सोमवार, 25 अगस्त 2014

पापानुबंधी पुण्य और पुण्यानुबंधीपुण्य


नीति के मार्ग पर चलते हुए जो पुण्य न फले और अनीति करने से ही जो पुण्य फलदायी हो, उसके लिए समझ लेना चाहिए कि वह पुण्य पापानुबंधी पुण्य है। पापानुबंधी पुण्य भी अर्थ-काम की सामग्री प्राप्त कराने वाला है और पुण्यानुबंधी पुण्य भी अर्थ-काम की सामग्री प्राप्त कराने वाला है। किन्तु, इन दोनों के बीच में अन्तर है। पापानुबंधी पुण्य उदय में आने लगे कि पापवृत्ति शुरू हो जाए। उसका जितना अधिक उदय होगा, उतनी ही पापवृत्ति अधिक होगी। इस पुण्य का उदय आदमी को आदमी नहीं रहने देता। आदमी को पागल बना देता है। अर्थ और काम की सामग्री का नशा चढ जाता है और धर्म भुला देता है। थोडी आत्माएं ही सामर्थ्य अर्जन करें तो बच सकती हैं। पापानुबंधी पुण्य ही उसे कहते हैं कि जो उदय में आकर जाते-जाते पाप का बडा पोटला चोंटा देता है। पुण्य समाप्त होता जाता है और पाप का संचय होता जाता है।

इस पुण्य के उदय की ज्ञानी प्रशंसा नहीं करते हैं। पापानुबंधी पुण्य के योग से मिली हुई सामग्री का उपयोग कहां होता है? इस सामग्री का उपयोग पापमय न बनता हो और आत्मा के परिणाम पापमय न बन जाते तो पीछे पाप का अनुबंध कैसे पडता? पीछे पाप छोडकर जो पुण्य जाए वह पापानुबंधी पुण्य है। इस पुण्य का पगला उदय में आने लगता है, तब यहां पाप की दिशा में पगला भरा ही रहता है। यह पुण्य ही इस प्रकार का है कि इसके खत्म होते-होते आत्मा पाप से भारी हो चुका होता है।

आज के कितने ही श्रीमानों की दशा का जो विवेकपूर्वक गहराई से अवलोकन करें, तो आपको यह वस्तु आँख के सामने दिखाई देगी। समृद्धिमंतों की दशा देखने के लिए भी इसलिए कहा जा रहा है कि वहां सामग्री विशेष होने से कहां किस प्रकार से उपयोग हो रहा है, उसकी और उस विशेष सामग्री के योग से कैसी दशा को वह प्राप्त कर रहा है, इत्यादि की शीघ्रता से स्पष्टता हो जाए। बाकी तो सामान्य स्थिति के मनुष्यों की दशा भी देखना आए तो किस-किस पुण्य का प्रभाव चल रहा है, उसका खयाल आ जाए। पापानुबंधी पुण्य का उदय बहुत भयंकर प्रकार से दुःख देने वाला होता है। जबकि पुण्यानुबंधी पुण्य की दशा उससे विपरीत होती है। पुण्यानुबंधी पुण्य का उदय पापानुबंधी पुण्य की तुलना में बहुत ही उच्च कोटि की सामग्री देता है और उसमें आत्मा को पागल नहीं बनाता है। इस सामग्री का आत्मा उपभोग करता रहे, तब भी उसे विरक्ति पैदा होती रहती है। मिली हुई सामग्री का उन्मार्ग की बजाय सन्मार्ग में व्यय होता है। यह पुण्यानुबंधी पुण्य का प्रभाव है। इसके प्रभाव से आत्मा अनीति से दूर रहता है, बुद्धि निर्मल रहती है, भावनाएं पवित्र रहती हैं और मोक्ष-मार्ग की ओर उन्मुख होता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

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