शनिवार, 13 मई 2017

मां की जगह कोई नहीं ले सकता

प्रकृति ने हमें मां दी, जो हमें बिना मांगे सबकुछ दे देती है। उसकी छत्रछाया में हमें सालों तक पता ही नहीं चलता कि निर्भरता क्या होती है। बच्चा भूख को शान्त करने के लिए मां के दूध पर निर्भर रहता है और मां उसकी भूख को शान्त करने के साथ ही बिना मांगे उसे पोषण, सुरक्षा, संरक्षण, संस्कार और अपनापन भी देती है। दरअसल मां के भीतर बच्चे की भावनात्मक स्थिति को पढलेने की अद्भुत् क्षमता होती है जो बच्चे के अस्तित्व, सेहत, विकास और खुशी के लिए जरूरी है। जब कभी बच्चा आहत, उदास, परेशान या गुस्सा होता है तो मां का प्यारभरा स्पर्श उसे सुकून पहुंचाता है। गर्मजोशी से भरा मानवीय व्यवहार उसे तनाव से मुक्त करता है, वहीं मां का प्रेम उसे दर्द से छुटकारा दिलाने वाली ताकतवर दवा बनता है। मां के दिमाग से प्रवाहित ऊर्जा आँखों से होती हुई, बच्चे की आँखों में प्रवेश करती है और दिमाग का उद्दीपन करती है। इस उद्दीपन से न्यूरोकेमिकल प्रतिक्रियाएं होती हैं।
काल और संस्कारों के प्रभाव से, स्वार्थ और कर्मों के योग से एक पिता बच्चों से मुंह फेर सकता है, भाई-भाई और भाई-बहिन आपस में दुश्मन बन सकते हैं, पति-पत्नी एक दूसरे को धोखा दे सकते हैं, लेकिन मां का प्यार इन सबके बीच हमेशा जिन्दा रहता है और उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता। जिन बच्चों को मां का ढेर सारा प्यार मिलता है, उनका दिमाग स्वस्थ रहता है। मां के अस्तित्व से ही हमारा अस्तित्व है। अपनी ममता के शीतल स्पर्श से मां जीवन के हर पल को सुन्दर और यादगार बनाती है। मां अपने स्नेह का कोष लुटाकर हमारे जीवन के हर पल को सदा सुख, शान्ति और खुशियों से महका देती है। मां की जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।
 कोई तो ऐसा कारण होगा जो एक मां को अपने बच्चे के प्रति इतना संवेदनशील बना देता है कि वह अपनी फिक्र किए बिना उसका हित सोचने लगती है? साधारण व्यक्ति के लिए इस गुत्थी को सुलझाना मुश्किल है, लेकिन वैज्ञानिक इसे सहज गुण मानते हैं जो मां के भीतर जैविकरूप से मौजूद होता है। उसे अपने बच्चे के दर्द या खुशी को महसूस करने के लिए मशक्कत नहीं करनी पडती। वह तो उसके भीतर रचा बसा होता है। तंत्रिका वैज्ञानिकों (न्यूरो सांइसिस्ट) के अनुसार दिमाग का लिम्बिक सिस्टम हमारी संवेदनाओं का केन्द्र होता है। यह वह हिस्सा है जो मां और बच्चे को आपस में जुडाव पैदा करने के लिए प्रेरित करता है। इस तरह मां और बच्चा दोनों एक दूसरे से जुडने के लिए आनुवांशिक रूप से डिजाइन किए गए हैं।
 ऐसी हजारों घटनाएं हैं, जब माताओं ने इसी संवेदनशील जुडाव के कारण अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर बच्चे को बचाया। लेकिन, आजकल बहुत-सी माताएं पूरी तरह स्वस्थ होते हुए भी गर्भपात करवा लेती हैं, यह उनकी क्रूरता, हिंसा तो है ही, मातृत्व के लिए भी अत्यंत शर्मनाक है। जो महिलाएं गर्भपात करवाती हैं, उनकी संवेदनाएं मर जाती है, फिर लाख चाहने पर भी उनके भीतर मां की वह संवेदनशीलता पैदा नहीं हो सकती, जिसके बूते पर मां और बच्चे के बीच अनकहा संवाद होता है, दोनों को एक दूसरे के दर्द का एहसास होता है। दरअसल आज का मातृत्व सिर्फ वासनाजन्य मातृत्व बनकर रह गया है, जहां भावनाओं का कोई स्थान नहीं है।
बहुत-सी माताएं मां बनने के बाद अपने शिशु का लालन-पालन भी ठीक से नहीं करती। कुछ फैशन और फिटनेस के चक्कर में बच्चों को अपने से दूर कर आया अथवा नौकर या पालनाघर के हवाले कर देती हैं तो कुछ भागती-दौडती जिंदगी में हाय पैसाके लिए कामकाज के चक्कर में ऐसा करती हैं। कुछ बच्चे को जल्दी से जल्दी भौतिकता की चकाचौंध में हो रही प्रतिस्पर्द्धा की अंधी दौड में भागने के लिए सबसे आगे खडा करना चाहती हैं और इस हवस में बच्चे का बचपन छीन लेती हैं, उसमें वो इमोशंस ही पैदा नहीं होने देती, जिससे जुडकर बच्चा शिक्षा, संस्कार और विकास पा सके। बल्कि, इस प्रकार बच्चा एक मशीन बनकर रह जाता है, जिसमें कभी भी मनोविकृति पैदा हो सकती है। ऐसी मां को देर-सवेर इसकी सजा भी भुगतनी पडती है, चाहे यह सजा वह बुढापे में भुगते। बच्चा भी सजा भुगतता है। आज का ऐसा विकृत मातृत्व न केवल माताओं और परिवारों के लिए एक चुनौती है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक चुनौती है। ऐसे मातृत्व से संस्कारवान संतानों की उम्मीद नहीं की जा सकती।
मेडिकल साइंस और मनोविज्ञान के अनुसार मां का दिल बच्चे के दिल को उद्दीपन देता है, जिससे बच्चे के दिमाग और दिल के बीच संवाद स्थापित होता है। दिल से दिल की यह बात मांओं की बुद्धिमत्ता में भी बढोतरी करती है। बच्चे को सीने के बाईं ओर लेना, उसका मां के दिल से सम्पर्क बनाता है, वहीं मां के अन्दर निष्क्रिय बुद्धिमत्ता का बडा हिस्सा सक्रिय हो जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चे को निकटता से पकडना उसके नर्वस सिस्टम को सक्रिय बनाता है और यह निकटता मां की उस बुद्धिमानी में बढोतरी करती है, जो उसे बच्चे के प्रति प्रतिक्रिया करने, उसे संवेदनशील बनाने और उसकी परवरिश करने के लिए प्रेरित करती है।

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