मंगलवार, 17 मार्च 2015

आत्म-निन्दा आत्मा की योग्यता


आत्म-निन्दा आत्मा की योग्यता

आत्म-निन्दा, यह आत्मा की योग्यता को सूचित करने वाली है, मनुष्य में प्रमादवश या अज्ञानवश पाप हो जाना, यह स्वाभाविक है, किन्तु पाप यदि हृदय में चुभे नहीं तो धर्म को पाने की भी योग्यता चली जाती है। तो धर्म आचरण करने की तो बात ही कहां रही? इसलिए जो कोई स्वयं को धर्म पाने के योग्य बनाने की इच्छा रखता हो अथवा प्राप्त धर्म को स्थिर रखने की इच्छा रखता हो, उनके पाप कम हो जाएं तब तक आत्म-निन्दा करते हुए स्वयं पर धिक्कार की वर्षा करते रहना सीखना चाहिए। इस प्रकार से जो स्वयं के पाप के लिए आत्म-निन्दा का शिक्षण लेते हैं, वे क्रमशः पाप से पीछे हटते जाते हैं। लेकिन, जिनको पाप का भय नहीं होता, पाप की तरफ तिरस्कार नहीं होता, स्वयं की जात को पाप से बचाने की इच्छा नहीं होती और पापकर्म के प्रति जिनके हृदय में घृणा नहीं होती है, वे पाप से बच नहीं सकते हैं, अपितु उल्टे पापमयता में अधिक से अधिक डूबते जाते हैं। बहुत से लोग कहते हैं कि ‘इसमें पाप, उसमें पाप, तो फिर करना क्या?’ सबसे पहले पाप से बचने के लिए हृदय में पाप का भय पैदा करना चाहिए। -आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 16 मार्च 2015

सत्पुरुष प्रपंच नहीं करते



नाशक-छल सत्पुरुषों का धर्म नहीं है। सत्पुरुष प्रपंचियों के नाशक प्रपंच को समझते जरूर हैं, किन्तु उनके नाशक-प्रपंचों को स्वयं के जीवन में कभी आगे नहीं करते। सत्पुरुष नाशक-प्रपंच का आदर करने वाले बनें तो सामान्य कोटि के सज्जन आत्मा के लिए जीवित रहना दुष्कर है। जिसके आधार से जीना होता है, वही यदि नाशक-प्रपंच करने वाला बने तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सत्पुरुषों की बडी जिम्मेदारी है। उनका जीवन कठिन से कठिन जीवन होता है। सत्पुरुषों को एक-एक प्रवृत्ति भी स्व-पर हित की साधक बनानी चाहिए। सत्पुरुषों की अकडाई भी नम्रता, सत्पुरुषों का कोप भी क्षमा, सत्पुरुषों की माया भी सरलता और सत्पुरुषों का लोभ भी संतोष का घर होना चाहिए। दुर्जनों की आत्माएं स्व-पर के अहित को साधने वाले जो-जो उपाय करती हैं, वे समस्त उपाय स्व-पर हित की साधना में योजित करने का सामर्थ्य सत्पुरुषों में होना चाहिए। इसी कारण सत्पुरुषों में सहनशीलता के साथ ही कर्तव्य परायणता भी होनी चाहिए। सत्पुरुषों में अज्ञानियों की तरफ से सेवित अज्ञानजन्य दोषों की सहनशीलता अथाग होनी चाहिए। कर्तव्य-परायणता भी अजोड होनी चाहिए। सत्पुरुषों की सहनशीलता हिम/बर्फ की तरह होनी चाहिए, जबकि कर्तव्य-परायणता अग्नि की ज्वाला के समान होनी चाहिए। सचमुच में ऐसे महापुरुष ही इस संसार के लिए मुक्ति के दूत होते हैं। ऐसे सत्पुरुषों के समक्ष छल करना तो जीवन भी मरण के समान है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 15 मार्च 2015

माता-पिता पहले या पत्नी ?



विचार करिए कि माता-पिता की आज्ञा-पालन करने में पत्नी को पूछा जाता है क्या? माता-पिता पहले या पत्नी? माता-पिता पत्नी को लाए अथवा पत्नी माता-पिता को लाई? सचमुच में विचार और विवेकहीन युग में आज तो पत्नी की खातिर माता-पिता को भी भूल जाते हैं। वस्तुतः यह लक्षण नीच आदमियों का है। श्री कल्पसूत्र में आता है कि तिर्यंचों को भी मां-बाप की आवश्यकता जब तक गरज होती है, तब तक ही और मनुष्यों में भी ऐसे अधम होते हैं कि पत्नी के मिलने पर मां-बाप को भूल जाते हैं, नहीं तो माता-पिता की आज्ञा पालन करने में पत्नी की सहमति की आवश्यकता ही नहीं है। शास्त्र कहता है कि पति उन्मार्ग पर जा रहे हों, तो पत्नी उन्हें रोकने के लिए सबकुछ करे और पति सन्मार्ग पर जा रहा हो तो शक्ति हो तो उनके पीछे जाए, नहीं तो तिलक करके घर आए। यह उच्च कुल की मर्यादा है। मर्यादा मानने वालों के लिए सब कुछ है। मर्यादाहीन के लिए तो कोई नियम ही नहीं होता है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

एक सफेद बाल आते ही संसार छूट जाता


एक सफेद बाल आते ही संसार छूट जाता

पुण्यशाली मनुष्यों को अपने सिर में केवल एक श्वेत बाल देखने से ही कितना विचार उत्पन्न हो जाता था कि वे सबकुछ छोडकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर निकल पडते थे। क्या आज हमारे समक्ष ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जिनके सिर पर एक भी काला बाल दृष्टिगोचर नहीं होता? ऐसे अनेक व्यक्ति हमारे समक्ष हैं, जिनका पूरा सिर सफेद बालों से घिरा हुआ है, फिर भी हम उनकी भावनाओं में किसी भी प्रकार का सुन्दर परिवर्तन नहीं देख पा रहे हैं। कारण क्या है? तनिक सोचो। वर्तमान भयानक वातावरण ने भी धर्म-भावना पर कितना क्रूर प्रहार किया है, इस पर भी विचार करो। स्पष्ट है कि जैनकुलों में से अथवा यों कहिए कि धर्मात्मा कुलों में से उत्तम प्रकार के आचरण नष्ट हो गए हैं, उसका ही यह परिणाम है। आज विचारों को उधार लेकर विचारक बने हुए मनुष्यों ने शुद्ध आचारों की मर्यादा के समक्ष काला वातावरण उपस्थित करके निर्घृण परिस्थिति उत्पन्न की है, अन्यथा आर्यदेश, आर्यजाति और आर्यकुल में उत्पन्न मनुष्यों में यह निर्घृण स्थिति उत्पन्न होनी असंभव थी। आज तो सफेद को डाई कराकर काला करने और जवान दिखने की होड मची है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

स्वयं की प्रभावना में लगना नीचता है



स्वयं को सर्वमान्य बनाने के मोह में पडकर शास्त्र की दृष्टि से जिनका मुँह तक देखना पाप हो, उन्हें बात-बात में आगे लाना, शासन के हित को ध्यान में रखकर उन्हें समाज के समक्ष लाने और उनकी पोल खोलने वाले पुण्य-पुरुषों को झगडालू अथवा अशान्ति-प्रिय बताने में अपना सम्मान समझना; यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोसजनक बात है। ऐसे व्यक्तियों को कहना पडता है कि स्वयं की प्रभावना भूले बिना आप कदापि शासन की प्रभावना नहीं कर सकेंगे। शासन प्रभावना के नाम पर स्वयं की प्रभावना करने में तल्लीन होना, यह प्रभु-शासन का घोर द्रोह है। शासन के प्रभाव से प्राप्त बडप्पन एवं ख्याति का उपयोग स्वयं की प्रभावना में करने के समान नीचता कोई नहीं है। जिस शासन के कारण उच्च स्थान प्राप्त हुआ हो, उसी शासन के द्रोहियों का स्वार्थ के लिए पोषण करना भी जिन-शासन का महान् द्रोह है।

प्रभु शासन के मर्म को अच्छी तरह जानने की डींग मारकर खोटा और सच्चा स्पष्ट दिखाई देवे, वैसे पक्षों में भी मध्यस्थ होने का कपट या आडम्बर करना, यह भद्रिक जनता के धर्म-धन को लुटाने का निकृष्ट धंधा करके विश्वासघात का महान् पाप करने के तुल्य है। यह बात उन्हें कटु लगेगी अथवा मधुर लगेगी, उसका विचार हमें नहीं करना है, क्योंकि उपकार-भावना से कटु, परन्तु हितकर बात कहने की परम् पुरुषों की हमें आज्ञा है और भारी से भारी जोखिम उठाकर भी यदि हममें शक्ति हो तो उन परम् पुरुषों की तारणहार आज्ञा का पालन करना अपना आवश्यक कर्तव्य है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आत्मघात राग-द्वेष का घिनौना रूप



पति के अभाव में पतिव्रता स्त्रियों का जीवन प्रायः दुःखी ही होता है, जिससे वे पति के वियोग में शोक के कारण अग्नि में प्रवेश करती हैं, यह कहकर कि "पति के शोक से पतिव्रता स्त्रियों का अग्नि में प्रवेश करना उचित है"। यह कहना भारी अज्ञानता है। पतिव्रता स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करें। जहां तक वे पत्नी हैं, तब तक उन्हें अन्य पुरुष को पति के रूप में स्थान नहीं देना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे पति की समस्त शुभ प्रवृत्तियों में मन, वचन और देह से सहायक हों, पति की समस्त विपदाओं को अपनी मानकर उन्हें शान्तिपूर्वक सहन करें और कुमार्ग गामी पति को सुमार्ग गामी बनाने का प्रयत्न करें। पतिव्रता स्त्रियों का यह कर्तव्य है, परन्तु पति की सेवा को ही धर्म मानकर परम् तारणहार परमात्मा की, सद्गुरुओं की और धर्म की सेवा को गौण मानना और पति के पीछे मर जाना, किसी भी प्रकार से धर्म नहीं है। यह तो अज्ञान की चरम सीमा है। पति के शोक में अग्नि में प्रविष्ट होना अज्ञान-मृत्यु है। इस प्रकार की मृत्यु से न तो उसे पति मिलता है और न वह सद्गति ही प्राप्त करती है। ऐसी मृत्यु प्रायः आत्मा को दुर्ध्यान-मग्न बनाकर भयानक दुर्गति में ही धकेलती है। यही बात उन लोगों से भी कहनी है जो विपरीत संयोगों से घबराकर आत्महत्या, आत्मघात का कदम उठाते हैं, इसमें क्रूरता भी है और कायरता भी। असीम पुण्योदय से प्राप्त मनुष्य जीवन का इस प्रकार सांसारिक कारणों से घात करना, किसी भी रीति से उचित नहीं ठहराया जा सकता, यह राग-द्वेष का सबसे घिनौना रूप है, जो तिर्यंच और नरक गति में ले जाने वाला है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 11 मार्च 2015

"भगवान की सौगंध"



आज तो ग्राहक को प्रसन्न करने के लिए धर्म की सौगन्ध भी खाई जाती है, यह भी कह दिया जाता है कि "भगवान को मध्य रखकर सत्य बात कह रहा हूं"। "भगवान की सौगंध" लेकर कोर्ट में झूठी गवाही दे दी जाती है। बताइए यह धर्म का सम्मान है या अपमान? ऐसे में धर्म की प्राप्ति कैसे हो सकती है भला? अनीति करते रहना और कहना कि "समय के अनुसार आवश्यक है"। गलत को समय के नाम पर सत्य बताना क्या ठीक है? साधु लोग यदि अधिक कहेंगे तो वे कह देंगे कि "ये लोग तो उपाश्रय में रहते हैं, इन्हें बाजार की हालत का क्या पता? निर्वाह का धन लाना कहां से?" धर्म कोई बाजारू वस्तु है जो धन के लिए धर्म को बाजार में घसीटा जाए? गलत हथकण्डों से धन प्राप्त करने के लिए धर्म का सहारा लिया जाए?

मैं कहता हूं कि जब तक इस प्रकार की मान्यता है, तब तक धर्म हृदय में प्रविष्ट नहीं होगा। धर्म को बाजार में न घसीटो। आपकी यह मान्यता दृढ होनी चाहिए कि "कम धन की प्राप्ति होगी तो कम ही सही, परन्तु पाप तो नहीं होगा, उसके लिए धर्म की आड तो नहीं ही ली जाएगी।" यह मान्यता यदि आपके हृदय में दृढ हो जाए तो काम हो जाए। धर्मनिष्ठ मनुष्यों के हृदय में पाप पर सद्भाव तो होना ही नहीं चाहिए।

पाप से बचने में प्रयत्नशील रहें

पाप से बचने का प्रयत्न ही वास्तविक कुलीनता है। जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि आत्मा संसार के त्याग और मोक्ष की साधना में ही प्रयत्नशील रहती है, उसी प्रकार कुलीन आत्मा पाप से बचने के सुप्रयत्न में लीन रहती है। जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि आत्मा को समस्त संसार कडवा लगता है, उसी प्रकार कुलीन आत्मा को पाप कडवा लगता है। जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि आत्मा पूर्व के कर्म बंधन के अतिरिक्त संसार में नहीं रह सकती, उसी प्रकार कुलीन आत्मा तीव्र अशुभ उदय के बिना पाप की ओर प्रवृत्त नहीं होती।

जिन आत्माओं ने पाप का भय त्याग दिया है, वे सम्यग्दृष्टि तो हैं ही नहीं, कुलीन भी नहीं हैं, क्योंकि पाप से निर्भीकता के समान अन्य कोई अयोग्यता ही नहीं है। जिस आत्मा को पाप का भय नहीं है, वह आत्मा चाहे जैसी भी हो तो भी अयोग्य ही है। ऐसी आत्मा को तो भगवान का शासन धर्म की अधिकारी भी नहीं मानता। अतः स्पष्ट है कि जो लोग निर्भयता के नाम पर यथेच्छ प्रवृत्तियां चलाते हैं और उन्हें वे धर्म के रूप में प्रकाश में लाते हैं, वे अपने स्वयं के संहारक होने के साथ अज्ञानी लोगों के भी संहारक होते हैं। इस कारण ऐसी संहारक आत्मा की किसी भी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देना अपनी कुलीनता का भी संहार करने जैसा है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 10 मार्च 2015

जर, जमीन और जोरू, ये तीनों कजिया के छोरू



"जर, जमीन और जोरू, ये तीनों कजिया के छोरू"। जर यानी धनमाल, जमीन यानी भूमि, मकान आदि और जोरू यानी स्त्री; ये तीनों झगड़े के कारण हैं। इनके संसर्ग में रहकर शान्ति की बात करना निरर्थक है। जर, जमीन और जोरू का मोह शान्त होना बहुत मुश्किल होता है। ये तीनों भयंकर विषय-कषाय के कारण हैं और दुर्गति में ले जाने वाले हैं, लेकिन जमानावादी इन्हीं में मस्त और मशगूल रहते हैं। संसार में मस्त रहने वाली आत्माओं को दुर्गति में ले जाने वाले कार्यों से भी आनन्द होता है। इन तीनों पौद्गलिक वस्तुओं की ममता छुडवाने के लिए तीर्थ की स्थापना है। लेकिन, पौद्गलिक लालसाओं में सडने वाली आत्माएं वास्तविक भक्ति कर ही नहीं सकती। उन आत्माओं को यह ज्ञान ही नहीं होता कि भक्ति का उत्कर्ष किस बात में है और अपकर्ष किस बात में है? संसार में मग्न, भोगों में आसक्त और एकान्त विषयों के अधीन बनी आत्माओं को यह ध्यान ही नहीं रहता। अतः यदि धर्मात्मा बनना चाहो तो अधर्म को खोटा मानना सीखो। धर्मपरायण होना हो तो पाप को पाप समझो। अधर्म का त्याग किए बिना हृदय में धर्म नहीं आ सकता। जब तक आप पाप को पाप नहीं मानेंगे, तब तक पुण्य कार्य के प्रति आपके हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होगा। यदि पाप को पाप मानते हो तो संसार की कोई भी वस्तु आपको व्याकुल नहीं कर सकेगी।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

सोमवार, 9 मार्च 2015

एकमात्र आत्म-कल्याण का ही लक्ष्य रखें



‘मुझे तो जीवन में अपनी आत्मा का कल्याण करना है और कल्याण करने का एकमात्र मार्ग अनंत उपकारी श्री जिनेश्वर देवों की आज्ञा की आराधना करना है।’ हृदय में ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए और आज्ञा की आराधना में मन-वचन-काया को जोडने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। यह दशा होगी तो कर्तव्य से च्युत नहीं होंगे और किसी भी पौद्गलिक लालसा के अधीन नहीं बनेंगे। भक्ष्याभक्ष्य के सेवन से बचेंगे, आचार, विचार और व्यवहार शासन के अनुरूप होगा।

इतनी सावधानी रखने पर भी किसी तीव्र पापोदय से आत्मा का पतन हो भी जाए, तो भी कालांतर में उस आत्मा का उत्थान हुए बिना नहीं रहता, उस आत्मा का मोक्ष निश्चित हो जाता है और जो आराधना की हो वह तो निष्फल जाती ही नहीं, अपितु कल्याणकारी ही होती है। इसलिए यही ध्येय रखना चाहिए और ऐसे प्रयत्न करने चाहिए, जिससे सुख पूर्वक आराधना हो सके। उसके लिए पतन के संयोगों से बचने का प्रयत्न भी लगातार रखना चाहिए। पौद्गलिक लालसा से यथासंभव बचते रहना चाहिए। यश की कामना, मान-सम्मान प्राप्त करने की इच्छा भी पौद्गलिक लालसा है। गीतार्थ महात्मा इस प्रकार की लालसा से भी परे ही रहेंगे।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 8 मार्च 2015

तुच्छ वस्तुओं के पीछे आत्मा बर्बाद न हो



संसार का यश तो तुच्छ वस्तु है। मिला तो भी क्या और न मिला तो भी क्या? हमें मान-सम्मान की अभिलाषा ही नहीं रखनी चाहिए। ऐसी तुच्छ वस्तुओं के पीछे आत्मा बर्बाद न हो जाए, इसके लिए इस जीवन में केवल जिनाज्ञा की आराधना अधिकतम करने के लक्ष्य वाला बनना चाहिए। हम स्वयं शुद्ध हैं अथवा नहीं, यह अवश्य देखना चाहिए। हम स्वयं सन्मार्ग पर हैं अथवा नहीं, उसका ध्यान रखने में तनिक भी उपेक्षा नहीं आने देनी चाहिए। हम सन्मार्ग पर हों, शुद्ध रहने के लिए प्रयत्नशील हों, केवल शासन-सेवा के आशय से ही आज्ञानुसार कार्य कर रहे हों, फिर भी गालियां सुननी पडे, कष्ट सहने पडें, तो उसका सत्कार करें। परिणाम में एकांत लाभ ही होता है। भक्ष्याभक्ष्य के एवं शील-मर्यादा आदि के उत्तम आचार-विचार दिन-प्रतिदिन घिसते जा रहे हैं। अभक्ष्य व अनंत काय का उपयोग अधिक होता जा रहा है। अभक्ष्य एवं अनंत काय का उपयोग जैन कुलों में नहीं होना चाहिए, ऐसी-ऐसी बातें कोई करे तो उसकी भी मजाक की जाती है। शील-मर्यादा-विषयक उत्तम आचार छोडने के विरूद्ध हित शिक्षा दी जाए तो उन्हें यह कहने में भी लज्जा नहीं आती कि ‘इन्हें जमाने का होंश नहीं है’। समस्त श्रावक-कुल ऐसे हो गए हों, यह बात नहीं है। कतिपय श्रावक-कुलों में अभी भी उत्तम आचार-विचार कायम हैं, परन्तु ऐसा अत्यंत अल्प प्रमाण में है। जडवाद की हवा का वेग इतने प्रमाण में है कि यदि उसके समक्ष सचेत न रह सके तो आत्महित का नाश हुए बिना नहीं रहेगा।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 7 मार्च 2015

कल्याण भावना का झरना बहे



श्रावक जैसे उत्तम कुल में तो परस्पर कल्याण-भावना के झरने बहते रहने चाहिए। जो कोई पुण्यात्मा श्रावक-कुल को प्राप्त करे, वह इस जीवन में ऐसा कर जाए कि जिससे उसका संसार अत्यंत परिमित बन जाए, ऐसा श्रावक-कुल का वातावरण होना चाहिए। श्रावक-कुल में रहे हुए नौकर, इतर जाति के होते हुए भी धर्म में रुचि वाले बन जाएं, ऐसे उत्तम कोटि के आचार एवं विचार श्रावक-कुलों में प्रवर्तमान होने चाहिए।

श्रावकों के घर के पशुओं पर भी उत्तम छाँया पडे, ऐसा श्रेष्ठ रहन-सहन उत्तम श्रावकों का होना चाहिए। इसके साथ जब हम आज के श्रावक-कुलों की दशा का विचार करते हैं, तब स्वाभाविक ग्लानि उत्पन्न हुए बिना नहीं रहती। उत्तम गिने जाते श्रावक परिवारों में भी आज बिगाडा प्रविष्ट होता जा रहा है। नामांकित कुलों में भी आज धर्म-संस्कार नष्ट होता जा रहा है। खाने-पीने की, पहनने-ओढने की और घुमने-फिरने आदि की स्वच्छंदता बढती जा रही है, भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार ही नहीं है, यह चिंता का विषय है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

संतान धर्महीन न बन जाए!



आज श्रावक-कुल जैसे उत्तम कुल के संस्कार कितने अधिक नष्ट हो गए हैं? घर के मुखिये को घर का कोई भी व्यक्ति आराधना से वंचित रह न जाए उसकी चिन्ता हो, ऐसे घर कितने हैं? आपको अपना पुत्र इज्जतदार, पेढीदार या धनवान बनाने की जितनी चिन्ता है, उतनी ही चिन्ता वह धर्म का आराधक बने इस बात की है क्या? पुत्र पेढीदार अथवा धनवान न बन पाए, उसमें अधिक हानि और चिन्ता है या वह धर्महीन बनकर इस मंहगे जीवन को नष्ट कर दुर्गति के कर्मों का बंध करे, उसमें अधिक हानि और चिन्ता है? पुत्र पूजा, सामायिक आदि न करे तो उसके लिए कितना खटकता है और विद्यालय अथवा दुकान पर न जाए तो उसके लिए कितना खटकता है? सचमुच, आज पारस्परिक सच्ची कल्याण भावना लुप्त होती जा रही है। आज तो प्रायः यह दशा है कि पिता, पुत्र, माता, भगिनी आदि संबंधी एवं स्नेही परस्पर आत्मा के शत्रु रूप बने हैं। इन आत्माओं की क्या दशा होगी, यहां से मृत्यु के पश्चात उनकी क्या गति होगी, उन्हें धर्म पुनः कब प्राप्त होगा और कब वह जन्म-मरण आदि के इन अनन्त काल से भोगे जाते दुःखों से मुक्त होंगे? इस प्रकार के वास्तविक कल्याणकारी विचार करने का भाव तो आज प्रायः नष्ट हो गया है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 5 मार्च 2015

सत्य की गवेषणा


सत्य की गवेषणा कब हो सकती है? क्या आपको आपकी दशा से प्रतीत होता है कि ‘आप सत्य के अर्थी हैं’? संसार के प्रति रोष और मोक्ष के प्रति गाढ राग रखे बिना क्या पारमार्थिक सत्य प्राप्त हो सकता है? नहीं प्राप्त हो सकता है, क्योंकि जो अर्थ एवं काम में अपना कल्याण मानते हैं और इसके लिए धर्म को भी ताक में रख देते हैं, जो संसार की सुरक्षा और वृद्धि के लिए ही उत्सुक हैं, जो अवकाश मिलने पर जैसे भी देव-गुरु मिल जाएं, उन गुरु की इच्छानुसार सेवा करने से अधिक कुछ करने के लिए तत्पर नहीं हैं, वे सत्य की गवेषणा नहीं कर सकते हैं। सत्य की गवेषणा करनी हो तो पुद्गल की ओर से दृष्टि हटनी चाहिए और आत्म-कल्याण की ओर दृष्टि जमनी चाहिए। आत्म-कल्याण ही ध्येय होना चाहिए और उसके लिए आप यदि मोक्षार्थी बन जाएं तो आपके लिए सत्य की गवेषणा अत्यंत सरल हो जाए। आत्मा को डूबने से बचाए, आत्मा के गुणों को विकसित करने की प्रेरणा दे, ऐसे चारित्रवान सुगुरुओं की शरण प्राप्त कर आत्मा इस काल में भी मोक्षमार्ग की शक्ति अनुसार आराधना कर सकती है। ऐसे सुगुरु कम ही सही, लेकिन आज भी हैं, बात सिर्फ उन्हें पहचानने की और कुगुरुओं से बचने की है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

बुधवार, 4 मार्च 2015

वेशधारी वंचक शासन के लिए खतरनाक



आज वेशधारी वंचक लाखों रुपयों का व्यय उन्मार्ग की पुष्टि में करवा रहे हैं। अधर्म में भी धर्म मनवा कर वेशधारी वंचक उदार एवं विवेकी श्रावकों के धन का भी पानी करवा रहे हैं। जो क्षेत्र आज अभावग्रस्त हैं और जिन सुक्षेत्रों की पुष्टि एवं वृद्धि के लिए आज बहुत कुछ करने की जरूरत है, उन सुक्षेत्रों की ओर वेशधारी वंचक उदार श्रावकों के हृदय में अरुचि उत्पन्न कर रहे हैं और अपनी ख्याति आदि के लिए धर्म के नाम पर कितना ही धन व्यय करवा रहे हैं। इस प्रकार भी श्री जैन शासन पर आक्रमण करने वाले पुष्ट बनें और बढें, उन वेशधारी वंचकों की जय-जयकार होती रहे, ऐसा भी आज बहुत-बहुत हो रहा है। यह कतई उचित नहीं है। धन का व्यय करने वाला यदि धर्म के, शासन के लिए समर्पण की भावना से अनुप्रेरित होकर कर रहा है तो यह उसकी भावनाओं का शोषण है, इसमें शासन की हानि है। वेशधारी वंचक शासन को हानि पहुंचाने वाले हैं और आराधना के कार्य में विक्षेप डालने वाले हैं। भगवान की अनुपस्थिति में रक्षक तो वे ही हैं न? वे रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो भयानक अनर्थ मचेगा ही, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। कोतवालों के वेश में चोर बने साधुओं से शासन श्रेष्ठ कैसे रह सकता है? जो पुण्यात्मा चकोर बनकर विराधना से बचेंगे और आराधना में तत्पर बनेंगे, वे इस काल में भी अपना कल्याण सर्वोत्तम प्रकार से कर सकेंगे, बाकी तो जिसका जैसा भाग्य !

वेशधारी वंचकों से सावधान

इस काल की महिमा यह है कि आज साधु वेशधारी वंचक शीथिलाचारी बहुसंख्यक हो गए हैं। जिस शासन के नाम पर ये मौज करते हैं, जिस शासन के नाम पर ये मान-सम्मान का उपभोग करते हैं, जिस शासन के नाम पर ये लोगों में पूजे जाते हैं और जिस शासन के नाम पर ये संसार में गुरु बने घूमते हैं; उसी शासन के लिए ये वंचक शत्रु का कार्य करते हैं। जिनकी ओर से शासन की प्रभावना की आशा कर सकते हैं, वे ही शासन की बदनामी करते हैं और शासन की बदनामी के कारणभूत होते हुए भी ये शासन के प्रति वफादार निर्दोष एवं पवित्र मुनियों पर झूठे कलंक लगाते हैं।

यद्यपि शासन समर्पित साधुओं को वस्तुतः व्यक्तिगत आक्रमणों की परवाह नहीं होती, परन्तु उन वंचक वेशधारियों के पाप से कतिपय आत्मा सन्मार्ग से च्युत हो जाएंगे और वे उन्मार्ग पर बढ जाएंगे। ऐसे समय में कल्याणार्थियों को तो अधिकाधिक सावधान होना चाहिए। अशक्ति के कारण आराधना कम-अधिक हो, उसकी वैसी चिन्ता नहीं है, परन्तु आराधना के मार्ग से भ्रष्ट न हो जाएं, इसकी तो पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। जहां तक हो सके वहां तक आराधना अधिक करने की भावना तो सम्यग्दृष्टि की होती ही है, परन्तु किसी वंचक के जाल में फंसकर मार्ग न चूक जाएं, यह विशेष संभालने योग्य है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

मंगलवार, 3 मार्च 2015

आचार्य, उपाध्याय और साधु पर विशेष जिम्मेदारी



पंच परमेष्ठियों में आचार्य तीसरे, उपाध्याय चौथे व साधु पांचवें पद पर आराध्य हैं। आचार्य आदि आराधक भी हैं और आराध्य भी हैं। उस-उस पद की उनमें जितनी-जितनी योग्यता हो, उतने-उतने अंश में वे आराध्य हैं। आचार्य आदि की आराधना का आधार भी वे स्वयं जिस पद पर स्थित हैं, उस पद के वे कितने वफादार हैं, उस पर निर्भर है। ये पद वेश अथवा ग्राह्य आडम्बर के ही कारण नहीं हैं, अपितु मुख्यतः गुणों के आधार पर हैं। श्री आचार्य, उपाध्याय और साधु पद पर गिने जाने वाली आत्माओं की जोखिम व जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ जाती है। वे तो वर्तमान में शासन के आधारभूत गिने जाते हैं। इनको अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए कि हम अपने-अपने पद को अधिक उज्ज्वल न कर सकते हों तो भी कम से कम उसे लांछित तो नहीं ही होने दें। आचार्य, उपाध्याय और साधु अपने पद से विपरीत व्यवहार करें, तो वे देखने में आचार्य, उपाध्याय अथवा साधु होने पर भी शासन को कुरेद कर खाने वाले कीडों का ही कार्य करते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

होली न खेलें !



एक निवेदन है। इस बार देश में स्वाइन फ्लू से दो हजार लोगों की मृत्यु हुई है। यह सरकारी आँकड़ा उन लोगों का है, जिन्होंने बड़े अस्पतालों में पहुंचकर दम तोड़ा है। वास्तविक आँकड़ा इससे काफी बड़ा है, क्योंकि ग्रामीण अंचल में इससे अधिक लोगों ने दम तोड़ा है।

दूसरी बात, बे मौसम बरसात और ओलावृष्टि ने हजारों किसानों को जीतेजी मार दिया है और आप पर भी इसका असर आनेवाले दिनों में पडनेवाला है।

ऐसे में इस बार पानी-रंग अथवा गुलाल से होली न खेलें। यह पानी, रंग, गुलाल मौसम के मद्देनजर आपके लिए भी जानलेवा हो सकता है। आपकी त्वचा खराब कर सकता है। रंग और गुलाल में क्या-क्या हैं, जो आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसका विश्लेषण यहां करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि विषय बहुत लम्बा है और विष काफी गंभीर परिणाम देने वाला।

खासकर वे लोग तो हर्गिज होली न खेलें, जिन्हें जुकाम, खांसी, अस्थमा है या जल्दी जुकाम होता है।

किसी को खेलना बहुत जरूरी लगे तो मुंह और ललाट पर नारियल तेल, सरसों का तेल या पोण्ड्स अथवा कोई अच्छी क्रीम गहरी लगाएं और केवल हल्का सा तिलक करवा लें।

अन्यथा इन केमिकल्स से खेलने की बजाय घर में परिवार व दोस्तों के साथ बैठकर शब्दों की पिचकारियां छोडें। हंसें-हंसाएं। लेकिन, इसमें भी मर्यादा का खयाल रहे।

बेहतर तो यह है कि प्रभु का स्मरण करें और आपदाओं से उबरने के लिए प्रार्थना करें।

आपको अच्छा लगे तो अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश अवश्य पहुंचाएं.

सोमवार, 2 मार्च 2015

पुरुषार्थ तो केवल धर्म में ही करणीय



संसार में चार पुरुषार्थ कहे गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सबसे पहला स्थान धर्म का है। धर्म से ही अर्थ, काम या मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए करने जैसा पुरुषार्थ एक ही है, धर्म। सवाल यह है कि आप धर्म किस अपेक्षा से कर रहे हैं? अर्थ-काम की प्राप्ति के लिए या मोक्ष प्राप्ति के लिए? कदाचित आप धर्म नहीं कर रहे हैं, तब आपको जो अर्थ और काम की शक्ति प्राप्त है, वह पूर्व जन्मों के अर्जित पुण्य के फलस्वरूप है और उसी अर्थ व काम को बढाने के लिए ही पुरुषार्थ है, तो उसकी प्राप्ति की सीमा वहीं तक है, जहां तक आपका पूर्व कृत पुण्य शेष है, जिस दिन आपका पुण्य का खाता पूरा हो गया, सारा खेल खत्म और फिर महादुःख का प्रारम्भ तय है। लेकिन, यदि आप धर्म भी साथ-साथ कर रहे हैं, तब यह सवाल खडा होगा कि यह धर्म आप किस अपेक्षा से कर रहे हैं? अर्थ, काम आदि लौकिक सुखों की प्राप्ति के लिए या देवगति और स्वर्गीय सुख प्राप्ति की कामना से किए गए धर्म से भी पुण्य तो अर्जित होता है, लेकिन यह पापानुबंधी पुण्य है। इससे कदाचित् आपको अर्थ, काम या देवगति तो प्राप्त हो जाएंगे, लेकिन जुगनू की चमक की तरह। पहले सुखाभास और फिर महादुःख! यह विष मिश्रित दूध की तरह है, जिसमें मिश्री और बादाम आदि हैं और पीने में स्वादिष्ट लगता है, किन्तु विष का प्रभाव होते ही महावेदना और मौत होती है। अर्थ-काम अनर्थकारी हैं, इनके लिए धर्म नहीं होता, धर्म तो मोक्ष का साधन है। मोक्ष की भावना से या निराशंस भाव से धर्म करने का ही ज्ञानी विधान करते हैं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

रविवार, 1 मार्च 2015

शिक्षा के नाम पर ठगी



शिक्षा संस्थानों में आज तो "सा विद्या या विमुक्तये" का बोर्ड लगाकर ठगने का धंधा किया जाता है, क्योंकि आज के शिक्षण में मुक्ति की तो कोई बात होती ही नहीं है। "सा विद्या या विमुक्तये" का अर्थ तो यह कि जो विद्या मुक्ति का बोध दे, लेकिन आज के स्कूल-कॉलेजों में मुक्ति के शिक्षण का स्थान तो स्वच्छंदता और विनाशक-विज्ञान ने ले लिया है। सारी पीढी बिगड रही है, यह आप आँखों से देख रहे हैं, फिर भी हम से पूछते हैं कि ‘शिक्षण में खराबी क्या है?’ जीवन का निर्माण बाल्यकाल से प्रारम्भ हो जाता है। बच्चों को हृदय की पवित्रता का मूल्य उतना नहीं बताया जाता, जितना दूसरी चीजों का बताया जाता है। आज शिक्षा में नैतिक अवमूल्यन की समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हृदय की पवित्रता केवल साधुओं के लिए ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, शासकों और परिवार के सदस्यों के लिए भी बहुत जरूरी है। साधारण व्यक्ति प्रवाह के पीछे चलता है। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ कहावत ही नहीं, यथार्थ है। जब एक व्यक्ति उचित-अनुचित ढंग से सत्ता प्राप्त कर कथित बडा आदमी बन जाता है, तब दूसरा आदमी भी सोचता है कि भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाकर बडा आदमी बना जा सकता है। सत्ता पर जब धर्म का अंकुश नहीं रहता, तो वह निरंकुश हो जाती है। सत्ता राष्ट्र की हो या परिवार की, उस पर से जब-जब धर्म का अंकुश हटता है, वह उन्मादी हो जाती है। प्रवाह को वही मोड सकता है, जो असाधारण हो, जो सत्ता और अर्थ प्राप्ति के लिए भ्रष्ट उपायों का सहारा न ले।

शिक्षा-व्यवस्था को बदलने की जरूरत

शिक्षक का वास्तविक कार्य तो यह है कि वह भाषा आदि सब सिखाने के साथ बालक को समझदार बनाए और उसमें ऐसी क्षमता विकसित करे कि वह अपने आप संस्कारी बने। माता-पिता ने यदि योग्य संस्कारों का सिंचन किया होता तो शिक्षक का आधा कार्य पूर्ण हो गया होता। फिर शिक्षक को केवल माता-पिता द्वारा प्रदत्त संस्कारों को विकसित करने की ही जिम्मेदारी रहती। भाषाज्ञान सिखाना यह वस्तुतः ज्ञान-दान नहीं, अपितु ज्ञान के साधन का दान है। सद्गुण प्राप्ति का और अवगुण त्याग का शिक्षण, यही शिक्षा का साध्य है। परन्तु, आज तो प्रायः जैसी माता-पिता की हालत है, वैसी शिक्षक की भी हालत है। सच्चा शिक्षक मात्र किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं होता। सच्चा शिक्षक तो विद्यार्थी में सुसंस्कारों का सिंचन करता है। मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित रहने वाला और विद्यार्थियों के सुसंस्कारों का लक्ष्य नहीं रखने वाला शिक्षक, शिक्षक नहीं, अपितु एक विशिष्ट मजदूर मात्र है। हमारे सोच को और हमारी बेकार हो चुकी समग्र शिक्षा-व्यवस्था को आज बदलने की जरूरत है। सब अपना कर्तव्य पालन करें और आने वाले कल को सुसंस्कारी बनाएं।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

पागलों की पैदावार बढ रही है



आपने आपकी संतानों को जिस प्रकार पढाया है और पढा रहे हैं, उसको देखते हुए यह नहीं माना जा सकता कि आप में सम्यग्दर्शन है। आपने उन्हें ऐसा शिक्षण दिलाया है कि वे आपको पाठ पढावें, यहां तक तो ठीक, परन्तु आपको ही उठालें तो कोई अचरज की बात नहीं। शिक्षण किसे कहा जाए? इसकी समझ आज न तो मां-बाप को है और न शिक्षकों को। और ये सब शिक्षण देने निकले हैं। ऐसे शिक्षण से तो आज पागलों की पैदावार बढ रही है। सुख में विराग और दुःख में समाधि, यह भगवान अरिहंत देवों द्वारा जगत को दिया गया ऊॅंचे से ऊॅंचा शिक्षण है। ऐसे शिक्षण में प्रायः संघ के अधिकांश लोगों की रुचि नहीं है, इसलिए बहुत विकृतियां हो रही हैं। आप अपनी संतानों को स्वार्थ के लिए ही पढाते हैं। शिक्षण देकर भी आप अपकार कर रहे हैं। ज्ञान का दान करके भी अज्ञानी बनाने का काम आपने शुरू किया है। ये कमाकर लावें, यही आप चाहते हैं, परन्तु असंतोष की आग में ये जल मरें, इसकी आपको चिन्ता नहीं है। संतान को कमाने के लिए पढावे, वह जैन नहीं। पेट के लिए विद्या पढाना पाप है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

असत्य-अधर्म का विरोध न करे वो साधु नहीं



यदि सत्य-धर्म का पक्ष रखना, असत्य-अधर्म का विरोध करना झगडा करना माना जाता है तो ऐसा झगडालू होना उचित है, साधु धर्म का तो यह प्रमुख दायित्त्व है। जिस साधु में अपने सत्य-धर्म के प्रति इतनी-सी निष्ठा भी न हो, वह पंच महाव्रतों का पालन किस प्रकार कर सकता है? यदि न्याय-नीति की बात करना, धर्म की रक्षा के लिए अडजाना, झगडा करना है तो ऐसा झगडालू होना, अपने सत्य-धर्म का पालन करना है। कहने वाले प्रभु महावीर को भी तो झगडालू कहते थे। श्री जिन आज्ञा का पालन करना और जिन आज्ञा विरोधी गतिविधियों पर अंकुश के लिए संघर्ष करना झगडा करना है तो ऐसे झगडालू होने पर हमें गर्व है, संतोष है, क्योंकि ऐसा करके ही साधु अपने साधुपन को बचा पाता है। ऐसी परिस्थिति में मूकदर्शक रहना, साधुपन पर दोष लगाना है। महाव्रतों का खण्डन करने जैसा है। सत्य के लिए मरना पडे तो मंजूर है, किन्तु झूठ के आगे समर्पण तो किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं ही है। भगवान का संघ, भगवान के सिद्धान्तों की रक्षा के लिए लडना पडे तो लडता है, शेष दुनिया की किसी चीज के लिए वह नहीं लडता। लडते समय भी सामने वाले के हित की चिन्ता तो उसके हृदय में रही हुई होती है। क्योंकि, यह तो धर्मयुद्ध है। ये सिद्धान्त तो जगत मात्र का कल्याण करने वाला है। असत्य-अधर्म का विरोध किए बिना सच्चे साधु को चैन नहीं पडता। यदि चैन पडे तो उसका साधुपन नहीं रहता।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

धर्म को सर्वांग रूप से अपनाएं !



धर्म का सही मूल्यांकन करना सीखें। यदि सही मूल्यांकन करते रहेंगे तो दृष्टि सम्यक रहेगी, नीर-क्षीर विभाजन-विवेक कायम रहेगा, धर्म-पथ पर अपना संतुलन बनाए रख सकेंगे। अन्यथा धर्म का कोई एक अंग आवश्यकता से अधिक महत्व पाकर धर्म-शरीर की सर्वांगीण उन्नति में बाधक बन जाएगा। सम्यक दृष्टि यही है कि जिसका जितना मूल्य है, उसको उतना ही महत्व दें। न अधिक, न कम। कंकड-पत्थर, काँच, हीरा, मोती, नीलम, मणि सबका अपना-अपना महत्व है। मिट्टी, लोहा, ताँबा, पीतल, चाँदी, सोना, सबका अलग-अलग मूल्य है। जिसका जितना महत्व है, उसका उतना ही मूल्य है।

मसलन, दान देना अच्छा है। धर्म का एक अंग है। दान अधिक है या कम इसका कोई महत्व नहीं होता। परंतु देते समय चित्त की चेतना कैसी है, भावना कैसी है, यही ध्यान देने की बात है। यदि उस समय चित्त में क्रोध या चिडचिडाहट या घृणा या द्वेष या भय या आतंक या बदले में कुछ प्राप्त करने की तीव्र लालसा है या यश की प्रबल कामना है अथवा प्रतिस्पर्धा का उत्कट भाव है, तो ऐसा दान शुद्ध, निष्काम, निरहंकार चित्त से दिए गए दान की अपेक्षा बहुत हल्का है। भले ही मात्रा में अधिक क्यों न हो। शुद्ध चित्त से दिए गए दान का अधिक महत्व है। इससे अपरिग्रह और त्याग धर्म पुष्ट होता है।

इसी प्रकार उपवास भी धर्म का एक अंग है। मानसिक संयम के लिए उपवास उपयोगी है। उपवास करें और मन भिन्न-भिन्न पकवानों में रमता रहे तो ऐसा उपवास हीन कोटि का होगा। उपवास करें और केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन को भी संयमित करें तो उपवास उच्च कोटि का होगा। उपवास करने वाला शील-सदाचार के क्षेत्र में दुर्बल हो तो उपवास करने वाले शीलवान व्यक्ति से हीन है। इसी प्रकार सामिष भोजन से निरामिष भोजन, चटपटे मिर्च-मसाले वाले राजसी भोजन से सादा सात्विक भोजन करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ है, उत्तम है। अपना अधिकांश समय आलस्य, प्रमाद, तंद्रा में गँवाने वाले व्यक्ति की अपेक्षा यथावश्यक कम से कम समय सोकर, अधिक से अधिक समय जागरूक रहने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से अधिक अच्छा है। इसी प्रकार भजन-कीर्तन तल्लीनता के लिए है। चित्त को एकाग्र करने के साधन हैं। किसी गुरु या संत का दर्शन, उनको किया गया नमन, उनके प्रति श्रद्धा जगाने के लिए है। उनके गुणों को देखकर मन में प्रेरणा जगाएँ और वे गुण स्वयं धारण करें, इसी निमित्त हैं। किसी धर्मग्रंथ का पाठ करते हैं, अथवा श्रवण करते हैं तो इसलिए कि उससे हमें प्रेरणा मिले, मार्गदर्शन मिले, जिससे कि धर्म जीवन में उतार सकें। कोरा वाणी-विलास और बुद्धि-विलास धर्म नहीं है। जीवन में उतरा हुआ शील-सदाचार ही धर्म है।-आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा