सोमवार, 16 नवंबर 2015

धर्म सबसे पहले


पडौसन आकर बालक को कहे कि ‘तेरी मां तो तुझे मारती है, इसलिए चल मेरे यहां मैं तुझे खेलाऊंगी’, तो भी वह बालक पडौसन के यहां नहीं जाएगा। अपने घर में रोटी और राबडी खाएगा, किन्तु हलवा-पुडी खाने के लिए वहां नहीं जाएगा। कोई उसे कहे कि ‘तेरी मां ने कल तो तुझे मारा था न?’ तो वह कहेगा कि ‘भले ही मारा, वह तो मेरी मां थी न?’ वहां श्रद्धा है कि ‘मां तो मां है।’ बालक को जिस प्रकार मां पर श्रद्धा है, उस प्रकार आपको ‘मेरे देव, मेरे गुरु, मेरा धर्म’, ऐसा कुछ है? माता तो प्रत्यक्ष दूध पिलाती है, किन्तु धर्म प्रत्यक्ष कुछ देता नहीं है न? माता के स्तन में दूध कौन देता है? धर्म नहीं दिखाई देता आपको? कचरे में से दूध? यहां धर्म का प्रभाव नहीं है? मल-मूत्र की कोटडी रूप शरीर में दूध कहां से आया? यह धर्म का प्रभाव नहीं तो और क्या है? ये तो नमकहराम ऐसे पक्के हैं कि जिन के योग से जन्मे, पोषण हुआ, बडे हुए उन्हें ही खत्म कर देने को तैयार हो गए हैं। आज माँ-बाप की उपेक्षा इसका जीवंत प्रमाण है.

जब काम-धंधा नहीं, तब भी धर्म नहीं होता तो फिर बाद में होगा? बैठने का ठिकाना नहीं तब धर्म नहीं होता, तो गादी मिलने के बाद धर्म होगा? जिनके योग से यह सबकुछ है वही पीछे है तो मानलो कि सबकुछ ही पीछे है। धर्मी तो कहता है कि सब बाद में, किन्तु जिनपूजा, सामायिक, गुरुवंदनादि धर्म ही पहले। सर्वस्व भले ही जाए, किन्तु धर्म नहीं छोडा जा सकता।

आप मनुष्य जन्म में आए वह पाप के योग से या धर्म के योग से? धर्म के ही योग से। आर्यदेश, आर्यजाति, आर्यकुल में जन्म मिला वह धर्म के योग से। माता के उदर से सही-सलामत जन्मे वह धर्म के ही योग से। माता ने गर्भ में ही गला क्यों नहीं दिया? गर्भपात क्यों नहीं कराया? जन्मते ही गला क्यों नहीं दबाया? दूध में जहर क्यों नहीं पिलाया? यह सब धर्म के ही योग से और यही धर्म इन सबके बाद? नमकहरामी में कोई कमी नहीं रखी है? धर्म आगे, उपकारी मां-बाप भी पीछे, तो दूसरी चीज की तो बात ही क्या है? मां-बाप तो उपकारी हैं, किन्तु धर्म के समक्ष इनको भी शास्त्र ने पीछे रखा है तो बाकी सब बाद में हो इसमें कौनसी नई बात है? यदि धर्म को बाद में रखा तो सबकुछ बाद में ही समझना। चाहे जिस धर्म वाला हो, किन्तु जो धर्म में मानता हो, वह यही कहेगा कि पहले धर्म और बाद में ही सब। यदि धर्म बाद में तो सब बाद में; कभी मिले तो भी वह भोग नहीं सकता। धर्म की अवगणना करने वालों का तो पूर्व पुण्य से प्राप्त किया हुआ राज्य भी नष्ट हो गया। अहंकार में डूबे हुए धर्म की अवगणना करने से भी नहीं घबराते। ऐसे अधर्मी और स्वार्थियों को धर्म की अवगणना करने में कितनी देर लगती है? ये लडखडाकर कहां जाएंगे, कहां गिरेंगे, इसका इन्हें भी पता नहीं चलेगा।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 15 नवंबर 2015

विषय-कषाय ही विद्वत्ता या मूर्खता का पैमाना



जैसे-जैसे वर्ष बीते, बडे हुए, वैसे-वैसे पांचों आस्रव बढे या घटे? विषय-कषाय बढे या घटे? इन्द्रियां काबू में आई या बहकी? यह सब प्रतिदिन आत्मा से पूछो। यदि आस्रव घटे हों, विषय-कषाय कम पडे हों और इन्द्रियां काबू में आई हों तो तो आप बडे, चतुर, समझदार, पढे-लिखे; किन्तु यदि आस्रव बढे हों, विषय-कषाय उछले हों, बढ गए हों और इन्द्रियां बहकी हों तो बेवकूफ, अनपढ, अक्लहीन और गंवार। विषय-कषाय की घटत-बढत ही विद्वत्ता और मूर्खता का आधार है।

आप उम्र के आधार पर, दुनियादारी के अनुभव के आधार पर, किताबें पढने के आधार पर विद्वत्ता का मूल्यांकन करते हो, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। प्रभु की पूजा की, किन्तु विषय-कषाय बढे या घटे यह प्रतिदिन आत्मा से पूछो! आत्मा को पूछो कि मोह-ममता का जाल टूटा? मकडी के जाल की तरह खुद के जाल में खुद ही फंसते हैं और ऊपर से श्री जिनेश्वरदेव को पहिचानने का दावा करें तो यह चल सकता है? नहीं ही चल सकता है। आत्मा के साथ हुआ संवाद योग्य के समक्ष ही किया जाता है, जहां-तहां नहीं किया जा सकता है। इतनी आत्म-चिंता न हो, गवेषक शक्ति न आए, प्रतिदिन गवेषणा न हो तो पढने से क्या? पूजा करने से क्या? ऐसों की यहां गणना नहीं है।

बडों की पूजा स्वयं के दोषों में कमी लाने के लिए है। आज तो अपनी अनुकूलता में सारी अनुकूलता। ऐसों को यदि कहो कि ‘ये पूज्य व्यक्ति हैं’, तो वे तुरंत कहेंगे कि ‘हां, यह बात सही है, किन्तु इनसे मुझे क्या लाभ है? मुझे तो लाभ हो तो मैं पूजूं।’ ऐसी मनोदशा है।

आत्मिक लाभ तो है, किन्तु इस लाभ की परवाह कहां है? शारीरिक, मानसिक और महत्त्वाकांक्षा के सांसारिक लाभ की यह बात है। यह लाभ होता हो तो मानने को तैयार हैं। तब ये किसको मानते हैं अब यह विचार करो! जैन शासन की विनय-मर्यादा आज नष्टप्रायः होती जा रही है इसका यही कारण है। विषय-कषाय की आधीनता ही इसके मूल में है और इसी को लेकर विनय-वैयावच्चादि भी विपरीत मार्ग पर जा रहे हैं। प्रत्येक क्रिया आत्मकल्याण के लिए होनी चाहिए, यह आज विस्मृत हो गया है, भूल गए हैं। विनय, वैयावच्च, भक्ति आदि में कल्याण न होता तो शास्त्रकार यह सब करने के लिए नहीं कहते, किन्तु आजकल के लोगों ने तो नया कल्याण खोजा है। ‘अपने साथ अनुकूलता बरते उसके साथ योग्य प्रकार से व्यवहार करना’, ऐसा स्पष्ट कहा जाता है।

अयोग्य पात्र अच्छी चीज को भी विकृत कर देते हैं। विनय, भक्ति, प्रेम भी आज अपनी अनुकूलता के हिसाब से होता है, अनुकूलता मिले वैसा हो तो होता है। ‘जहां मुझे मान मिले उस मुनि को हाथ जोडूं’, ऐसी भावना वाला कितना बडा वर्ग? पिचत्तर फीसदी ऐसा वर्ग है। यह आज की विडम्बना है। ऐसी बीमार मानसिकता में अच्छे परिणामों की आशा कैसे की जा सकती है? -सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 14 नवंबर 2015

साधु का आहार



साधु आहार संयमपुष्टि के लिए लेता है, किन्तु ग्रास (कौर) मुँह में डालते समय आत्मा से पूछे कि ‘यह संयमपुष्टि के लिए लिया जा रहा है या स्वादपुष्टि के लिए?’ तो तुरंत जवाब मिलता है कि अभी संयमपुष्टि के लिए आहार की स्थिति में समय है; किन्तु ‘शास्त्र कहते हैं इसलिए सब संयमपुष्टि के लिए ही है’, ऐसा कहकर गाडी लुढकाए तो मारा जाए। यह कोई छिपा नहीं रहता। खाने में कंकर आए तो तुरन्त पता चल जाता है न? पता चल जाता है यह तो ठीक है, किन्तु मन और मुखाकृति में तुरन्त बदलाव हो जाता है। कदाचित् कोई समझदार हो, कुशल हो तो मुखाकृति में बदलाव न भी लाए, किन्तु मन? इसके लिए तो मुनि को नाना प्रकार के अभिग्रह करने पडते हैं। यह स्थिति लाने के लिए ही अभिग्रह हैं। छठ के पारणे छठ, पारणे में भी आयम्बिल और आयम्बिल में भी जिस पर मक्खी न बैठे ऐसा आहार लेने का धन्ना अणगार का अभिग्रह था। उनके जैसे मुनि को फिर छठ का तप करने, आयम्बिल करने और ऐसा आहार लेने का अभिग्रह किसलिए? क्योंकि आहार तो संयमपुष्टि के लिए है। ये आत्माएं अपनी परीक्षा सूक्ष्मता से कर सकती थीं।

जिव्हा (जीभ) को ऐसी बनानी कि उसे रस-कस का पता ही नहीं चले, स्वाद-लोलुपता ही समाप्त हो जाए, ऐसा ये मानते थे। साधु आहार ‘पुत्रमांसवत्’ करे यह विधि है। जंगल में गए हुए को न चाहते हुए भी किसी परिस्थिति अथवा मजबूरीवश पुत्र के शव का मांस खाना पडे तो वह कैसे हृदय से खाएगा? इस प्रकार मुनि आहार करे ऐसा शास्त्र कहते हैं। आज यह दृष्टि नहीं है। आज ढोंगियों का झुण्ड बढ गया है, स्वाद-लोलुपता बढ गई है, यह आज दुःख का विषय है। अपने दोषों को छिपाने के लिए इन दोषों को ही गुण के रूप में बतलाने की लालसा बढ गई है। इसलिए ऐसे लुच्चों के साथ मेल नहीं बैठता। अंतर से प्रेम नहीं होता।

यदि स्वयं विरक्त है तो निरस आहार आए वहां गुस्सा क्यों आता है? वहां ऐसा किसलिए? कहना चाहिए कि अमुक के बिना नहीं चलता। साधु प्रतिज्ञाहीन होता है अर्थात् उसे प्रतिज्ञा की जरूरत नहीं, लेकिन वह कब? जब साधना द्वारा ऐसी उच्च दशा आए तब। यदि ऐसी दशा आए बिना ही ऐसा मान ले तो तो फिर मुनिवेष पहिनने के बाद कुछ करने का रहता ही नहीं है; किन्तु ऐसा नहीं है। मुनि को अभिग्रह धारण करना ही चाहिए। साधुत्व स्वीकार करने के बाद, संयम अंगीकार करने के बाद तो जोखिमदारी बढती है। यदि इस बात को समझे तो तो मुनि आनंदमग्न रहता है, लेकिन नहीं समझते वे दुःखी हैं।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

आत्म-निरीक्षण सन्मार्ग पर ले जाता है



व्यक्ति स्वयं को जैसा कहता है, बताता है अथवा लोग उसके संबंध में उसके बाह्य क्रियाकलापों को देखकर जैसी धारणा बनाते हैं; व्यक्ति वस्तुतः स्वयं वैसा है या नहीं, इतना विचार करनेवाली आत्मा मिथ्यादृष्टि होते हुए भी सन्मार्ग में जाती है, उन्मार्ग से बचती है। अमुक समय में गुरु की निश्रा चाहिए यह बात अलग है। ऐसी आत्माएं अपने संबंध में दुनिया कहे वैसा अपने आपको मान लेने के लिए एकदम तैयार नहीं होती और जो इस प्रकार अपने आपको मानने के लिए तैयार नहीं होती, वे ही अपने छुपे हुए दोषों को देख सकती हैं। लोगों ने जैसा माना है उसमें कोई फेरफार नहीं है, लोगों ने सही ही समझा है, ऐसा मानकर फूलने वाला स्वयं मरता है और मारता है। ऐसे विचार की भावना स्थूल न हो और सूक्ष्म हो तभी विचार करे तो समझ सकता है।

मुनि से भी वंदना को विघ्न मानने के लिए कहा गया है। मुनि लोगों को वंदना करते हुए देखकर फूले नहीं, अहंकार नहीं करे कि उसे कितने और कैसे लोग नमन कर रहे हैं, उसमें ऋजुता का भाव अखण्डरूप से रहना ही चाहिए। मुनि भी उस वंदना को पूर्व के ज्ञानी महापुरुषों को समर्पित करे और अपना आत्मनिरीक्षण करे कि वह उस योग्य कैसे बने? स्वयं का इस प्रकार आत्म-निरीक्षण मिथ्यादृष्टि भी उचित प्रमाण में कर सकता है और इससे वह अनायास ही बिना किसी अतिरिक्त श्रम के भी सन्मार्ग पर जा सकता है। उन्मार्ग में होते हुए भी सीधे मार्ग पर कैसे, यह विचार करो! वह कहता है कि "शास्त्र गहन हैं, मति अल्प है इसलिए शिष्ट पुरुष कहें वही प्रमाण"। अपनी मति पर वह नाचता-इतराता नहीं, इसलिए वह मार्गानुसारी कहलाता है। सतत आत्म-निरीक्षण कर अपने आपको कसौटी पर कसने वाला ही जीवन में सफल हो सकता है।-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 11 नवंबर 2015

दुनिया दुर्जनों की है, सज्जनों की नहीं



सज्जनों पर विपत्ति आए इसमें कोई नई बात नहीं है। दुनिया दुर्जनों की है, सज्जनों की नहीं। दुर्जनों के बीच में रहे और विपत्ति न आए, ऐसा होता है? कई बार कुछ भी गफलत किए बिना भी विपत्ति आती है। पूर्व के पापोदय से सब आता है। भगवान महावीर ने कौनसी गफलत की थी? सुदर्शन सेठ का क्या अपराध था? गजसुकुमाल, ढंढणऋषि तथा झांझरीया मुनिवर की उस भव में कोई गलती थी? मेतार्य मुनि ने चोरी की थी? नहीं ही, फिर भी चोरी का आरोप कैसे आया? खंधक मुनि ने पूर्वावस्था में किसी की स्त्री पर कुदृष्टि डाली थी? नहीं ! फिर भी आरोप आया न?

भगवान महावीर जगत के एकांत उपकारी थे, परम शुद्ध पंचमहाव्रत पालनेवाले थे, जिनके दान-शील-तप-भाव सर्वोत्कृष्ट कोटि के थे, उनको भी साढे बारह वर्ष तक लगातार और भयंकर विपत्तियों का सामना करना पडा, बताओ उन्होंने कौनसी गफलत की थी? पूर्व के कर्मबंध की बात स्वीकार है। बहुत से कहते हैं कि थोडी-बहुत गलती (डेढ वांक) के बिना लडाई नहीं होती, किन्तु ऐसा सब जगह नहीं होता। स्वार्थी स्वार्थी में ऐसा हो सकता है। बहुत से मूर्ख कहते हैं कि ‘यह बात सही है कि सामनेवाला पक्ष तूफानी है, किन्तु अपने में भी कुछ तो है न?’ यदि अपने में कुछ साबित हो जाए तो अपनी कीमत फूटी कोडी की भी नहीं।

दुर्जन की यह आदत होती है कि जहां न हो वहां छेद करे। कौआ किसी जानवर पर बैठे तो जहां घाव हो उसी में चोंच मारता है और घाव न हो वहां चोंच मारकर नया घाव पैदा कर देता है। कौआ तालाब में से पानी नहीं पीता है, किन्तु पनिहारिन के बेवडे (मटके) में चोंच डालकर पानी जरूर बिगाड देता है। कौऐ की यह बुरी आदत है। वहां ‘इस बहिन का ही अपराध है कि वह पानी भरने आई ही क्यों?’ ऐसा कहना उचित है?

खलः करोति दुर्वृत्तं, नूनं फलति साधुषु। -सुभाषितमाला

दुर्जनों का सज्जनों के साथ दुश्मनी का व्यवहार जन्मसिद्ध अधिकार है, वहां क्या उपाय हो सकता है? यह तो साहूकार का दिवालिये के साथ पाला पडने जैसा है। श्री जिनेश्वरदेव और उनके मुनियों ने उपसर्ग सहकर के केवलज्ञान प्राप्त किया है। उनको उपसर्ग क्यों? तीस दिन के उपवास करे, इगतीसवें दिन पारणा आए, वहां उस पर चोरी का आरोप किसलिए? मेतार्य मुनि ने चोरी की थी? नहीं, फिर भी इन मासखमण के तपस्वी पर चोरी का आरोप क्यों आया? ‘उन्होंने भी कुछ तो किया होगा।’ ऐसा यहां कहा जा सकता है? नहीं ही। शास्त्र कहते हैं कि श्री जिनेश्वरदेव में भी ऐसी शक्ति नहीं थी कि वे पाखण्डियों को समझा पाते। भगवान चाहे जैसा उम्दा वर्णन करें, किन्तु पाखण्डी बाहर जाकर बोलते थे कि ‘बोलनेवाले होंशियार जरूर हैं, किन्तु है सब गप्पे।’ हारनेवाले के लिए एक ही रास्ता है, उसका जब कोई दांव नहीं चलता तो वह कहता है कि ‘भाई! ये तो बहुत तेज है।’ किन्तु इनकी बात सच्ची है, ऐसा स्वीकार नहीं करते।

दुर्जन का स्वभाव ही यह है कि उसे सज्जन खटकता है, इसलिए उसकी एक-एक प्रवृत्ति खटकती है। लेकिन, दुर्जन यदि अपना धारा हुआ सब कर सकता होता तो एक भी सज्जन को जीने देता? सभी की तिजोरी का धन हडप लेने की यदि लोभी में शक्ति होती तो एक भी श्रीमंत बचता? इसलिए दुर्जनों की परवाह न करते हुए, सज्जनों को अपने मार्ग पर सतत अडिग-अविचल रहना चाहिए, दुनिया जो कहे, जो सोचे।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

धर्म रहित शिक्षण कंटक पैदा करता है



शिक्षण तो सभी चाहते हैं। अशिक्षित रहने की कोई इच्छा नहीं करता है। किन्तु जिस हेतु से शिक्षण लेना है, वह वस्तु तो रोम-रोम में परिणत होनी चाहिए न? ‘शिक्षितों से तो ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है।’ ऐसा परिणमन होना ही चाहिए न? साहूकार की छाप कौनसी है? आधी रात को पैसा देता है, स्वीकार समय से एक मिनट भी देरी नहीं करता है और तनिक भी बदलता नहीं है, तो वह साहूकार। साहूकार कहलाना और इन समस्त क्रियाओं को दूर रखना, यह कैसे चलेगा?

शिक्षण देना और शिक्षण फलदायी हो, इस प्रकार का प्रयत्न कुछ भी करने में नहीं आता है, तो वह शिक्षण फलदायी किस प्रकार होगा? शिक्षण पाया हुआ आत्मा उत्पात करने वाला कैसे बनता है? धार्मिक हेतु रहित शिक्षण से ही उत्पात जागृत होता है और ऐसा शिक्षण प्राप्त किए हुए व्यक्ति समाज में कंटक रूप ही बनते हैं।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 8 नवंबर 2015

धर्म के बदले पौद्गलिक लालसा



पुद्गलानन्दी आत्माओं की भक्ति निम्न स्तर की हो जाती है। पौद्गलिक लालसाओं में सडने वाली आत्माएं वास्तविक भक्ति कर ही नहीं सकती है। उन आत्माओं को यह ज्ञान ही नहीं होता कि भक्ति का उत्कर्ष किस बात में है और अपकर्ष किस बात में? संसार में मग्न, भोगों में आसक्त और एकान्त विषयों के अधीन बनी आत्माओं को यह विवेक ही नहीं रहता। वह तो संसार के लिए धर्म और भक्ति का सौदा ही करती है।

अतः यदि धर्मात्मा बनना चाहते हो तो अधर्म को मिथ्या मानना सीखो। धर्म-परायण होना हो तो पाप को पाप समझो। अधर्म का त्याग किए बिना जीवन में धर्म आ ही नहीं सकता है। आज तो ग्राहक को प्रसन्न करने के लिए धर्म की सौगन्ध भी खाई जाती है, यह भी कह दिया जाता है कि ‘भगवान को मध्य रखकर सत्य बात कह रहा हूं।’ यह धर्म का सम्मान है या अपमान? जब तक आप पाप को पाप नहीं मानेंगे, पुण्य कार्य के प्रति आपके हृदय में सच्चा प्रेम उमड ही नहीं सकता। धर्म के बदले पौद्गलिक आकांक्षाएं अंततोगत्वा विनाश की ओर ही ले जाती है। धर्म और भक्ति मोक्ष के लिए ही होनी चाहिए।-सूरिरामचन्द्र

शनिवार, 7 नवंबर 2015

इन्हें सच्चा सुख कैसे मिलेगा?



दुःख की बात है कि आज जहां देखें वहां धर्मस्थानों में भी बडप्पन की झूठी एवं तुच्छ वासना पनप रही है, जिसे निकालना आवश्यक है। आज यह मनोदशा है कि देव अर्थात् खिलौना, गुरु अर्थात् हमारी इच्छानुसार चलने वाला और धर्म अर्थात् अवकाश में आराम का स्थान। आज का फैशन परस्त शौकीन युवक जब मन्दिर में जाता है तो धर्मी त्रस्त होते हैं। वह युवक संसार के परम तारक परमात्मा के निकट सीना खोलकर खडा रहता है। इसमें वह अपनी वीरता समझता है। बताइए, उसके समान पामर भला कौन होगा?

जिसके हृदय में गुणवान के प्रति सम्मान नहीं है, उसे सुख कैसे प्राप्त होगा? क्योंकि आत्म-गुणों के प्रकाशन-प्रकटीकरण में ही वास्तविक सुख निहित है। गुणवान आत्माओं के प्रति सम्मान ही गुण-प्रकाशन का एक विशेष अवसर है। सच्चे गुणवान की आज्ञानुसार अपना जीवन-निर्माण करने के लिए जो तैयार नहीं होते, वे यदि सिर पीट-पीट कर मर जाएंगे तो भी उन्हें सच्चा सुख कभी नहीं मिलेगा।-सूरिरामचन्द्र

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

तप-संयम मुक्ति के लिए



अहिंसा, संयम और तप मुक्ति के लिए हैं, संसार की साधना के लिए नहीं हैं। तपस्वी की लोग भले ही पूजा करें, परन्तु लोगों के पूजने के कारण तपस्वी तो यह मानता है कि जिस तप की संसार पूजा करता है, उस तप की मुझे तो सर्वाधिक पूजा करनी चाहिए। अपनी पूजा के लिए तप नहीं होना चाहिए। तप के कारण तपस्वी की पूजा है, संयम के कारण संयमी की पूजा है; इस पूजा से अहंकार नहीं आना चाहिए, बल्कि तपस्वी को तप में, संयमी को संयम में और अधिक दृढ होना चाहिए, ताकि लोगों का तप और संयम के प्रति विश्वास बढे, वे भी मोक्ष-मार्ग के लिए तप और संयम के मार्ग पर अग्रसर होने के उत्सुक बनें।

आज धर्म कदाचित् कतिपय धर्मात्माओं के अज्ञान के कारण बिगड रहा हो, ऐसा कई लोगों को दिखाई देता होगा, कई लोग ऐसी बातें भी करते हैं; परन्तु आपका संसार तो पूर्णतः सड-गल गया है। बिगडे हुए को तो फिर भी सुधारा जा सकता है; सडे हुए को सुधारा नहीं जा सकता। सडे हुए को तो काट कर फेंक ही देना पडेगा। सडे-गले की सर्जरी करने की आपकी तैयारी होगी तो बिगडे हुए अपने आप सुधर जाएंगे।-सूरिरामचन्द्र

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

पापात्माओं से बचें



धर्मीति ख्यातिलोभेन, प्रच्छादितनिजाश्रवः।

तृणाय मन्यते विश्वं, हीनोऽपि धृतकैतवः।।1।।

आत्मोत्कर्षात्ततो दम्भी, परेषां चापवादतः।

बध्नाति कठिनं कर्म्म, बाधकं योगजन्मनः।।2।।

'कपट को धारण करने वाली आत्मा धर्मीपन की ख्याति के रूप से स्वयं के आस्रव को छुपाकर, स्वयं हीन होते हुए भी जगत को तृण के समान मानते हैं।'

'उस कारण से दम्भी आत्मा स्वयं का उत्कर्ष करके और दूसरों के अपवाद बोलकर, योगजन्म के बाधक बनने वाले कठिन कर्म को बांधते हैं।'

इस विश्व में मायावी और प्रपंची आत्माओं का पंथ ही अलग होता है और इसी कारण से ऐसी आत्माएं स्वयं के पंजे-परिचय में आने वाली आत्माओं का जितना अहित न करे, उतना ही कम है तथा विश्व के उपकारियों को नीचा दिखाने की बेशर्मी की, जितनी कार्यवाही न करे, उतना कम है! ऐसी आत्माओं के द्वारा कोई भी अच्छा कार्य करवाने की आशा रखना, उसके जैसी भयंकर मूर्खता दूसरी एक भी नहीं है। इसलिए कल्याण के अर्थी सभी आत्माओं का तो यह कर्त्तव्य है कि "ऐसे शासन के सत्य की और इस सत्य का प्रचार करने वाली आत्माओं को गलत रीति से नीचा दिखाने की कोशिश करने वाली, कराने वाली और करने वाले को इरादापूर्वक सहयोग देने वाले पापात्माओं से स्वयं की जात को बचानी चाहिए, ऐसे पापात्माओं के सहवास से बचने में ही कल्याण है।"-सूरिरामचन्द्र

बुधवार, 4 नवंबर 2015

बोझारूप धर्मशास्त्र



वर्तमान मौजशोख के साधन व भौतिकता की चकाचौंध में ही जो स्वर्ग व मोक्ष की कल्पना करता हो, उसे तो धर्मशास्त्र भी सिर्फ बोझारूप लगेंगे। भावी जीवन को सुधारने और आत्महित की चिंता के प्रति जो बेपरवाह हैं, उन्हें अपने स्वयं के दोष सुनने की इच्छा भी नहीं होती है, फलस्वरूप शिष्ट पुरुषों का समागम और तत्त्वचिंतन आदि गुणों का आगमन बन्द हो जाता है और जीवन में अहंकार आ जाता है। ऐसे लोगों को फिर चापलूसी ही अच्छी लगती है, जो स्वयं भी डूबता है और दूसरे को भी डुबो देता है। आज अधिकांश लोगों में अपनी कमियां या क्षतियां सुनने की ताकत नहीं रही है, इस कारण कोई खरी-खरी कहे तो बुरा लगता है; परन्तु जब आत्मज्ञान होगा, तब अपनी भूल बताने वाले उपकारी लगेंगे।-सूरिरामचन्द्र

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

मरने के बाद मेरा क्या होगा?



‘मुझे यह शरीर छोडकर अन्यत्र जाना है’, इस बात को आज लगभग सभी भूल गए हैं। ‘यहां से जाने के बाद मेरा क्या होगा?’ यह चिन्ता आज लगभग नष्ट हो गई है। "मैं मरने वाला हूं", यह खयाल हर पल रहे तो जीवन में बहुत-सी समझदारी आ जाए। भावी जीवन को मोक्ष मार्ग का आधार बनाने के प्रयत्न शुरू हो जाएं। सिर्फ वर्तमान की क्रियाएं, पेट भरना, बाल-बच्चे पैदा करना और मौजमजा करना, ये क्रियाएं तो कौन नहीं करता है? तुच्छ प्राणी भी अपने रहने के लिए घर बना देते हैं, वर्तमान की इच्छापूर्ति करते हैं और विपत्ति में भागदौड भी करते हैं। मात्र वर्तमान का विचार तो क्षुद्र जंतुओं में भी होता है। भावी जीवन का विचार छोडकर जो सिर्फ वर्तमान के ही विचारों में डूबा रहता है, वह अपने कर्त्तव्य पालन से च्युत हुए बिना नहीं रहता है।-सूरिरामचन्द्र

सोमवार, 2 नवंबर 2015

आत्म-ज्ञान रहित शिक्षा का परिणाम



आज युवकों की क्या दशा है, यह तो अखबार पढने वाले आप लोगों को मालूम ही है, ये युवक अपने बाप के भी बाप बन गए हैं और प्रोफेसर के भी प्रोफेसर बन गए हैं। कॉलेजों के संस्थापक कॉलेजों को कैसे चलावें, इस चिंता में हैं और नए कॉलेज न खोलने के निर्णय पर आए हैं। दुनिया में पढे-लिखे गिने जानेवाले अपनी होंशियारी का उपयोग भी दुनिया को परेशान करने में और स्वयं का स्वार्थ साधने में कर रहे हैं।

आत्मा का ज्ञान हुए बिना, जितना अधिक पढा जाए, उतना अधिक गंवारपन आता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज के कॉलेज हैं, जहां शिष्टता प्रायः देखने को नहीं मिलती और विपरीत इसके जिधर देखो उच्छृंखलता ही दिखाई देती है। आज पढे-लिखे लोग ही सबसे ज्यादा विनाशक प्रवृत्तियों में संलग्न हैं। हिंसा, चोरी, डकैती, लूटपाट, भ्रष्टाचार और अश्लील कृत्यों में सबसे ज्यादा कौन लोग संलग्न हैं? पढे-लिखे ही न? आत्म-ज्ञान से रहित व्यक्तियों को ज्ञान देने का यह परिणाम है।-सूरिरामचन्द्र

रविवार, 1 नवंबर 2015

मन की विनाशक भूख



मन की तृष्णा ने आज कितना भयानक आतंक फैलाया है? पिता-पुत्र, पति-पत्नी, बडा भाई, छोटा भाई, सास-बहू इन सब लोगों के बीच का व्यवहार देखो। जरा सोचो तो सही एक दूसरे के लिए कितनी ईर्ष्या, द्वेष-भावना दिल में भरी हुई है? मन की तृष्णा बढी है। पर-वस्तुओं को प्राप्त करने की व भोगने की लालसा बढी है और त्याग-भावना नष्टप्रायः हो गई है। इसके परिणामस्वरूप आज के संसार में भयानक भगदड और भागदौड मच रही है। लोग भौतिकता की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं। जब तक मन की भयानक भूख नहीं मिटेगी और त्याग की भावना पैदा नहीं होगी, तब तक ऐसी भगदड और भागदौड मची रहेगी, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। इस तरह विचार किया जाए तो अवश्य समझ में आएगा कि मन की भौतिक भूख ही सारे विनाश का कारण है।-सूरिरामचन्द्र