शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

सम्यग्दृष्टि कषायों से सावधान रहे


सम्यग्दृष्टि कषायों से सावधान रहे

सम्यग्दृष्टि आत्माओं को कषायों से बहुत ही सावधान रहना चाहिए। विराग में कमी न हो, विषय-सुख के प्रति घृणा हो, त्याग के साथ तप का आचरण भी बहुत हो, परन्तु ऐसे व्यक्ति को भी ज्ञान का घमंड आ जाए तो ज्ञानी, त्यागी, तपस्वी, सम्यग्दृष्टि का भी पतन हो सकता है। विपरीत अर्थ किया और उसमें आग्रह आ गया, तो पतन होना सरल है और यदि आग्रह से बच जाए तो पतन न हो, यह भी स्वाभाविक है।

श्री सिद्धसेन दिवाकर और श्री जिनभद्र गणिवर के बीच बडा अर्थभेद था, यह तो आपने सुना होगा। परन्तु, इन महापुरुषों ने अपने-अपने माने हुए अर्थ का प्रतिपादन करने में तनिक भी पक्षपात नहीं आने दिया। अपने किए हुए अर्थ के समर्थन में जितनी-जितनी बातें इन महापुरुषों ने रखी हैं, वे श्री जिनागम को सन्मुख रखकर ही रखी हैं।

इन महापुरुषों ने कहा कि श्री जिनागम के इन-इन वचनों से हमको यह बात उचित लगी है।इन महापुरुषों द्वारा किए गए प्रतिपादन को पढने से ज्ञात होता है कि उसमें व्यक्तिगत ममत्व की गंध तक नहीं है। हृदय के वे इतने प्रामाणिक थे कि यह अर्थ हमको इसलिए सत्य लगता है कि भगवान ने इसका अर्थ ऐसा ही कहा है, ऐसा हमको प्रतीत होता है’, ऐसा वे कहते थे। अपने द्वारा किए हुए अर्थ के विषय में उन उपकारियों के हृदय में ममत्व नहीं था।

अपने द्वारा किए गए अर्थ के विरुद्ध प्रस्तुत आगम के प्रमाणों को पलटने का उन उपकारियों ने प्रयत्न नहीं किया। अपितु आगम के प्रमाणों से स्वयं द्वारा किया गया अर्थ किस प्रकार संगत है और किस प्रकार असंगत नहीं है, यह बताने का उन्होंने प्रयत्न किया है। इसलिए, इन उपकारियों के लिए आभिनिवेशिक मिथ्यात्व की प्राप्ति नहीं कही जा सकती। इनकी बात के विषय में पिछले महापुरुषों ने भी क्या कहा है? ‘इस विषय में अमुक आचार्य यह कहते हैं और अमुक आचार्य यह कहते हैं; तत्त्व केवलिगम्य है।क्यों? इन दोनों महापुरुषों ने अन्य आगम-प्रमाणों से अपने किए हुए अर्थ को संगत करने का प्रयत्न किया है, परन्तु उनमें से किसी भी महापुरुष ने अन्य आगम-प्रमाणों को पलटने का प्रयत्न नहीं किया।

मैंने ऐसा किया है अथवा मैंने ऐसा कहा हैऐसा नहीं, अपितु शास्त्र क्या कहता है, यह विचार कीजिए। मुझे ऐसा लगता है, इसलिए सत्य है’, ऐसे विचार कदापि नहीं आने चाहिए, परन्तु शास्त्र ऐसा कहता हैं, अतः सत्य है’, ऐसे विचार आने चाहिए। तनिक भी ऐसा लगे कि मैं जो मानता हूं, उस अर्थ से विपरीत बात शास्त्र में हैतो शास्त्र की बात ही सच्ची है’, यह स्वीकार कर लेना चाहिए। इसके लिए सरलता चाहिए और सरलता साधुता का सबसे अहम गुण है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें