।

जब तक मन की भयानक भूख नहीं मिटेगी और त्याग की भावना पैदा नहीं होगी, तब तक ऐसी भगदड और भागदौड मची रहेगी, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। इस तरह विचार किया जाए तो अवश्य समझ में आएगा कि मन की भौतिक भूख ही सारे विनाश का कारण है। आज सभी तरफ अधिक से अधिक धन कमाने की होड मची हुई है, येन-केन-प्रकारेण जल्दी से जल्दी इतना धन कमाना कि कोई प्रतिस्पर्द्धा में अपने सामने न टिके। बस, यही धुन सवार है। नीति से कमाया हुआ धन भले ही अच्छा माना जाए, परन्तु धन तो वास्तव में खराब ही है, क्योंकि यह प्रायः तृष्णा को जगाता ही है। और जो धन का बन जाता है, वह बाप का नहीं रहता, मां का नहीं रहता, भाई का नहीं रहता, पुत्र का नहीं रहता, पुत्री का नहीं रहता; वास्तव में फिर वह किसी का नहीं रहता। धन ही उसके लिए सबकुछ होता है। वह धन के नशे में पागल हो जाता है, बेभान हो जाता है।

आज आप लोगों के घरों में बुजुर्गों की स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘जो कमावे, वह खावे और दूसरा मांगे तो मार खावे’। ऐसी स्थिति हो जाने के कारण ही इस देश में वृद्धाश्रम या विधवाश्रम की बातें चलने लगी हैं। ऐसे आश्रम स्थापित हों, यह कोई गौरव की बात नहीं है; अपितु उन बुजुर्गों और विधवाओं के परिवारों के लिए तथा समाज और संस्कृति के लिए शर्म की बात है।

आपसे मेरा पहला प्रश्न यह है कि आपका राग आप के माता-पिता पर अधिक है या पत्नी-बच्चों पर अधिक है? भगवान पर राग होने का दावा करने वाले को मेरा यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। योग की भूमिका में माता-पिता की पूजा लिखी है, पत्नी-बच्चों की नहीं। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि आज के लोगों को कम से कम कीमत की कोई चीज लगती हो तो वह उसके मां-बाप हैं।-सूरिरामचन्द्र

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

अपना भविष्य अपने हाथ में है



आप जरा शान्त-चित्त से चिन्तन करके देखिए, अपने आप से पूछिए कि ‘मैं कौन हूं, शरीर या आत्मा?’ आप चिन्तन करेंगे तो पाएंगे कि ‘मैं शरीर नहीं, अपितु आत्मा हूं।’ शरीर और आत्मा एक नहीं, बल्कि भिन्न हैं, इसी कारण जो शरीर का सुख है, वह आत्मा का सुख नहीं है। शरीर के सुख में आत्मा को सुख हो, ऐसा नियम नहीं है। शरीर के दुःख में भी आत्मा सुखी हो सकती है और शरीर के सुख में भी आत्मा दुःखी हो सकती है। लेकिन, किसी भी अवस्था में आत्मा को दुःखी नहीं करना चाहिए। आत्म-सुख के लिए शरीर का सुख छोडना पडे तो छोड देना, क्योंकि ‘मैं शरीर नहीं हूं।’ शरीर और आत्मा भिन्न हैं, मैं शरीर नहीं, आत्मा हूं; इतना भान आपको हो जाएगा तो आपकी कार्यशैली स्वतः बदल जाएगी।

‘मैं कहां से आया हूं?’ इसकी कल्पना अपनी वर्तमान स्थिति से कर सकते हैं। किसी भी गति से मैं आया, लेकिन इतना तो तय है कि पूर्व भव में कुछ पुण्य कर्म करके आया हूं। इसीलिए मुझे यह श्रेष्ठ भव मिला है तथा अन्य जीवों की अपेक्षा श्रेष्ठ सामग्री प्राप्त हुई है। ‘मेरा वर्तमान आचरण कैसा है?’ अब यही देखना है, क्योंकि यहां से मरकर कहां जाना है, इसका आधार उसी पर है। सदगति में ही जाने की इच्छा होने पर भी वर्तमान जीवन शैली के आधार पर ही वह स्थान निश्चित होने वाला है। इस दृष्टि से आपका भविष्य आप के ही हाथों में है। आप जो प्रवृत्ति करते हैं, वह भविष्य का विचार करके करते हैं? इस सवाल पर विचार करते हुए आपको धैर्य के साथ चिन्तन करना होगा।

सोचना होगा कि मैं जो भी प्रवृत्ति कर रहा हूं, क्या भविष्य का विचार करके कर रहा हूं? आत्मा की दृष्टि से भविष्य में इसका अच्छा परिणाम आएगा या नहीं? यदि आपको यह समझ नहीं आता तो ज्ञानियों से पूछकर अपनी प्रवृत्ति करें, क्योंकि अब तक जो किया, वह तो भूतकाल हो गया, उसके भविष्य में जो परिणाम आने हैं, वे तो आएंगे ही, किन्तु अब तो संभल जाऊं ताकि भविष्य सुधर सके, अब आगे का तो अपने हाथ में है। वर्तमान काल हमारे भूतकाल की कार्यशैली का ही परिणाम है, इसका खयाल नहीं होने के कारण ही वर्तमान में शान्ति नहीं है। लेकिन, भविष्य अपने हाथ में होने पर भी गलत प्रवृत्ति कर अपने भविष्य को बिगाडना क्या समझदारी का लक्षण है? भविष्य का चिंतन करने वाले चक्रवर्ती सम्राट भी राजपाट सब छोडकर साधु बन गए। एक क्षण में उन्होंने छः खण्ड की सुख-सामग्री छोड दी। उन्होंने सोचा कि ‘इस सुख-समृद्धि में भविष्य का विचार नहीं किया तो भविष्य खतरनाक है।’ कोई भी प्रवृत्ति करते समय भविष्य का विचार करना तथा स्वयं को मालूम न पडे तो ज्ञानी को पूछकर प्रवृत्ति करना, ये दो नियम जीवन सुधार के लिए आवश्यक हैं।-सूरिरामचन्द्र