गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

गांधी से हुआ टकराव (2)


सन् 1915 के आसपास अहमदाबाद में आश्रम स्थापित कर गांधीजी ने जब राजनीतिज्ञ के अतिरिक्त महात्माकी भूमिका अदा करनी शुरू कर दी, तब धर्म सिद्धान्तों की व्याख्या के बारे में गांधीजी और जैनाचार्यों के बीच भारी विवाद हुआ था, जिसमें मुख्य भूमिका युवा मुनिश्री रामविजयजी ने अदा की थी। मुनिश्री रामविजयजी को गांधीजी की विचारधारा का सर्वप्रथम परिचय उनकी दीक्षा के दूसरे ही वर्ष में हुआ। उस समय मुनिश्री की उम्र मात्र 18 वर्ष की थी। वे अपने गुरुजी मुनिश्री प्रेमविजयजी महाराज के साथ वडोदरा के एक उपाश्रय में बिराजमान थे। पास की जैन बोर्डिंग के प्रांगण में जैन समाज के प्रतिष्ठित लोगों की ओर से गांधीजी का सम्मान आयोजित किया गया था। मुनिश्री अपने गुरुदेव के साथ उपाश्रय में बैठे-बैठे माइक पर आ रही भाषणों की आवाज सुन रहे थे। जैन श्रेष्ठी गांधीजी के सम्मान के लिए फूलों के हार लाए थे, लेकिन गांधीजी ने उन्हें अस्वीकार करते हुए जैन धर्म पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आपके धर्म के अनुसार इसमें एकेन्दि्रय जीव की हिंसा होती है। गांधीजी का इस तरह कटाक्ष करना मुनिश्री को नागंवार गुजरा, वे बहुत व्यथित हुए। गांधीजी को स्वतंत्रता संग्राम और उनके आश्रम के लिए सर्वाधिक मदद भी जैन समाज से ही मिल रही थी, ऊपर से ऐसा बर्ताव?
फिर गांधीजी ने अहमदाबाद में स्थायी होने के बाद इन्दुलाल याज्ञिक का नवजीवनमासिक अपने हाथ में लिया और उसे साप्ताहिक बनाया। इस साप्ताहिक में उन्होंने अहिंसा के विषय में जो विचार प्रकाशित करने शुरू किए, उसके कारण भी जैनियों में भारी ऊहापोह की स्थिति बन गई। गांधीजी को पहली बार झटका तब लगा, जब उन्होंने सुना कि मुनिश्री रामविजयजी के प्रवचनों में अपार जनसमूह उमड रहा है और बडे-बडे मैदानों में पांव धरने की भी जगह नहीं बचती। प्रवचनों का प्रभाव ऐसा कि भक्ष्य-अभक्ष्य के सेवन और अहमदाबाद में पनपती होटल-संस्कृति के खिलाफ दिए गए उनके प्रवचनों से लोग होटलों में खाना-पीना बंद कर दे रहे हैं, बडे-बडे नामी होटलों के बन्द होने की नौबत आ गई है। गांधीजी का सोच बना कि ऐसा प्रभावशाली मुनि यदि मेरे आंदोलन में जुड जाए तो इसका काफी लाभ होगा और उन्होंने मुनिश्री को अपने साथ जुडने के लिए प्रस्ताव भिजवाना शुरू कर दिया। एक बार गांधीजी ने मुनिश्री के प्रवचन में आने के लिए समाचार कहलवाए तो मुनिश्री ने साफ शब्दों में कहलवा दिया कि प्रवचन में आना चाहें तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन यहां आकर वे राजनीति की बात नहीं कर सकेंगे
गांधीजी को लगा कि इस मुनि को पटाना इतना आसान नहीं है, तब उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल को आगे किया। वल्लभभाई भी एक नेता की नहीं, बल्कि श्रोता की हैसियत से मुनिश्री रामविजयजी के प्रवचनों में आते और घण्टों तक बैठकर इस युवा मुनि की मंत्रमुग्ध करदेने वाली वाणी को सुनते। एक बार सरदार से रहा नहीं गया और उन्होंने अपने निहीत उद्देश्य की बात मुनिश्री के सामने प्रकट कर ही दी। सरदार पटेल ने कहा- महाराजश्री! इस समय गांधीजी के नेतृत्व में देश में स्वराज के लिए जो आंदोलन चल रहा है, वह भी धार्मिक कार्य ही है। यदि आप जैसा कोई उसमें रुचि ले तो प्रजा में जागृति आएगी, क्या आपको ऐसा नहीं लगता?’ गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुडने का यह खुला निमंत्रण था, परन्तु मुनिश्री रामविजयजी ऐसे प्रलोभनों से परे थे। उन्होंने तुरन्त जवाब दिया- इस आंदोलन में मुझे धार्मिकता का अंश भी दिखाई नहीं देता। जिस दिन मुझे इसमें धार्मिकता दिखाई देगी, उस दिन किसी के भी निमंत्रण की आशा रखे बगैर मैं स्वयं आकर इससे जुड जाऊंगा।इस उत्तर को सुनकर सरदार पटेल निराश होकर चले गए। इसके बाद भी गांधीजी और सरदार पटेल ने काफी प्रयास किए, किन्तु उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली।
मुनिश्री का साफ मानना था कि आत्म-धर्म की अवज्ञा कर राष्ट्र-धर्म का उपदेश देने वाले राष्ट्र के लिए भी श्रापरूप हैं। ऐसे उपदेश से राष्ट्र-हितैषियों को भी सावधान रहना चाहिए। राष्ट्रधर्म को राष्ट्रधर्म के रूप में पहचानने में किसी को भी विरोध नहीं हो सकता, परन्तु जब राष्ट्रधर्म को युगधर्म के रूप में निरूपित कर उसे ही प्रधानपद बनाकर आत्मधर्म को, आत्मधर्म के उपासकों को और आत्मधर्म के विशिष्ट अंगों को धक्का पहुंचाने का प्रयास हो तो उसके विरूद्ध सत्यधर्म के उपासक के प्रबल विरोध में कोई नवीनता नहीं है।मुनिश्री रामविजयजी के इन धारदार शब्दों से राष्ट्रधर्म और आत्मधर्म की उनकी विचारधारा और व्याख्या एकदम स्पष्ट हो जाती है। आज राष्ट्र की जो हालत है, उसे देखकर हम समझ सकते हैं कि मुनिश्री की तब कही हुई बात कितनी सटीक और यथार्थ है। आज राष्ट्रधर्म में से उसकी आत्मा गायब है, उसी का परिणाम है भयंकर भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और छल-कपट की राजनीति; जिसकी शुरुआत गांधीजी के समय ही हो गई थी। (क्रमश:)

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